मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार के भोजपुर जिले में बालू खनन संचालन से उत्पन्न हुआ। Bihar State Mining Corporation Limited (BSMC) ने जिले के बालू घाटों के संचालन के लिए उप-ठेकेदारों के चयन हेतु ई-नीलामी के लिए निविदा सूचना प्रकाशित की।
याचिकाकर्ता कंपनी ने इस निविदा प्रक्रिया में भाग लिया और सर्वाधिक बोलीदार होने के कारण उसे खनगांव (बहियारा) बालू घाट आवंटित किया गया। इसने रु.5,53,41,610/- की बोली लगाई थी। आवश्यक राशि जमा करने के बाद इसके पक्ष में वर्क ऑर्डर जारी किया गया।
याचिकाकर्ता और BSMC के बीच 27.06.2022 को एक समझौता निष्पादित एवं पंजीकृत किया गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने आवंटित बालू घाट पर खनन गतिविधियां शुरू कीं।
याचिकाकर्ता के अनुसार, संचालन जारी था, जब अचानक BSMC के प्रबंध निदेशक ने पत्र संख्या 360 दिनांक 03.03.2023 जारी किया। इस पत्र द्वारा यह आरोप लगाते हुए कि याचिकाकर्ता ने अनुमत खनन क्षेत्र से बाहर 90060 घन फुट बालू का उत्खनन किया है, उस पर रु.96,97,705/- का जुर्माना लगाया गया। याचिकाकर्ता को यह राशि 24 घंटे के भीतर जमा करने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि उसने 03.03.2023 को ही यह राशि दबाव में, तथा बालू के परिवहन के लिए आवश्यक e-transit challans के सृजन पर प्रतिबंध लगाने की धमकी के तहत, जमा कर दी।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष दायर रिट याचिका में इस जुर्माने को चुनौती दी गई और इससे जुड़े कई अन्य राहतें मांगी गईं। याचिकाकर्ता ने पत्र संख्या 360 दिनांक 03.03.2023 को रद्द करने, जमा किए गए जुर्माने की राशि की वापसी का निर्देश देने, तथा प्रबंध निदेशक की क्षमता और Bihar Minerals (Concession, Prevention of Illegal Mining, Transportation & Storage) Rules, 2019 (2019 नियम) के कुछ प्रावधानों की प्रयोज्यता से संबंधित घोषणाएं मांगीं।
याचिकाकर्ता के मामले का मुख्य आधार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह जुर्माना बिना:
- किसी भी पूर्व शो-कॉज नोटिस के,
- सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना, या
- उस निरीक्षण या जांच रिपोर्ट की प्रतिलिपि उपलब्ध कराए बिना, जिसके आधार पर जुर्माना लगाया गया,
लगाया गया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इंगित किया कि impugned आदेश में स्वयं यह उल्लेख है कि 24.02.2023 और 25.02.2023 को निरीक्षण किया गया, जिसमें कथित रूप से पाया गया कि न तो कोई साइनबोर्ड लगाया गया था, न ही सीमा-दीवार निर्मित थी और अनुमत क्षेत्र के बाहर से बालू का उत्खनन किया गया था। परंतु याचिकाकर्ता ने कहा कि उसे किसी भी निरीक्षण की सूचना नहीं दी गई और न ही उसके समक्ष कोई निरीक्षण किया गया।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से यह आरोप अस्वीकार किया कि उसने अनुमत क्षेत्र से बाहर बालू का उत्खनन किया। उसका कहना था कि इतने बड़े जुर्माने को, बिना उसे आरोपों का प्रतिवाद करने का अवसर दिए, लगाना अवैध है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है।
समर्थन में, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा किया:
- निर्णय दिनांक 09.05.2023, C.W.J.C. No.3400 of 2023, M/s. Uma Associates vs. State of Bihar and Ors.,
- निर्णय दिनांक 01.08.2025, C.W.J.C. No.17442 of 2023, M/s. Shri Vijay Kumar Singh vs. The State of Bihar and Ors., तथा
- निर्णय दिनांक 01.08.2024, C.W.J.C. No.9091 of 2023, Maa Bhawani Traders vs. The State of Bihar & Ors.
याचिकाकर्ता ने 2019 नियमों के नियम 20, नियम 30 और नियम 56 का भी संदर्भ दिया। उसका तर्क था कि इन नियमों में इस प्रकार खनिज का मूल्य क्षतिपूरक रूप से वसूलने का प्रावधान नहीं है, और यह कि, किसी भी स्थिति में, नियम 30 केवल पहले उल्लंघन के लिए पट्टेदार पर 1,00,000/- रुपये तक का दंड लगाने की अनुमति देता है। इस आधार पर, उसने कहा कि लगभग 97 लाख रुपये का जुर्माना नियमों से परे है और टिकाऊ नहीं है।
दूसरी ओर, BSMC (प्रतिवादी सं. 5 और 6) के अधिवक्ताओं ने जुर्माने का समर्थन किया। उनका कहना था कि निदेशक, खान एवं भूविज्ञान विभाग के आदेश पर भोजपुर में अवैध खनन, परिवहन और खनिज भंडारण की जांच के लिए बालू घाटों का निरीक्षण करने को एक विशेष जांच दल गठित किया गया। इस निरीक्षण के दौरान कथित रूप से पाया गया कि याचिकाकर्ता के बालू घाट पर कोई साइनबोर्ड नहीं था और अनुमत क्षेत्र के बाहर खनन चल रहा था।
2019 नियमों के नियम 59 के तहत किए गए इस निरीक्षण के आधार पर अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने आवंटित क्षेत्र से बाहर 90060 CFT बालू का अवैध उत्खनन किया है। उन्होंने कहा कि रु.96,97,705/- का जुर्माना 2019 नियमों के नियम 56(2) के तहत लगाया गया।
प्रतिवादियों का यह भी तर्क था कि याचिकाकर्ता ने मांग उठाए जाने वाले उसी दिन, बिना आपत्ति, जुर्माने की राशि जमा कर दी। प्रतिवादियों के अनुसार, इससे यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और जुर्माना मान लिया। उन्होंने याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत पटना उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों से इस मामले को अलग बताने की भी कोशिश की।
M/s. Shri Vijay Kumar Singh के निर्णय के संबंध में उन्होंने बताया कि उसके विरुद्ध एक अपील (L.P.A. No. 887 of 2025) खंडपीठ के समक्ष दायर की गई है, जिससे संकेत मिलता है कि विधिक स्थिति अंतिम नहीं है। M/s. Uma Associates और Maa Bhawani Traders के संबंध में उनका तर्क था कि तथ्यों में अंतर था। Uma Associates में पट्टेदार ने जुर्माने की राशि बिल्कुल जमा नहीं की थी। Maa Bhawani Traders में जुर्माना आपत्ति के साथ जमा किया गया था। इसके विपरीत, यहां याचिकाकर्ता ने राशि बिना आपत्ति, उसी दिन जमा की और लगभग नौ महीने बाद, अनुबंध पूरा करने के बाद, रिट दायर की।
न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने दोनों पक्षों के तर्कों पर विचार किया। न्यायालय ने अपने ध्यान को मूल प्रश्न पर केंद्रित किया: क्या बिना किसी नोटिस या सुनवाई दिए लगाया गया यह जुर्माना आदेश टिक सकता है?
न्यायालय ने नोट किया कि अभिलेख पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह दर्शाया जाए कि:
- जुर्माना आदेश से पूर्व कोई शो-कॉज नोटिस जारी किया गया हो,
- याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया गया हो, या
- जांच या निरीक्षण रिपोर्ट की प्रति याचिकाकर्ता को दी गई हो।
न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता को इतने बड़े जुर्माने की राशि जमा करने के लिए केवल 24 घंटे का समय दिया गया। न्यायालय के मत में, इस प्रकार का जुर्माना केवल याचिकाकर्ता की उपस्थिति में की गई विधिवत जांच के बाद ही विधिसम्मत रूप से लगाया जा सकता था, जो यहां स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी।
प्राकृतिक न्याय के महत्व को रेखांकित करने के लिए न्यायालय ने Hon’ble Supreme Court के हालिया निर्णय Krishnadatt Awasthy v. State of M.P. & Ors., (2025) 7 SCC 545 पर भरोसा किया। न्यायालय ने उस निर्णय के अनुच्छेद 43 से 48 उद्धृत किए।
Krishnadatt Awasthy में Supreme Court ने यह प्रतिपादित किया कि:
- सुनवाई का अवसर इतना बुनियादी है कि न्यायालय प्रायः विधानों को प्रक्रिया संबंधी आधारों पर निरस्त होने से बचाने के लिए उनमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को पढ़ते हैं।
- प्राकृतिक न्याय का पालन न होना अपने आप में ही prejudice (हानि/पूर्वाग्रह) है; अलग से prejudice का प्रमाण सामान्यतः आवश्यक नहीं होता, सिवाय उन सीमित परिस्थितियों के जहां कानूनन केवल एक ही निष्कर्ष संभव हो।
- प्राधिकरण यह मानकर कि सुनवाई देने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, स्वयं ही सुनवाई की प्रक्रिया को टाल नहीं सकते; prejudice का प्रश्न बाद में न्यायालय के विचार हेतु होता है, इसे प्राधिकरण पूर्वानुमान नहीं कर सकता।
- प्राकृतिक न्याय लचीला है, परन्तु निष्पक्ष सुनवाई से वंचित करना, जिससे वास्तविक prejudice हो, आदेश को अवैध बना देता है।
इन सिद्धांतों से प्रेरणा लेते हुए पटना उच्च न्यायालय ने यह मूल नियम दोहराया कि किसी को बिना सुने दंडित नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, audi alteram partem के सिद्धांत के तीन अनिवार्य तत्व हैं:
- जिस व्यक्ति के अधिकार प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने वाले हों, उसे सुनवाई का यथोचित अवसर दिया जाए,
- प्राधिकरण निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करे, और
- प्राधिकरण मनन कर कारणयुक्त, बोलता (speaking) आदेश पारित करे।
तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि निरीक्षण याचिकाकर्ता की पीठ पीछे किया गया। निरीक्षण के बाद न तो रिपोर्ट साझा की गई और न ही कोई शो-कॉज नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता को सुने बिना ही जुर्माना लगा दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्णत: उल्लंघन है और आदेश को non est (शून्य/निरस्त) बना देता है।
न्यायालय ने यह भी पाया कि इतनी बड़ी राशि जमा करने के लिए केवल 24 घंटे का समय देना, और साथ ही e-challans के सृजन पर रोक लगाने की धमकी देना, मनमाना और अवैध है।
इसी आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता पर रु.96,97,705/- का जुर्माना लगाने वाले दिनांक 03.03.2023 के impugned पत्र को रद्द (quash) और निरस्त कर दिया। हालांकि, न्यायालय ने यह अंतिम निर्णय नहीं दिया कि 2019 नियमों के तहत कोई दंड लगाया जा सकता है या नहीं। इसके बजाय, उसने मामला पुनः प्रतिवादियों के पास भेज दिया।
प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया है कि वे मामले पर पुनर्विचार करें और याचिकाकर्ता को उचित सुनवाई का अवसर देकर, विधि के अनुसार एक कारणयुक्त, बोलता आदेश पारित करें। इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ रिट याचिका को स्वीकार कर लिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में खान एवं भूविज्ञान विभाग तथा BSMC से जुड़े सभी बालू घाट पट्टेदारों और ठेकेदारों के लिए महत्वपूर्ण है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि प्राधिकरण कथित अवैध खनन के लिए भारी-भरकम जुर्माना बिना पहले नोटिस जारी किए, आधारभूत सामग्री उपलब्ध कराए, और प्रभावित पक्ष को सुने, नहीं लगा सकते। भले ही प्राधिकरण यह मानता हो कि पट्टेदार ने नियमों का उल्लंघन किया है, फिर भी उसे निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन करना ही होगा।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि e-challans पर रोक की धमकी देकर 24 घंटे के भीतर भारी राशि जमा करने के लिए ठेकेदार को मजबूर करना मनमाना है। ऐसी तरकीबें विधिसम्मत जांच का स्थान नहीं ले सकतीं।
व्यवहारिक रूप से, इसका अर्थ यह है कि बिहार में बालू ठेकेदार और अन्य खनिज पट्टाधारी ऐसे जुर्मानों को चुनौती दे सकते हैं जो अचानक और बिना समुचित सुनवाई के लगाए जाते हैं। साथ ही, यह निर्णय अवैध खनन को संरक्षण नहीं देता; यह केवल यह आग्रह करता है कि किसी भी उल्लंघन का निष्कर्ष पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया से ही निकाला जाए।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या Bihar State Mining Corporation बिना शो-कॉज नोटिस जारी किए, निरीक्षण रिपोर्ट साझा किए या सुनवाई का अवसर दिए, कथित अवैध उत्खनन के लिए बालू घाट के पट्टेदार पर भारी जुर्माना लगा सकती है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना पारित ऐसा जुर्माना आदेश अवैध और non est है तथा उसे रद्द किया जाना चाहिए। - प्रश्न: e-challans रोकने की धमकी के तहत, और 24 घंटे की अवधि में, पट्टेदार द्वारा तुरंत जुर्माने की राशि जमा कर देने से क्या सुनवाई न देने की खामी दूर हो जाती है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने दबाव में भुगतान किया और नोटिस व सुनवाई के अभाव से आदेश फिर भी टिकाऊ नहीं रह जाता। - प्रश्न: यदि जुर्माना आदेश रद्द हो जाने के बाद भी प्राधिकरण को पट्टेदार द्वारा अवैध खनन का संदेह हो तो उन्हें क्या करना चाहिए?
उत्तर: उन्हें विधिवत जांच करनी होगी, यथोचित सुनवाई का अवसर देना होगा, और कानून के अनुरूप एक नया, बोलता आदेश पारित करना होगा।
न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय
- Krishnadatt Awasthy v. State of M.P. & Ors., (2025) 7 SCC 545.
- M/s. Uma Associates vs. State of Bihar and Ors., C.W.J.C. No.3400 of 2023 (निर्णय दिनांक 09.05.2023) – याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत।
- M/s. Shri Vijay Kumar Singh vs. The State of Bihar and Ors., C.W.J.C. No.17442 of 2023 (निर्णय दिनांक 01.08.2025) – याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत; अपील L.P.A. No. 887 of 2025 पर प्रतिवादियों द्वारा संदर्भित।
- Maa Bhawani Traders vs. The State of Bihar & Ors., C.W.J.C. No.9091 of 2023 (निर्णय दिनांक 01.08.2024) – याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.17683 of 2023
मामले का शीर्षक: Shivshankar Kaushik Infrastructure Pvt. Limited vs. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024(2) PLJR 503
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Sandeep Kumar
निर्णय की तिथि: 27-01-2026
मामले की प्रकृति: कथित अवैध बालू खनन पर लगाए गए जुर्माने को चुनौती देते हुए दायर सिविल रिट अधिकारिता के अंतर्गत रिट याचिका।
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Suraj Samdarshi, Advocate; Mr. Avinash Shekhar
- राज्य की ओर से: Mr. Pramendra Kumar Singh, A.C. to G.A.-10
- Bihar State Mining Corporation Ltd. की ओर से: Mr. Ranjeet Kumar Pandey, Advocate; Mr. Rajesh Kumar, Advocate
- Mines की ओर से: Mr. Naresh Dikshit, Spl. P.P.; Ms. Shruti Singh, Advocate
प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान: Bihar Minerals (Concession, Prevention of Illegal Mining, Transportation & Storage) Rules, 2019 – विशेष रूप से नियम 20, 30, 56 और 59 (जैसा कि बहस में संदर्भित किया गया)।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें
यदि आपको यह व्याख्या सहायक लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि
बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप Samvida Law Associates को और अद्यतनों के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



