मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक एफआईआर से शुरू हुआ, जिसे एक लड़की की मां ने दर्ज कराया, जो रिट कार्यवाही में प्रतिवादी संख्या 11 है। उसने शिकायत की कि उसकी नाबालिग बेटी को जबरन भगा कर ले जाया गया है। इस आधार पर, परवलपुर थाना कांड संख्या 55/2025, जिला नालंदा, परवलपुर थाना में भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) की धारा 96 के तहत दर्ज किया गया।
मामला दर्ज होने के बाद, लड़की को ढूंढकर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। मजिस्ट्रेट ने उसका बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज किया। उस बयान में उसने कहा कि वह 19 वर्ष की है और उसकी आयु का आंकलन 19 वर्ष किया गया है। उसने स्पष्ट रूप से कहा कि उसका पिता और उसके पिता का एक मित्र उस पर किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करने का दबाव डाल रहे थे, जबकि उसने पहले ही वर्तमान याचिकाकर्त्री के पुत्र से विवाह कर लिया है।
उसके बयान के अनुसार, उसने अपना विवाह संपन्न किया और 06.04.2025 को वह अपने वैवाहिक घर गई और वहीं रहने लगी। जब उसे यह पता चला कि एक आपराधिक मामला दर्ज हो गया है, तो वह थाने में उपस्थित हुई। उसने विशेष रूप से इस बात से इनकार किया कि उसका अपहरण हुआ है और उसने अपने वैवाहिक घर लौटने की इच्छा व्यक्त की।
दिनांक 30.04.2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट – V, हिलसा, नालंदा ने उसके धारा 183 BNSS के तहत दिए गए बयान को संज्ञान में लिया और उससे पूछा कि वह कहां जाना चाहती है। उसने न्यायालय को बताया कि वह अपनी सास, याचिकाकर्त्री, के साथ अपने वैवाहिक घर जाना चाहती है। याचिकाकर्त्री न्यायालय में उपस्थित थी, और मजिस्ट्रेट ने उसे लड़की को वैवाहिक घर ले जाने की अनुमति दे दी।
अभिलेख से यह स्पष्ट होता है कि लड़की का विवाह याचिकाकर्त्री के पुत्र विकास कुमार से 13.07.2024 को होने का दावा किया गया है, जिसका समर्थन वेदिक समाज कल्याण समिति, गाज़ियाबाद द्वारा जारी एक प्रमाणपत्र से होता है। यह विवाह 15.07.2024 को उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 के तहत पंजीकृत किया गया।
एक पूर्व आपराधिक मामला भी था: परवलपुर थाना कांड संख्या 91/2024, जो 17.06.2024 को लड़की की मां द्वारा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366A तथा पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 4 और 8 के तहत दर्ज कराया गया था। उस मामले में लड़की के पति को हिरासत में लिया गया था।
30.04.2025 के उस आदेश के बाद, जिसके तहत लड़की को याचिकाकर्त्री के साथ जाने की अनुमति दी गई थी, मां ने उसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लोक अभियोजक के माध्यम से एक आवेदन दायर किया। उस आवेदन में उसने यह दावा किया कि लड़की नाबालिग है और परवलपुर थाना कांड संख्या 91/2024 का उल्लेख किया। इस आवेदन और स्कूल प्रमाणपत्रों पर भरोसा करते हुए, मजिस्ट्रेट ने निष्कर्ष निकाला कि लड़की नाबालिग है और उसकी सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए 27.05.2025 को एक नया आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया कि उसे बाल कल्याण समिति, बिहार शरीफ की निगरानी में रखा जाए। बाद में उसे नवादा स्थित बाल कल्याण समिति में स्थानांतरित कर दिया गया।
27.05.2025 का यह बाद वाला आदेश, जिसने प्रभावी रूप से 30.04.2025 के पूर्ववर्ती अभिरक्षा (कस्टडी) निर्णय को पलट दिया, को लड़की की सास द्वारा आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 2451/2025 में पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्त्री ने पटना उच्च न्यायालय से एक रिट ऑफ सर्टियोरारी अथवा अन्य उपयुक्त रिट जारी करने की प्रार्थना की, ताकि उसकी बहू श्वेता कुमारी को 27.05.2025 से बाल कल्याण समिति में कथित अवैध निरोध से मुक्त कराया जा सके। उसका तर्क था कि मजिस्ट्रेट के पास 30.04.2025 के अपने उस पूर्व आदेश, जिसमें लड़की को उसके साथ जाने की अनुमति दी गई थी, की समीक्षा या उसे वापस लेने की शक्ति नहीं थी, और इसलिए 27.05.2025 का दूसरा आदेश शून्य (void) है।
उसने आगे एक मंडामस (mandamus) की भी मांग की, ताकि कथित अवैध निरोध के लिए पीड़ित महिला को मुआवजा दिया जाए और उन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाए, जिन्होंने, उसके अनुसार, प्रतिवादी संख्या 11 के साथ मिलकर कार्य किया। तथापि, मुख्य विधिक चुनौती मजिस्ट्रेट की अपनी ही पूर्व आदेश में संशोधन करने की क्षमता तथा लड़की के मौलिक अधिकारों पर केंद्रित रही।
याचिकाकर्त्री की ओर से यह तर्क दिया गया कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 362, जो अब BNSS की धारा 403 में परिलक्षित है, किसी भी आपराधिक न्यायालय को, मामले का निर्णय करते हुए हस्ताक्षर किए जाने के बाद, किसी निर्णय या अंतिम आदेश में परिवर्तन या उसकी समीक्षा करने से रोकती है, सिवाय लिखत या गणनात्मक भूलों को सुधारने के। अधिवक्ता ने निवेदन किया कि 30.04.2025 का आदेश, जिसमें लड़की के बयान और उसकी इच्छा पर विचार किया गया था, उसकी अभिरक्षा संबंधी एक अंतिम आदेश था।
याचिकाकर्त्री ने रेखांकित किया कि लड़की की आयु मजिस्ट्रेट द्वारा 19 वर्ष आंकी गई थी और नालंदा के सिविल सर्जन/मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी के अधीन गठित एक मेडिकल बोर्ड ने उसकी आयु 18–19 वर्ष के बीच मानी थी। स्वयं लड़की ने लगातार कहा था कि वह 19 वर्ष की है और अपने पति तथा ससुराल वालों के साथ रहना चाहती है। इस आधार पर अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वह यह निर्णय लेने में सक्षम थी कि वह कहां रहेगी, और उसके जीवन, स्वतंत्रता तथा आवागमन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों को उसकी मां या अन्य पारिवारिक सदस्यों के आग्रह पर सीमित नहीं किया जा सकता।
यह भी प्रस्तुत किया गया कि लड़की गर्भवती थी और उसे बाल कल्याण समिति में, उस वैवाहिक परिवार से दूर रखना, जो उसकी देखभाल के लिए तैयार था, एक “विसंगतिपूर्ण स्थिति” (piquant situation) पैदा कर रहा था। अधिवक्ता ने यह दलील दी कि यद्यपि सामान्य न्यायिक आदेशों को प्रायः अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती नहीं दी जाती, परंतु मजिस्ट्रेट के आचरण में प्रकट अवैधता उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित ठहराती है। इस प्रस्ताव के समर्थन में पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ के निर्णय रिकहब चंद जैन बनाम राज्य बिहार, 1979 PLJR 5 पर भरोसा किया गया।
याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता ने अतिरिक्त रूप से स्वेता कुमारी बनाम राज्य बिहार एवं अन्य, आपराधिक WJC संख्या 253/2008 का उल्लेख किया, जिसमें एक खंडपीठ ने एक बालिग महिला को, जब उसे वयस्क पाया गया और अपने भविष्य को समझने में सक्षम माना गया, उसके पति के साथ रहने की अनुमति दी थी; और राहुल कुमार सिंह एवं अन्य बनाम राज्य उत्तर प्रदेश एवं अन्य, 2015 SCC OnLine All 8557 का भी हवाला दिया।
दूसरी ओर, सूचक (informant) के अधिवक्ता ने याचिकाकर्त्री की लोकस स्टैंडी (locus standi) पर प्रश्न उठाया, यह कहते हुए कि याचिकाकर्त्री का पुत्र विकास कुमार पहले से ही विवाहित था और उसकी एक संतान भी थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि लड़की द्वारा दावा किया गया विवाह वैध नहीं था। यह तर्क दिया गया कि किसी पूर्व आदेश की “समीक्षा” (review) नहीं हुई, क्योंकि 30.04.2025 को मजिस्ट्रेट ने वास्तव में लड़की की आयु निर्धारित ही नहीं की थी। उन्होंने केवल उसके धारा 183 BNSS के तहत दिए गए बयान पर कार्य किया था।
सूचक ने लड़की के शैक्षिक प्रमाणपत्र पर भरोसा किया, जिसमें उसकी जन्म तिथि 10.09.2010 दर्ज थी, जिससे वह प्रासंगिक तिथियों पर नाबालिग सिद्ध होती है। अधिवक्ता ने बल देकर कहा कि न्यायालय का कर्तव्य है कि वह किसी बाल पीड़िता की रक्षा करे और उसके हित में आदेश पारित करे। एक बार जब अल्पायु होने का दस्तावेजी प्रमाण न्यायालय के संज्ञान में आ गया, तो उसकी अभिरक्षा बाल कल्याण समिति को सौंपना उचित था, विशेषकर तब, जब उसके माता–पिता न्यायालय में उपस्थित नहीं थे।
राज्य के अधिवक्ता ने इस पक्ष का समर्थन किया और लड़की को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम के तहत “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक/बालिका” के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने JJ अधिनियम की धारा 27(1) का संदर्भ दिया, जो राज्य को ऐसे बच्चों के लिए बाल कल्याण समितियों का गठन करने के लिए बाध्य करती है। उन्होंने धारा 36 की ओर भी संकेत किया, जो समिति को जांच करने और बच्चे को चिल्ड्रेन होम, शेल्टर होम, फिट सुविधा या फिट व्यक्ति के पास भेजने का अधिकार देती है, तथा धारा 94 का, जो समिति को किसी देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे की आयु निर्धारित करने का अधिकार प्रदान करती है।
इससे राज्य ने तर्क दिया कि लड़की को याचिकाकर्त्री के साथ जाने की अनुमति देने वाला मजिस्ट्रेट का प्रारंभिक आदेश मात्र एक अस्थायी उपाय था, जिसकी उसकी आयु के संबंध में कोई अंतिमता नहीं थी, और 27.05.2025 का बाद वाला आदेश केवल स्थिति को सही करने के लिए था, जब उसकी अल्पायु संबंधी नए दस्तावेज सामने आए। इसी आधार पर यह तर्क दिया गया कि CrPC की धारा 362/BNSS की धारा 403 लागू नहीं होती और बाद का आदेश पूर्णतः विधिसम्मत है।
माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा ने इन प्रतिद्वंद्वी दलीलों पर विचार किया और एक केंद्रीय प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया: क्या न्यायिक मजिस्ट्रेट – V, नालंदा, 30.04.2025 को लड़की को उसकी सास के साथ जाने की अनुमति देने वाला आदेश पारित करने के बाद, 27.05.2025 का आदेश पारित करने के लिए न्यायोचित था?
न्यायालय ने BNSS की धारा 403 (पूर्व CrPC की धारा 362) को पुनरुत्पादित किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जब किसी न्यायालय ने किसी मामले का निपटारा करते हुए अपने निर्णय या अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हों, तो वह उस निर्णय या आदेश में परिवर्तन या समीक्षा नहीं कर सकता, सिवाय लिखत या गणनात्मक भूलों के सुधार के। इस प्रावधान को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि 30.04.2025 का आदेश एक अंतिम आदेश था। मजिस्ट्रेट ने लड़की को बालिग के रूप में स्वीकार किया, उसकी स्पष्ट इच्छा पर विचार किया, और उसे याचिकाकर्त्री को उसके वैवाहिक घर में रहने के लिए सौंप दिया।
उच्च न्यायालय राज्य की इस दलील से “संतुष्ट” नहीं हुआ कि 30.04.2025 का आदेश मात्र अस्थायी था। बाद वाले आदेश में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि पूर्व आदेश अंतरिम या किसी विस्तृत बाद के आदेश के अधीन था। भले ही पूर्व आदेश त्रुटिपूर्ण होता, कानून किसी आपराधिक न्यायालय को CrPC की धारा 362/BNSS की धारा 403 के विपरीत जाकर ऐसे आदेश में परिवर्तन या उसे वापस लेने की अनुमति नहीं देता।
इसे और पुष्ट करने के लिए, न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय मोहम्मद जाकिर बनाम शबाना एवं अन्य, 2018 (15) SCC 316, तथा रामबली सहनी बनाम राज्य बिहार, विशेष अनुमति याचिका संख्या 357/2026 का हवाला दिया। दोनों ही मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि एक बार निर्णय या आदेश पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, केवल लिखत या गणनात्मक भूलों के सुधार को छोड़कर, उसमें परिवर्तन या समीक्षा नहीं की जा सकती।
पटना उच्च न्यायालय ने इसके बाद एक अन्य विधिक दोष की पड़ताल की: प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन। न्यायालय ने इंगित किया कि मजिस्ट्रेट ने अपने ही पूर्व आदेश को पलट दिया और लड़की की अभिरक्षा को बाल कल्याण समिति में भेज दिया, बिना लड़की या याचिकाकर्त्री में से किसी को भी कोई नोटिस जारी किए। यदि मजिस्ट्रेट उनके हितों के प्रतिकूल कोई आदेश पारित करना चाहते थे, तो वे उन्हें सुनवाई का अवसर देने के लिए बाध्य थे। ऐसा न करने से बाद वाला आदेश “कानून की नजर में गलत” हो गया और समीक्षा पर विधिक रोक से स्वतंत्र रूप से भी अस्थिर हो गया।
इन पहलुओं को एक साथ देखते हुए, न्यायालय ने impugned (प्रभावित) आदेश को “प्रकट अवैधता” (manifest illegality) करार दिया और माना कि ऐसा गलत आदेश, भले ही किसी न्यायिक प्राधिकारी द्वारा पारित हो, उच्च न्यायालय की असाधारण रिट अधिकारिता में सुधारा जा सकता है और सुधारा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह दलील अस्वीकार कर दी कि न्यायिक आदेश, जब वे क्षेत्राधिकार से परे हों या वैधानिक सीमाओं के स्पष्ट उल्लंघन में हों, तो भी पूरी तरह रिट की जांच से मुक्त हैं।
तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट का 27.05.2025 का आदेश रद्द कर दिया और 30.04.2025 का पूर्व आदेश बहाल कर दिया। साथ ही, न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि ट्रायल कोर्ट यह महसूस करे कि लड़की की आयु पर उचित निर्णय अभी भी आवश्यक है, तो वह उस उद्देश्य से उपयुक्त आदेश पारित कर सकता है, परंतु केवल लड़की को सुनवाई का अवसर देने के बाद ही।
इसी आधार पर आपराधिक रिट याचिका को स्वीकृत कर लिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय परिवारों, युवा दंपतियों और यहां तक कि पुलिस अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो ऐसे मामलों में शामिल होते हैं जहां किसी महिला की आयु और अभिरक्षा को लेकर विवाद होते हैं।
पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला की अभिरक्षा के संबंध में मजिस्ट्रेट द्वारा पारित अंतिम आदेश में, उसके पारित हो जाने के बाद, आसानी से परिवर्तन नहीं किया जा सकता, सिवाय साधारण लिखत या संख्यात्मक भूल को सुधारने के। भले ही नए तथ्य सामने आएं, सही प्रक्रिया यह नहीं है कि उसी कार्यवाही में हस्ताक्षरित आदेश की “समीक्षा” कर उसे पलट दिया जाए।
दूसरा, निर्णय इस बात पर बल देता है कि जब किसी महिला को उसके स्वयं के बयान के आधार पर उसके वैवाहिक घर में रहने की अनुमति दी जा चुकी हो, तो उसकी स्वतंत्रता उसके अनुपस्थित रहते हुए नहीं छीनी जा सकती। ऐसे मामलों में अभिरक्षा में किसी भी परिवर्तन से पहले, उस महिला और उस पारिवारिक सदस्य को, जिसके साथ वह रह रही है, अवश्य सुना जाना चाहिए।
तीसरा, न्यायालय ने JJ अधिनियम के तहत बाल कल्याण समितियों की भूमिका को BNSS के अधीन आपराधिक न्यायालयों की सीमाओं के साथ संतुलित किया है। जबकि यह स्वीकार करते हुए कि देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों की सुरक्षा की जानी चाहिए, न्यायालय ने मजिस्ट्रेटों को याद दिलाया कि जब वे बाल कल्याण समिति को शामिल करना चाहें, तो उन्हें विधि में वर्णित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है।
वे दंपति, जो अंतर–परिवार या विवादित विवाहों में माता–पिता के विरोध का सामना कर रहे हों, उनके लिए यह निर्णय संकेत देता है कि जब किसी महिला की इच्छा को न्यायालय द्वारा वयस्क के रूप में स्वीकार कर लिया गया हो, तो उसकी व्यक्त की गई इच्छा का मजबूत महत्व है और उसे बाद के एकतरफा (ex parte) आदेशों से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या न्यायिक मजिस्ट्रेट, 30.04.2025 के उस आदेश के बाद, जिसमें महिला को उसके वैवाहिक घर जाने की अनुमति दी गई थी, बाद में अपना निर्णय बदलकर 27.05.2025 के आदेश द्वारा उसे बाल कल्याण समिति को भेज सकते थे?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि मजिस्ट्रेट का पहला आदेश एक अंतिम आदेश था और CrPC की धारा 362/BNSS की धारा 403, लिखत या गणनात्मक भूलों को छोड़कर, उसमें परिवर्तन या उसकी समीक्षा करने पर रोक लगाती है। - प्रश्न: क्या महिला या याचिकाकर्त्री को सुने बिना, महिला की अभिरक्षा बाल कल्याण समिति को सौंपने वाला आदेश वैध था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि पूर्व अभिरक्षा आदेश को पलटते हुए, बिना महिला या उसकी सास को नोटिस दिए, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ और यह आदेश इसी आधार पर भी अस्थिर था। - प्रश्न: क्या उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 226 के तहत, इस प्रकार के न्यायिक आदेश में हस्तक्षेप कर सकता था?
उत्तर: हां। क्योंकि आदेश “प्रकट अवैधता” से ग्रस्त था और मजिस्ट्रेट की शक्तियों से परे चला गया था, उच्च न्यायालय ने अपनी असाधारण रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए प्रभावित आदेश को रद्द कर पहले वाले आदेश को बहाल कर दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Mohammed Zakir v. Shabana & others, 2018 (15) SCC 316
- Rambali Sahni v. State of Bihar, SLP No. 357 of 2026
- Rikhab Chand Jain v. State of Bihar, 1979 PLJR 5 (याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता द्वारा संदर्भित)
- Sweta Kumari v. State of Bihar & others, Cr. WJC No. 253 of 2008 (याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता द्वारा संदर्भित)
- Rahul Kumar Singh & another v. State of U.P. & others, 2015 SCC OnLine All 8557 (याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता द्वारा संदर्भित)
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 2451/2025 (आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 1760/2025 में), जो परवलपुर थाना कांड संख्या 55/2025, जिला नालंदा से उत्पन्न हुआ।
मामले का शीर्षक: सितबिया देवी बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य।
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा।
उल्लेख (Citation): 2024(2) PLJR 420।
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्त्री की ओर से: श्री निरंजन कुमार, अधिवक्ता; श्री अभिजीत कुमार, अधिवक्ता।
- राज्य की ओर से: श्री प्रभु नारायण शर्मा, एसी टू एजी।
- प्रतिवादी संख्या 11 की ओर से: श्री अमरेंद्र कुमार सिंह संख्या 1, अधिवक्ता; श्री शिलेंद्र कुमार सिंह, अधिवक्ता।
मामले का स्वरूप: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक रिट याचिका, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट – V, हिलसा, नालंदा के उस आदेश को चुनौती दी गई, जो एक लड़की की अभिरक्षा और उसे बाल कल्याण समिति में रखने से संबंधित था।
निर्णय की तिथि: 28.01.2026।
निर्णय का लिंक: MTYjMjQ1MSMyMDI1IzEjTg==-9RDzSf8uv7Q=
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