2. निर्णय की सरल व्याख्या
यह मामला दो पुलिस प्रशिक्षणाधीन अधिकारियों से संबंधित है, जिन्हें बिहार सरकार ने सब-इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त किया था और जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान एक कथित अनुशासनहीनता के आरोप में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। पटना हाई कोर्ट ने इस मामले में विस्तार से सुनवाई की और यह जांचा कि क्या विभाग ने सही तरीके से कार्रवाई की है या नहीं।
दोनों प्रशिक्षु अधिकारियों ने 1 जून 2019 को जॉइन किया था और फरवरी 2021 में उन्हें बिहार स्पेशल आर्म्ड पुलिस-04, दुमरांव (राजगीर पुलिस अकादमी के अधीन) में बेसिक ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। उनकी आउटडोर गतिविधियों और टेस्ट पूरे हो चुके थे और वे मई–जून 2021 में होने वाले लिखित आंतरिक परीक्षा में बैठने वाले थे।
लेकिन परीक्षा शुरू होने के दो दिन पहले एक घटना सामने आई। प्रशासन ने आरोप लगाया कि जब परीक्षा कक्ष में CCTV कैमरा लगाया जा रहा था, तब दोनों प्रशिक्षु अधिकारियों और एक अन्य प्रशिक्षु ने मिलकर कैमरा से छेड़छाड़ की। इस आधार पर उन्हें परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया और विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई।
विभाग ने पहले शो-कॉज नोटिस जारी किया, जिस पर दोनों अधिकारियों ने जवाब दिया कि उन्होंने किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की। उन्होंने कहा कि वे मात्र कमरे में मौजूद थे और कई अन्य प्रशिक्षु भी उसी समय वहां थे। इसके बाद विभाग ने चार्जशीट जारी कर दी और जांच अधिकारी और प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त कर दिए।
जांच के दौरान कई विभागीय गवाहों ने बयान दिए। लेकिन खास बात यह थी कि CCTV फुटेज चलाने वाले ऑपरेटर को—जो इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण गवाह था—जांच में कभी गवाह के रूप में नहीं बुलाया गया। न ही उन अन्य प्रशिक्षुओं के बयान लिए गए जो मौके पर मौजूद थे। गवाहों ने केवल इतना कहा कि CCTV फुटेज में प्रशिक्षुओं को कमरे में आते-जाते हुए देखा गया। किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि उन्होंने आरोपियों को कैमरे को हाथ लगाते या छेड़छाड़ करते देखा था।
इसके बावजूद जांच अधिकारी ने बिना ठोस सबूत के आरोप को साबित मान लिया और विभाग ने अप्रैल 2022 में दोनों प्रशिक्षु अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। उनकी अपील और मेमोरियल भी विभाग ने खारिज कर दिए। अंत में दोनों अधिकारियों ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
हाई कोर्ट ने पूरे मामले को विस्तार से देखा, खासकर यह कि क्या विभाग ने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 का पालन किया था या नहीं। नियम 17(3) के तहत, जब किसी कर्मचारी पर बड़ी सज़ा (जैसे बर्खास्तगी) का आरोप हो, तो विभाग को चार्जशीट के साथ:
- आरोपों का स्पष्ट ब्योरा,
- उनसे जुड़े तथ्य,
- दस्तावेजों की सूची,
- और सबसे महत्वपूर्ण—गवाहों की सूची अनिवार्य रूप से देनी होती है।
लेकिन इस मामले में विभाग गवाहों की सूची देना भूल गया था। यह बात खुद राज्य ने अपनी काउंटर एफिडेविट में स्वीकार की।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह गलती मामूली नहीं, बल्कि प्रक्रिया को असंवैधानिक और अवैध बना देती है। एक कर्मचारी के करियर को खत्म करने जैसी कार्रवाई बिना उचित प्रक्रिया के नहीं की जा सकती।
इसके अलावा कोर्ट ने सबूतों का मूल्यांकन करते हुए स्पष्ट किया कि:
- CCTV ऑपरेटर की गवाही सबसे महत्वपूर्ण थी, उसे बुलाया ही नहीं गया।
- अन्य प्रशिक्षु जो मौके पर मौजूद थे, उन्हें भी गवाह नहीं बनाया गया।
- सिर्फ कमरे में मौजूद होने को गलत काम का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
Supreme Court के Roop Singh Negi v. Punjab National Bank (2009) निर्णय का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि:
- किसी भी कर्मचारी को दंड देने के लिए विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत होना आवश्यक है।
- केवल शंका, अनुमान या कथन—चाहे कितने भी प्रबल हों—कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकते।
अंत में हाई कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी, इसलिए:
- जांच रिपोर्ट,
- बर्खास्तगी आदेश,
- अपीलीय आदेश,
- मेमोरियल आदेश
सभी को रद्द किया जाता है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों प्रशिक्षु अधिकारियों को तीन महीने के भीतर उनके पद पर पुनः नियुक्त किया जाए और सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।
यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है—कार्रवाई चाहे कितनी भी गंभीर क्यों न हो, विभाग कानून का पालन किए बिना किसी की नौकरी नहीं छीन सकता।
3. निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि सरकारी विभागों—खासकर पुलिस विभाग—को विभागीय जांच में निर्धारित नियमों का पालन करना ही होगा।
- केवल आरोप या शंका के आधार पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं किया जा सकता।
- CCTV से संबंधित मामलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फुटेज दिखाने वाले ऑपरेटर या प्रत्यक्षदर्शियों को गवाह बनाना अनिवार्य है।
- यह फैसला सरकारी कर्मचारियों को आश्वस्त करता है कि अगर विभागीय कार्रवाई में प्रक्रियात्मक गलती हो, तो हाई कोर्ट उन्हें राहत दे सकता है।
- सरकार और पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों को यह संदेश मिलता है कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के बिना कठोर सज़ा आदेश टिक नहीं सकते।
4. कानूनी मुद्दे और निर्णय
- क्या गवाहों की सूची न देना नियम 17(3) का उल्लंघन है?
✔ हाँ, कोर्ट ने कहा कि यह अनिवार्य प्रावधान है। सूची न देने से जांच अवैध हो जाती है। - क्या आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण थे?
✘ नहीं। CCTV ऑपरेटर को गवाह नहीं बनाया गया, न ही किसी ने यह कहा कि प्रशिक्षुओं ने कैमरे को छुआ या छेड़ा। - क्या सिर्फ कमरे में मौजूद होना अपराध माना जा सकता है?
✘ बिल्कुल नहीं। कोर्ट ने कहा कि केवल उपस्थिति के आधार पर आरोप साबित नहीं किया जा सकता। - क्या विभागीय कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी?
✘ नहीं। महत्वपूर्ण गवाहों को न बुलाना और आरोपों को संदेह के आधार पर साबित मान लेना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है। - क्या बर्खास्तगी और अपील आदेश सही थे?
✘ नहीं। कोर्ट ने सभी आदेश रद्द कर दिए और पुनर्नियोजन का निर्देश दिया।
5. पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank & Others, (2009) 2 SCC 570
6. न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank & Others, (2009) 2 SCC 570
7. मामले का शीर्षक
- Manish Prajapati v. State of Bihar & Others
- Skant Kumar Gupta v. State of Bihar & Others
8. केस नंबर
- CWJC No. 1638 of 2024
- CWJC No. 1111 of 2024
10. न्यायमूर्ति गण का नाम
- माननीय श्री न्यायाधीश अरविंद सिंह चंदेल
11. वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ताओं की ओर से:
- श्री विनय रंजन, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से (CWJC 1638/2024):
- GP-5
- राज्य की ओर से (CWJC 1111/2024):
- GP-23
12. निर्णय का लिंक
MTUjMTYzOCMyMDI0IzEjTg==-N3WAQOXE8UM=
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