पटना उच्च न्यायालय: रेलवे कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को प्रक्रिया की त्रुटियों के कारण रद्द किया गया (पटना उच्च न्यायालय, 2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक रेलवे कर्मचारी पर लगाए गए अनुशासनात्मक दंड को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि जांच की प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामियां थीं। न्यायालय ने पाया कि “विजिलेंस चेक” यानी औचक निरीक्षण के दौरान स्वतंत्र गवाह नहीं बुलाए गए थे और जांच अधिकारी खुद ही विजिलेंस विभाग से थे, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठता है। इतना ही नहीं, कर्मचारी पर जो आरोप लगाए गए थे, वे और जो निष्कर्ष निकाले गए, दोनों में भारी विरोधाभास था। इन कारणों से अदालत ने पूरे अनुशासनात्मक कार्यवाही को असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण ठहराया।

यह मामला एक पूछताछ-सह-आरक्षण लिपिक (Enquiry-cum-Reservation Clerk) से जुड़ा था, जो पूर्व मध्य रेलवे में कार्यरत था। 12 सितंबर 2011 को विजिलेंस टीम ने अचानक उसके काउंटर की जांच की। इस दौरान टीम ने दावा किया कि कर्मचारी के पास सरकारी नकद में ₹632 की कमी है। तीन तत्काल फॉर्म बिना दावेदार के पाए गए और कुछ आरक्षण पर्चियों में अनियमितता बताई गई। इसके आधार पर तीन आरोपपत्र जारी किए गए — मुख्य आरोप था कि कर्मचारी ने ₹632 सरकारी नकद से कम रखकर कदाचार किया और रेलवे सेवा (आचरण) नियम, 1966 का उल्लंघन किया।

विभागीय जांच हुई, और जांच अधिकारी की रिपोर्ट के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने कर्मचारी का वेतन तीन साल के लिए कम करने की सजा दी। अपीलीय प्राधिकारी ने भी इसे बरकरार रखा। इसके बाद कर्मचारी ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), पटना पीठ में आवेदन (O.A. No. 17/2016) दायर किया, जिसे 01.08.2019 को खारिज कर दिया गया। अंततः कर्मचारी ने पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

न्यायालय के सामने कर्मचारी की दलीलें थीं —

  1. विजिलेंस जांच के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था, जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Moni Shankar v. Union of India (2008) 3 SCC 484 के अनुसार यह आवश्यक है।
  2. जांच अधिकारी स्वयं विजिलेंस निरीक्षक थे, जो Union of India v. Prakash Kumar Tondon (2009) 2 SCC 541 में निषिद्ध बताया गया है।
  3. आरोपपत्र में ₹632 की कमी बताई गई थी, लेकिन अंत में अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने ₹76 की अधिकता के आधार पर सजा दी — यह कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।

अदालत ने पाया कि “संयुक्त निरीक्षण ज्ञापन” (Joint Inspection Memo) अधूरा और अस्पष्ट था। उसमें यह तक स्पष्ट नहीं था कि नकद में कमी है या अधिकता। चूंकि मूल आरोप “कमी” का था, बाद में “अधिकता” बताकर सजा देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।

10 नवम्बर 2022 को पटना उच्च न्यायालय ने अपने मौखिक निर्णय में कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने —

  • केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश (01.08.2019),
  • अनुशासनात्मक प्राधिकारी का आदेश (23.07.2013), और
  • अपीलीय प्राधिकारी का आदेश (10.03.2014)
    — तीनों को रद्द कर दिया।

रेलवे प्रशासन को आदेश दिया गया कि तीन महीने के भीतर कर्मचारी का वेतन बहाल कर उसका समस्त बकाया भुगतान किया जाए।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. सरकारी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा: यह फैसला बताता है कि कोई भी विभाग केवल विजिलेंस रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकता, जब तक जांच निष्पक्ष और साक्ष्यपूर्ण न हो।
  2. स्वतंत्र गवाहों की अनिवार्यता: रेलवे या अन्य विभागों में जब विजिलेंस टीम औचक निरीक्षण करती है, तो स्वतंत्र गवाह मौजूद रहना जरूरी है। बिना गवाह की जांच संदिग्ध मानी जाएगी।
  3. निष्पक्ष जांच अधिकारी: अगर जांच अधिकारी उसी विभाग (जैसे विजिलेंस) से है, जिसने जांच की, तो वह निष्पक्ष नहीं मानी जाएगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में बाहरी अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए।
  4. आरोप बदलना अनुचित: अगर आरोप “कमी” का है तो सजा “अधिकता” पर नहीं दी जा सकती। यह न्याय के मूल सिद्धांत “प्राकृतिक न्याय” का उल्लंघन है।
  5. केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश की समीक्षा: यह फैसला बताता है कि जब न्यायाधिकरण महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी कर देता है, तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
  6. व्यवहारिक राहत: केवल निर्णय रद्द करना ही नहीं, बल्कि अदालत ने बकाया राशि भुगतान का आदेश भी दिया, जिससे कर्मचारी को वास्तविक राहत मिली।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या बिना स्वतंत्र गवाह के की गई विजिलेंस जांच वैध है?
    नहीं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Moni Shankar v. Union of India के अनुसार स्वतंत्र गवाह जरूरी हैं। रेलवे यह नहीं दिखा सका कि उसकी प्रक्रिया अलग है, इसलिए जांच रिपोर्ट अविश्वसनीय मानी गई।
  • क्या विजिलेंस निरीक्षक को जांच अधिकारी बनाया जा सकता है?
    नहीं। अदालत ने माना कि जांच अधिकारी विजिलेंस निरीक्षक थे और विभाग ने इसका खंडन नहीं किया। इसलिए जांच निष्पक्ष नहीं मानी गई।
  • क्या अनुशासनात्मक प्राधिकारी आरोप बदल सकता है?
    नहीं। आरोप में ₹632 की कमी का जिक्र था, लेकिन दंड आदेश में ₹76 की अधिकता बताई गई। अदालत ने कहा कि यह M.V. Bijlani v. Union of India (2006) 5 SCC 88 के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
  • क्या न्यायाधिकरण का आदेश सही था?
    नहीं। अदालत ने कहा कि न्यायाधिकरण ने महत्वपूर्ण तथ्यों और कानून की अनदेखी की, इसलिए उसका आदेश रद्द किया गया।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  1. Moni Shankar v. Union of India, (2008) 3 SCC 484 — स्वतंत्र गवाहों की अनिवार्यता पर।
  2. Union of India & Others v. Prakash Kumar Tondon, (2009) 2 SCC 541 — विजिलेंस अधिकारी की निष्पक्षता पर।
  3. M.V. Bijlani v. Union of India, (2006) 5 SCC 88 — आरोप से परे जाकर सजा देने की मनाही पर।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Moni Shankar v. Union of India (2008) 3 SCC 484 — स्वतंत्र गवाहों के सिद्धांत को दोहराया गया।
  • Union of India v. Prakash Kumar Tondon (2009) 2 SCC 541 — जांच की निष्पक्षता पर जोर दिया गया।
  • M.V. Bijlani v. Union of India (2006) 5 SCC 88 — आरोप के दायरे से बाहर जाकर सजा देने को अवैध ठहराया गया।

मामले का शीर्षक

  • याचिकाकर्ता बनाम भारत संघ, पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक एवं अन्य

केस नंबर

  • Civil Writ Jurisdiction Case No. 11663 of 2021
  • केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण, पटना पीठ के O.A. No. 17/2016 (दिनांक 01.08.2019) से उत्पन्न मामला

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 11

न्यायमूर्ति गण का नाम

  • माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
  • माननीय न्यायमूर्ति पुर्णेंदु सिंह
    (मौखिक निर्णय दिनांक 10 नवम्बर 2022)

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री गौतम साहा, अधिवक्ता
  • प्रतिवादी (भारत संघ/पूर्व मध्य रेलवे) की ओर से: श्री प्रवीन कुमार सिन्हा, अधिवक्ता तथा श्री राकेश कुमार सिन्हा, केंद्रीय सरकारी अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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