पटना उच्च न्यायालय का फैसला: अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट का अधिकार (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय (दिनांक 22 दिसंबर 2022) में यह स्पष्ट किया कि किन परिस्थितियों में कोई अभियुक्त (accused person) अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए बिना अपने वकील के माध्यम से मुकदमे की कार्यवाही में भाग ले सकता है। यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा द्वारा Criminal Miscellaneous No. 33429 of 2017 में दिया गया था, जो Complaint Case No. 2341(C)/2011 से संबंधित था।

मामला एक प्रसिद्ध जूता कंपनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़ा था, जिन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 201, 465, 467, 468, 471, 477A, 120B और 34 के तहत आरोप लगाए गए थे। अभियोजन पक्ष का कहना था कि इन अधिकारियों ने पहले की जमानत याचिका और क्वैशिंग याचिका में कुछ जाली दस्तावेज़ (forged documents) का इस्तेमाल किया था ताकि अदालत से राहत मिल सके।

जब निचली अदालत ने उन्हें उपस्थित होने के लिए तलब किया, तो उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 205 के तहत व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट की मांग की। लेकिन मजिस्ट्रेट, पटना ने 27 मार्च 2017 को यह अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद अभियुक्तों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।

अभियुक्तों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि –

  • वे सभी कंपनी के उच्च पदस्थ अधिकारी हैं और दिल्ली में रहते हैं। उन्हें व्यवसायिक कार्यों के लिए देश-विदेश की यात्रा करनी पड़ती है।
  • उनके खिलाफ किसी प्रकार का सीधा आरोप या विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई है।
  • मामला दरअसल एक नागरिक विवाद (civil dispute) है, जिसे आपराधिक रूप देने की कोशिश की गई है।
  • यदि उन्हें हर तारीख पर पटना आना पड़े, तो कंपनी का कार्य प्रभावित होगा।
  • वे अदालत में एक हलफनामा (undertaking) देने को तैयार हैं कि उनका वकील हर तारीख पर उपस्थित रहेगा और वे पहचान या साक्ष्य पर कोई आपत्ति नहीं करेंगे।

दूसरी ओर, राज्य पक्ष और शिकायतकर्ता (Opposite Party No. 2) ने इस छूट का विरोध किया। उनका कहना था कि—

  • अभियुक्तों को पहले समन भेजे गए थे लेकिन वे पेश नहीं हुए।
  • जब गैर-जमानती वारंट जारी हुआ, तब उन्होंने यह अर्जी दी।
  • अदालत को अब सिर्फ मुकदमे के शीघ्र निपटारे का निर्देश देना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद धारा 205, धारा 317, और धारा 273 CrPC का विश्लेषण किया।

अदालत का विश्लेषण

  • धारा 205 CrPC: मजिस्ट्रेट किसी भी आरोपी को प्रारंभिक स्तर से ही व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है, यदि पर्याप्त कारण हों।
  • धारा 317 CrPC: जांच या ट्रायल के दौरान भी अदालत आरोपी की उपस्थिति से छूट दे सकती है, जब तक न्याय के हित में उसकी उपस्थिति जरूरी न हो।
  • धारा 273 CrPC: सामान्य नियम यह है कि सबूत आरोपी की उपस्थिति में ही लिए जाएं, लेकिन अदालत विवेक से छूट दे सकती है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह छूट किसी आरोपी का “अधिकार” नहीं है, बल्कि यह अदालत की विवेकाधिकार शक्ति (discretion) है, जिसे उचित कारण होने पर ही प्रयोग किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख

न्यायालय ने तीन प्रमुख फैसलों का उल्लेख किया—

  1. Bhaskar Industries Ltd. v. Bhiwani Denim & Apparels Ltd. (2001) 7 SCC 401
  2. Rameshwar Yadav v. State of Bihar (2018) 4 SCC 608
  3. Puneet Dalmia v. CBI (2020) 12 SCC 695

इन फैसलों में यह कहा गया था कि:

  • आरोपी की उपस्थिति केवल “हाजिरी लगाने” के लिए नहीं होती, बल्कि मुकदमे की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए होती है।
  • यदि वकील की उपस्थिति में मुकदमा आगे बढ़ सकता है, तो अदालत को आरोपी को राहत देनी चाहिए।
  • आरोपी को हलफनामा देना चाहिए कि वह पहचान पर विवाद नहीं करेगा, उसका वकील हर तारीख पर उपस्थित रहेगा और कोई अनावश्यक स्थगन (adjournment) नहीं मांगा जाएगा।
  • यदि आरोपी या उसका वकील मुकदमे में देरी करता है, तो अदालत छूट वापस ले सकती है।

पटना उच्च न्यायालय का निष्कर्ष

अदालत ने माना कि अभियुक्त कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी हैं, दिल्ली में रहते हैं और पटना में हर तारीख पर पेश होना कठिन है। निचली अदालत ने यह नहीं बताया कि उनकी उपस्थिति क्यों अनिवार्य है।

इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट को विवेक का प्रयोग कर उन्हें छूट देनी चाहिए थी।

अंतिम आदेश

  • निचली अदालत का आदेश (27.03.2017) रद्द किया गया।
  • अभियुक्तों को अदालत में उनके वकील के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दी गई।
  • अदालत ने यह छूट निम्न शर्तों पर दी —
    1. अभियुक्त यह लिखित हलफनामा देंगे कि वे अपनी पहचान पर विवाद नहीं करेंगे और उनका वकील हर तारीख पर उपस्थित रहेगा।
    2. अभियुक्त चार्ज फ्रेमिंग (charges framing) और अन्य आवश्यक अवसरों पर स्वयं उपस्थित होंगे।
    3. यदि वकील गैरहाजिर रहा या देरी की कोशिश की, तो मजिस्ट्रेट 205(2) CrPC के तहत अभियुक्त को व्यक्तिगत रूप से बुला सकता है।
  • साथ ही, ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि एक वर्ष के भीतर मुकदमे का निपटारा करे।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह फैसला उन सभी व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जो दूरस्थ स्थानों में मुकदमे झेल रहे हैं — जैसे व्यापारी, कंपनी अधिकारी या सरकारी कर्मचारी।

  • अदालत ने माना कि यदि आरोपी सद्भावपूर्वक (bona fide) सहयोग करता है, तो उसकी शारीरिक उपस्थिति हर तारीख पर आवश्यक नहीं।
  • इससे यह सिद्ध होता है कि कानून केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि व्यावहारिक न्याय (practical justice) का पालन करता है।
  • यह फैसला न्यायालयों को यह संदेश देता है कि न्याय और सुविधा के बीच संतुलन जरूरी है।
  • साथ ही, अदालतों को यह अधिकार भी दिया गया है कि यदि आरोपी छूट का दुरुपयोग करे, तो छूट रद्द की जा सकती है।

यह निर्णय अदालतों के कार्यकुशलता (efficiency) और समयबद्ध न्याय (timely justice) की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम है।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय

  • प्रश्न 1: क्या कंपनी अधिकारियों को धारा 205 CrPC के तहत व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जा सकती है?
    निर्णय: हाँ। यदि आरोपी दूर रहते हैं और वकील के माध्यम से मुकदमे की प्रगति सुनिश्चित हो सकती है, तो छूट दी जा सकती है।
  • प्रश्न 2: क्या व्यक्तिगत उपस्थिति CrPC के तहत अनिवार्य है?
    निर्णय: नहीं। धारा 205 और 317 अदालत को विवेकाधिकार देती हैं कि जब उपस्थिति जरूरी न हो, तो छूट दी जा सकती है।
  • प्रश्न 3: क्या मजिस्ट्रेट द्वारा छूट की अर्जी खारिज करना उचित था?
    निर्णय: नहीं। मजिस्ट्रेट ने कोई ठोस कारण नहीं दिया और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को अनदेखा किया।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Bhaskar Industries Ltd. v. Bhiwani Denim & Apparels Ltd., (2001) 7 SCC 401
  • Rameshwar Yadav v. State of Bihar, (2018) 4 SCC 608
  • Puneet Dalmia v. CBI, (2020) 12 SCC 695

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Bhaskar Industries Ltd. v. Bhiwani Denim & Apparels Ltd., (2001) 7 SCC 401
  • Rameshwar Yadav v. State of Bihar, (2018) 4 SCC 608
  • Puneet Dalmia v. CBI, (2020) 12 SCC 695

मामले का शीर्षक

Ramesh Kumar Dua & Ors. बनाम State of Bihar एवं अन्य

केस नंबर

Criminal Miscellaneous No. 33429 of 2017
(Complaint Case No. 2341(C)/2011, जिला – पटना)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 358

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री कौशल कुमार झा (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्रीमती सोनी श्रीवास्तव (अधिवक्ता)
  • राज्य की ओर से: श्री झारखंडी उपाध्याय (अधिवक्ता)
  • प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से: श्री संजय कुमार घोषरवे (अधिवक्ता)

निर्णय का लिंक

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