मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिनदहाड़े हुई एक गोलीबारी से संबंधित है, जो 30.10.1992 को लगभग दोपहर 2 बजे गाँव चैइलवन, थाना गोपालपुर, जिला गोपालगंज में हुई थी।
सूचक रोशन कमकार (PW-3) के फर्दबeyan के अनुसार, वह और उसका पुत्र नंदलाल कमकार गाँव के मुखिया श्याम सुंदर राय (PW-1) के घर गए थे, ताकि उनके फ़ोटोग्राफ़ पर प्रमाणित हस्ताक्षर करवाए जा सकें। यह प्रमाणन उन कार्डों पर आवश्यक था जिनका उपयोग किसान, गन्ना चीनी मिल को आपूर्ति करने के लिए करते थे।
फ़ोटोग्राफ़ पर प्रमाणित हस्ताक्षर करवाने के बाद, पिता और पुत्र घर लौटने लगे। मुखिया के “बखर” (पशुशाला/भंडारण कक्ष) के पास, कथित रूप से, उन पर उसी गाँव के कई अभियुक्तों ने, जो सभी देसी कट्टों से लैस थे, घेरकर हमला कर दिया।
सूचक ने आरोप लगाया कि तीन अभियुक्तों, जिनमें अपीलकर्ता परसुराम पांडे भी शामिल था, ने नंदलाल को पकड़ लिया। अभियुक्त चंद्रदेव पांडे द्वारा “मार डालने” का आदेश दिए जाने पर अभियुक्त त्रिभुवन पांडे ने बेहद नज़दीक से देसी कट्टे से नंदलाल पर गोली चला दी, जो बाईं भौं के नीचे और नाक के नीचे के हिस्से में लगी। नंदलाल गिर पड़ा, दर्द से चिल्लाने लगा और तेज़ी से खून बहने लगा।
फर्दबeyan में आगे कहा गया कि अन्य अभियुक्त तीन दिशाओं में मोर्चा लेकर खड़े हो गए, और जो भी पास आएगा उसे गोली मार देने की धमकी दी, तथा जैसे ही ग्रामीण लोग गोली की आवाज़ सुनकर इकट्ठा हुए, वे भाग निकले। कथित रूप से बताई गई वजह यह थी कि घटना से 15 दिन पहले एक झगड़ा हुआ था: अभियुक्त त्रिभुवन पांडे और सुरेंद्र राय ने सूचक के खेत से गन्ने के पौधे काट लिए थे, जिसका नंदलाल ने विरोध किया था, जिससे कहासुनी हो गई थी।
पुलिस ने गोपालपुर थाना कांड सं. 54/1992 दर्ज किया। जाँच के बाद, प्राथमिकी में नामित सभी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोपपत्र दायर किया गया। मामला सत्र न्यायालय में समर्पित किया गया और सत्र वाद सं. 249/1993/54/1993 के रूप में दर्ज हुआ।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, गोपालगंज ने 21.08.1995 के निर्णय और 22.08.1995 के सज़ा आदेश द्वारा अपीलकर्ता त्रिभुवन पांडे को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया और उसे धारा 302 आईपीसी के तहत आजीवन कठोर कारावास तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत तीन वर्ष का कठोर कारावास सुनाया। अन्य अभियुक्तों, जिनमें अपीलकर्ता परसुराम पांडे भी शामिल था, को धारा 302/149 आईपीसी के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कठोर कारावास की सज़ा दी गई।
सभी दोषियों ने आपराधिक अपीलें दायर कीं। लंबितावस्था के दौरान, आपराधिक अपील (DB) सं. 253/1995, पाँच अपीलकर्ताओं (सुरेंद्र पांडे, सुरेंद्र राय, कंचन राय, रामचंद्र पांडे और चंद्रदेव पांडे) के संबंध में उनकी मृत्यु के कारण 05.04.2022 को अबेट हो गई। अपील केवल अपीलकर्ता संख्या 1, परसुराम पांडे के लिए जारी रही। अपीलकर्ता त्रिभुवन पांडे द्वारा दायर आपराधिक अपील (DB) सं. 293/1995 भी लंबित रही।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें माननीय श्री न्यायमूर्ति ए.एम. बादर और माननीय श्री न्यायमूर्ति सुनील कुमार पंवार (निर्णय के लेखक) शामिल थे, ने दोनों आपराधिक अपीलों की एक साथ सुनवाई की और पूरे अभिलेख का परीक्षण किया।
अभियोजन ने आठ गवाहों की जाँच कराई। PW-7, डॉ. शंभु कुमार केडिया ने नंदलाल के शव का पोस्टमार्टम किया। PW-8, परास नाथ सिंह, प्रारम्भिक चरण में जाँचकर्ता अधिकारी थे। PW-1 (मुखिया), PW-2, PW-3 (सूचक), PW-4 और PW-6 को प्रत्यक्षदर्शी गवाह के रूप में उद्धृत कर जाँच किया गया। PW-5 की जाँच मुख्य रूप से पूर्व की गन्ना पौधे काटने की घटना के संबंध में की गई।
अपीलकर्ताओं का बचाव शुरू से अंत तक यह था कि वे निर्दोष हैं और झूठा फँसाए गए हैं।
प्रेरणा (मोटिव) और घटना की “उत्पत्ति” को चुनौती
अपीलकर्ताओं के अधिवक्ताओं का पहला प्रमुख तर्क यह था कि मृतक के परिवार और अभियुक्तों के बीच कोई वास्तविक दुश्मनी नहीं थी। स्वयं सूचक ने जिरह में स्वीकार किया था कि घटना के समय कोई दुश्मनी नहीं थी और वह कथित गन्ना काटने की घटना के बाद भी गाँव में अभियुक्तों से मिलता-जुलता और अभिवादन (सलाम-दुआ) करता था।
इस आधार पर अधिवक्ता ने सुझाव दिया कि सामान्य समझ के विपरीत है कि अपीलकर्ता अचानक नंदलाल की हत्या कर दें, जिससे अभियोजन की कहानी की मूल उत्पत्ति ही संदिग्ध हो जाती है।
PW-5, जिसे गन्ना काटने की घटना का गवाह बताया गया था, ने कहा कि वह अपने खेत पर गया था, जबकि कोई काम नहीं था, और उसने देखा कि अभियुक्त त्रिभुवन और सुरेंद्र, नंदलाल के गन्ने के पौधे काट रहे थे। जिरह में उसकी इस बात को कि गन्ना काटने की घटना हुई थी, नहीं हिला सकी।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के इस तर्क से सहमति व्यक्त की कि मनुष्य की प्रेरणाएँ “बहुत रहस्यमय” हो सकती हैं और यह बताना कठिन है कि कोई व्यक्ति कब और कैसे अपनी आंतरिक भावनाओं पर अमल करेगा। कोई व्यक्ति अपराध के लिए कोई भी समय चुन सकता है और यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने भावी शिकार से मिलने पर अपना मन प्रकट कर देगा।
पीठ ने उल्लेख किया कि यह प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के सीधे साक्ष्य का मामला है, जो घटना स्थल, हमले के तरीके और प्रयुक्त हथियारों के बारे में है। ऐसे मामलों में अपराध सिद्ध करने के लिए प्रेरणा अनिवार्य नहीं होती। प्रेरणा मुख्यतः उन मामलों में महत्वपूर्ण होती है जो केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हों। यहाँ अभियोजन ने विश्वसनीय प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किए थे।
इसलिए न्यायालय ने यह दलील अस्वीकार कर दी कि केवल इसलिए अभियोजन की कहानी संदिग्ध है कि पूर्व संबंध ऊपर-ऊपर से सौहार्दपूर्ण थे।
मुखिया के इशारे पर झूठा फँसाए जाने का आरोप
दूसरा प्रमुख तर्क यह था कि निचली अदालत ने PW-1 (मुखिया) पर गलत भरोसा किया। बचाव पक्ष ने उसे “माहिर आपराधिक व्यक्ति” बताया और दावा किया कि उसकी अपीलकर्ताओं से दुश्मनी थी तथा उसने बदला लेने के लिए वर्तमान मामले का इस्तेमाल किया।
पीठ ने घटना के स्थान और परिस्थितियों पर विचार किया। स्थान मुखिया के बखर के निकट था। घटना के दिन कई ग्रामीण, जिनमें सूचक और उसका पुत्र भी शामिल थे, मुखिया के घर उनकी गन्ना आपूर्ति कार्डों के लिए फ़ोटोग्राफ़ पर प्रमाणित हस्ताक्षर करवाने गए थे। न्यायालय ने देखा कि उस दिन मुखिया के घर पर कई लोगों की उपस्थिति स्वाभाविक परिस्थिति थी, क्योंकि मुखिया को औपचारिक रूप से ऐसे फ़ोटोग्राफ़ प्रमाणित करने का अधिकार प्राप्त था।
न्यायालय को कोई कारण नज़र नहीं आया कि सूचक, जिसका अपना पुत्र मारा गया था, मुखिया के हाथों की “कठपुतली” बनकर अभियुक्तों को झूठा फँसाएगा। बचाव पक्ष कोई भी ऐसा ठोस संकेत प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे प्रतीत हो कि हत्या किसी और ने की थी या अपीलकर्ता कहीं और थे।
उच्च न्यायालय ने नोट किया कि प्रत्यक्षदर्शी गवाह जिरह में खरे उतरे और लगातार यह बयान देते रहे कि अभियुक्तों ने नंदलाल पर हमला किया। जिस उद्देश्य से वे मुखिया के घर आए थे, उसे देखते हुए उनका घटना स्थल पर होना स्वाभाविक था।
तदनुसार, यह तर्क कि मुखिया के इशारे पर मामला गढ़ा गया, निराधार पाया गया।
चिकित्सकीय एवं प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के बीच कथित टकराव
अपीलकर्ताओं द्वारा उठाई गई तीसरी चुनौती यह थी कि चिकित्सकीय साक्ष्य प्रत्यक्षदर्शी संस्करण से मेल नहीं खाता। अभियोजन गवाहों के अनुसार, अपीलकर्ता त्रिभुवन पांडे ने अपने कट्टे की नाल नंदलाल के शरीर पर सटाकर गोली चलाई थी। फिर भी डॉक्टर को प्रवेश घाव के आसपास उस क़िस्म की कालिख या जली हुई त्वचा नहीं मिली, जो आम तौर पर “संपर्क-विधि” से चलायी गई गोली में अपेक्षित होती है।
PW-7, डॉक्टर ने कहा कि चोट संख्या 1 प्रवेश घाव थी, पर उस पर बंदूक की नाल के त्वचा से सटने का कोई चिह्न नहीं था। उन्होंने घाव को बाईं भौं के नीचे, नाक के पास बताया, जिसके आस-पास की हड्डियाँ टूटी हुई थीं। मस्तिष्क के पदार्थ से गोली का एक टुकड़ा बरामद हुआ। मृत्यु का कारण गोली लगने से उत्पन्न रक्तस्राव और शॉक बताया गया।
न्यायालय ने फर्दबeyan और बयानात के शब्दों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। PW-3 ने लिखा था कि गोली “क़रीब से” चलाई गई। मौखिक साक्ष्य में कुछ गवाहों ने “सटाकर” शब्द का प्रयोग किया। पीठ ने इसे गांव की सामान्य बोलचाल में “काफ़ी नज़दीक से” के अर्थ में समझा, न कि आवश्यक रूप से इस अर्थ में कि नाल शरीर से सटी हुई थी।
न्यायालय ने यह इंगित किया कि गाँव की पगडंडियाँ अक्सर ऊँची-नीची होती हैं। यह पूरी तरह संभव था कि मृतक, हमलावर से कुछ ऊँचाई पर खड़ा हो। ऐसी स्थिति में नाक के पास प्रवेश करने वाली गोली ऊपर की ओर जाकर मस्तिष्क में पहुँच सकती थी। मस्तिष्क के अर्द्ध-द्रवित (सेमी-लिक्विड) स्वभाव से यह भी समझा जा सकता है कि गोली का टुकड़ा वहीं धँस गया और बाहर निकलने का घाव क्यों नहीं मिला।
निचली अदालत ने यह भी नोट किया था कि यद्यपि बड़े क्षेत्र में कालिख नहीं थी, डॉक्टर ने मृतक के चेहरे पर “सुई की नोक के बराबर आकार के कई जले हुए धब्बे” पाए थे। उच्च न्यायालय ने सहमति जताई कि जले हुए धब्बों में कालिख भी शामिल होती है और वे नज़दीकी दूरी से चली गोली के अनुरूप हैं।
इस विश्लेषण पर उच्च न्यायालय ने माना कि चिकित्सकीय साक्ष्य वस्तुतः प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के अनुरूप है, न कि उसके विपरीत। और वैसे भी, जहाँ विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य मौजूद हो, वहाँ चिकित्सकीय मत जो केवल अन्य संभावनाएँ सुझाता हो, निर्णायक नहीं होता। न्यायालय ने दोहराया कि स्पष्ट और भरोसेमंद प्रत्यक्षदर्शी गवाही की साक्ष्यमूल्य, चिकित्सकीय राय से अधिक होती है।
अवैध जमाव (Unlawful Assembly) और प्रत्येक अभियुक्त की भूमिका
पीठ ने फिर यह विचार किया कि विधि की दृष्टि से प्रत्येक अभियुक्त किस हद तक उत्तरदायी है। अभियोजन साक्ष्य से यह सिद्ध हुआ कि अभियुक्त चंद्रदेव पांडे ने नंदलाल पर जानलेवा हमला करने का आदेश दिया। अभियुक्त/अपीलकर्ता, जिनमें परसुराम पांडे भी शामिल था, अन्य के साथ मिलकर सूचक और मृतक को घेर लेते हैं, और कुछ लोग नंदलाल को पकड़े रहते हैं, जबकि अभियुक्त त्रिभुवन उस पर गोली चलाता है।
गवाहों ने कभी चार व्यक्तियों के नाम लिए, कभी दो या तीन के, कि किन लोगों ने मृतक को शारीरिक रूप से पकड़ा हुआ था। फिर भी वे इस बात पर सुसंगत रहे कि सभी अभियुक्त, मुखिया के घर से लौटते समय, देसी हथियारों से लैस एक समूह के रूप में पीड़ितों को घेरने में शामिल थे।
न्यायालय ने धारा 149 आईपीसी के अंतर्गत स्थापित विधि-सिद्धांत को याद किया: किसी अवैध जमाव के सदस्य, (1) उस जमाव के समान उद्देश्य (Common Object) की पूर्ति में किए गए कार्यों के लिए, या (2) ऐसे कार्यों के लिए जिनके किए जाने की उन्हें जानकारी थी कि वे उस उद्देश्य की पूर्ति में किए जा सकते हैं, सामूहिक रूप से उत्तरदायी (vicariously liable) होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर सदस्य कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष (Overt) कृत्य करे।
जब कई अभियुक्त हथियारों से लैस होकर एकत्र हो जाते हैं और हमले में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, तो अभियोजन पर यह बोझ नहीं होता कि वह सिद्ध करे कि किसने कौन-सा वार किया। प्रत्येक सदस्य, समान उद्देश्य की पूर्ति में किए गए अपराधों के लिए साझे तौर पर ज़िम्मेदार होता है।
इस मामले में न्यायालय ने भरोसेमंद साक्ष्य पाया कि चंद्रदेव के आदेश पर त्रिभुवन ने क़रीब से गोली चलाई, जबकि अन्य अभियुक्त हथियारबंद रहकर पीड़ित को घेरने और उसे सहायता मिलने से रोकने में सहभागी थे। छोटे-मोटे विरोधाभास या विवरणों में अंतर, विशेषकर लम्बे समयांतराल और स्वाभाविक विस्मृति के कारण, महत्वहीन (trivial) माने गए और अभियोजन की मूल कहानी को ख़ारिज करने के लिए अपर्याप्त समझे गए।
जाँच और पुष्टिकरण (Corroboration)
बचाव पक्ष ने यह भी इंगित किया कि दूसरे जाँचकर्ता अधिकारी, जिसने गवाहों के बयान दर्ज किए, को अदालत में पेश नहीं किया गया। उच्च न्यायालय ने नोट किया कि PW-8, पहले जाँचकर्ता अधिकारी, घटना स्थल पर गए थे और वहाँ से रक्तरंजित मिट्टी जब्त की थी। उस स्थान पर खून की उपस्थिति ने इस बात की पुष्टि की कि हमला वहीं हुआ जैसा प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने बताया था।
न्यायालय ने माना कि दूसरे जाँचकर्ता अधिकारी का परीक्षण न होना अभियोजन को कमज़ोर नहीं करता, क्योंकि जाँच के मुख्य तथ्य—घटना स्थल और वहाँ से खून बरामद होने की बात—PW-8 के माध्यम से सिद्ध हो चुकी थी।
अंतिम निर्णय
समस्त मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्य की जाँच-परख के बाद, उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा साक्ष्य के मूल्यांकन से पूर्ण सहमति व्यक्त की। न्यायालय ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को भरोसेमंद पाया, चिकित्सकीय साक्ष्य को सहायक माना, और धारा 302 आईपीसी, धारा 27 शस्त्र अधिनियम तथा धारा 149 आईपीसी के विधिक अनुप्रयोग को सही ठहराया।
फलस्वरूप, न्यायालय ने माना कि दोनों आपराधिक अपीलें निरर्थक (devoid of merit) हैं। 19.04.2022 के निर्णय द्वारा पटना उच्च न्यायालय ने आपराधिक अपील (DB) सं. 253/1995 (जो अपीलकर्ता परसुराम पांडे के लिए जीवित थी) तथा त्रिभुवन पांडे द्वारा दायर आपराधिक अपील (DB) सं. 293/1995 को खारिज कर दिया। इस प्रकार, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, गोपालगंज द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सज़ाएँ पुष्टि हो गईं।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और समूहिक हिंसा से प्रभावित परिवारों के लिए।
पहला, पटना उच्च न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि जब कई लोग हथियारबंद समूह बनाकर किसी पीड़ित को घेर लेते हैं, तो यदि उनमें से एक घातक गोली चलाता है और बाकी उसका समर्थन या सुविधा उपलब्ध कराते हैं, तो सभी पर हत्या की ज़िम्मेदारी डाली जा सकती है। यह आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति स्वयं पीड़ित पर शारीरिक हमला करे।
दूसरा, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गवाहों के बयानों में छोटी-छोटी बातों पर मामूली अंतर—जैसे किसने कौन-सा अंग पकड़ा—अपने आप में किसी मामले को समाप्त नहीं कर देते, जब मुख्य कहानी स्वाभाविक और सुसंगत बनी रहती है।
तीसरा, निर्णय यह समझाता है कि यदि डॉक्टर को व्यापक रूप से कालिख न मिले तो मात्र इस आधार पर क़रीब से चली गोली को ख़ारिज नहीं किया जा सकता, ख़ासकर तब, जब चिकित्सकीय रिपोर्ट में जले हुए धब्बे पाए जाएँ और गोली की दिशा प्रत्यक्षदर्शी संस्करण से मेल खाए।
पीड़ित परिवारों के लिए यह मामला यह दर्शाता है कि न्यायालय वास्तविक प्रत्यक्षदर्शी बयानों को महत्व देगा, भले ही अभियुक्त उनके ही गाँव के परिचित लोग हों और भले ही पूर्व संबंध बाहरी रूप से सौहार्दपूर्ण दिखते हों। अभियुक्तों के लिए यह निर्णय यह रेखांकित करता है कि हिंसक समान उद्देश्य वाले हथियारबंद समूह में शामिल होना भी उतनी ही ज़िम्मेदारी ला सकता है, जितनी ट्रिगर दबाने से आती है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या कथित रूप से मज़बूत प्रेरणा (मोटिव) की अनुपस्थिति और पहले के सौहार्दपूर्ण संबंधों के बावजूद, गोलीबारी की घटना और सभी अभियुक्तों की भागीदारी के संबंध में अभियोजन का संस्करण विश्वसनीय था?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि जब भरोसेमंद प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य उपलब्ध हो, तो प्रेरणा अनिवार्य नहीं होती, और अभियोजन का संस्करण सुसंगत और विश्वासयोग्य था। -
प्रश्न: क्या चिकित्सकीय साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के बीच गोली चलने की दूरी के बारे में अंतर, अभियोजन के मामले पर संदेह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि प्रवेश घाव, गोली की दिशा तथा जले हुए धब्बों सहित चिकित्सकीय निष्कर्ष, बहुत नज़दीकी दूरी से चली गोली के अनुरूप हैं और प्रत्यक्षदर्शी बयानों का समर्थन करते हैं। -
प्रश्न: जब वास्तव में केवल एक व्यक्ति ने गोली चलाई, तो क्या सभी अभियुक्तों को धारा 302/149 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया जा सकता है?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि समान उद्देश्य के साथ या यह जानते हुए कि हत्या होना संभावित है, हथियारबंद अवैध जमाव के सभी सदस्य धारा 149 आईपीसी के तहत अपराध के लिए सामूहिक रूप से उत्तरदायी (vicariously liable) हैं।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय के उपलब्ध अंश में किसी विशेष पूर्ववर्ती केस लॉ का नाम या उद्धरण उल्लेखित या उस पर निर्भर नहीं किया गया है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक अपील (DB) सं. 253/1995, साथ में आपराधिक अपील (DB) सं. 293/1995; उद्गम: गोपालपुर थाना कांड सं. 54/1992; सत्र वाद सं. 249/1993/54/1993
मामले का शीर्षक: परसुराम पांडे बनाम The State of Bihar; साथ में त्रिभुवन पांडे बनाम The State of Bihar
उद्धरण (Citation): 2022 (3) PLJR 108
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति ए.एम. बादर तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति सुनील कुमार पंवार
वाद-सहायक (Advocates): दोनों अपीलों में अपीलकर्ताओं की ओर से – श्री जितेंद्र कुमार गिरी, अधिवक्ता; राज्य की ओर से – सुश्री शशि बाला वर्मा, APP
मामले की प्रकृति: धारा 302 आईपीसी, धारा 302/149 आईपीसी तथा धारा 27 शस्त्र अधिनियम के अंतर्गत दोषसिद्धि और सज़ा के विरुद्ध आपराधिक अपीलें (खंडपीठ)
पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 19.04.2022
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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