पटना उच्च न्यायालय का फैसला: इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के अस्थायी कर्मचारियों की नियमितीकरण की मांग पर निर्णय (2022)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 2 दिसंबर 2022 को एक अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) में काम कर रहे अस्थायी (casual) कर्मचारियों को केवल लंबे समय तक काम करने के आधार पर नियमित (regular) नहीं माना जा सकता। यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद ने Civil Writ Jurisdiction Case No. 17211 of 2019 में सुनाया।

मामले में IOCL के विभिन्न ठिकानों — जैसे पटना, बरौनी, गया, रक्सौल और झारखंड के बोकारो — पर काम कर रहे कई कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की थी कि उन्हें 19 नवंबर 1998 से ही नियमित कर्मचारी माना जाए। उनका कहना था कि वे उसी समय से कंपनी के “Approved List of Casual Persons (ALCP)” में शामिल थे और तब से लगातार काम कर रहे हैं, इसलिए उन्हें वेतन, वरिष्ठता (seniority) और अन्य लाभ उसी तारीख से मिलना चाहिए।

पृष्ठभूमि

1998 में IOCL ने Approved List of Casual Persons (ALCP) तैयार की थी। इसमें शामिल कर्मचारियों को केवल जरूरत पड़ने पर काम दिया जाता था। वे स्थायी कर्मचारी नहीं थे और उनकी उपस्थिति का अलग रजिस्टर रखा जाता था।

कुछ मज़दूर संगठनों ने इस प्रणाली का विरोध किया और मामला Reference Case No. 32 of 1999 के रूप में केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण (CGIT), कोलकाता में पहुँचा।

वर्ष 2011 में औद्योगिक न्यायाधिकरण ने प्रबंधन के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि IOCL द्वारा इन कर्मचारियों की नियुक्ति न तो अवैध थी और न ही अनुचित।

इसके बाद कर्मचारियों ने CWJC No. 11651 of 2012 नामक याचिका पटना उच्च न्यायालय में दायर की, जिसमें उन्होंने नियमितीकरण की मांग की। उस समय अदालत ने कोई राहत नहीं दी, लेकिन कर्मचारियों को यह अनुमति दी कि वे प्रबंधन को उमादेवी बनाम कर्नाटक राज्य (2006) 4 SCC 1 में दिए गए सिद्धांतों के आधार पर आवेदन दे सकते हैं।

इसके बाद IOCL ने 31 जुलाई 2017 को इन कर्मचारियों को Junior Operator (Grade-I) के पद पर नए सिरे से नियुक्ति पत्र जारी किया। उन्हें एक वर्ष के लिए परिवीक्षा अवधि (probation) पर रखा गया और बाद में वर्ष 2019 में उन्हें नियमित सेवा में पुष्टि दी गई।

लेकिन नियुक्ति और पुष्टि के बाद भी कर्मचारियों ने फिर से यह मांग करते हुए याचिका दायर की कि उन्हें 1998 से ही नियमित कर्मचारी माना जाए।

न्यायालय का विश्लेषण

न्यायालय ने कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत तीन मुख्य दस्तावेजों का विश्लेषण किया:

  • 19 नवंबर 1998 की ALCP में नामांकन की सूची,
  • 6 अक्टूबर 2007 का कर्मचारी संघ और प्रबंधन के बीच समझौता ज्ञापन (MoU),
  • और 27 अक्टूबर 2014 की प्रबंधन की ओर से भेजी गई चिट्ठी

अदालत ने कहा कि इन दस्तावेजों में से किसी में भी कर्मचारियों को नियमित करने का कोई वादा या आश्वासन नहीं दिया गया था।

1998 के पत्र में यह शब्द था कि “नियमितीकरण पर उचित समय पर विचार किया जाएगा” — यानी यह केवल एक संभावना थी, वादा नहीं।
2007 के समझौते में साफ लिखा गया था कि प्रबंधन के सामने “कुछ बाधाएं (constraints)” हैं, इसलिए केवल उचित समय पर विचार होगा।
2014 के पत्र में सिर्फ यह बताया गया था कि यह मामला कोलकाता उच्च न्यायालय में लंबित है।

इसलिए अदालत ने कहा कि कर्मचारियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे यह माना जा सके कि उन्हें 1998 से नियमितीकरण का वैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ।

इसके अलावा, सभी कर्मचारियों ने 2017 में नए सिरे से नियुक्ति पत्र स्वीकार किया और उस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। उन्होंने परिवीक्षा पूरी की और फिर नियमित हुए। इसलिए अब वे यह नहीं कह सकते कि उनकी सेवा 1998 से मानी जाए।

कानूनी सिद्धांतों का अनुप्रयोग

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध निर्णय सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (2006) 4 SCC 1 पर भरोसा किया।

इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि —

“यदि कोई व्यक्ति अस्थायी, संविदा या आकस्मिक (casual) रूप से नियुक्त होता है, तो वह केवल लंबे समय तक काम करने के आधार पर स्थायी नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।”

अदालत ने यह भी कहा कि “वैध अपेक्षा (legitimate expectation)” का सिद्धांत अस्थायी कर्मचारियों पर लागू नहीं होता क्योंकि उनकी नियुक्ति कभी भी नियमित चयन प्रक्रिया से नहीं हुई होती।

पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति किसी स्वीकृत रिक्त पद (sanctioned post) पर नहीं थी और न ही किसी नियमित चयन प्रक्रिया से हुई थी। वे केवल ALCP सूची में casual labourer के रूप में शामिल थे। इसलिए उन्हें 1998 से नियमित मानने का कोई कानूनी आधार नहीं था।

कर्मचारियों द्वारा उद्धृत तीन सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों —
Direct Recruit Class-II Engineering Officers’ Association v. State of Maharashtra (AIR 1990 SC 1607),
Director, Printing and Stationery Department v. Motilal (2014) 11 SCC 470, और
Gauri Shankar Pd. Rai v. Sajal Chakraborty (2015) 8 SCC 163 —
को अदालत ने असंगत बताया, क्योंकि वे मामलों में नियुक्तियाँ irregular थीं, casual नहीं।

अंतिम निर्णय

अदालत ने कहा कि —

  • याचिकाकर्ता 2017 से पहले केवल अस्थायी मजदूर थे।
  • 2017 का नियुक्ति पत्र उनकी पहली नियमित नियुक्ति थी।
  • किसी दस्तावेज़ में 1998 से नियमितीकरण का वादा नहीं था।
  • उमादेवी केस के सिद्धांत के अनुसार, ऐसे कर्मचारी नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते।

इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि कर्मचारियों का दावा कानूनी रूप से अस्वीकार्य है।

निर्णय का महत्व और प्रभाव

यह फैसला बिहार और झारखंड के उन हजारों कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो लंबे समय से ठेका, अस्थायी या आकस्मिक रूप से सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

कर्मचारियों के लिए संदेश:
सिर्फ लंबे समय तक काम करने से कोई स्थायी कर्मचारी नहीं बन जाता। जब तक नियुक्ति स्वीकृत पदों पर और नियमित चयन प्रक्रिया से न हो, तब तक नियमितीकरण का अधिकार नहीं बनता।

नियोक्ताओं (जैसे IOCL) के लिए लाभ:
यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि प्रबंधन यदि कर्मचारियों को नए सिरे से नियुक्त करता है, तो वह वैध है और उन पर पुराने समय का वेतन या लाभ देने की कोई बाध्यता नहीं है।

ट्रेड यूनियनों के लिए सबक:
समझौते (MoU) या मौखिक आश्वासन कानूनी नियुक्ति की जगह नहीं ले सकते। सार्वजनिक रोजगार में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का पालन जरूरी है।

इस फैसले ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि न्यायालय “पिछले दरवाज़े से नियुक्ति” (backdoor appointment) को मान्यता नहीं देता और प्रत्येक नियुक्ति को वैधानिक प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय

  • क्या ALCP सूची में शामिल कर्मचारी 1998 से नियमितीकरण का दावा कर सकते हैं?
    नहीं। उनकी नियुक्ति केवल अस्थायी थी और उसमें कोई वादा नहीं था।
  • क्या 1998 और 2007 के दस्तावेज़ नियमितीकरण का वैध आश्वासन देते हैं?
    नहीं। उनमें केवल “उचित समय पर विचार किया जाएगा” लिखा था, जो कोई गारंटी नहीं।
  • क्या 2017 में नया नियुक्ति पत्र स्वीकार करने के बाद पुरानी सेवाओं का दावा किया जा सकता है?
    नहीं। नई नियुक्ति का अर्थ है कि कर्मचारी ने नई शर्तें स्वीकार कीं।
  • क्या उमादेवी बनाम कर्नाटक राज्य (2006) का निर्णय लागू होता है?
    हाँ। अदालत ने कहा कि यह मामला उमादेवी सिद्धांत के दायरे में आता है।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Direct Recruit Class-II Engineering Officers’ Association v. State of Maharashtra, AIR 1990 SC 1607
  • Director, Printing and Stationery Department, U.P. v. Motilal, (2014) 11 SCC 470
  • Gauri Shankar Pd. Rai v. Sajal Chakraborty, (2015) 8 SCC 163

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाया गया निर्णय

  • Secretary, State of Karnataka v. Umadevi, (2006) 4 SCC 1

मामले का शीर्षक

Nawal Kishore Singh & Ors. बनाम The Executive Director I/C (RS), Indian Oil Corporation Ltd. (MD) एवं अन्य

केस नंबर

Civil Writ Jurisdiction Case No. 17211 of 2019

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 365

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री मुकुल सिन्हा, अधिवक्ता
  • प्रतिवादियों (IOCL) की ओर से: श्री अंकित कत्यार, अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

MTUjMTcyMTEjMjAxOSMxI04=-UqsWW4MYFmA=

यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी और आप बिहार में कानूनी बदलावों से जुड़े रहना चाहते हैं, तो Samvida Law Associates को फॉलो कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News