पटना उच्च न्यायालय : न्यायिक हिरासत के आदेश के खिलाफ हैबियस कॉर्पस दायर नहीं की जा सकती (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था, जिसे नशे की अवैध खेती और व्यापार (गांजा की खेती) के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उसने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर यह दावा किया कि उसकी हिरासत अवैध है और अदालत द्वारा उसे न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश गलत तरीके से पारित किया गया है।

मामला नवादा जिले के नारदीगंज थाना कांड संख्या 49/2022 से संबंधित था। यह प्राथमिकी NDPS Act, 1985 की धारा 8(b)(c) और 20(a)(b) के तहत दर्ज की गई थी।

घटना का विवरण:
4 मार्च 2022 को नारदीगंज थाना के सहायक उप-निरीक्षक (A.S.I.) सुनील कुमार सिंह को गुप्त सूचना मिली कि छह लोग, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, गांजा की खेती और व्यापार कर रहे हैं। पुलिस जब मौके पर पहुँची तो कई लोग भागने लगे। गाँव वालों और चौकीदार ने याचिकाकर्ता का नाम बताया। याचिकाकर्ता के घर के बगल की जमीन से दो बड़े गांजा के पौधे (कुल वजन 7 किलो) बरामद हुए।

इस आधार पर मामला दर्ज हुआ और 3 नवम्बर 2022 को याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। 4 नवम्बर 2022 को सेशन जज, नवादा ने उसे 17 नवम्बर 2022 तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की, यह कहते हुए कि सेशन जज का आदेश “यांत्रिक” (mechanical) तरीके से पारित किया गया है, बिना यह देखे कि न्यायिक हिरासत की जरूरत है या नहीं। उसने मांग की कि उसे तुरंत रिहा किया जाए।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से:

  • न्यायिक आदेश बिना दिमाग लगाए पारित किया गया।
  • इस आदेश में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया, इसलिए यह आदेश अवैध है।
  • उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले Gautam Navlakha v. NIA (2021 SCC OnLine SC 382) और पटना उच्च न्यायालय के फैसले Kundan Kumar v. State of Bihar (2020(1) BLJ 648) का हवाला दिया।

राज्य की ओर से:

  • यह याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि Full Bench के फैसले Shikha Kumari v. State of Bihar (2020(2) PLJR 15) में स्पष्ट किया गया है कि हैबियस कॉर्पस का उपयोग न्यायिक हिरासत आदेश को चुनौती देने के लिए नहीं किया जा सकता।
  • याचिकाकर्ता के पास अन्य कानूनी उपाय हैं — जैसे जमानत या पुनरीक्षण (revision) का आवेदन।

न्यायालय का विश्लेषण

पीठ में माननीय न्यायमूर्ति सुधीर सिंह और माननीय न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह शामिल थे।

अदालत ने कहा कि यह मुद्दा पहले ही कई फैसलों में स्पष्ट किया जा चुका है कि यदि हिरासत किसी सक्षम न्यायालय के आदेश से हुई है, तो उस पर हैबियस कॉर्पस नहीं दायर की जा सकती, जब तक कि:

  1. आदेश पूर्णतः अवैध न हो,
  2. आदेश देने वाले न्यायालय को अधिकार (jurisdiction) न हो, या
  3. आदेश “पूरी तरह यांत्रिक” तरीके से पारित किया गया हो, बिना किसी न्यायिक विचार के।

अदालत ने Gautam Navlakha v. NIA (2021), Manubhai Ratilal Patel v. State of Gujarat (2013) और Serious Fraud Investigation Office v. Rahul Modi (2019) जैसे फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि रिमांड (Remand) का आदेश एक न्यायिक कार्य है, इसलिए उस पर हैबियस कॉर्पस नहीं चल सकती।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने सेशन जज, नवादा के 4 नवम्बर 2022 के आदेश को पढ़ा और पाया कि—

  • जज ने केस डायरी, साक्ष्य और दस्तावेजों की जांच की थी।
  • जज ने यह संतुष्टि दर्ज की थी कि अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में भेजना आवश्यक है।

इसलिए अदालत ने कहा कि यह आदेश “यांत्रिक” नहीं था और इसमें कोई अवैधता नहीं थी।

अंतिम निर्णय

  • हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि हिरासत न्यायिक आदेश के तहत हुई है।
  • आदेश में न तो अधिकार की कमी थी और न ही यह अवैध था।
  • यदि याचिकाकर्ता को कोई अन्य कानूनी उपाय चाहिए, तो वह अपनी याचिका संशोधित कर उचित मंच पर जा सकता है।

निष्कर्ष:
यह याचिका अस्वीकृत (Dismissed) कर दी गई।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) का प्रयोग केवल अवैध या गैरकानूनी हिरासत के मामलों में किया जा सकता है — न्यायिक हिरासत में नहीं।

इसका अर्थ है:

  • यदि किसी व्यक्ति को अदालत के आदेश से जेल भेजा गया है, तो वह सीधे हैबियस कॉर्पस नहीं दायर कर सकता।
  • उसे जमानत या रिवीजन जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाने होंगे।
  • पुलिस और अदालत द्वारा की गई वैध न्यायिक प्रक्रिया को हैबियस कॉर्पस के जरिए नहीं रोका जा सकता।

इस निर्णय से यह भी स्पष्ट होता है कि “हैबियस कॉर्पस न्यायिक आदेश को चुनौती देने का शॉर्टकट नहीं है।”

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या न्यायिक हिरासत आदेश के खिलाफ हैबियस कॉर्पस दायर की जा सकती है?
    ❌ नहीं। केवल तभी जब आदेश अवैध हो या अधिकारहीन न्यायालय ने दिया हो।
  • क्या सेशन जज का आदेश बिना दिमाग लगाए पारित किया गया था?
    ✅ नहीं। अदालत ने पाया कि आदेश न्यायिक विवेक के साथ पारित हुआ।
  • क्या याचिकाकर्ता के पास अन्य उपाय उपलब्ध हैं?
    ✅ हाँ। वह जमानत या पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर सकता है।
  • अंतिम परिणाम:
    याचिका खारिज की गई, याचिकाकर्ता को याचिका संशोधित करने की स्वतंत्रता दी गई।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Gautam Navlakha v. National Investigation Agency, 2021 SCC OnLine SC 382
  • Kundan Kumar v. State of Bihar, 2020(1) BLJ 648

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Shikha Kumari v. State of Bihar, 2020(2) PLJR 15 (Full Bench)
  • Manubhai Ratilal Patel v. State of Gujarat, (2013) 1 SCC 314
  • Serious Fraud Investigation Office v. Rahul Modi, (2019) 5 SCC 266

मामले का शीर्षक

Yachikakarta v. State of Bihar & Others (NDPS Act – Habeas Corpus Case)

केस नंबर

Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1435 of 2022

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 380

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति सुधीर सिंह
माननीय श्री न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से — श्री इन्द्रदेव प्रसाद, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से — श्री ललित किशोर, महाधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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