निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने 9 जनवरी 2023 को एक अहम पारिवारिक विवाद में फैसला सुनाते हुए पति की यह मांग खारिज कर दी कि उसकी पत्नी और नाबालिग बेटी का डीएनए परीक्षण (DNA Test) कराया जाए ताकि यह साबित हो सके कि पत्नी ने विवाहेतर संबंध बनाए थे।
यह मामला सिविल मिसलेनियस जुरिस्डिक्शन नं. 568/2018 (मैट्रिमोनियल केस नं. 833/2010 से संबंधित) था, जिस पर निर्णय माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने दिया।
पति ने तलाक की मांग हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत की थी, यह कहते हुए कि उसकी पत्नी ने उसे धोखा दिया और उनकी बेटी “खुशी कुमारी” किसी और के संबंध से जन्मी है। उसका दावा था कि वह चिकित्सकीय रूप से नपुंसक (impotent) है और संतानोत्पत्ति में असमर्थ है।
परिवार न्यायालय, पटना ने पहले ही पति की यह याचिका (डीएनए टेस्ट के लिए) खारिज कर दी थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए उसने उच्च न्यायालय में अपील की। लेकिन अदालत ने कहा कि पति ने कोई ठोस प्रथम दृष्टया (prima facie) सबूत नहीं दिया जिससे पत्नी या बेटी का डीएनए टेस्ट करवाना न्यायोचित ठहराया जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
पति और पत्नी का विवाह जून 1987 में हुआ था। पति भारतीय सेना में कार्यरत था और जनवरी 2005 में सेवानिवृत्त हुआ। सेवानिवृत्ति के बाद उसने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी अपने मायके चली गई और वापस आने से इंकार कर दिया।
इसके बाद दिसंबर 2005 में पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया। पति का कहना था कि उस दौरान उनका पत्नी से कोई संपर्क नहीं था, इसलिए यह बच्ची किसी और की है। उसने यह भी कहा कि डॉक्टरों ने उसे “varicocele” और “zero sperm count” की समस्या बताई है, जिससे वह बच्चा पैदा करने में असमर्थ है।
पत्नी ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया और कहा कि बच्ची वैवाहिक संबंध से ही जन्मी है। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है (एक महिला विभा देवी से), जबकि उसका विवाह उससे अब भी वैध है। इस आधार पर पत्नी ने पति के खिलाफ 498A, 323, 307 और 379 IPC के तहत आपराधिक मामला भी दर्ज किया।
पति के तर्क
पति की ओर से श्री श्रीराम कृष्णा ने दलील दी कि —
- चिकित्सकीय रिपोर्टों में 2006 से उसे नपुंसक (infertile) बताया गया है।
- पत्नी ने दिसंबर 2005 में बेटी को जन्म दिया जब दोनों के बीच कोई दाम्पत्य संबंध नहीं थे।
- डीएनए टेस्ट से यह साबित हो जाएगा कि बच्ची उसकी नहीं है और पत्नी ने व्यभिचार किया है।
- उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Dipanwita Roy v. Ronobroto Roy (2015) 1 SCC 365 का हवाला दिया, जिसमें इसी तरह के मामले में डीएनए टेस्ट की अनुमति दी गई थी।
- यदि पत्नी डीएनए टेस्ट से इनकार करती है, तो इसे अपराध-सूचक (adverse inference) माना जाना चाहिए।
पत्नी के तर्क और न्यायालय की सहायता
पत्नी की ओर से श्री रवीन्द्र प्रसाद सिंह ने बहस की, जबकि अदालत की सहायता के लिए अमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के रूप में सुश्री सूर्या निलाम्बरी को नियुक्त किया गया।
उन्होंने कहा कि —
- पति द्वारा प्रस्तुत सभी चिकित्सकीय रिपोर्टें बच्ची के जन्म के बाद की हैं (2006, 2012, 2016), इसलिए वे अप्रासंगिक हैं।
- 2006 की अल्ट्रासोनोग्राफी रिपोर्ट में शुक्राणु संख्या (sperm count) का कोई उल्लेख नहीं है, अतः यह रिपोर्ट नपुंसकता सिद्ध नहीं करती।
- पति ने खुद स्वीकार किया कि उसने दूसरी शादी की है, जो उसकी नीयत पर सवाल उठाती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि डीएनए टेस्ट सिर्फ संदेह के आधार पर नहीं कराया जा सकता, क्योंकि इससे मां और बच्चे की गरिमा (dignity) पर गहरा असर पड़ता है।
उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया:
- Goutam Kundu v. State of West Bengal (1993) 3 SCC 418
- Sharda v. Dharmpal (2003) 4 SCC 493
- Bhabani Prasad Jena v. Orissa Women Commission (2010) 8 SCC 633
- Dipanwita Roy v. Ronobroto Roy (2015) 1 SCC 365
न्यायालय की टिप्पणियाँ
माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने कहा कि —
- पति की पहली मेडिकल रिपोर्ट (2006) बच्चे के जन्म के बाद की है, और उसमें नपुंसकता सिद्ध नहीं होती।
- “Early varicocele” एक सामान्य स्थिति है जो संतानहीनता का निश्चित प्रमाण नहीं है।
- पति के पिता ने खुद गवाही में कहा कि पत्नी 2005 तक ससुराल आती-जाती थी, जिससे यह साबित होता है कि पति को पत्नी तक पहुंच (access) थी।
- पति ने 2006 के बाद पत्नी से पुनः साथ रहने की इच्छा भी जताई थी, जो उसके अपने दावे को कमजोर करता है।
अदालत ने कहा कि डीएनए टेस्ट कोई साक्ष्य जुटाने का साधन (fishing tool) नहीं है। इसे केवल तभी कराया जा सकता है जब पर्याप्त ठोस तथ्य प्रस्तुत हों।
डीएनए टेस्ट का आदेश देना किसी महिला और बच्चे की निजता (privacy) व गरिमा (dignity) का गंभीर उल्लंघन हो सकता है।
कानूनी सिद्धांत
- संतान की वैधता की धारणा (Section 112, Indian Evidence Act)
यदि बच्चा विवाह के दौरान जन्मा है तो वह वैध माना जाएगा, जब तक पति-पत्नी के बीच “non-access” का पुख्ता प्रमाण न हो। - सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत (Goutam Kundu मामला)
- डीएनए टेस्ट सामान्य रूप से नहीं कराया जा सकता।
- पहले यह साबित करना जरूरी है कि पति-पत्नी के बीच कोई संबंध नहीं थे।
- ऐसे आदेश से बच्चे को अवैध (illegitimate) घोषित करने का खतरा रहता है, इसलिए अदालतें इसे अत्यंत सावधानी से जारी करती हैं।
- निजता और गरिमा का अधिकार
डीएनए टेस्ट के आदेश से पहले अदालत को यह देखना चाहिए कि कहीं यह महिला और बच्चे के सम्मान का हनन तो नहीं करेगा।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
- पति ने अपने दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया।
- चिकित्सीय रिपोर्टें नपुंसकता साबित नहीं करतीं।
- पत्नी और बेटी के डीएनए टेस्ट की मांग असंगत और अनुचित थी।
- इसलिए अदालत ने परिवार न्यायालय का आदेश बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
- अदालत ने अमिकस क्यूरी सुश्री सूर्या निलाम्बरी की सराहना की और उन्हें ₹11,000 का मानदेय देने का निर्देश दिया।
निर्णय का महत्व और प्रभाव
यह फैसला विवाह विवादों में एक महत्वपूर्ण नजीर (precedent) है।
- डीएनए टेस्ट केवल संदेह के आधार पर नहीं कराया जा सकता।
- किसी भी बच्चे की वैधता पर संदेह करने से पहले अदालत को मां-बच्चे की गरिमा और गोपनीयता का सम्मान करना चाहिए।
- यह निर्णय बताता है कि सत्य की खोज भी संविधानिक सीमाओं और मानवीय गरिमा के भीतर रहकर ही की जानी चाहिए।
यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि कानून साक्ष्य और नैतिकता के संतुलन को बनाए रखने का माध्यम है, न कि निजी प्रतिशोध का साधन।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या पति ने डीएनए टेस्ट के लिए प्रथम दृष्टया आधार प्रस्तुत किया? ❌ नहीं।
- क्या तलाक के मुकदमे में डीएनए टेस्ट कराना उचित था? ❌ नहीं।
- क्या निजता और गरिमा बच्चे की वैधता से ऊपर है? ✔️ हाँ।
- क्या याचिका स्वीकार की गई? ❌ नहीं, याचिका खारिज।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Goutam Kundu v. State of West Bengal (1993) 3 SCC 418
- Sharda v. Dharmpal (2003) 4 SCC 493
- Bhabani Prasad Jena v. Orissa Women Commission (2010) 8 SCC 633
- Dipanwita Roy v. Ronobroto Roy (2015) 1 SCC 365
मामले का शीर्षक
Bipin Kumar Singh बनाम Pushpa Devi
केस नंबर
Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 568 of 2018
(Arising out of Matrimonial Case No. 833 of 2010)
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 698
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- पति की ओर से: श्री श्रीराम कृष्णा, श्री अमरजीत, डॉ. कमल देव शर्मा
- पत्नी की ओर से: श्री रवीन्द्र प्रसाद सिंह
- अमिकस क्यूरी: सुश्री सूर्या निलाम्बरी
निर्णय का लिंक
NDQjNTY4IzIwMTgjMSNO-eQWxGb0y9EM=
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