मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला माननीय सदस्य (न्यायिक), लोकायुक्त, बिहार द्वारा 28.11.2019 को पारित आदेश से उत्पन्न हुआ, जो केस संख्या 1/Lok/(Urban Development)/31/2010, शीर्षक Md. Saifuddin v. Mayor Municipal Corporation में पारित हुआ था।
उस लोकायुक्त कार्यवाही में, सदस्य (न्यायिक) ने सभी नगर निकायों में समूह ‘डी’ सेवाओं के आउटसोर्सिंग संबंधी सरकारी नीति पर भरोसा किया। उन्होंने यह रिकॉर्ड किया कि उनकी दृष्टि में समूह ‘डी’ कर्मचारियों की दैनिक वेतन आधार पर नियुक्ति “भ्रष्टाचार का स्थायी स्रोत” है और जिन नगर निकायों ने इस प्रकार की सेवाओं का आउटसोर्सिंग नहीं किया है, उनके पास इस नीति को “विचलित करने का कोई न कोई एजेंडा” है।
इसी आधार पर लोकायुक्त ने निर्देश दिया कि वे नगर निकाय, जिन्होंने अभी तक समूह ‘डी’ सेवाओं का आउटसोर्सिंग नहीं किया है, उन्हें सरकारी निर्णय का पालन न करने के लिए स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना होगा। उनसे यह भी पूछा गया कि वे कितने दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को लगा रहे हैं और यह कारण बताने को कहा गया कि उनके विरुद्ध अप्रैल 2020 से यह प्रथा रोकने का निर्देश क्यों न जारी किया जाए।
लोकायुक्त ने यह “स्पष्ट” कर दिया कि यदि नगर निकाय, जिनमें पटना नगर निगम और मुजफ्फरपुर नगर निगम भी शामिल हैं, रिपोर्ट प्रस्तुत करने में विफल रहते हैं तो 01.04.2020 से किसी भी समूह ‘डी’ कर्मचारी की नियुक्ति पर रोक लगाने का आदेश पारित किया जाएगा। आदेश में दरभंगा नगर निगम को विशेष रूप से चेतावनी दी गई कि यदि 31.01.2020 तक आउटसोर्सिंग पूर्ण नहीं हुआ तो दैनिक वेतन भोगियों को जारी रखने के लिए दिए गए उसके अनुरोध पर आगे कोई विचार नहीं किया जाएगा।
इस आदेश के अनुपालन में, लोकायुक्त, बिहार के कार्यालय के अतिरिक्त सचिव ने 09.12.2019 की चिट्ठी से शहरी विकास एवं आवास विभाग, बिहार के उप सचिव को निर्देश भेजा, ताकि उसका अनुपालन किया जा सके।
फलस्वरूप, शहरी विकास एवं आवास विभाग के विशेष सचिव ने पूरे बिहार के सभी नगर आयुक्तों, जिनमें गया नगर निगम भी शामिल है, को निर्देश जारी किए कि समूह ‘डी’ कर्मचारियों की दैनिक वेतन आधार पर ली जा रही सेवाएँ बंद कर दी जाएँ।
इन समूह ‘डी’ कर्मियों में अनेक सफाईकर्मी शामिल थे। जैसा कि उच्च न्यायालय ने दर्ज किया, उनकी सेवाएँ रोकने का प्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि गया नगर निगम का पूरा क्षेत्र, जो एक राष्ट्रीय पर्यटन स्थल है, “पूरी तरह कूड़े-कचरे से पट” गया।
इसी पृष्ठभूमि में, याचिकाकर्ता, जो गया का निवासी है, ने 15.02.2020 को पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 3599/2020 दायर किया।
याचिकाकर्ता ने लोकायुक्त के आदेश और उसके परिणामों को दो मुख्य आधारों पर चुनौती दी: पहला, यह कि गया नगर निगम के समूह ‘डी’ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की सेवाओं पर रोक का आदेश मनमाना, अधिकार क्षेत्र से परे और बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 के अधिदेश से बाहर है; और दूसरा, यह कि लोकायुक्त ने इस प्रकार के आदेश को लागू करने के लिए प्राधिकारियों को निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र से अधिक का उपयोग किया।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
माननीय मुख्य न्यायाधीश और माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. कुमार की खंडपीठ ने तीन केंद्रीय प्रश्न निर्धारित किए:
1. बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 के तहत लोकायुक्त संस्था की भूमिका और दायरा क्या है?
2. क्या यह अधिनियम लोकायुक्त को सेवा संबंधी मामलों को उठाने की अनुमति देता है?
3. क्या लोकायुक्त द्वारा आदेशित कर्मचारियों के एक समूह की सेवाओं की समाप्ति, ऐसी संस्था के लिए निर्धारित दृष्टि के भीतर आती है?
राज्य (प्रतिवादी संख्या 1 एवं 2 के माध्यम से) द्वारा दायर प्रति-हलफनामा में, शहरी विकास एवं आवास विभाग ने लोकायुक्त के आदेश के बाद उठाए गए कदमों की व्याख्या की। प्रारंभ में, मेमो संख्या 406 दिनांक 28.01.2020 द्वारा सभी नगर स्थानीय निकायों को, लोकायुक्त के आदेश का अनुपालन करते हुए, आउटसोर्सिंग से समूह ‘डी’ कर्मचारियों की सेवाओं पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया।
हालाँकि, मामले को “समग्रता” में विचार करने के बाद, विभाग ने मेमो संख्या 454 दिनांक 03.02.2020 जारी कर पूर्ववर्ती पत्र को 31.03.2020 तक स्थगित कर दिया। तत्पश्चात कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण समूह ‘डी’ कर्मचारियों के लिए आउटसोर्सिंग सेवा सुविधा 01.06.2020 तक (पत्र संख्या 1430 दिनांक 30.03.2020) और फिर 01.09.2020 तक (पत्र संख्या 1869 दिनांक 29.05.2020) बढ़ा दी गई।
बाद में, पत्र संख्या 3603 दिनांक 12.10.2020 नगर आयुक्त, दरभंगा को, सभी नगर स्थानीय निकायों की प्रतिलिपि के साथ जारी किया गया, जिसके द्वारा समूह ‘डी’ कर्मचारियों के आउटसोर्सिंग सेवा लाभ मार्च 2021 तक बढ़ाए गए। इसी पत्र में पटना उच्च न्यायालय द्वारा CWJC No.5713 of 2020 (Bihar Local Bodies Employee Federation and Ors v. State of Bihar and Ors) में 28.05.2020 को पारित अंतरिम आदेश के आलोक में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश भी दिया गया। समूह ‘डी’ कर्मचारियों की आउटसोर्सिंग सेवाएँ जारी रहीं।
उच्च न्यायालय ने CWJC No.5713 of 2020 में 28.05.2020 के अंतरिम आदेश को पूर्णतः उद्धृत किया। उस मामले में न्यायालय ने लगभग 25,000 दैनिक वेतन भोगी कर्मियों/सफाईकर्मियों को 01.06.2020 से हटाए जाने से बचाने के लिए यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया था तथा अगली सुनवाई तिथि तक विवादित आदेशों को लागू न करने का निर्देश दिया था।
मुख्य कानूनी प्रश्नों की ओर लौटते हुए, खंडपीठ ने लोकायुक्त संस्था की विधायी पृष्ठभूमि और दायरे का विस्तृत विश्लेषण किया।
न्यायालय ने लोकपाल/लोकायुक्त (ओम्बड्समैन) की अवधारणा की उत्पत्ति 1966 की प्रशासनिक सुधार आयोग की अंतरिम रिपोर्ट से जोड़ी, जिसमें केंद्र स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त की स्थापना का प्रस्ताव था। रिपोर्ट में कल्पना की गई थी कि ये संस्थाएँ मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के प्रशासनिक कार्यों की जाँच करेंगी, जहाँ नागरिकों ने अन्याय सहने का दावा किया हो।
न्यायालय ने रिपोर्ट से उद्धरण देते हुए यह भी दिखाया कि लोकपाल और लोकायुक्त जैसी संस्थाएँ संसद द्वारा नियंत्रित प्रशासनिक व्यवस्था की सहायक स्वतंत्र संस्थाएँ हैं, जो राजनीतिक प्रभाव से मुक्त, सामान्य प्रशासनिक पदानुक्रम से बाहर और नागरिक की अन्याय की भावना को दूर करने तथा प्रशासन में जन-विश्वास बनाए रखने के लिए बनाई गई हैं।
इसके बाद, न्यायालय ने Lokpal and Lokayuktas Act, 2013 और उसके उद्देशिका (Preamble) का संदर्भ दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि ये संस्थाएँ “निर्दिष्ट लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करने” के लिए हैं। विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समिति की 77वीं रिपोर्ट का हवाला यह रेखांकित करने के लिए दिया गया कि यह अधिनियम “स्वतंत्र और सशक्त भ्रष्टाचार-रोधी संस्था” की स्थापना हेतु पारित किया गया था।
बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 का न्यायालय ने विस्तार से परीक्षण किया। खंडपीठ द्वारा उद्धृत बिहार अधिनियम की उद्देशिका स्पष्ट करती है कि इसका उद्देश्य “सभी श्रेणी के लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार से संबंधित आरोपों की त्वरित जाँच और अभियोजन” है।
न्यायालय ने प्रमुख प्रावधानों पर प्रकाश डाला:
धारा 2(ख) में “आरोप” को लोक सेवक के संबंध में पद के दुरुपयोग, व्यक्तिगत हित या भ्रष्ट उद्देश्य अथवा ईमानदारी के अभाव के संदर्भ में परिभाषित किया गया है।
“दुशासन” (mal administration) की परिभाषा में अव्यवहारिक, अन्यायपूर्ण, दमनकारी या भेदभावपूर्ण कार्यवाही, या प्रशासनिक कार्यों में लापरवाही या अत्यधिक विलंब को शामिल किया गया है।
धारा 16 लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र का निर्धारण करती है। यह लोकायुक्त को ऐसे मामलों की जाँच करने का अधिकार देती है, जो मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्य विधानसभा के सदस्य, निर्दिष्ट निकायों के अधिकारी, तथा स्थानीय प्राधिकरणों, निगमों, सरकारी कंपनियों, समितियों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य सब्सिडी प्राप्त संस्थाओं के प्रमुखों या कर्मचारियों के विरुद्ध “आरोप या शिकायत” (जैसा कि अधिनियम में परिभाषित है) से उत्पन्न होते हों।
धारा 28क (Section 28A) यह निर्धारित करती है कि जाँच के बाद यदि लोकायुक्त यह पाता है कि किसी प्रशासनिक कार्रवाई से अन्याय या अनुचित कठिनाई हुई है, तो उसे क्या करना है। ऐसे मामलों में उसे संबंधित लोक सेवक और सक्षम प्राधिकारी को लिखित रिपोर्ट देकर सुधारात्मक कार्रवाई की अनुशंसा करनी होती है, जो तीन माह के भीतर उत्तर देने के लिए बाध्य हैं। यदि लोकायुक्त उस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होता, तो वह राज्यपाल को विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।
धारा 38(1)(क) लोकायुक्त को यह अधिकार देती है कि जहाँ वह prima facie संतुष्ट हो कि पट्टा, लाइसेंस, अनुमति, अनुबंध या समझौता भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त किए गए हैं, वह उन्हें रद्द या संशोधित करने और संबंधित व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट करने की अनुशंसा कर सकता है। धारा 38(1)(ख) के तहत वह जाँच के दौरान जनहित में निवारक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है, जैसे भ्रष्टाचार को जारी रहने से रोकने के लिए किसी निर्णय के क्रियान्वयन पर रोक की सिफारिश करना।
महत्त्वपूर्ण रूप से, धारा 38(1)(i) लोकायुक्त को बर्खास्तगी, सेवा से हटाना या पदावनति जैसी दंड देने की शक्ति देती है, परंतु यह शक्ति “अपने स्वयं के कार्मिकों” — अर्थात लोकायुक्त संस्था के अधिकारी और कर्मचारियों — तक सीमित है, न कि अन्य विभागों या नगर निकायों के कर्मचारियों तक।
इस वैधानिक ढाँचे से पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि लोकायुक्त का अधिकार क्षेत्र मूलतः लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार या दुशासन (mal-administration) से संबंधित आरोपों से जुड़ा हुआ है। कोई भी कार्रवाई ऐसे आरोपों के संबंध में ही हो सकती है और उसे सक्षम प्राधिकारी को अनुशंसा करने की विधि का पालन करना होगा, न कि ऐसे प्रत्यक्ष आदेश के रूप में, जिनसे कार्यपालिका के कार्यभार को स्वयं संभाल लिया जाए।
न्यायालय ने इस व्याख्या को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से समर्थित किया। Institution of A.P. Lokayukta/Upa-Lokayukta v. T. Rama Subba Reddy, (1997) 9 SCC 42 में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त को वास्तविक ओम्बड्समैन के रूप में कार्य करना चाहिए ताकि लोक निकायों में जनता का विश्वास बना रहे, और उनके निर्णय लागू होने योग्य होने चाहिए। हालाँकि, उसी निर्णय में यह भी संकेत दिया गया कि सरकार स्वतः ही उनकी अनुशंसाओं से बाध्य नहीं है और अनुपालन तंत्र स्पष्ट करने के लिए विधान की आवश्यकता हो सकती है।
खंडपीठ ने Justice Chandrashekharaih (Retired) v. Janekere C. Krishna & Ors., (2013) 3 SCC 117 से भी विस्तृत उद्धरण दिए, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने लोकपाल/लोकायुक्त जैसे संस्थानों की अपेक्षित स्वतंत्रता और सीमित अधिकार क्षेत्र को दोहराया।
इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने अपने ही एक पूर्व एकल पीठ के निर्णय Bipin Bihari Singh v. State of Bihar (CWJC No. 18053 of 2019, निर्णय दिनांक 03.06.2020) पर भरोसा किया। उस मामले में यह ठहराया गया था कि अधिकार क्षेत्र के बिना लिया गया कोई भी निर्णय नन-एस्ट है; कोई वैधानिक निकाय अपने मूल विधि द्वारा प्रदत्त शक्तियों से परे कार्य नहीं कर सकता; और लोकायुक्त “निश्चित रूप से कोई सुपर एक्जीक्यूटिव नहीं है” और न ही उसके पास संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की तरह न्यायिक पुनरीक्षण की शक्ति है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, खंडपीठ ने माना कि लोगों को सेवा से हटाना पूर्णतः “सेवा विधि” (service jurisprudence) के दायरे में आता है। ऐसे सेवा संबंधी मामले, जिनमें समूह ‘डी’ कर्मचारियों के रोजगार की निरंतरता या गैर-निरंतरता के प्रश्न शामिल हों, बिहार अधिनियम के तहत लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि यद्यपि सदस्य (न्यायिक) ने यह दर्ज किया कि समूह ‘डी’ कर्मचारियों की दैनिक वेतन आधार पर नियुक्ति भ्रष्टाचार का स्थायी स्रोत है, परंतु इस निष्कर्ष के समर्थन में कोई जाँच रिपोर्ट अभिलेख पर नहीं थी। धारा 28क के तहत किसी व्यापक रिपोर्ट द्वारा सक्षम प्राधिकारी को विशिष्ट सुधारात्मक कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की गई थी और न ही उस प्राधिकारी द्वारा तीन माह के भीतर किसी विचार-विमर्श की प्रक्रिया या राज्यपाल को विशेष रिपोर्ट का कोई संकेत मिला।
इसके विपरीत, लोकायुक्त ने सीधे आदेश और निर्देश जारी कर दिए कि एक निश्चित तिथि से समूह ‘डी’ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति पर रोक लगा दी जाए और सरकारी नीति को लागू न करने पर स्पष्टीकरण माँगा जाए। उच्च न्यायालय के मत में ऐसे प्रत्यक्ष आदेश “कानून की शब्दावली में तो दूर की बात, उसकी भावना में भी” स्वीकार्य नहीं हैं। विधि की मूल संरचना यह है कि लोकायुक्त अनुशंसा करता है; वह स्वयं सेवाएँ समाप्त नहीं कर सकता और न ही नगर निकायों में किसी श्रेणी के रोजगार को बंद कर सकता है।
न्यायालय ने इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला कि समूह ‘डी’ या किसी अन्य सेवा के रोजगार की निरंतरता से जुड़े प्रश्न, बिहार लोकायुक्त संस्था के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। विवादित आदेश के अनुपालन में की गई किसी भी कार्रवाई को शून्य (void) घोषित किया गया।
तदनुसार, उच्च न्यायालय ने केस संख्या 1/Lok/(Urban Development)/31/2010 में 28.11.2019 को पारित लोकायुक्त का आदेश रद्द कर दिया। न्यायालय ने माना कि यह आदेश विधि की दृष्टि में नन-एस्ट है और उस पर आधारित सभी कार्रवाइयों का कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय नगर निकायों के कर्मियों, विशेषकर समूह ‘डी’ के दैनिक वेतन भोगी सफाईकर्मियों, और उन नागरिकों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो बुनियादी नगरीय सेवाओं पर निर्भर हैं।
पहला, यह कर्मचारियों को ऐसी संस्था के आदेशों के आधार पर अचानक सेवा से हटाए जाने से बचाता है, जिसके पास सेवा संबंधी मामलों पर कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि लोकायुक्त पूरे वर्ग के कर्मचारियों की सेवाएँ समाप्त करने या उनके रोजगार पर रोक लगाने का प्रत्यक्ष आदेश नहीं दे सकता।
दूसरा, यह स्पष्ट करता है कि बिहार लोकायुक्त एक भ्रष्टाचार-रोधी निगरानी संस्था (watchdog) है, कोई सुपर प्रशासक नहीं। उसकी भूमिका भ्रष्टाचार और दुशासन की जाँच कर, बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 की धाराएँ 28क और 38 में दिए गए प्रावधानों के अनुसार सक्षम प्राधिकारियों को अनुशंसा तक सीमित है, न कि सीधे सेवा आदेश पारित करने तक।
तीसरा, यह रेखांकित करता है कि भ्रष्टाचार-रोधी उपाय भी विधि की चार दीवारों के भीतर रहकर ही किए जाने चाहिए। नेक इरादे अधिकार क्षेत्र के बिना की गई कार्रवाई को वैध नहीं बना सकते। जहाँ नगरीय स्वच्छता और आजीविका पर प्रभाव पड़ता हो, वहाँ निर्णय वैधानिक नियोक्ताओं और सरकार द्वारा लिए जाएँगे, न कि उस संस्था द्वारा जिसके अधिकार केवल जाँच और अनुशंसा तक सीमित हैं।
बिहार भर के नागरिकों और कर्मियों के लिए यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है: यदि कोई भी प्राधिकारी अपने कानूनी अधिकार से आगे बढ़कर ऐसा निर्णय लेता है, जिससे नौकरियाँ या बुनियादी सेवाएँ प्रभावित होती हैं, तो ऐसी कार्रवाई को पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।
कानूनी प्रश्न और उत्तर
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प्रश्न: क्या बिहार लोकायुक्त, बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 के अंतर्गत, सेवा संबंधी मामलों से निपट सकता है और नगर निकायों में समूह ‘डी’ कर्मचारियों की सेवाओं की समाप्ति या रोजगार पर रोक लगाने का निर्देश दे सकता है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि समूह ‘डी’ या किसी अन्य सेवा के रोजगार की निरंतरता से जुड़े प्रश्न लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। उसका दायित्व भ्रष्टाचार तथा उससे संबंधित दुशासन के आरोपों की जाँच और उसके बाद अनुशंसा करने तक सीमित है, प्रत्यक्ष सेवा आदेश पारित करने तक नहीं। -
प्रश्न: क्या 28.11.2019 का लोकायुक्त का वह आदेश, जिसके द्वारा भविष्य की तिथि से समूह ‘डी’ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्ति पर रोक लगाई गई, विधि की दृष्टि से वैध था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने उस आदेश को नन-एस्ट (अवैध) घोषित किया, क्योंकि वह बिहार लोकायुक्त अधिनियम, 2011 द्वारा दी गई शक्तियों से परे था। अधिनियम लोकायुक्त को ऐसे प्रत्यक्ष रोजगार संबंधी आदेश देने का अधिकार नहीं देता; वह केवल उचित जाँच के बाद सक्षम प्राधिकारियों को कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है। -
प्रश्न: विवादित लोकायुक्त आदेश के अनुपालन में सरकारी विभागों और नगर निकायों द्वारा उठाए गए कदमों का क्या प्रभाव है?
उत्तर: न्यायालय ने निर्णय दिया कि विवादित आदेश के अनुपालन में की गई कोई भी कार्रवाई शून्य (void) है। चूँकि मूल आदेश ही अधिकार क्षेत्र के अभाव में था, उस पर आधारित सभी अनुवर्ती कदमों की कोई कानूनी वैधता नहीं है।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Institution of A.P. Lokayukta/Upa-Lokayukta v. T. Rama Subba Reddy, (1997) 9 SCC 42.
- Justice Chandrashekharaih (Retired) v. Janekere C. Krishna & Ors., (2013) 3 SCC 117.
- Bipin Bihari Singh v. State of Bihar, CWJC No.18053 of 2019, Patna High Court, निर्णय दिनांक 03.06.2020।
- CWJC No.5713 of 2020, Bihar Local Bodies Employee Federation and Ors v. State of Bihar and Ors (अंतरिम आदेश दिनांक 28.05.2020)।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No.3599 of 2020
मामले का शीर्षक: Dharmendra Kumar v. The State of Bihar & Ors
पीठ (Coram): Hon’ble the Chief Justice; Hon’ble Mr. Justice S. Kumar
उद्धरण (Citation): 2022(1) PLJR 267
निर्णय की तिथि: 06-12-2021
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Ranjeet Kumar, Advocate; Mr. Kundan Kumar, Advocate; Ms. Vagisha Pragya Vacaknavi, Amicus Curiae.
- प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Pawan Kumar, AC to AG; Mr. Rabindr Kumar Priyadarshi, Advocate.
मामले का स्वरूप: अनुच्छेद 226 के तहत दायर सिविल रिट याचिका, जिसमें लोकायुक्त, बिहार के सदस्य (न्यायिक) द्वारा पारित आदेश तथा उसके परिणामस्वरूप समूह ‘डी’ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले कार्यपालिका के निर्देशों की वैधता और अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी गई।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No.3599 of 2020
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