मामले की पृष्ठभूमि
मामला NEET (UG)-2024 से उत्पन्न हुआ, जो MBBS और अन्य मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा है, जिसे National Testing Agency (NTA) द्वारा 5 मई 2024 को आयोजित किया गया था।
याचिकाकर्ता ने NEET (UG)-2024 उत्तीर्ण किया और Bihar Combined Entrance Competitive Examination Board (BCECE Board) द्वारा काउंसलिंग के लिए बुलाया गया। काउंसलिंग के बाद उसे प्रवेश पत्र मिला और उसने Narayan Medical College and Hospital, Jamuhar, Sasaram, जिला रोहतास में MBBS पाठ्यक्रम (सत्र 2024–2029) में प्रवेश ले लिया।
जब वह प्रथम वर्ष में पढ़ाई कर रहा था, तब NTA ने 23.10.2024 (F.No.2024/CBI/264) दिनांकित कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में यह आरोप लगाया गया कि NEET (UG)-2024 के दौरान उसके द्वारा अनुचित साधनों के उपयोग का संदेह है और यह सूचित किया गया कि उसके परिणाम को अगली आदेश तक रोक दिया गया है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसे ऐसा कोई नोटिस कभी प्राप्त नहीं हुआ। बाद में, 11.02.2025 को BCECE Board के Examination Controller ने Memo No. 188/2025 जारी किया। इस मेमो में मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिया गया कि जिन छात्रों के नाम NTA द्वारा चिन्हित किए गए हैं, उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी जाए और इसकी सूचना बोर्ड को दी जाए।
इस मेमो के आधार पर कार्यवाही करते हुए, Narayan Medical College and Hospital के Principal ने 17.02.2025 को आदेश संख्या NMCH/PO/25/84 जारी किया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता का प्रवेश तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया और उसे 48 घंटों के भीतर हॉस्टल खाली करने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की सिविल रिट अधिकारिता के अंतर्गत याचिका दायर कर कारण बताओ नोटिस, BCECE Board के मेमो और कॉलेज के प्रवेश-निरस्तीकरण आदेश को रद्द करने की मांग की। उसने अपना MBBS प्रवेश बहाल करने और impugned आदेशों पर अंतरिम स्थगन की भी प्रार्थना की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार द्वारा की गई। न्यायालय ने याचिकाकर्ता, NTA, CBI, BCECE Board, कॉलेज, बिहार राज्य और National Medical Commission की ओर से की गई दलीलों पर विचार किया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह थी कि उसके करियर को बिना किसी ठोस साक्ष्य के और बिना निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन किए बर्बाद कर दिया गया।
उसके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि NEET (UG)-2024 प्रश्नपत्र लीक और कदाचार से संबंधित CBI का मामला Shastri Nagar Police Station Case Crime No. 358/2024 दिनांक 05.05.2024 के रूप में दर्ज किया गया था। परंतु उस FIR में याचिकाकर्ता को अभियुक्त के रूप में नामित नहीं किया गया। यह कहा गया कि जांच के दौरान भी उसके विरुद्ध कोई ठोस सामग्री एकत्रित नहीं की गई और न ही उसके विरुद्ध कोई charge-sheet दायर की गई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, केवल अनुचित साधनों के प्रयोग के महज संदेह के आधार पर उसकी उम्मीदवारी और कॉलेज प्रवेश रद्द कर दिए गए। उसने कहा कि उसे कोई नोटिस तामील नहीं किया गया और न ही प्रवेश रद्द करने से पूर्व कोई जवाब देने का अवसर दिया गया। यह, उसके अनुसार, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने आगे यह भी प्रस्तुत किया कि CBI की जांच अभी भी लंबित है और कोई अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई है। बिना किसी निष्कर्षात्मक निष्कर्ष के उसके करियर को “अनिश्चित काल के लिए लटकी हुई स्थिति में” रखना अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा। यदि विधिवत वैज्ञानिक जांच के बाद CBI को साक्ष्य मिलते हैं और उसके विरुद्ध charge-sheet दाखिल की जाती है, तो बाद में निरस्तीकरण उचित हो सकता है। परंतु, उसने तर्क दिया, परीक्षा को हुए डेढ़ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।
उसने जोर देकर कहा कि संदेह चाहे कितना भी प्रबल हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। यदि अंततः CBI उसे मुक़दमे के लिए नहीं भेजती, तो उसके द्वारा गँवाए गए वर्षों और MBBS सीट की भरपाई का कोई तरीका नहीं होगा। इस आधार पर उसने न्यायालय से आदेशों को निरस्त कर उसका प्रवेश बहाल करने का अनुरोध किया।
NTA का पक्ष
NTA ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से व्यापक परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट किया। CBI NEET (UG)-2024 से संबंधित छह मामलों की जांच कर रही थी। एक मामला Ministry of Education की लिखित शिकायत पर आधारित था। अन्य पाँच मामले विभिन्न राज्य सरकारों से CBI को हस्तांतरित किए गए थे, जिनमें Shastri Nagar Police Station का मामला (Crime No. 358/2024) भी शामिल है, जो 05.05.2024 को Nitish एवं अन्य के विरुद्ध Indian Penal Code की धाराओं 120B, 407, 408 और 409 के तहत दर्ज किया गया था।
जांच के दौरान, CBI ने कई ऐसे अभ्यर्थियों की पहचान की जो कथित रूप से कदाचार में शामिल थे। CBI ने ऐसे अभ्यर्थियों की सूची NTA को साझा की और यह भी संकेत दिया कि संदिग्ध लाभार्थियों की एक अतिरिक्त सूची बाद में भेजी जाएगी।
याचिकाकर्ता का नाम CBI द्वारा भेजी गई सूची में था। इसके आधार पर, NTA ने याचिकाकर्ता तथा अन्य अभ्यर्थियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया कि क्यों उनके विरुद्ध कार्रवाई न की जाए। NTA के अनुसार, याचिकाकर्ता ने निर्धारित समय सीमा के भीतर कोई जवाब नहीं दिया।
01.11.2024 को NTA ने Director General of Health Services को 21 अभ्यर्थियों के बारे में, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, सूचित किया, जिनके कदाचार में संलिप्त होने का CBI को संदेह था। उनके NEET परिणाम रोक दिए गए। NTA ने विशेष रूप से काउंसलिंग कराने वाली संस्थाओं और मेडिकल कॉलेजों को यह सलाह दी कि निष्पक्षता और पारदर्शिता के हित में उनके प्रवेश रद्द करने पर विचार करें। इसी के आधार पर BCECE Board और कॉलेज ने याचिकाकर्ता का प्रवेश रद्द कर दिया।
NTA ने Supreme Court के निर्णय Vanshika Yadav vs. Union of India & Ors. (Writ Petition (Civil) No. 335 of 2024) पर भी भरोसा किया। NEET (UG)-2024 कदाचार से संबंधित इस मामले में Supreme Court ने कहा था कि जो भी छात्र धोखाधड़ी में लिप्त पाया जाए या कदाचार से लाभान्वित हो, वह प्रवेश जारी रखने का कोई अर्जित अधिकार (vested right) दावा नहीं कर सकता। काउंसलिंग समाप्त होने के बाद भी उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।
CBI का रुख
न्यायालय ने पूर्व में, 23.09.2025 को, Union of India को निर्देश दिया था कि वह CBI से निर्देश लेकर counter affidavit दाखिल कराए। इसके अनुपालन में New Delhi स्थित CBI EO-III के एक Deputy Superintendent of Police द्वारा शपथित counter affidavit दायर किया गया।
CBI ने बताया कि वरिष्ठ अधिकारियों से मिली सूचना के अनुसार NEET (UG)-2024 के MBBS/BDS प्रवेश के लिए प्रश्नपत्र की chain of custody में integrity का उल्लंघन हुआ था। एक संगठित गिरोह ने छात्रों और परीक्षा कर्मियों के साथ मिलकर कथित रूप से प्रश्नपत्र लीक किया।
CBI के अनुसार, जांच के दौरान महत्वपूर्ण सामग्री सामने आई और 45 नामित अभियुक्तों के विरुद्ध पाँच charge-sheet दाखिल की गईं। प्रश्नपत्र की प्रतियां विभिन्न स्थानों पर वितरित की गईं, जिनमें Learn Play School, Patna भी शामिल है।
CBI ने न्यायालय को सूचित किया कि Learn Play School की 4/5 मई 2024 की CCTV फुटेज में याचिकाकर्ता की उपस्थिति अन्य अभ्यर्थियों के साथ दर्ज है। फुटेज में अभियुक्तों एवं अभ्यर्थियों का आना-जाना भी दिखाई देता है। याचिकाकर्ता ने बाद में NEET की परीक्षा Tribhuvan School, Patna में दी, 720 में से 205 अंक प्राप्त किए, All India Rank 955873 हासिल की और Narayan Medical College में प्रवेश पाया।
साथ ही, CBI ने निष्पक्षतापूर्वक यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की सटीक संलिप्तता के संबंध में जांच अभी जारी है और उसके विरुद्ध अभी कोई charge-sheet दाखिल नहीं की गई है।
राज्य, BCECE Board और कॉलेज की दलीलें
राज्य, BCECE Board और कॉलेज ने सीमित पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का प्रवेश रद्द किया जाना NTA के संचार का प्रतिफल है, जो स्वयं CBI द्वारा एकत्रित सामग्री पर आधारित था। उन्होंने स्वतंत्र रूप से कोई जांच नहीं की।
न्यायालय का विधिक विश्लेषण
पटना उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर सावधानीपूर्वक विचार किया और अभिलेख पर मौजूद सामग्री की समीक्षा की।
न्यायालय ने पहले Supreme Court के Vanshika Yadav फैसले पर चर्चा की। वहां Supreme Court ने स्पष्ट किया था कि जब तक परीक्षा में व्यापक स्तर पर लीक (systematic leak) सिद्ध न हो, पूरी परीक्षा रद्द करना उचित नहीं है। हालांकि, कोई भी अभ्यर्थी जिसके द्वारा धोखाधड़ी की गई हो या जो कदाचार का लाभार्थी हो, वह प्रवेश जारी रखने का अर्जित अधिकार नहीं रखता।
Supreme Court ने यह भी अनुमति दी थी कि जिन छात्रों की व्यक्तिगत शिकायतें उस निर्णय के दायरे में नहीं आतीं, वे संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत क्षेत्राधिकारयुक्त उच्च न्यायालयों का रुख कर सकते हैं। परंतु उसने स्पष्ट रूप से यह चेतावनी भी दी कि उसके निर्णय को कदाचार में संलिप्त लोगों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही पर रोक के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। किसी भी ऐसे अभ्यर्थी के विरुद्ध, जो कदाचार का लाभार्थी पाया जाए, कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
पटना उच्च न्यायालय ने इसके बाद Madhya Pradesh High Court के निर्णय Pratibha Singh Ku. (Minor) v. State of M.P. [2014(3) MPHT 178] का उल्लेख किया। वहां यह माना गया था कि:
राज्य पर मुक्त और निष्पक्ष प्री-एडमिशन प्रोफेशनल परीक्षाओं का संचालन करने की पूरी जिम्मेदारी है; इस शक्ति में परिणाम घोषित होने के बाद भी परीक्षा से संबंधित सभी मामलों की जांच करने की शक्ति शामिल है; सार्वजनिक परीक्षाओं में धोखाधड़ी पूरे परिणाम को दूषित कर देती है; और सामूहिक नकल (mass copying) के मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कठोर अनुपालन आवश्यक नहीं भी हो सकता है।
न्यायालय ने इसके बाद NEET (UG)-2024 के लिए NTA द्वारा जारी Information Bulletin के अध्याय 13 को देखा। क्लॉज 13.1 में “unfair means” को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जो किसी भी ऐसी गतिविधि को शामिल करता है जो किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाती हो और कई प्रकार के कदाचार को कवर करती है। क्लॉज 13.2 में यह प्रावधान है कि ऐसा अभ्यर्थी जो परीक्षा से पहले, दौरान या बाद में इन गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, उसे अनुचित साधनों का उपयोग करने वाला माना जाएगा, उसे तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित किया जाएगा और उसके विरुद्ध आपराधिक एवं अन्य कार्रवाई भी की जा सकती है। क्लॉज 13.3 अनिवार्य करता है कि ऐसे अभ्यर्थियों के परिणाम रद्द कर दिए जाएंगे और घोषित नहीं किए जाएंगे।
इन प्रावधानों और Supreme Court के निर्णय के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि NEET (UG)-2024 में अनुचित साधनों का प्रयोग करने वाले अभ्यर्थियों के विरुद्ध कार्रवाई करने हेतु NTA सक्षम प्राधिकारी है।
छात्रों के अधिकार और परीक्षा की निष्पक्षता के बीच संतुलन
न्यायालय ने माना कि NEET (UG)-2024 का प्रश्नपत्र लीक और integrity का उल्लंघन एक संगठित गिरोह का कार्य प्रतीत होता है, जिसमें कुछ छात्र और परीक्षा कर्मी शामिल हैं। CBI की जांच से पहले ही पाँच charge-sheet दाखिल हो चुकी हैं और याचिकाकर्ता से संबंधित जांच अभी प्रगति पर है।
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि इस अवस्था में वह यह नहीं कह सकता कि याचिकाकर्ता से संबंधित जांच प्रारंभिक चरण में है या पर्याप्त सामग्री पहले ही एकत्रित की जा चुकी है। हालांकि, उसे यह बताया गया कि CCTV फुटेज में Learn Play School में याचिकाकर्ता अन्य अभियुक्तों के साथ दिखाई देता है, जो उसकी भूमिका पर संदेह का आधार बनता है।
इसके बाद न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित न्याय (speedy trial) के अधिकार की ओर रुख किया, जैसा कि Supreme Court ने Abdul Rehman Antulay & Ors. vs. R.S. Nayak & Anr. [(1992) 1 SCC 225] में स्पष्ट किया है। जबकि speedy trial एक ऐसा अधिकार है जो जांच, पूछताछ, मुकदमा, अपील और पुन:विचारण (retrial) सभी चरणों को कवर करता है, Supreme Court ने यह भी कहा है कि विशेषकर व्यापक और जटिल अपराधों में जांच या मुकदमे के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय करना न तो व्यावहारिक है और न ही सलाह योग्य।
पटना उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि CBI की जांच, यद्यपि समय लेने वाली हो सकती है, फिर भी उसे यथासंभव उचित अवधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब छात्रों के करियर दांव पर लगे हों। न्यायालयों और अन्वेषण एजेंसियों को “अच्छे और बुरे को अलग” (grain from chaff) करना चाहिए ताकि bona fide छात्र किसी गलती के बिना दंडित न हों। साथ ही, जो वास्तव में कदाचार में शामिल हों, उनके साथ कठोरतापूर्वक निपटा जाना चाहिए और उन्हें धोखाधड़ी के लाभ का आनंद नहीं लेने दिया जाना चाहिए, क्योंकि धोखाधड़ी हर गंभीर (solemn) कार्य को दूषित कर देती है।
अंतिम निर्णय
उपरोक्त के आधार पर न्यायालय ने माना कि इस चरण पर याचिकाकर्ता के प्रवेश-निरस्तीकरण में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं है।
तद्नुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई।
हालांकि, न्यायालय ने दो महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जोड़े। पहला, उसने यह अपेक्षा व्यक्त की कि प्राधिकारी एवं जांच अधिकारी यथाशीघ्र जांच पूरी करने का ईमानदार प्रयास करेंगे, ताकि genuine छात्रों को आपराधिक मामलों के कठोर परिणामों से बचाया जा सके, जो उनके पूरे जीवन और करियर को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
दूसरा, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश याचिकाकर्ता के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं करता। बल्कि, वह CBI को यह स्वतंत्रता देता है कि वह ठोस सामग्री के आधार पर कोई प्रारंभिक (tentative) निष्कर्ष निकाले। एक बार ऐसी सामग्री उपलब्ध होने पर, संबंधित प्रतिवादी प्राधिकारी न्याय के हित में अंतिम निर्णय ले सकते हैं। इससे यह गुंजाइश बनी रहती है कि यदि अंततः जांच याचिकाकर्ता के विरुद्ध संदेह को पुष्ट नहीं करती, तो मामले पर पुनर्विचार किया जा सके।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय NEET अभ्यर्थियों और उन मेडिकल छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके नाम परीक्षा कदाचार की जांच में सामने आते हैं।
पहला, यह दर्शाता है कि जब NTA और CBI की सामग्री से अनुचित साधनों के संभावित उपयोग का संकेत मिलता है, तो पटना उच्च न्यायालय जांच लंबित रहने और charge-sheet दाखिल न होने के बावजूद प्रवेश बहाल करने से परहेज करता है।
दूसरा, न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि CBI की सूचनाओं और अपनी Information Bulletin के मार्गदर्शन में NTA परिणाम रोक सकता है और जहाँ अनुचित साधनों का संदेह हो, वहाँ प्रवेश रद्द करने की सिफारिश कर सकता है। मेडिकल कॉलेज और राज्य काउंसलिंग निकाय ऐसी सिफारिशों पर कार्रवाई कर सकते हैं।
तीसरा, न्यायालय ने अभी भी इस बात पर बल दिया है कि छात्रों के करियर पर असर डालने वाली जांच यथाशीघ्र पूरी की जानी चाहिए और genuine छात्रों को कष्ट नहीं उठाना चाहिए। यदि बाद में जांच किसी छात्र को क्लीन चिट दे, तो पुनर्विचार का रास्ता खुला रहता है।
छात्रों और अभिभावकों के लिए, यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि किसी संदिग्ध कोचिंग स्थल से, जो लीक से जुड़ा हो, केवल उपस्थित होना और CCTV फुटेज में दर्ज हो जाना भी, अंतिम जांच लंबित रहते हुए, प्रवेश पर गंभीर परिणाम डाल सकता है।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
-
प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय NEET (UG)-2024 में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के NTA और CBI के संदेह के आधार पर MBBS प्रवेश निरस्तीकरण में, जबकि जांच अभी लंबित है, हस्तक्षेप कर सकता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि NTA NEET Information Bulletin और Supreme Court के निर्णयों द्वारा समर्थित है और कदाचार के संदेह वाले अभ्यर्थियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए सक्षम है। चल रही CBI जांच और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए इस चरण पर निरस्तीकरण को निरस्त करने का कोई ठोस आधार नहीं था। -
प्रश्न: क्या CBI द्वारा charge-sheet दाखिल करने में देरी अपने आप छात्र को प्रवेश जारी रखने का अधिकार देती है?
उत्तर: नहीं। यद्यपि त्वरित जांच speedy trial के अधिकार का हिस्सा है, इतने व्यापक अपराधों में कोई निश्चित समय सीमा थोपना संभव नहीं है। न्यायालय ने केवल यह निर्देश दिया कि जांच उचित समय के भीतर पूरी की जाए, और देरी को प्रवेश बहाल करने का आधार नहीं माना।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Vanshika Yadav vs. Union of India & Ors., Writ Petition (Civil) No. 335 of 2024 (Supreme Court of India) – NEET (UG)-2024 कदाचार और दोषयुक्त (tainted) अभ्यर्थियों के अधिकारों से निपटने के सिद्धांतों के लिए उद्धृत।
- Pratibha Singh Ku. (Minor) v. State of M.P. [2014(3) MPHT 178] – इस सिद्धांत के लिए उद्धृत कि प्रोफेशनल प्रवेश परीक्षाओं में धोखाधड़ी परिणामों को दूषित कर देती है और सामूहिक नकल के मामलों में प्राकृतिक न्याय का कठोर अनुपालन हमेशा आवश्यक नहीं है।
- Abdul Rehman Antulay & Ors. vs. R.S. Nayak & Anr. [(1992) 1 SCC 225] – अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित न्याय के संवैधानिक अधिकार और जांचों के लिए कठोर समय-सीमा निर्धारित करने की सीमाओं पर उद्धृत।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 5711 of 2025
मामले का शीर्षक: Rishu Ranjan vs. The Examination Controller of Bihar Combined Entrance Competitive Examination Board & Ors.
उद्धरण: 2026(1) PLJR 532
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
कोरम: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar
निर्णय की तिथि: 23-12-2025
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Shashi Bhushan Singh, Advocate
- बिहार राज्य की ओर से: Mr. Pratik Kumar, AC to GA-11; बाद की सुनवाई में Mr. Raghwanand, GA 11 और Mr. Sanjay Kumar Tiwari, AC to GA 11 भी
- NTA की ओर से: Ms. Chhaya Kirti, Advocate
- CBI की ओर से: Mr. Kumar Priya Ranjan, Senior Panel Counsel; Mr. Sudarshan Bhardwaj, Advocate
- BCECE Board की ओर से: Mr. Prasoon Sinha, Senior Advocate; Mr. Prabhat Kumar, Advocate
- Narayan Medical College and Hospital (प्रतिवादी संख्या 3) की ओर से: Mr. P.K. Shahi, Senior Advocate; Mr. Amish Kumar, Advocate
- NMC की ओर से: Mr. Kumar Priya Ranjan, Advocate
मामले का स्वभाव: अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें NEET (UG) आधारित MBBS प्रवेश निरस्तीकरण एवं संबंधित प्रशासकीय आदेशों को चुनौती दी गई।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 5711 of 2025
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, तो आप Samvida Law Associates को आगे की जानकारियों के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


