पटना उच्च न्यायालय का फैसला : विश्वविद्यालय को संबद्ध कॉलेज में प्राचार्य-प्रभारी नियुक्त करने का अधिकार — वरिष्ठता और वैधानिक नियंत्रण को प्राथमिकता (2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय बिहार के निजी सहायता प्राप्त (private aided) एवं संबद्ध कॉलेजों के प्रशासन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर स्पष्टता प्रदान करता है। इस फैसले में अदालत ने यह तय किया कि जब कॉलेज में प्रबंधन को लेकर विवाद हो या वैध शासी निकाय (Governing Body) अस्तित्व में न हो, तब विश्वविद्यालय को यह अधिकार है कि वह वरिष्ठ शिक्षक को प्राचार्य-प्रभारी (Principal In-Charge) के रूप में नियुक्त करे।

यह मामला गोपालगंज जिले के एक संस्कृत महाविद्यालय, जो कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध है, से संबंधित था। याचिकाकर्ता एक शिक्षक थे, जिन्हें वर्ष 2017 में नियमित प्राचार्य के चिकित्सा अवकाश पर जाने के बाद प्राचार्य-प्रभारी का कार्यभार दिया गया था

याचिकाकर्ता का कहना था कि जब वे पहले से ही प्राचार्य-प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे थे, तब विश्वविद्यालय द्वारा दिनांक 20 जून 2019 को एक अन्य शिक्षक को प्राचार्य-प्रभारी नियुक्त करना मनमाना और अवैध है।

हालाँकि विश्वविद्यालय का तर्क था कि नए नियुक्त शिक्षक वरिष्ठतम (senior-most) हैं और कॉलेज में वैध शासी निकाय के अभाव में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था।

इस विवाद का निपटारा माननीय न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा द्वारा 10 जनवरी 2023 को किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं—

  • कॉलेज के नियमित प्राचार्य नवंबर 2017 में चिकित्सा अवकाश पर चले गए।
  • उस समय याचिकाकर्ता को प्राचार्य-प्रभारी का कार्यभार सौंपा गया।
  • बाद में कॉलेज की शासी निकाय का कार्यकाल समाप्त हो गया, और नया शासी निकाय विधिवत रूप से गठित नहीं हो सका।
  • विश्वविद्यालय ने इस स्थिति को देखते हुए 20.06.2019 को एक आदेश पारित कर वरिष्ठ शिक्षक को प्राचार्य-प्रभारी नियुक्त कर दिया तथा उन्हें शासी निकाय के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष यह दलीलें रखीं—

  • वे पहले से ही प्राचार्य-प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे थे, इसलिए विश्वविद्यालय को नया आदेश जारी करने का अधिकार नहीं था।
  • यह कॉलेज एक निजी सहायता प्राप्त संस्था है, जहाँ प्राचार्य-प्रभारी की नियुक्ति का अधिकार केवल शासी निकाय को है।
  • विश्वविद्यालय का आदेश कॉलेज के आंतरिक प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप है।
  • नियुक्त किए गए वरिष्ठ शिक्षक कथित रूप से आवश्यक योग्यता नहीं रखते।
  • यह पूरा कदम विश्वविद्यालय द्वारा शासी निकाय पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से उठाया गया।

विश्वविद्यालय एवं प्रतिवादी का पक्ष

विश्वविद्यालय और नियुक्त शिक्षक ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि—

  • नियुक्त शिक्षक याचिकाकर्ता से कई वर्षों वरिष्ठ हैं और उनकी नियुक्ति विधिवत आयोग के माध्यम से हुई थी।
  • याचिकाकर्ता तुलनात्मक रूप से कनिष्ठ (junior) हैं।
  • कॉलेज में कोई वैध शासी निकाय अस्तित्व में नहीं था, जिससे प्रशासनिक शून्यता उत्पन्न हो गई थी।
  • विश्वविद्यालय को अपने अधिनियम और विनियमों के अंतर्गत संबद्ध कॉलेजों पर पर्यवेक्षण और नियंत्रण का अधिकार है।
  • जब नियमित प्राचार्य अनुपस्थित हो, तो वरिष्ठतम शिक्षक को प्रभार देना वैधानिक व्यवस्था है।

उच्च न्यायालय द्वारा विचार किए गए वैधानिक प्रावधान

पटना उच्च न्यायालय ने बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम और संबंधित स्टैच्यूट्स (Statutes) का अध्ययन किया, जिनमें यह प्रावधान है कि—

  • संबद्ध कॉलेजों की शासी निकाय विश्वविद्यालय के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है।
  • यदि शासी निकाय के गठन या कार्यप्रणाली में कठिनाई हो, तो सिंडिकेट (Syndicate) हस्तक्षेप कर सकता है।
  • नियमित प्राचार्य के अभाव में वरिष्ठतम शिक्षक को प्राचार्य-प्रभारी बनाया जाना चाहिए।
  • नियमित प्राचार्य की नियुक्ति स्वयं विश्वविद्यालय द्वारा की जाती है, जिससे यह स्पष्ट है कि अंतरिम व्यवस्था में भी विश्वविद्यालय की भूमिका वैध है।

उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ

न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्न महत्वपूर्ण बातें कहीं—

  • निजी सहायता प्राप्त संबद्ध कॉलेज पूरी तरह स्वतंत्र संस्थान नहीं हैं; वे विश्वविद्यालय के वैधानिक नियंत्रण में कार्य करते हैं।
  • शासी निकाय और कॉलेज प्रशासन को विश्वविद्यालय के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है।
  • जब कॉलेज में शासी निकाय प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर रहा हो, तब विश्वविद्यालय का हस्तक्षेप कानूनसम्मत है।
  • चूँकि नियुक्त शिक्षक वरिष्ठ हैं और योग्य भी हैं, इसलिए उन्हें प्राचार्य-प्रभारी बनाना तर्कसंगत और वैध है।
  • याचिकाकर्ता का यह दावा कि उन्हें प्राचार्य-प्रभारी बने रहने का अधिकार है, कानून में कहीं भी समर्थित नहीं है

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की मूल नियुक्ति या यूजीसी नियमों के अनुपालन जैसे प्रश्न इस मामले के दायरे में नहीं आते।

पटना उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय

उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि—

  • विश्वविद्यालय द्वारा दिनांक 20 जून 2019 को पारित आदेश पूरी तरह वैध है।
  • वरिष्ठ शिक्षक को प्राचार्य-प्रभारी नियुक्त करना कानून और नियमों के अनुरूप है।
  • पहले दिया गया अंतरिम स्थगन (stay) समाप्त किया जाता है।
  • रिट याचिका खारिज की जाती है, और किसी प्रकार का खर्च (cost) नहीं लगाया गया।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला बिहार के कॉलेज प्रशासन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है—

  • यह विश्वविद्यालयों के पर्यवेक्षणीय अधिकार को मजबूत करता है।
  • यह स्पष्ट करता है कि वरिष्ठता और वैधानिक प्रावधान, व्यक्तिगत दावों से ऊपर हैं।
  • यह सुनिश्चित करता है कि कॉलेजों में प्रशासनिक कार्य ठप न पड़े
  • यह निर्णय अनावश्यक आंतरिक विवादों पर अंकुश लगाने में सहायक होगा।

आम जनता और शैक्षणिक संस्थानों के लिए यह फैसला यह संदेश देता है कि सार्वजनिक धन से सहायता प्राप्त संस्थानों में अनुशासन और वैधानिक नियंत्रण आवश्यक है

कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)

  • क्या विश्वविद्यालय प्राचार्य-प्रभारी नियुक्त कर सकता है?
    ➤ हाँ, वैधानिक प्रावधानों के तहत।
  • क्या याचिकाकर्ता को प्रभार पर बने रहने का अधिकार था?
    ➤ नहीं, वरिष्ठ शिक्षक का दावा प्राथमिक है।
  • क्या विश्वविद्यालय का आदेश मनमाना था?
    ➤ नहीं, यह कानूनसम्मत और उचित था।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Braj Kishore Singh v. State of Bihar & Others, 1997 (1) PLJR 509 (Full Bench)

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम एवं संबंधित स्टैच्यूट्स के सिद्धांत

मामले का शीर्षक

शिक्षक बनाम विश्वविद्यालय प्राधिकारी एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 24241 of 2019

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 573

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री अशोक कुमार चौधरी, अधिवक्ता; सुश्री सुष्मिता कुमारी, अधिवक्ता
  • विश्वविद्यालय की ओर से: श्री दीपक कुमार, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी शिक्षक की ओर से: श्री संजीव कुमार झा, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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