पटना उच्च न्यायालय ने एक निर्माण कंपनी द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कंपनी ने भविष्य के टेंडरों से डिबार (प्रतिबंधित) किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने पाया कि संबंधित निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और याचिकाकर्ता का नाम डिबार सूची से हटा दिया गया है, अतः अब याचिका निरर्थक हो चुकी है।
निर्णय की सरल व्याख्या
इस मामले में याचिकाकर्ता एक निजी निर्माण कंपनी थी, जिसे मुजफ्फरपुर रोड डिवीजन-1 के कार्यपालक अभियंता द्वारा 23 जून 2017 को एक पत्र जारी कर भविष्य के सभी सरकारी टेंडरों से डिबार कर दिया गया था। कंपनी ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि यह आदेश न केवल अनुचित है, बल्कि इससे पहले इसी विषय में पटना हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश (CWJC No. 6293 of 2016) की भी अवहेलना की गई है।
कंपनी ने यह तर्क दिया कि निर्माण कार्य में हुई देरी उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई, जैसे कि:
- हाई टेंशन तारों और अंडरग्राउंड टेलीफोन केबल को समय पर स्थानांतरित नहीं किया गया।
- नक्सली क्षेत्रों में काम के दौरान धमकियां मिलीं।
- टेलीफोन कंपनियों ने मशीनें जब्त कर लीं।
- स्थानीय असामाजिक तत्वों ने काम में बाधा डाली।
- प्रशासन द्वारा सुरक्षा न प्रदान करने के कारण शाम 4 बजे से सुबह 10 बजे तक काम बंद रखना पड़ा।
कंपनी ने यह भी कहा कि उसने कई बार विभाग को सूचित किया लेकिन उचित कार्रवाई नहीं की गई। फिर भी 85% से अधिक काम पूरा कर लिया गया। ऐसे में डिबारमेंट का आदेश न केवल अन्यायपूर्ण था, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता था।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट (SBD) के क्लॉज 5.2 के अनुसार यदि देरी सरकारी कारणों या पहले से मौजूद अड़चनों के कारण हो, तो उसका दोष ठेकेदार पर नहीं मढ़ा जा सकता।
हालांकि जब 26 अप्रैल 2023 को यह मामला कोर्ट के समक्ष आया, तब तक परिस्थितियां बदल चुकी थीं। कंपनी ने निर्माण कार्य पूरा कर लिया था और उसका नाम डिबार सूची से हटा दिया गया था।
ऐसे में कोर्ट ने माना कि याचिका में मांगी गई राहतें अब प्रासंगिक नहीं रहीं। अगर याचिकाकर्ता को कोई और दावा करना है (जैसे भुगतान आदि), तो वह संबंधित विभाग से संपर्क कर सकता है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि यदि कोई विवाद खत्म हो चुका है या उसका समाधान हो चुका है, तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा। ठेकेदारों को यह सीख मिलती है कि डिबारमेंट या अनुबंध विवादों में वे समय पर कानूनी राहत लें, अन्यथा मामला बाद में निरर्थक हो सकता है।
साथ ही, सरकारी अधिकारियों के लिए यह एक संकेत है कि डिबारमेंट जैसे कठोर निर्णय सोच-समझ कर और उचित प्रक्रिया का पालन कर ही लेने चाहिए। यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वच्छता और निर्बाध कार्य की परिस्थितियाँ उपलब्ध कराए।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- मुद्दा: क्या 23 जून 2017 को जारी डिबारमेंट आदेश वैध था?
- निर्णय: कोर्ट ने इस पर कोई राय नहीं दी क्योंकि मामला निरर्थक हो चुका था।
- मुद्दा: क्या काम पूरा होने और डिबारमेंट हटाए जाने के बाद याचिका की कोई उपयोगिता बचती है?
- निर्णय: नहीं, इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।
- तर्क:
- याचिकाकर्ता ने अपना कार्य पूरा कर लिया है।
- उसका नाम डिबार सूची से हटा दिया गया है।
- अब कोई सक्रिय विवाद नहीं बचा है।
- यदि कोई दावा है तो वह विभाग से संपर्क कर सकता है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- CWJC No. 6293 of 2016 (पूर्व निर्णय का उल्लेख किया गया)
मामले का शीर्षक
M/s Alectra Construction Ltd. बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
केस नंबर
Civil Writ Jurisdiction Case No. 11375 of 2017
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी
माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
याचिकाकर्ता की ओर से: कुमारी रश्मि, अधिवक्ता; श्री सुरेश प्रसाद सिंह नंबर 1, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री स्वप्निल कुमार सिंह, सहायक अधिवक्ता (AC to GP 19)
निर्णय का लिंक
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