निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने एक अहम मामले में यह स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस याचिका (Habeas Corpus Petition) केवल तब दायर की जा सकती है जब किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखा गया हो। अगर किसी व्यक्ति की हिरासत किसी वैध न्यायिक आदेश पर आधारित है, तो इस आधार पर हैबियस कॉर्पस दायर नहीं की जा सकती।
यह मामला सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एक दंपति थे जो स्वयं को एक लड़की (यहाँ ‘X’ कहा गया है) के चाचा और चाची बताते थे। उन्होंने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि ‘X’ को अल्पावास गृह (Short Stay Home) से मुक्त कर उन्हें सौंपा जाए।
यह लड़की एक POCSO विशेष न्यायालय (Protection of Children from Sexual Offences Act के अंतर्गत गठित अदालत) के आदेश से 18 मई 2022 को अल्पावास गृह भेजी गई थी। अदालत ने स्कूल रजिस्टर और आधार कार्ड के आधार पर यह पाया था कि ‘X’ अभी नाबालिग है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि —
- डॉक्टर की मेडिकल रिपोर्ट में ‘X’ की उम्र 18 वर्ष से अधिक बताई गई है।
- उसने धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत बयान दिया है कि उसने अपनी मर्जी से याचिकाकर्ताओं के भतीजे से विवाह किया है।
- उसने अपने माता-पिता के पास जाने से इनकार कर दिया था।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने तर्क दिया कि लड़की को अल्पावास गृह भेजने का आदेश एक सक्षम न्यायालय द्वारा दिया गया था, इसलिए यह अवैध हिरासत नहीं है। उन्होंने शिखा कुमारी बनाम बिहार राज्य (पूर्णपीठ निर्णय, 2020 (2) PLJR 15) का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत कानूनी न्यायिक आदेश पर आधारित होती है, तब हैबियस कॉर्पस याचिका बनती नहीं है।
न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि —
- POCSO विशेष न्यायालय ने पहले ही यह निष्कर्ष निकाला था कि ‘X’ नाबालिग है।
- उस निष्कर्ष को याचिकाकर्ताओं ने न तो किसी अपील में चुनौती दी, न किसी वैधानिक प्रक्रिया से पलटवाने की कोशिश की।
- जब किसी व्यक्ति की हिरासत किसी वैध न्यायिक आदेश से तय हुई हो, तब उस पर हैबियस कॉर्पस दायर नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता (जो लड़की के चाचा-चाची हैं) का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है कि वे लड़की की अभिरक्षा (custody) की मांग करें। क्योंकि यह मामला बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) और अभिभावक न्यायालय (Special POCSO Court) के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसलिए, पटना उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका को अविवेकपूर्ण और गैर-समुचित (misconceived) बताया और खारिज कर दिया।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला आम नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि हैबियस कॉर्पस केवल उसी स्थिति में दायर की जा सकती है जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को गैर-कानूनी ढंग से छीना गया हो। यदि किसी व्यक्ति को किसी न्यायिक आदेश के तहत रखा गया है, तो उस आदेश को सिर्फ उचित कानूनी प्रक्रिया (जैसे अपील) से ही चुनौती दी जा सकती है, न कि हैबियस कॉर्पस के माध्यम से।
बिहार सरकार और सामाजिक कल्याण विभाग के लिए यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि —
- यदि किसी लड़की को किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से अल्पावास गृह में रखा गया है, तो उस स्थिति को “अवैध हिरासत” नहीं कहा जा सकता।
- प्रशासन और बाल कल्याण संस्थान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी लड़कियों की सुरक्षा और भलाई के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएँ।
जनता के दृष्टिकोण से, यह फैसला यह संदेश देता है कि न्यायालय कानूनी प्रक्रिया की शुचिता (integrity of legal process) को सर्वोपरि मानता है। चाहे मामला संवेदनशील ही क्यों न हो, अदालत कानून की सीमाओं से बाहर जाकर आदेश नहीं देती।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- मुद्दा 1: क्या किसी व्यक्ति को न्यायिक आदेश के तहत अल्पावास गृह में रखने पर हैबियस कॉर्पस दायर की जा सकती है?
🔹 निर्णय: नहीं। जब हिरासत वैध न्यायिक आदेश पर आधारित हो, तब वह अवैध नहीं मानी जाती। इसलिए हैबियस कॉर्पस लागू नहीं होती। - मुद्दा 2: क्या लड़की के चाचा-चाची को उसकी अभिरक्षा का अधिकार है?
🔹 निर्णय: नहीं। याचिकाकर्ताओं का अभिरक्षा पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि मामला न्यायिक और बाल कल्याण प्राधिकरण के अधीन है। - मुद्दा 3: क्या उम्र निर्धारण (Age Determination) के न्यायिक निष्कर्ष को हैबियस कॉर्पस के जरिए चुनौती दी जा सकती है?
🔹 निर्णय: नहीं। यह अदालत का न्यायिक निष्कर्ष है, जिसे केवल उचित अपील या पुनर्विचार याचिका के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Shikha Kumari vs. The State of Bihar (Full Bench), 2020 (2) PLJR 15
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Shikha Kumari vs. The State of Bihar (Full Bench), 2020 (2) PLJR 15
मामले का शीर्षक
Sarswati Devi & Another v. The State of Bihar & Others
केस नंबर
Criminal Writ Jurisdiction Case No. 949 of 2022
(Triveniganj P.S. Case No. 183 of 2021, District – Supaul)
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 166
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह
माननीय श्री न्यायमूर्ति खातिम रेज़ा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री प्रमोद मिश्रा, अधिवक्ता
- प्रतिवादियों की ओर से: श्री पी. एन. शर्मा, ए.सी. टू एडवोकेट जनरल
निर्णय का लिंक
MTYjOTQ5IzIwMjIjNSNO-ASTUUBHvfJo=
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