निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके किसी आश्रित को पहले से ही नौकरी मिल चुकी है, तो परिवार के दूसरे सदस्य को “दया नियुक्ति” नहीं दी जा सकती। यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति हरिश कुमार ने 03 मार्च 2025 को सुनाया। मामला बिहार सैन्य पुलिस-11, जमुई के एक इंस्पेक्टर की सेवा में मृत्यु के बाद उनके पुत्र द्वारा की गई दया नियुक्ति की मांग से जुड़ा था।
मृत इंस्पेक्टर की मृत्यु 11 सितम्बर 2017 को हुई थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने “दया नियुक्ति” के लिए आवेदन दिया। आवेदन में उसने स्वयं बताया कि उसका बड़ा भाई भारतीय रेल में ग्रुप-डी कर्मचारी के रूप में कार्यरत है। इसी आधार पर कमांडेंट, बिहार मिलिट्री पुलिस-11 ने उसका आवेदन दिनांक 30.07.2018 को अस्वीकृत कर दिया। बाद में मृतक की पत्नी (याचिकाकर्ता की मां) ने भी पुनः आवेदन किया, परंतु उसे भी 14.10.2018 को खारिज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसका बड़ा भाई वर्ष 2002 से ही अलग रह रहा है, इसलिए परिवार को उसकी आय से कोई सहायता नहीं मिलती। उसने पंचायत के प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए ताकि यह साबित किया जा सके कि परिवार आर्थिक रूप से कठिनाई में है।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने 19 नवम्बर 2014 को एक परिपत्र जारी किया था, जिसके अनुसार यदि मृतक सरकारी कर्मचारी के किसी आश्रित को पहले से “उचित रूप से रोजगार” (gainfully employed) मिला है, तो परिवार के अन्य सदस्य को दया नियुक्ति नहीं दी जाएगी। यह नियम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह आश्रित परिवार के साथ रहता है या नहीं, या परिवार की सहायता करता है या नहीं।
न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर पटना उच्च न्यायालय की फुल बेंच पहले ही “नीराज कुमार मल्लिक बनाम बिहार राज्य” (2018 (2) PLJR 951) के मामले में स्पष्ट निर्णय दे चुकी है। उस निर्णय में कहा गया था कि –
यदि मृत सरकारी कर्मचारी का कोई भी आश्रित “उचित रूप से रोजगार प्राप्त” (gainfully employed) है, तो परिवार का कोई अन्य सदस्य दया नियुक्ति का अधिकारी नहीं होगा।
फुल बेंच ने यह भी कहा था कि यह जाँच “वस्तुनिष्ठ” (objective) होगी – यानी यह देखा जाएगा कि उस नौकरी से परिवार का पालन-पोषण संभव है या नहीं, न कि यह कि वह व्यक्ति परिवार की सहायता करने को इच्छुक है या अलग रह रहा है।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया कि उसका बड़ा भाई भारतीय रेल में कार्यरत है। उसने यह भी नहीं कहा कि उस भाई की नौकरी इतनी छोटी या अस्थायी है कि उससे परिवार का पालन-पोषण संभव नहीं। इसलिए न्यायालय ने माना कि वह “gainfully employed” है और याचिकाकर्ता का दावा नीति के अनुसार अस्वीकृत किया जाना उचित था।
सरल शब्दों में कहा जाए तो दया नियुक्ति कोई अधिकार नहीं है, बल्कि यह सरकार द्वारा दी जाने वाली अस्थायी सहायता है ताकि परिवार अचानक आय-विहीन न रह जाए। लेकिन यदि परिवार में कोई सदस्य पहले से नौकरी में है, तो माना जाता है कि परिवार की तात्कालिक आर्थिक आवश्यकता पूरी हो रही है। चाहे वह सदस्य परिवार के साथ न रहता हो या परिवार की मदद न करता हो, यह बात नीति में मायने नहीं रखती।
न्यायालय ने अंत में कहा कि प्रशासनिक आदेश (दिनांक 30.07.2018 और 14.10.2018) पूरी तरह नीति और फुल बेंच निर्णय के अनुरूप हैं, इसलिए याचिका निराधार है और इसे खारिज किया जाता है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय बिहार सरकार के कर्मचारियों के परिवारों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है – दया नियुक्ति केवल उन मामलों में मिलेगी, जहाँ परिवार के किसी सदस्य के पास आजीविका का कोई साधन न हो। यदि किसी आश्रित को पहले से स्थायी नौकरी है, तो अन्य सदस्य को सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी, भले ही परिवार के भीतर विवाद या अलगाव क्यों न हो।
यह नीति “रोजगार का अधिकार” नहीं बल्कि “आपातकालीन सहायता” की भावना पर आधारित है। इससे सरकार को एक समान और पारदर्शी नीति लागू करने में सुविधा होती है और यह सुनिश्चित होता है कि दया नियुक्ति केवल उन्हीं परिवारों को मिले जिन्हें वास्तव में तत्काल आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।
प्रशासनिक दृष्टि से भी यह निर्णय महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अधिकारी यह समझ सकते हैं कि उन्हें केवल यह देखना है —
- क्या मृतक के किसी आश्रित के पास पहले से नौकरी है?
- यदि है, तो क्या वह नौकरी इतनी छोटी या अस्थायी है कि परिवार का पालन-पोषण संभव नहीं?
यदि दूसरा प्रश्न “नहीं” है, तो दया नियुक्ति का दावा खारिज किया जा सकता है। इससे नीति के दुरुपयोग पर रोक लगती है और न्यायसंगत प्रक्रिया बनी रहती है।
कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या परिवार का कोई अन्य सदस्य नौकरी में होने पर दूसरा सदस्य दया नियुक्ति पा सकता है?
❖ नहीं। यदि कोई आश्रित पहले से “gainfully employed” है, तो अन्य आश्रित अयोग्य हैं। - क्या अलग रहना या परिवार की मदद न करना दया नियुक्ति का आधार बन सकता है?
❖ नहीं। यह नीति वस्तुनिष्ठ है, पारिवारिक परिस्थितियाँ या रिश्ते इसमें मायने नहीं रखते। - क्या याचिकाकर्ता यह दिखा सका कि उसके भाई की नौकरी इतनी छोटी थी कि परिवार का पालन-पोषण न हो सके?
❖ नहीं। ऐसा कोई तथ्य नहीं बताया गया, इसलिए अपवाद लागू नहीं हुआ। - क्या प्रशासनिक आदेश गलत थे?
❖ नहीं। आदेश नीति और फुल बेंच निर्णय के अनुरूप थे। याचिका खारिज की गई।
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- नीरज कुमार मल्लिक बनाम बिहार राज्य, 2018 (2) PLJR 951 (फुल बेंच)
- उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा राज्य, (1994) 4 SCC 138
- अषा रामचंद्र अंबेडकर बनाम भारत संघ (उद्धृत संदर्भ)
- विशाल कुमार बनाम बिहार राज्य (डिवीजन बेंच)
मामले का शीर्षक
Tek Narayan Paswan v. State of Bihar & Ors.
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 2617 of 2019
उद्धरण (Citation)
2025 (2) PLJR 218
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति हरिश कुमार (दिनांक 03.03.2025 का मौखिक निर्णय)
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री इब्राहिम कबीर, अधिवक्ता; श्रीमती श्रुति सिन्हा, अधिवक्ता
- प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: श्री शैलेश कुमार, सहायक अधिवक्ता, जीपी-5
निर्णय का लिंक
MTUjMjYxNyMyMDE5IzEjTg==-wSTO8yQ48n4=
यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।


