मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (BIADA) द्वारा M/s Prerna Agro Food Products को आवंटित एक औद्योगिक प्लॉट से उत्पन्न हुआ। प्लॉट, संख्या O-7(P), क्षेत्रफल 5000 वर्ग फुट, पट्टा विलेख दिनांक 07.06.2018 के तहत आवंटित किया गया था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इकाई वाणिज्यिक उत्पादन शुरू नहीं कर सकी क्योंकि कोविड-19 सहित अपरिहार्य परिस्थितियाँ एवं उसके नियंत्रण से बाहर अन्य कारण विद्यमान थे। दूसरी ओर, बीआईएडीए ने यह मानकर कार्यवाही की कि इकाई निर्धारित समय सीमा के भीतर उत्पादन प्रारंभ करने में विफल रही है।
दिनांक 29.12.2022 को, उप महाप्रबंधक, औद्योगिक क्षेत्र, पटना क्लस्टर, बीआईएडीए (प्रतिवादी संख्या 6) ने कार्यालय आदेश मेमो संख्या 801 पारित कर याचिकाकर्ता के प्लॉट आवंटन को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता ने इस रद्दीकरण को योजना के तहत अपीलीय प्राधिकारी, उद्योग विभाग, बिहार सरकार के प्रधान सचिव के समक्ष अपील में चुनौती दी।
दिनांक 07.03.2023 को, अपील संख्या 102/2023 में प्रधान सचिव (प्रतिवादी संख्या 2) ने रद्दीकरण आदेश की पुष्टि की तथा अपील खारिज कर दी। अपने औद्योगिक प्लॉट को खोने की स्थिति का सामना करते हुए, याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 5269/2023 दायर कर पटना उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का सहारा लिया।
रिट याचिका में, याचिकाकर्ता ने दिनांक 29.12.2022 के रद्दीकरण आदेश तथा दिनांक 07.03.2023 के अपीलीय आदेश दोनों को निरस्त करने की मांग की। याचिकाकर्ता ने यह भी प्रार्थना की कि अंतिम निर्णय तक प्लॉट का पुनः तृतीय पक्ष को आवंटन न किया जाए तथा बीआईएडीए द्वारा आवंटन के संबंध में कोई भी जबरदस्ती की कार्रवाई न की जाए।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
मामला पटना उच्च न्यायालय के माननीय श्री न्यायमूर्ति ए. अभिनव (ए.) अभिषेक रेड्डी के समक्ष आया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता तथा बीआईएडीए एवं राज्य प्राधिकरणों की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की दलीलें सुनी गईं।
याचिकाकर्ता की मुख्य grievance यह थी कि आवंटन का रद्दीकरण कठोर था, क्योंकि वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ न कर पाने की विफलता जानबूझकर नहीं थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह प्रस्तुत किया कि कोविड-19 जैसी परिस्थितियों ने लघु औद्योगिक इकाइयों की संचालन या उत्पादन शुरू करने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया, और याचिकाकर्ता का मामला भी इसी कठिनाई के दायरे में आता है।
याचिकाकर्ता ने न्यायालय से निवेदन किया कि रद्दीकरण को बरकरार रखने के बजाय उसे वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने का एक अवसर दिया जाए। बल इस बात पर दिया गया कि इकाई अब सभी शर्तों, जिसमें बकाया भुगतान भी शामिल है, का पालन करने के लिए तत्पर और इच्छुक है, और पिछला चूक उसके नियंत्रण से बाहर कारणों से हुई थी।
इस निवेदन के समर्थन में, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने न्यायालय का ध्यान पटना उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के पूर्ववर्ती निर्णय, C.W.J.C. No. 15567 of 2022, शीर्षक M/s Maa Kali Food Products Industrial Growth Centre, Maranga Vs. The State of Bihar & Ors., दिनांक 02.12.2022 की ओर आकर्षित किया।
उस मामले में, औद्योगिक इकाई द्वारा उत्पादन प्रारंभ न किए जाने की समान परिस्थितियों में, डिवीजन बेंच ने बीआईएडीए के रद्दीकरण आदेश को निरस्त कर दिया था। यह निर्णय संबंधित इकाई द्वारा दिए गए एक विस्तृत प्रतिज्ञा (undertaking) के आधार पर था, जिसमें उसने निर्धारित समय सीमा के भीतर वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने का वचन दिया था। उस मामले में न्यायालय ने उक्त undertaking को इकाई को दूसरा अवसर देने में निर्णायक कारक माना।
उक्त मिसाल का अनुसरण करते हुए, वर्तमान मामले में भी याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष हलफनामे पर लिखित undertaking दायर की। यह undertaking, जिसे निर्णय में पूर्णरूपेण उद्धृत किया गया है, में अनेक विशिष्ट वादे सम्मिलित थे:
प्रथम, याचिकाकर्ता ने undertaking दी कि बीआईएडीए द्वारा दिनांक 07.06.2018 के रद्दीकरण आदेश को वापस लेने की तिथि से 90 दिनों के भीतर वह वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ कर देगा। द्वितीय, याचिकाकर्ता ने वादा किया कि नौ माह के भीतर औद्योगिक इकाई पूर्ण रूप से संचालित और क्रियाशील हो जाएगी तथा मूल आवंटन की शर्तों के अनुसार कम-से-कम 80% उत्पादन क्षमता प्राप्त कर लेगी।
तृतीय, याचिकाकर्ता ने यह वचन दिया कि बीआईएडीए को देय सभी स्वीकृत बकायों, यदि कोई हो, को कब्जा सौंपे जाने की तिथि अथवा रद्दीकरण आदेश वापस लेने की तिथि से चार सप्ताह के भीतर चुका देगा। चतुर्थ, याचिकाकर्ता ने बीआईएडीए के पक्ष में रुपये 1,00,000 की प्रदर्शन बैंक गारंटी देने पर सहमति व्यक्त की, जिसकी पहचान Bank Guarantee No. 4403IPEBG230002 दिनांक 04.10.2023 से की गई।
पंचम, याचिकाकर्ता ने जीएसटी तथा विद्युत शुल्क से संबंधित सभी बकायों का भुगतान करने की undertaking दी। सबसे महत्वपूर्ण, याचिकाकर्ता ने यह स्वीकार किया कि undertaking का पालन करने में विफल रहने की स्थिति में बीआईएडीए को परिसर का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा लेने का अधिकार होगा, उसे किसी तृतीय पक्ष को पुनः आवंटित करने की स्वतंत्रता होगी, और याचिकाकर्ता भूमि तथा परिसर पर अपने सभी अधिकार खो देगा।
undertaking में यह भी उल्लेख था कि यदि याचिकाकर्ता न्यायालय के समक्ष दी गई undertaking का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध अवमानना (contempt) कार्यवाही आरंभ किए जाने के लिए वह स्वयं उत्तरदायी होगा, और वह undertaking की विषय-वस्तु का पालन करेगा।
इस undertaking तथा C.W.J.C. No. 15567 of 2022 के डिवीजन बेंच के पूर्व निर्णय पर विचार करने के उपरांत, न्यायालय ने उल्लेख किया कि डिवीजन बेंच पहले ही ऐसी गंभीर undertaking के आधार पर सशर्त अवसर प्रदान करने के इस दृष्टिकोण को स्वीकार कर चुकी है। न्यायालय इस बात से आश्वस्त हुआ कि वर्तमान मामले में भी इसी प्रकार की कार्यवाही न्याय के अनुरूप होगी।
न्यायालय ने बीआईएडीए के अधिवक्ता द्वारा की गई प्रस्तुतियों को भी ध्यान में रखा। यद्यपि बीआईएडीए के अधिवक्ता की विस्तृत दलीलें पाठ में दर्ज नहीं हैं, फिर भी स्पष्ट है कि न्यायालय ने औद्योगिक मानकों के प्रवर्तन के प्रति बीआईएडीए की चिंता और याचिकाकर्ता द्वारा अंतिम अवसर की प्रार्थना के बीच संतुलन स्थापित किया।
अतः न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि undertaking स्वीकार कर याचिकाकर्ता को वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ करने के लिए समयबद्ध अवसर देना उपयुक्त और न्यायसंगत समाधान होगा। इससे एक ओर औद्योगिक इकाई बच सकेगी, वहीं दूसरी ओर चूक की स्थिति में कड़ी शर्तों और परिणामों के माध्यम से बीआईएडीए के हितों की भी रक्षा होगी।
इन्हीं आधारों पर न्यायालय ने स्पष्ट निर्देशों की एक श्रृंखला जारी की।
प्रथम, चूँकि बीआईएडीए पहले ही रद्दीकरण के बाद प्लॉट का कब्जा ले चुकी थी, न्यायालय ने निर्देश दिया कि न्यायालय के आदेश की प्राप्ति के तुरंत बाद परिसर का कब्जा याचिकाकर्ता को वापस सौंप दिया जाए।
द्वितीय, न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को कब्जा सौंपे जाने की तिथि से एक सप्ताह के भीतर रुपये 1,00,000 की बैंक गारंटी उपलब्ध करानी होगी। यह आवश्यकता पूर्ववर्ती undertaking को एक प्रवर्तनीय शर्त में परिवर्तित करती है।
तृतीय, याचिकाकर्ता को कब्जा सौंपे जाने की तिथि से दो सप्ताह के भीतर, यदि कोई हो, बीआईएडीए के सभी बकाया का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
चतुर्थ, न्यायालय ने यह अनिवार्य कर दिया कि याचिकाकर्ता को कब्जा सौंपे जाने की तिथि से नब्बे दिनों के भीतर वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करना होगा और बिहार औद्योगिक वाणिज्यिक नीति, 2016 के तहत स्वीकृत विनिर्माण गतिविधि प्रारंभ करनी होगी। इससे याचिकाकर्ता के दायित्वों को प्रासंगिक औद्योगिक नीति ढांचे से जोड़ा गया।
निर्णय में यह दर्ज है कि undertaking के उल्लंघन के परिणाम, जिसमें संभावित अवमानना कार्यवाही भी शामिल है, याचिकाकर्ता को उसके अधिवक्ता के माध्यम से समझा दिए गए। न्यायालय ने 11.10.2023 दिनांकित याचिकाकर्ता की undertaking को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर अभिलेख पर ले लिया।
न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि undertaking के उल्लंघन की स्थिति में, याचिकाकर्ता को आवंटित संपत्ति का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा दो सप्ताह के भीतर बीआईएडीए को सौंपना होगा। यदि याचिकाकर्ता न तो निर्धारित समय के भीतर पूर्ण वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करता है और न ही उसके पश्चात दो सप्ताह के भीतर कब्जा सौंपता है, तो बीआईएडीए को संबंधित परिसर का कब्जा लेने के लिए स्वतंत्र माना जाएगा।
अंततः, इन शर्तों को निर्धारित करते हुए, न्यायालय ने 29.12.2022 दिनांकित मेमो संख्या 801 द्वारा उप महाप्रबंधक, पटना क्लस्टर, बीआईएडीए द्वारा जारी रद्दीकरण आदेश तथा 07.03.2023 दिनांकित अपील प्रकरण संख्या 102/2023 में प्रधान सचिव-सह-अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पारित अपीलीय आदेश दोनों को निरस्त और रद्द कर दिया।
इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में बीआईएडीए भूमि पर कार्यरत उद्यमियों और लघु औद्योगिक इकाइयों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि पटना उच्च न्यायालय ऐसी इकाइयों को दूसरा अवसर दे सकता है, जो उत्पादन शुरू करने में विफल रही हों, विशेष रूप से जब विफलता का कारण कोविड-19 जैसी परिस्थितियों से समझाया गया हो और वह जानबूझकर न प्रतीत हो।
हालाँकि, राहत बिना शर्त नहीं है। न्यायालय ने विस्तृत, समयबद्ध undertaking पर जोर दिया और कड़ी शर्तें लगाईं: बैंक गारंटी, बकाया की अदायगी, उत्पादन शुरू करने के लिए निश्चित समयसीमा, तथा उल्लंघन की स्थिति में स्पष्ट परिणाम।
बीआईएडीए और इसी प्रकार के अन्य प्राधिकरणों के लिए यह निर्णय संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह उन्हें औद्योगिक प्लॉटों पर नियंत्रण से वंचित नहीं करता, बल्कि यह अपेक्षा करता है कि जब कोई इकाई वास्तव में कठिनाई से गुजर रही हो और अनुपालन एवं निवेश के लिए तैयार हो, तो उसकी स्थिति पर विचार किया जाए। साथ ही, यदि इकाई पुनः चूक करती है, तो बीआईएडीए को स्पष्ट रूप से कब्जा वापस लेने और आगे आवंटन की कार्यवाही करने के लिए अधिकृत किया गया है।
सामान्य पाठकों के लिए यह मामला यह दिखाता है कि यदि कोई आवंटी स्पष्ट योजना, समयसीमा के प्रति प्रतिबद्धता और गंभीर परिणाम स्वीकार करने की तैयारी के साथ पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है, तो कभी-कभी रद्द किए गए औद्योगिक आवंटन को बचाया जा सकता है। परन्तु, एक बार ऐसी undertaking दे दी जाए, तो उसका पालन न करने पर न केवल भूमि के नुकसान का, बल्कि न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही का भी जोखिम होता है।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता द्वारा समय पर उत्पादन शुरू न कर पाने के बावजूद बीआईएडीए द्वारा किए गए औद्योगिक प्लॉट आवंटन के रद्दीकरण तथा उसके अपीलीय अनुमोदन को बरकरार रखा जाना चाहिए था?
उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने रद्दीकरण आदेश और अपीलीय आदेश दोनों को निरस्त कर दिया, किंतु केवल याचिकाकर्ता द्वारा दी गई कड़ी लिखित undertaking के आधार पर और विस्तृत शर्तों एवं समयसीमाओं के अनुपालन की शर्त पर। - प्रश्न: याचिकाकर्ता के पक्ष में कब्जे की बहाली और आवंटन की निरंतरता किन शर्तों के अधीन रहनी चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने कब्जा पुनः सौंपने, रुपये 1,00,000 की बैंक गारंटी उपलब्ध कराने, लंबित बकायों के निपटान, 90 दिनों के भीतर वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने, निर्धारित अवधि में पूर्ण वाणिज्यिक उत्पादन प्राप्त करने तथा चूक की स्थिति में बीआईएडीए को कब्जा सौंपने के निर्देश दिए, साथ ही undertaking के उल्लंघन पर अवमानना कार्यवाही की संभावना भी स्पष्ट की।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण
- C.W.J.C. No. 15567 of 2022, M/s Maa Kali Food Products Industrial Growth Centre, Maranga Vs. The State of Bihar & Ors., निर्णय दिनांक 02.12.2022, पटना उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच।
प्रकरण का विवरण
प्रकरण संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 5269 of 2023
प्रकरण शीर्षक: M/S Prerna Agro Food Products through its Proprietor Shri Ashutosh Kumar Sinha vs. The Bihar Industrial Area Development Authority (BIADA) & Ors.
उद्धरण: 2024 (1) PLJR 305
न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय
पीठ: Hon’ble Mr. Justice A. Abhishek Reddy
निर्णय की तिथि: 06.11.2023
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Rajesh Kumar, Advocate
बीआईएडीए की ओर से: Mr. Girijish Kumar, Advocate
प्रतिवादीगण/राज्य की ओर से: Mr. P.K. Shahi, Advocate General; Mr. Manish Dhari Singh, AC to AG
मामले का स्वरूप: औद्योगिक प्लॉट आवंटन के रद्दीकरण एवं वैधानिक अपील की खारिजी को चुनौती देने वाली रिट याचिका।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 5269 of 2023
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