मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्त्री की शादी विपक्षी पक्ष संख्या 2 के साथ 29.11.2012 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई। कुछ समय बाद आपसी संबंध बिगड़ गए। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति का व्यवहार बदल गया और उसने उसके साथ अत्याचार करना शुरू कर दिया।
गर्भावस्था के दौरान, उसे लगा कि उसका पति उसकी देखभाल नहीं कर रहा है। इस कारण वह अपने मायके चली गई। 09.11.2013 को एक पुत्र का जन्म हुआ। जन्म के बाद, उसके माता-पिता उसे मुंबई ले गए ताकि वह अपने पति के साथ रह सके।
हालाँकि, पत्नी के अनुसार, मुंबई में भी पति ने उसके साथ मारपीट की। अंततः 04.06.2015 को उसे अपने नाबालिग पुत्र के साथ मुंबई स्थित पति के निवास से निकलने पर मजबूर होना पड़ा और वह वापस मायके आ गई। उसका आरोप था कि उसके पति ने कभी उसकी और बच्चे की देखभाल नहीं की और उन्हें उपेक्षित किया।
पत्नी का कहना था कि वह स्वयं और अपने पुत्र का भरण-पोषण करने में आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रही है। उसने कहा कि उसका पति एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में कार्यरत है और अच्छी तनख्वाह पाता है, तथा उसे मकान किराये और अन्य संपत्तियों से भी आय प्राप्त होती है। इसी आधार पर, उसने अपने तथा नाबालिग पुत्र के भरण-पोषण के लिए संहिता की धारा 125 के अंतर्गत प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, वैशाली, हाजीपुर के समक्ष एक आवेदन दायर किया।
पति हाज़िर हुआ और भरण-पोषण के दावे का विरोध किया। उसका आरोप था कि पत्नी कमजोर दिमाग की, अनुशासनहीन, स्वार्थी, झगड़ालू है और वह ही उसके साथ मारपीट करती है। उसने विवाह से एक पुत्र के जन्म को स्वीकार किया और दावा किया कि वह हमेशा पत्नी को आर्थिक सहायता देता रहा है।
आय के संबंध में पति ने कहा कि वह महाराष्ट्र विद्युत मंडल में सहायक अभियंता के रूप में कार्यरत है और केवल 25,000 रुपये प्रति माह वेतन लेता है। उसने पत्नी के इस दावे को नकार दिया कि उसका वेतन लगभग 70,000 या 80,000 रुपये प्रति माह है। उसका यह भी दावा था कि पत्नी उच्च शिक्षित है और एक निजी फर्म में काम करती है, तथा मुंबई में जीवन-यापन की ऊँची लागत के कारण उसके लिए भरण-पोषण देना कठिन है, विशेष रूप से तब, जब उसके अनुसार पत्नी किसी भी उचित कारण के बिना उसका घर छोड़कर चली गई।
परिवार न्यायालय ने यह मुद्दा निर्धारित किया कि क्या पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है और क्या पति, पर्याप्त साधन होने के बावजूद, उसकी उपेक्षा कर रहा है।
दोनों पक्षों ने साक्ष्य प्रस्तुत किए। विवाह और पुत्र का जन्म विवादित नहीं था। पति ने अपनी वेतन पर्ची प्रस्तुत की, जिसे प्रदर्श 1 के रूप में अंकित किया गया। पत्नी की ओर से पाँच गवाह, जिनमें याचिकाकर्त्री स्वयं शामिल थी, का बयान दर्ज हुआ। बचाव पक्ष की ओर से पति, उसके पिता और उसकी माता को गवाह के रूप में पेश किया गया।
साक्ष्यों के मूल्यांकन पर, परिवार न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के बीच वैवाहिक संबंध स्वीकार्य हैं, यह आरोप है कि बिना किसी उचित कारण के पत्नी को वैवाहिक घर से निकाल दिया गया, और वह अपने भरण-पोषण में असमर्थ है। परिवार न्यायालय ने निर्णय दिया कि वह भरण-पोषण की हकदार है।
परिवार न्यायालय ने पति की वेतन आय 60,000 से 70,000 रुपये के बीच मानी। उसने यह नोट किया कि पत्नी ने दुकानों, गोदाम और अन्य कथित संपत्तियों के संबंध में, जो पति की बताई गई थीं, कोई दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किए और केवल वेतन पर्ची ही दाखिल की। उसने यह भी देखा कि उच्च न्यायालय के एक विविध मामले में पारित आदेश के अनुसार पति पहले से ही पत्नी को प्रति माह 10,000 रुपये दे रहा था।
अपने अंतिम आदेश दिनांक 11.04.2018 में परिवार न्यायालय ने कुल 10,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण स्वीकृत किया, अर्थात पत्नी के लिए 5,000 रुपये प्रति माह और नाबालिग पुत्र के भरण-पोषण एवं शिक्षा के लिए 5,000 रुपये प्रति माह, जो आवेदन दायर करने की तिथि से देय होगा, किसी अन्य मंच के तहत दी जा रही राशि की समायोजन/कटौती के बाद।
इसके बाद पत्नी ने भरण-पोषण की राशि को अपर्याप्त बताते हुए पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 22/2019 दायर की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय लिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष पत्नी ने अपनी चुनौती को केवल भरण-पोषण की राशि तक सीमित रखा। पति ने परिवार न्यायालय के निष्कर्षों के विरुद्ध कोई चुनौती दायर नहीं की। इसलिए, पुनरीक्षण में विवाद केवल इस बात पर था कि कितना भरण-पोषण उचित एवं क़ानूनी होगा।
पत्नी की ओर से यह दलील दी गई कि परिवार न्यायालय ने पति के वेतन में से उसकी व्यक्तिगत ऋण किश्तों (इंस्टॉलमेंट्स) की कटौती के बाद का केवल शुद्ध “टेक होम” वेतन ही ध्यान में रखा, जो गलत है। अधिवक्ता ने इंगित किया कि प्रदर्श 1 में सकल वेतन 63,949 रुपये दिखाया गया है, जिसमें से 31,346 रुपये की कटौती हो रही थी। कटौती वाले स्तंभ में 16,178 रुपये “MSEB Emp CCSoc Mumbai” के खाते में कटौती दिखी, जो पति द्वारा लिया गया ऋण चुकाने की राशि थी।
पत्नी के अधिवक्ता ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय Dr. Kulbhushan Kunwar बनाम Smt. Raj Kumari and another, AIR 1971 SC 234 पर भरोसा किया। उसने Seema and another बनाम Gourav Juneja, 2018 SCC OnLine P&H 3045 तथा Nitin Sharma बनाम Sunita Sharma and others, 2021 SCC OnLine Del 694 पर भी भरोसा किया। इन निर्णयों में कहा गया है कि भरण-पोषण निर्धारित करते समय केवल आयकर और अनिवार्य अंशदान जैसे GPF/EPF की कटौतियों को ही ध्यान में रखा जा सकता है, मकान किराया, बिजली, ऋण पुनर्भुगतान, LIC प्रीमियम व इसी प्रकार की अन्य मदों की कटौती को नहीं।
पत्नी के अधिवक्ता ने आगे यह भी प्रस्तुत किया कि पति यह सिद्ध करने में असफल रहा कि पत्नी कमाती है। पति उस कथित निजी फर्म का नाम तक नहीं बता सका जिसमें उसके अनुसार पत्नी काम करती थी, जबकि पत्नी ने लगातार किसी भी प्रकार के रोजगार से इनकार किया। इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के निर्णय Sunita Kachwaha and others बनाम Anil Kachwaha, (2014) 16 SCC 715 पर भरोसा किया गया, जिसमें कहा गया है कि केवल बिना साक्ष्य के किया गया खोखला कथन कि पत्नी कमाती है, भरण-पोषण घटाने का आधार नहीं बन सकता।
पति की ओर से यह दलील दी गई कि वह अपने माता-पिता के साथ मुंबई में रहता है, वहाँ जीवन-यापन की लागत बहुत अधिक है और उसके माता-पिता की कोई स्वतंत्र आय नहीं है। अतः उन पर भी उसका भरण-पोषण का दायित्व है। इस सिद्धांत के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्णय Rajnesh बनाम Neha and another, (2021) 2 SCC 324 पर भरोसा किया गया, जिसमें कहा गया कि आश्रित माता-पिता पर होने वाला खर्च भरण-पोषण निर्धारित करते समय एक प्रासंगिक कारक है।
पति के अधिवक्ता ने यह भी इंगित किया कि वह महुआ थाना कांड संख्या 294/2016, धारा 498A आईपीसी में आपराधिक अभियोजन का सामना कर रहा है और उसे इस शर्त पर अग्रिम जमानत दी गई कि वह पत्नी को प्रति माह 10,000 रुपये का भुगतान करेगा और हाजीपुर स्थित विचारण न्यायालय के समक्ष नियमित रूप से उपस्थित होगा। चूँकि वह मुंबई में आवश्यक सेवा में कार्यरत है, उसे बार-बार अल्पावधि अवकाश लेकर वायुयान से यात्रा कर विचारण में उपस्थित होना पड़ता है, जिससे उसके व्यय और बढ़ जाते हैं। उसका तर्क था कि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय में प्रयुक्त सूत्र का कठोर अनुप्रयोग उसके लिए अत्यधिक कठिनाई उत्पन्न करेगा। उसने Bharat Petroleum Corporation बनाम N.R. Vairamani and another, (2004) 8 SCC 579 पर भरोसा करते हुए कहा कि नज़ीरों को गणितीय प्रमेय की तरह बिना तथ्यों के अंतर को देखे लागू नहीं किया जाना चाहिए।
पटना उच्च न्यायालय ने पहले अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच की। पत्नी ने बयान दिया कि पति लगभग 70,000 रुपये प्रति माह वेतन पाता है और उसके ताजपुर तथा चकिया में मकान हैं, जिनसे उसे किराया प्राप्त होता है। उसने विशेष रूप से कहा कि वह ताजपुर वाले मकान में रह चुकी है। उसने पति की ओर से दिए गए इस सुझाव को नकार दिया कि वह किसी निजी फर्म में कार्यरत है और 25,000 से 30,000 रुपये प्रति माह कमाती है।
जिरह के दौरान पति की ओर से यह तक सुझाव नहीं दिया गया कि ताजपुर या चकिया में कोई किराये के मकान नहीं हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि साक्ष्य में पति ने पत्नी के किराया आय संबंधी दावे का खंडन नहीं किया।
पति ने स्वीकार किया कि पत्नी कुछ समय के लिए ताजपुर वाले मकान में रही थी। उसकी माता, जिन्हें ओ.पी.डब्ल्यू.3 के रूप में जाँच-परख (एग्ज़ामिनेशन) किया गया, उससे भी आगे बढ़कर मुख्य परीक्षण में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उसके पास ताजपुर में दुकान सहित मकान है और उसे लगभग 32,000 से 35,000 रुपये प्रति माह किराया आय प्राप्त होती है। पति अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र है। उसके पिता, ओ.पी.डब्ल्यू.2 ने भी किराया आय के अस्तित्व को स्वीकार किया।
महत्वपूर्ण यह है कि किसी भी अभिभावक ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि वे अपने पुत्र के साथ मुंबई में रहते हैं या उसकी आय पर आश्रित हैं। इन परिस्थितियों में पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि माता-पिता के भरण-पोषण का बोझ उठाने संबंधी पति की दलील अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों से समर्थित नहीं है। साथ ही, मकान/दुकान से 32,000 से 35,000 रुपये प्रति माह की किराया आय को एक स्वीकृत तथ्य माना गया, जिसे परिवार न्यायालय ने विचार में नहीं लिया था।
वेतन आय के संबंध में उच्च न्यायालय ने पत्नी की दलील से सहमति व्यक्त की। उसने माना कि प्रदर्श 1 में “MSEB” सहकारी समिति के खाते में 16,178 रुपये मासिक कटौती ऋण पुनर्भुगतान के लिए थी, और पत्नी एवं नाबालिग पुत्र के भरण-पोषण की राशि निर्धारित करते समय इसे घटाकर आय नहीं निकाली जा सकती।
न्यायालय ने Dr. Kulbhushan Kunwar के अनुच्छेद 19 का हवाला दिया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भरण-पोषण के लिए “मुक्त आय” का आकलन करते समय केवल आयकर और अनिवार्य भविष्य निधि अंशदान ही घटाए जा सकते हैं; मकान किराया, बिजली और इसी प्रकार के व्यक्तिगत व्यय को अलग नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के Seema प्रकरण का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि पति ऋण लेकर और ईएमआई भरकर अपनी भरण-पोषण देयता कम नहीं कर सकता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने Nitin Sharma में यही सिद्धांत अपनाया कि केवल कर और अनिवार्य GPF/EPF जैसी वैधानिक कटौतियों को ही मान्यता दी जाएगी।
पटना उच्च न्यायालय ने Vinny Parmvir Parmar बनाम Parmvir Parmar, (2011) 13 SCC 112 तथा Jasbir Kaur Sehgal बनाम District Judge, Dehradun and others, (1997) 7 SCC 7 के निर्णयों का भी हवाला दिया। इन निर्णयों में बल दिया गया है कि भरण-पोषण ऐसा होना चाहिए जिससे पत्नी वैवाहिक घर में जिस स्तर और जीवनशैली में रहती थी, उसकी स्थिति के अनुरूप यथोचित सुविधा के साथ जीवन-यापन कर सके, बशर्ते पति की क्षमता और उसके युक्तिसंगत खर्चों को ध्यान में रखा जाए। कोई स्थिर सूत्र नहीं है; प्रत्येक मामला अपने तथ्यों पर निर्भर करता है।
पुनरीक्षण की लंबित अवधि के दौरान न्यायालय को सूचित किया गया कि पति को पदोन्नत कर डिप्टी एग्ज़िक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया है और उसका सकल वेतन 1,14,564 रुपये प्रति माह हो गया है। हालाँकि, उसने और भी ऋण ले रखे हैं और कुल कटौतियाँ बढ़कर 80,405 रुपये प्रति माह हो गई हैं, जिनमें “MSEB” सहकारी समिति को 43,600 रुपये प्रति माह ईएमआई के रूप में भुगतान शामिल है। फरवरी 2023 की वेतन पर्ची इस संबंध में प्रस्तुत की गई। पत्नी की ओर से यह तर्क दिया गया कि ये ऋण इस उद्देश्य से लिए गए कि उसके हाथ में आने वाले वेतन को कम दिखाया जा सके और भरण-पोषण की राशि न्यूनतम रखी जा सके।
इसके बाद न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के विस्तृत निर्णय Rajnesh बनाम Neha पर चर्चा की। उस मामले में उच्चतम न्यायालय ने विशेष विवाह अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम सहित विभिन्न विधियों के अंतर्गत भरण-पोषण के प्रावधानों की समीक्षा की। न्यायालय ने भरण-पोषण निर्धारित करने के मानदंड तय किए, भरण-पोषण आदेशों को दीवानी डिक्री की तरह प्रवर्तनीय बनाये जाने के निर्देश दिए, और यह अनिवार्य किया कि सभी भरण-पोषण कार्यवाहियों में दोनों पक्ष संपत्ति और देयताओं के प्रकटीकरण का शपथ-पत्र (Affidavit of Disclosure of Assets and Liabilities) दाखिल करेंगे।
Rajnesh के अनुच्छेद 130 में उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया कि भरण-पोषण तय करते समय न्यायालयों को उस निर्णय के भाग B-III में उल्लिखित मानदंडों पर विचार करना चाहिए, यद्यपि वे कारक सर्वसमावेशी नहीं हैं। इस दृष्टिकोण की हाल ही में Aditi @ Mithi बनाम Jitesh Sharma, 2023 INSC 981; 2023 SCC OnLine 1451 में पुनः पुष्टि की गई।
पटना उच्च न्यायालय ने यह नोट किया कि जब परिवार न्यायालय ने 11.04.2018 को अपना आदेश पारित किया, तब उसे Rajnesh के निर्णय का लाभ उपलब्ध नहीं था, जो बाद में पुनरीक्षण की लंबित अवधि के दौरान आया। Rajnesh तथा अन्य निर्णयों से विकसित विधिक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, और वेतन एवं किराया आय से संबंधित साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए, उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि मात्र 10,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण विधिक जांच में टिक नहीं सकता।
अतः न्यायालय ने परिवार न्यायालय के आदेश को केवल राशि (क्वांटम) के प्रश्न पर रद्द कर दिया। संबंध, उपेक्षा या भरण-पोषण के अधिकार संबंधी निष्कर्षों से न्यायालय ने कोई छेड़छाड़ नहीं की।
मामले को प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, वैशाली, हाजीपुर को यह निर्देश देते हुए वापस भेजा गया कि वह भरण-पोषण की राशि का पुनः निर्धारण करे। परिवार न्यायालय को निर्देश दिया गया कि वह Rajnesh के अनुसार दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और देयताओं के शपथ-पत्र दाखिल करने का अवसर दे। तत्पश्चात, परिवार न्यायालय अभिलेख पर पहले से उपलब्ध सामग्रियों पर पुनर्विचार कर केवल राशि के विषय में उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त/प्रस्तुत होने की तिथि से चार माह के भीतर नया आदेश पारित करेगा।
पटना उच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इस बीच, पति उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में विविध मामले में दिए गए आदेश के अनुसार पत्नी को प्रति माह 10,000 रुपये का भुगतान करता रहेगा। भरण-पोषण की पुनर्निर्धारण करते समय परिवार न्यायालय को न केवल मूल निर्णय की तिथि पर पति के वेतन को, बल्कि बाद में उसके वेतन में हुई वृद्धि को भी ध्यान में रखना होगा।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण-पोषण चाहने वाली महिलाओं के लिए, विशेषकर ऐसे मामलों में जहाँ पति वेतनभोगी कर्मचारी हो और उसे अतिरिक्त किराया आय भी प्राप्त हो, अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पहले, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पति ऋण लेकर और हाथ में मिलने वाले वेतन को कम दिखाकर अपनी भरण-पोषण देयता कम नहीं कर सकता। भरण-पोषण निर्धारित करते समय केवल आयकर और अनिवार्य भविष्य निधि जैसे वैधानिक अंशदान की कटौतियाँ ही घटाई जा सकती हैं। व्यक्तिगत ऋण की ईएमआई और इसी प्रकार की अन्य कटौतियों को बहाने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दूसरे, न्यायालय ने यह बल दिया है कि यदि संपत्तियों से किराया आय का स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध हो, तो भरण-पोषण तय करते समय उस आय को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। यहाँ पति के माता-पिता ने स्वयं दुकानों से किराया आय स्वीकार की थी, और उस साक्ष्य की अनदेखी नहीं की जा सकती थी।
तीसरे, यह निर्णय Rajnesh बनाम Neha में उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई मार्गदर्शिका को व्यावहारिक रूप देता है। इसमें परिवार न्यायालय को दोनों पक्षों से संपत्ति एवं देयताओं के शपथ-पत्र मँगाने और उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित विस्तृत मानदंडों के अनुसार भरण-पोषण निर्धारण करने का निर्देश दिया गया है।
सरल शब्दों में, जिन पति/पत्नी और बच्चों की उपेक्षा की जा रही है, उनके संदर्भ में यह आदेश यह दर्शाता है कि पटना उच्च न्यायालय पति की वास्तविक आर्थिक क्षमता की बारीकी से जाँच करेगा और तकनीकी या कृत्रिम कटौतियों के आधार पर उनके उचित भरण-पोषण के अधिकार को विफल नहीं होने देगा।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या परिवार न्यायालय पति के ऋण कटौतियों के बाद की शुद्ध वेतन आय को आधार बनाकर और किराया आय की अनदेखी कर कुल 10,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण तय करने में सही था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऋण की ईएमआई संबंधी कटौतियों को भरण-पोषण हेतु आय की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता और स्वीकृत किराया आय को नज़रअंदाज़ कर दिया गया था। आदेश के राशि संबंधी हिस्से को रद्द कर दिया गया। -
प्रश्न: बाद के उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में अब परिवार न्यायालय को भरण-पोषण निर्धारित करते समय कौन-सी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए?
उत्तर: परिवार न्यायालय को Rajnesh बनाम Neha के अनुसार दोनों पक्षों से संपत्ति तथा देयताओं के शपथ-पत्र मँगाने होंगे, पति के वेतन (बाद की वृद्धि सहित) और किराया आय पर विचार करना होगा, तथा चार माह के भीतर भरण-पोषण की राशि पुनर्निर्धारित करनी होगी। -
प्रश्न: क्या इस मामले के तथ्यों पर पति का अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का दायित्व, पत्नी और नाबालिग पुत्र के प्रति उसकी देयता को कम कर देता है?
उत्तर: नहीं, क्योंकि न तो कोई साक्ष्य था कि माता-पिता मुंबई में उसके साथ रहते हैं या उस पर आश्रित हैं, जबकि उनकी संपत्ति से किराया आय का अस्तित्व स्वीकार किया गया था।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Dr. Kulbhushan Kunwar बनाम Smt. Raj Kumari and another, AIR 1971 SC 234
- Seema and another बनाम Gourav Juneja, 2018 SCC OnLine P&H 3045
- Nitin Sharma बनाम Sunita Sharma and others, 2021 SCC OnLine Del 694
- Sunita Kachwaha and others बनाम Anil Kachwaha, (2014) 16 SCC 715
- Rajnesh बनाम Neha and another, (2021) 2 SCC 324
- Bharat Petroleum Corporation बनाम N.R. Vairamani and another, (2004) 8 SCC 579
- Vinny Parmvir Parmar बनाम Parmvir Parmar, (2011) 13 SCC 112
- Jasbir Kaur Sehgal बनाम District Judge, Dehradun and others, (1997) 7 SCC 7
- Aditi @ Mithi बनाम Jitesh Sharma, 2023 INSC 981; 2023 SCC OnLine 1451
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 22/2019 (भरण-पोषण मामला संख्या 153/2016 से उत्पन्न)
वाद का शीर्षक: Jyoti Raj बनाम The State of Bihar and another
उद्धरण: 2024(1) PLJR 749
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्त्री की ओर से: श्री निखिल कुमार अग्रवाल, अधिवक्ता; सुश्री अदिति हंसारिया, अधिवक्ता; श्री यश सहय, अधिवक्ता
- राज्य/प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से: श्री अखिलेश्वर दयाल, ए.पी.पी.
- प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से: श्री अंकित कत्यार, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: परिवार न्यायालय द्वारा संहिता की धारा 125 के अंतर्गत पारित आदेश के विरुद्ध आपराधिक पुनरीक्षण, जो केवल भरण-पोषण की राशि के प्रश्न तक सीमित था।
पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 22.12.2023
परिणाम: आवेदन आंशिक रूप से स्वीकृत; भरण-पोषण की राशि संबंधी परिवार न्यायालय का आदेश रद्द; राशि के संबंध में पुनः निर्णय हेतु मामला वापस भेजा गया, अंतरिम रूप से प्रति माह 10,000 रुपये का भरण-पोषण जारी रखने का निर्देश।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय देखें
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