पटना उच्च न्यायालय का फैसला: भर्ती रद्दीकरण और “नियमों के खेल” पर महत्वपूर्ण निर्णय — 2022

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 14 नवंबर 2022 को एक अहम फैसला सुनाया जिसमें बिहार राज्य विद्युत बोर्ड (अब बिहार राज्य विद्युत होल्डिंग कंपनी लिमिटेड) द्वारा 2007 में शुरू की गई एक भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद था। यह मामला इस बात पर केंद्रित था कि क्या कोई सरकारी संस्था वर्षों तक भर्ती को लटकाकर बाद में योग्यता के नियम बदल सकती है या नहीं।

साल 2007 में बोर्ड ने जूनियर लाइनमैन और अनस्किल्ड लेबरर (अकुशल मजदूर) के पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। अकुशल मजदूर के लिए न्यूनतम योग्यता केवल आठवीं पास रखी गई थी। हजारों अभ्यर्थियों ने आवेदन किया और परीक्षा की उम्मीद में इंतजार करने लगे।

लेकिन इस भर्ती की प्रक्रिया अधूरी रह गई। इसी बीच, वर्ष 2012 में बिजली विभाग का पुनर्गठन हुआ और इसे कई कंपनियों में बाँट दिया गया। 2015 में नई होल्डिंग कंपनी ने पुराने विज्ञापन को रद्द करते हुए न्यूनतम योग्यता को आठवीं से बढ़ाकर दसवीं पास कर दिया।

इससे वे सभी अभ्यर्थी जो पहले योग्य थे, अब अयोग्य घोषित हो गए। अभ्यर्थियों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। 2014 में उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि छह महीनों के भीतर भर्ती पर अंतिम निर्णय लिया जाए। परंतु जब आदेश का पालन नहीं हुआ, तो उन्होंने अवमानना याचिका दाखिल की। इसी दौरान कंपनी ने पहली बार बताया कि उसने 2015 में ही भर्ती रद्द कर दी थी और योग्यता बढ़ा दी थी।

तब अभ्यर्थियों ने नई याचिका (CWJC No. 6229/2016) दाखिल की जिसमें इन दोनों पत्रों (दिनांक 16.04.2015 और 05.05.2015) को चुनौती दी गई।

2018 में एकल न्यायाधीश ने यह माना कि चयन प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने कंपनी को निर्देश दिया कि 2007 की भर्ती को पुरानी योग्यता के अनुसार तीन महीनों में पूरा किया जाए।

इस आदेश के खिलाफ कंपनी ने एलपीए (Letters Patent Appeal No. 1264 of 2018) दायर किया।

अपील में कंपनी का तर्क था कि किसी उम्मीदवार को नौकरी का “अधिकार” नहीं होता, भले ही विज्ञापन जारी हुआ हो। उन्होंने Shankarsan Dash v. Union of India (1991) का हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यही सिद्धांत दिया था कि नियुक्ति का कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं होता। दूसरी ओर, अभ्यर्थियों ने कहा कि सरकार या संस्था प्रक्रिया के बीच में “नियमों का खेल” नहीं बदल सकती, जैसा कि कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में स्पष्ट किया गया है।

डिवीजन बेंच (माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी एवं माननीय न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह) ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर कहा कि भले ही किसी को नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं होता, लेकिन राज्य की कार्यवाही निष्पक्ष और गैर-मनमानी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई संस्था सालों तक भर्ती प्रक्रिया लंबित रखे और फिर अचानक योग्यता बदल दे, तो यह “वाजिब अपेक्षा” (Legitimate Expectation) के सिद्धांत के खिलाफ है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि अकुशल मजदूर के लिए आठवीं से दसवीं पास की योग्यता बढ़ाने का कोई ठोस औचित्य नहीं था। काम का स्वरूप वही था, इसलिए योग्यता बढ़ाना केवल औपचारिकता या मनमानी लगती है। साथ ही, कंपनी ने प्रक्रिया रद्द करने की सूचना बहुत देर से और बिना पारदर्शिता के दी, जिससे उम्मीदवारों को नुकसान हुआ।

हालांकि न्यायालय ने यह भी माना कि 2007 के पुराने विज्ञापन के आधार पर अब नियुक्ति कराना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि 15 साल से अधिक बीत चुके हैं और परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। इसलिए अदालत ने एक संतुलित रास्ता अपनाया — भर्ती बहाल करने की जगह उम्मीदवारों को मुआवजा देने का आदेश दिया।

अदालत ने प्रत्येक अभ्यर्थी को ₹1.5 लाख का मुआवजा चार सप्ताह में देने का निर्देश दिया, अन्यथा 9% वार्षिक ब्याज देना होगा। यह राहत इस बात की स्वीकृति थी कि भले ही नौकरी का अधिकार न हो, लेकिन वर्षों की प्रतीक्षा और नियमों के मनमाने बदलाव से उम्मीदवारों को अन्याय हुआ।

इस प्रकार, यह फैसला स्पष्ट करता है कि सरकार या कोई सार्वजनिक संस्था उम्मीदवारों से पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीद रखती है, तो खुद भी वही सिद्धांत अपनाए।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  1. आम जनता और अभ्यर्थियों के लिए:
    यह निर्णय बताता है कि यदि सरकार किसी भर्ती को वर्षों तक अधर में रखकर बाद में नियम बदल देती है, तो अदालत इसमें हस्तक्षेप कर सकती है। भले ही सीधी नियुक्ति का आदेश न मिले, पर अदालत मुआवजा देकर न्याय सुनिश्चित कर सकती है।
  2. सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थाओं के लिए:
    यह फैसला एक चेतावनी है कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद योग्यता या मानदंड बदलना तब तक वैध नहीं जब तक इसके पीछे कोई ठोस सार्वजनिक हित न हो। अगर मनमाने ढंग से ऐसा किया गया तो यह “दुरुपयोग” (abuse of power) माना जाएगा।
  3. नीति निर्माताओं के लिए:
    यदि किसी विभाग में पुनर्गठन या नई नीति बनती है, तो पुरानी भर्तियों को तुरंत उचित कारण के साथ बंद करना चाहिए और उम्मीदवारों को सूचित करना चाहिए। लंबे समय तक चुप रहना और फिर अचानक बदलाव करना न्यायसंगत नहीं है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या भर्ती के बीच में योग्यता बदली जा सकती है?
    अदालत ने कहा कि प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियम बदलना “rules of the game” का उल्लंघन है, जब तक कोई बहुत बड़ा सार्वजनिक कारण न हो। यहाँ ऐसा कोई औचित्य नहीं था।
  • क्या उम्मीदवारों को नियुक्ति का अधिकार होता है?
    नहीं, लेकिन राज्य की कार्रवाई निष्पक्ष और उचित होनी चाहिए। जब उम्मीदवारों को यह अपेक्षा दिलाई जाती है कि प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, तो अचानक बदलाव अनुचित है।
  • उचित राहत क्या है?
    अदालत ने मुआवजा (₹1.5 लाख प्रति व्यक्ति, ब्याज सहित) का आदेश दिया ताकि अन्याय की भरपाई हो सके, लेकिन पुरानी भर्ती से नियुक्ति कराने का आदेश नहीं दिया।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • Shankarsan Dash v. Union of India, (1991) 3 SCC 47 — उम्मीदवार को नियुक्ति का स्वाभाविक अधिकार नहीं।

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Tej Prakash Pathak v. Rajasthan High Court, (2013) 4 SCC 540
  • K. Manjusree v. State of A.P., (2008) 3 SCC 512
  • Asha Kaul v. State of J&K, (1993) 2 SCC 573
  • State of Haryana v. Subash Chander Marwaha, (1974) 3 SCC 220
  • State of Bihar v. Shyama Nandan Mishra, 2022 LiveLaw (SC) 449
  • State of Jharkhand v. Brahmputra Metallics Ltd., 2020 SCC OnLine SC 968

मामले का शीर्षक

बिहार राज्य विद्युत बोर्ड (अब बिहार राज्य विद्युत होल्डिंग कंपनी लिमिटेड) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य (नाम गुप्त रखे गए)

केस नंबर

Letters Patent Appeal No. 1264 of 2018 (arising out of CWJC No. 6229 of 2016)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 141

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी एवं माननीय न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह
(निर्णय दिनांक 14 नवंबर 2022)

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • श्री आनंद कुमार ओझा — अपीलकर्ता की ओर से
  • श्री योगेन्द्र प्रसाद सिन्हा, अपर महाधिवक्ता (AAG-7) — राज्य की ओर से

निर्णय का लिंक

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