निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 10 अक्टूबर 2022 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि यदि किसी मकान मालिक को अपने किराए के मकान की आवश्यकता ईमानदारी से है, तब भी निचली अदालत को यह जांचना अनिवार्य है कि क्या मकान का कुछ भाग खाली करवाकर आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा ने दिया। मामला शिवहर जिले का था, जहाँ एक मकान मालिक ने अपने किरायेदार के खिलाफ बेदखली वाद संख्या 3/2008 दायर किया था। मकान मालिक का कहना था कि उसे अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए उक्त कमरे की आवश्यकता है ताकि वह उसे गोडाउन (गोदाम) के रूप में उपयोग कर सके।
निचली अदालत (मुंसिफ, शिवहर) ने 16 जून 2016 को निर्णय देते हुए मकान मालिक के पक्ष में आदेश पारित किया और किरायेदार को 60 दिनों में मकान खाली करने का निर्देश दिया।
किरायेदार ने इस निर्णय के खिलाफ बिहार भवन (पट्टा, किराया एवं निष्कासन) नियंत्रण अधिनियम, 1982 की धारा 14(8) के तहत नागरिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 178/2016 पटना उच्च न्यायालय में दायर की। उसका मुख्य तर्क था कि निचली अदालत ने आंशिक निष्कासन (Partial Eviction) की संभावना पर विचार नहीं किया, जो कि कानून के अनुसार आवश्यक है।
विवाद की पृष्ठभूमि
मकान मालिक ने बताया कि उसने उक्त संपत्ति खरीदी और उसमें कई कमरे बनाकर “भुखलू साह मार्केट” नाम से बाजार विकसित किया। उसने एक कमरा किरायेदार को 500 रुपये मासिक किराए पर प्रिंटिंग प्रेस चलाने के लिए दिया था। बाद में उसे स्वयं के व्यवसाय के लिए उसी कमरे की आवश्यकता पड़ी, इसलिए उसने बेदखली वाद दायर किया।
किरायेदार ने यह कहा कि वह कमरे को मकान मालिक के भाई से किराए पर लेकर बैठा था, न कि स्वयं वादी से। उसने कहा कि किरायानामा (दिनांक 25 दिसंबर 2005) जाली है।
निचली अदालत का निर्णय
साक्ष्य और गवाहों की जाँच के बाद अदालत ने यह पाया कि मकान मालिक और किरायेदार का संबंध स्थापित है, और मकान मालिक की आवश्यकता सच्ची और वाजिब (bona fide) है। इसलिए अदालत ने किरायेदार को बेदखली का आदेश दे दिया।
लेकिन अदालत ने यह नहीं देखा कि क्या आंशिक निष्कासन से मकान मालिक की जरूरत पूरी की जा सकती थी।
उच्च न्यायालय के समक्ष मुद्दा
क्या निचली अदालत ने धारा 11(1)(c) के तहत आंशिक निष्कासन की संभावना पर विचार किए बिना गलती की है?
पक्षकारों की दलीलें
किरायेदार की ओर से:
- अदालत पर यह वैधानिक जिम्मेदारी थी कि वह यह देखे कि क्या मकान का केवल कुछ भाग खाली कराने से मकान मालिक की जरूरत पूरी हो सकती है।
- यह दायित्व अदालत पर स्वतः लागू होता है, भले ही किरायेदार ने इसे विशेष रूप से न कहा हो।
- उन्होंने इन फैसलों पर भरोसा किया:
- Krishna Murari Prasad v. Mitar Singh, AIR 1994 SC 489
- Bimal Kishore Gupta v. Beena Devi, 2001 (2) PLJR 837
- Anis Khan v. Shyam Babu Sah, Civil Revision No. 179/2016 (Patna High Court, 2019)
मकान मालिक की ओर से:
- कोई ऐसा मुद्दा लिखित बयान में नहीं उठाया गया था।
- किराए का कमरा केवल 10×11 फीट (110 वर्ग फीट) था और एक संकरा रास्ता (2.5 फीट) था, जिससे आंशिक निष्कासन संभव नहीं था।
- एक छोटे कमरे को विभाजित कर आवश्यकता पूरी करना व्यावहारिक नहीं है।
- उन्होंने Veena Rani v. Ishrati Amanullah, AIR 1985 Pat 207 पर भरोसा किया।
न्यायालय का अवलोकन
पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि बिहार भवन (पट्टा, किराया एवं निष्कासन) नियंत्रण अधिनियम, 1982 की धारा 11(1)(c) के अनुसार अदालत को यह देखना अनिवार्य है कि—
“क्या मकान मालिक की उचित आवश्यकता केवल मकान के एक भाग के खाली होने से पूरी हो सकती है।”
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले Krishna Murari Prasad v. Mitar Singh (1994) का हवाला देते हुए कहा:
“भले ही मकान केवल एक कमरे का हो, फिर भी अदालत को यह विचार करना चाहिए कि क्या किसी प्रकार का विभाजन संभव है जिससे मकान मालिक की जरूरत पूरी हो जाए।”
इसके अतिरिक्त, Bimal Kishore Gupta v. Beena Devi (2001) में भी यह कहा गया था कि अदालत को स्वतः एक मुद्दा तैयार करना चाहिए और दोनों पक्षों को उस पर साक्ष्य देने का अवसर देना चाहिए।
इसी प्रकार, Anis Khan v. Shyam Babu Sah (2019) में पटना उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए मामला वापस भेजा था कि ट्रायल कोर्ट ने आंशिक निष्कासन पर विचार नहीं किया था।
उच्च न्यायालय का निर्णय
माननीय न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा ने कहा कि—
- निचली अदालत द्वारा यह पाया जाना कि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक है, एक सही निष्कर्ष था और उसे चुनौती नहीं दी गई।
- परंतु अदालत ने आंशिक निष्कासन की अनिवार्य जांच नहीं की, जो कानून के अनुसार आवश्यक थी।
इसलिए, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय को केवल इस सीमा तक रद्द किया कि मामला पुनः ट्रायल कोर्ट को भेजा जाए ताकि वह आंशिक निष्कासन के मुद्दे पर निर्णय करे।
अदालत ने निर्देश दिया:
- निचली अदालत एक नया मुद्दा तय करे कि क्या मकान का कुछ भाग खाली कराकर मकान मालिक की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
- दोनों पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए।
- यह कार्यवाही चार महीने के भीतर पूरी की जाए।
- मकान मालिक की bona fide आवश्यकता से संबंधित निष्कर्ष अपरिवर्तित रहेगा।
इस प्रकार, उच्च न्यायालय ने किरायेदार की पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की।
निर्णय का महत्व और प्रभाव
- निचली अदालतों पर वैधानिक दायित्व: अदालत को आंशिक निष्कासन पर स्वतः विचार करना होगा, चाहे किरायेदार ने इसकी मांग की हो या नहीं।
- किरायेदारों के अधिकारों की रक्षा: यह फैसला सुनिश्चित करता है कि किरायेदारों को पूरी तरह से बेदखल न किया जाए यदि मकान मालिक की आवश्यकता आंशिक रूप से पूरी हो सकती है।
- मकान मालिक और किरायेदार में संतुलन: यह फैसला बिहार किराया अधिनियम की उस भावना को सुदृढ़ करता है जिसमें दोनों पक्षों के हितों में संतुलन रखा गया है।
- निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शन: अब बिहार की सभी अदालतों को किरायेदारी विवादों में आंशिक निष्कासन का मुद्दा अवश्य तय करना होगा।
- त्वरित निपटान: उच्च न्यायालय ने 4 महीने की समय सीमा तय करके यह सुनिश्चित किया कि मामले अनावश्यक रूप से लटके न रहें।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या निचली अदालत ने आंशिक निष्कासन पर विचार न करके गलती की?
❖ हाँ। अदालत को यह देखना चाहिए था कि क्या मकान का कुछ भाग खाली कराना पर्याप्त होता। - क्या मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक (bona fide) थी?
❖ हाँ। यह तथ्य साबित था और बरकरार रखा गया। - क्या आंशिक निष्कासन पर विचार न करना आदेश को अधूरा बनाता है?
❖ हाँ। यह कानूनी त्रुटि है, इसलिए मामला पुनः भेजा गया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय
- Krishna Murari Prasad v. Mitar Singh, AIR 1994 SC 489
- Bimal Kishore Gupta v. Beena Devi, 2001 (2) PLJR 837
- Anis Khan v. Shyam Babu Sah, Civil Revision No. 179/2016 (Patna High Court, 2019)
- Veena Rani v. Ishrati Amanullah, AIR 1985 Pat 207
- Kalyan Singh Chauhan v. C.P. Joshi, AIR 2011 SC 1127
मामले का शीर्षक
Shyambabu Sah v. Shyam Babu Sah
केस नंबर
Civil Revision No. 178 of 2016
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 61
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- किरायेदार की ओर से (याचिकाकर्ता): श्री सुरेन्द्र किशोर ठाकुर
- मकान मालिक की ओर से (प्रतिवादी): श्री योगेन्द्र मिश्रा, श्री अरविंद कुमार झा
निर्णय का लिंक
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