पटना उच्च न्यायालय का निर्णय: स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन में झूठे दावे पर रोक, 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 16 अगस्त 2022 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन (Swatantra Sainik Samman Pension) के झूठे दावे को खारिज कर दिया गया। यह मामला एक व्यक्ति द्वारा दाखिल किया गया था जिसने यह दावा किया था कि वह 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुआ था और छह महीने जेल में रहा था।

यह मामला माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह की एकलपीठ के समक्ष सुना गया। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसने वर्ष 1942 में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और 2 अक्टूबर 1942 से 2 अप्रैल 1943 तक जेल में रहा। उसने वर्ष 1981 में बिहार सरकार को स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के लिए आवेदन दिया था।

लेकिन केंद्र सरकार ने उसका आवेदन 1986 में अस्वीकार कर दिया और पुनः 2014 में यह कहते हुए खारिज किया कि उसके पास आवश्यक प्रमाण नहीं हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 2018 में, यानी लगभग 32 वर्ष बाद, पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता का कहना था कि वह वास्तव में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल था और सरकार ने बिना उचित कारण उसके आवेदन को अस्वीकार कर दिया। उसने अदालत से गुहार लगाई कि उसे स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन योजना, 1980 के तहत पेंशन दी जाए।

सरकार की दलीलें और योजना की शर्तें

केंद्र सरकार और बिहार राज्य ने जवाब में कहा कि—

“हर व्यक्ति जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, उसे पेंशन का अधिकार नहीं मिलता। केवल वही लोग पात्र हैं जो योजना की शर्तें पूरी करते हैं और अपने दावे का दस्तावेजी प्रमाण दे सकते हैं।”

स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन योजना, 1980 के अनुसार, केवल निम्नलिखित परिस्थितियों में पेंशन दी जा सकती है:

  1. छह महीने या उससे अधिक की जेल सजा (महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए तीन महीने)।
  2. छह महीने या उससे अधिक भूमिगत रहना, बशर्ते व्यक्ति घोषित अपराधी रहा हो या उस पर गिरफ्तारी का इनाम घोषित हुआ हो।
  3. जिला बदर (externment) या नजरबंदी (internment) का आदेश।
  4. संपत्ति की जब्ती या बिक्री स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण।
  5. गोली या लाठीचार्ज से स्थायी रूप से घायल होना।
  6. सरकारी नौकरी से बर्खास्त होना स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण।
  7. कोड़ों की सजा (flogging) मिलना।

इसके लिए आवेदनकर्ता को जेल प्रमाणपत्र या राज्य सरकार द्वारा प्रमाणित अभिलेख देने होते हैं। यदि पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध न हों तो रिकॉर्ड न मिलने का प्रमाणपत्र (NARC) और दो सह-कैदी प्रमाणपत्र (Co-Prisoner Certificates) आवश्यक होते हैं।

अदालत की जांच और निष्कर्ष

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रमाण अधूरे और विरोधाभासी थे। उसने दो सह-कैदी प्रमाणपत्र (CPC) दिए—

  • एक परम गौंड से, जो स्वयं केवल नौ महीने जेल में रहे थे (जो योजना के अनुसार एक वर्ष से कम है)।
  • दूसरा रामकृष्ण से, जिन्होंने यह नहीं बताया कि वे और याचिकाकर्ता कब एक ही जेल में थे।

अदालत ने कहा कि ये प्रमाण योजना के नियमों के अनुसार मान्य नहीं हैं।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता की उम्र के संबंध में गंभीर विरोधाभास पाए गए:

  • वर्ष 1992 के शपथपत्र में उसने अपनी उम्र 56 वर्ष बताई, यानी उसका जन्म वर्ष 1936 हुआ।
  • उसने दावा किया कि वह 1942 में जेल गया, यानी उस समय उसकी उम्र मात्र 6 वर्ष थी।
  • उसके वोटर पहचान पत्र (2004) में उम्र 60 वर्ष दर्ज है, यानी जन्म वर्ष 1944 हुआ।

राज्य सरकार ने 2013 में एक मेडिकल बोर्ड गठित किया जिसने उसकी उम्र 70-80 वर्ष बताई, जिससे यह साबित हुआ कि 1942 में वह अधिकतम 9 वर्ष का बच्चा रहा होगा।

अदालत ने कहा कि यह सब दर्शाता है कि याचिकाकर्ता ने “किसी भी तरह से सरकारी पेंशन प्राप्त करने के लिए झूठे दस्तावेज़ों का उपयोग किया।”

याचिका की देरी और परिणाम

अदालत ने यह भी नोट किया कि यह याचिका अत्यधिक विलंब से दायर की गई थी। पेंशन अस्वीकृति 1986 में हुई थी, जबकि याचिका 2018 में दाखिल हुई — यानी 32 वर्ष बाद।

कानून के अनुसार, इतने लंबे समय के बाद राहत की मांग करना “लैचेस (Laches)” कहलाता है, जो स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि इतने वर्षों बाद पुरानी मांगें पुनर्जीवित नहीं की जा सकतीं, खासकर जब यह मामला सार्वजनिक धन (public funds) से जुड़ा हो।

अदालत का निर्णय

न्यायालय ने निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्ट निर्णय दिया:

  • याचिकाकर्ता ने योजना के अनुसार आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए।
  • मंडल जेल, सासाराम के रिकॉर्ड में उसका नाम कभी कैदी के रूप में दर्ज नहीं पाया गया।
  • उसकी उम्र के दस्तावेज़ विरोधाभासी हैं और स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी असंभव लगती है।
  • याचिका तीस साल की देरी से दायर हुई, इसलिए न्यायिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है।

इसलिए अदालत ने कहा —

“यह याचिका पूरी तरह से गलत और भ्रामक है, जिसे खारिज किया जाता है।”

निर्णय का महत्व और प्रभाव

  1. ईमानदार स्वतंत्रता सेनानियों की गरिमा की रक्षा: अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी योजनाएँ केवल सच्चे सेनानियों के लिए हैं। झूठे दावे उनके बलिदान का अपमान हैं।
  2. कठोर पात्रता और प्रमाण की अनिवार्यता: बिना ठोस दस्तावेज़ों के किसी को भी पेंशन नहीं दी जा सकती। अदालत सहानुभूति के आधार पर नियम नहीं तोड़ सकती।
  3. विलंबित मामलों पर रोक: इतने वर्षों बाद पुराने मामलों को खोलने की प्रवृत्ति को अदालत ने अस्वीकार किया।
  4. सरकारी धन की सुरक्षा: अदालत ने कहा कि सरकारी पेंशन या सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रोकना न्यायपालिका की जिम्मेदारी है।
  5. प्रशासनिक निष्पक्षता की पुष्टि: यह निर्णय बताता है कि यदि किसी योजना में कड़ा सत्यापन आवश्यक है, तो वह सार्वजनिक विश्वास की रक्षा के लिए आवश्यक है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या याचिकाकर्ता स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पाने का पात्र था?
    ❖ नहीं। उसने कोई वैध प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।
  • क्या उसकी उम्र के दस्तावेज़ों में विरोधाभास था?
    ❖ हाँ। मेडिकल जांच और दस्तावेज़ों के अनुसार वह 1942 में मात्र 9 वर्ष का था।
  • क्या 32 वर्ष की देरी के बाद याचिका स्वीकार की जा सकती थी?
    ❖ नहीं। इतनी देर से याचिका दाखिल करना कानूनन अस्वीकार्य है।
  • क्या अधिकारियों ने न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया?
    ❖ नहीं। उन्होंने योजना के अनुसार आवेदन की जाँच की और उचित निर्णय लिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • Union of India v. Kameshwar Prasad Singh, AIR 1997 SC 1789
  • State of Madhya Pradesh v. Nandlal Jaiswal, (1986) 4 SCC 566
  • M.P. Rural Road Development Authority v. L.G. Chaudhary Engineers & Contractors, (2012) 3 SCC 495

मामले का शीर्षक

Ramjee Sah v. Union of India & Ors.

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 3903 of 2018

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 58

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री धनश्वर प्रसाद गुप्ता
  • राज्य की ओर से: श्री मनीष कुमार, GP-4
  • भारत सरकार की ओर से: श्री मनोज कुमार सिंह, CGC

निर्णय का लिंक

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