EPF हर्जाने के विरुद्ध दाखिल रिट पूर्वकालीन होने के आधार पर अस्वीकार — पटना उच्च न्यायालय, 2023

मेहरोत्रा इंजीनियरिंग वर्क्स ने मुजफ्फरपुर कार्यालय द्वारा लगाए गए ईपीएफ हर्जाने और ब्याज को चुनौती दी थी। पटना उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने माना कि कंपनी को पहले ईपीएफ अधिनियम के तहत वैधानिक अपील दायर करनी चाहिए। रिट याचिका खारिज कर दी गई, लेकिन अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), द्वारा मेहरोत्रा इंजीनियरिंग वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के विरुद्ध शुरू की गई कार्यवाही से उत्पन्न हुआ।

कंपनी कंपनियाँ अधिनियम, 1956 के तहत निगमित है और बेला औद्योगिक क्षेत्र, मुजफ्फरपुर से संचालित होती है। इसे कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 के तहत आच्छादित प्रतिष्ठान के रूप में माना गया।

दिनांक 25.01.2022 को क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त-II, क्षेत्रीय कार्यालय, मुजफ्फरपुर ने कंपनी के विरुद्ध दो पृथक आदेश पारित किए। एक आदेश, ज्ञापन संख्या BR/RO/MUZ/ENF/14B/BRMUZ0001367000/ORDER/2188 युक्त, के द्वारा ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 की धारा 14B के तहत 12,39,266/- रुपये का हर्जाना लगाया गया। दूसरा आदेश, ज्ञापन संख्या BR/RO/MUZ/ENF/7Q/BRMUZ0001367000/ORDER/2188 युक्त, के द्वारा उसी अधिनियम की धारा 7Q के तहत 9,58,383/- रुपये का ब्याज अधिरोपित किया गया।

यह हर्जाना और ब्याज, याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतों में दर्शाए अनुसार, फरवरी 2014 से मार्च 2021 की अवधि के चूक से संबंधित था।

इन आदेशों से आहत होकर, कंपनी ने सिविल रिट अधिकारिता मामला संख्या 13337/2022 दायर कर पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। रिट याचिका में दोनों आदेशों को निरस्त करने की प्रार्थना की गई थी तथा अनेक आधार उठाए गए थे, जिनमें प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन, गैर-विस्तृत (नॉन-स्पीकिंग) एवं यांत्रिक आदेश तथा सीमा (Limitation) से बंधित होने के तर्क शामिल थे।

11.01.2023 को हुई सुनवाई के दौरान, श्री मनीष मणि, क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त-II, मुजफ्फरपुर, उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती आदेश के अनुपालन में न्यायालय में उपस्थित थे। मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बाजंथरी द्वारा की गई।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

याचिकाकर्ता कंपनी ने मुख्य रूप से दिनांक 25.01.2022 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके द्वारा धारा 14B के तहत हर्जाना लगाया गया, तथा उसी दिनांक के उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसके द्वारा ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 की धारा 7Q के तहत ब्याज लगाया गया था।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से क्षतिपूर्ति (हर्जाना) आदेश और ब्याज आदेश को निरस्त करने के लिए सर्टियोरारी की रिट जारी करने का अनुरोध किया। साथ ही, निम्नलिखित घोषणाएँ मांगी गईं कि:

(i) हर्जाना आदेश गैर-विस्तृत और यांत्रिक है, क्योंकि प्राधिकारी द्वारा जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया, उनका उसमें विस्तार से उल्लेख नहीं है;

(ii) ऑडी ऑल्टरम पार्टम (दूसरी पक्ष को सुने जाने के अधिकार) के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है; और

(iii) धारा 14B और 7Q के तहत कार्यवाही सीमा (limitation) से बंधित थी, क्योंकि इन्हें फरवरी 2014 – मार्च 2021 की अवधि के लिए प्रारंभ किया गया था।

दूसरी ओर, न्यायालय ने सर्वप्रथम इस प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया कि जब ईपीएफ कानून के तहत वैधानिक अपील का प्रावधान उपलब्ध है, तो क्या उसे इस रिट याचिका पर विचार करना चाहिए।

न्यायालय ने उल्लेख किया कि विवादित आदेश कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 की धारा 7(I) के तहत अपील योग्य है। यह उपबंध, क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त द्वारा पारित आदेश जैसे आदेशों के विरुद्ध उपयुक्त अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष विशिष्ट अपीलीय उपाय प्रदान करता है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कंपनी को अपील दायर करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, शो कॉज नोटिस से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राधिकारी का मन पहले से ही बंद था, क्योंकि उसने याचिकाकर्ता को सुने बिना ही हर्जाना लगाने और वसूली करने का निश्चय कर लिया था। इसी आधार पर, अधिवक्ता ने वैधानिक अपील के उपाय को दरकिनार कर सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के रिट अधिकारिता का आह्वान करने का प्रयास किया।

इस दलील की जांच के लिए, न्यायालय ने ईपीएफ प्राधिकारी द्वारा जारी शो कॉज नोटिस के शब्दों को सावधानीपूर्वक परखा। नोटिस के एक विशिष्ट अंश को निर्णय में उद्धृत किया गया:

“You are entitled for an opportunity of being heard before the damages are levied. You may, therefore, avail this opportunity before the damages are levied in such case may appear either in person or through——“

इस अंश से न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि प्राधिकारी ने स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता को सूचित किया था कि हर्जाना लगाए जाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। नोटिस की भाषा से यह परिलक्षित होता है कि हर्जाना लगाने का निर्णय पूर्वनिश्चित नहीं था और सुनवाई केवल औपचारिकता मात्र नहीं थी।

इसके आधार पर, न्यायालय ने माना कि शो कॉज नोटिस की सामग्री याचिकाकर्ता के इस आरोप का समर्थन नहीं करती कि उसके सुनवाई के अधिकार को छीना गया या ईपीएफ प्राधिकारी ने पूर्वनिर्णय कर रखा था। अतः प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, विशेषतः ऑडी ऑल्टरम पार्टम के उल्लंघन के दावे को इस चरण पर स्वीकार नहीं किया गया।

जब यह तर्क अस्वीकृत हो गया, तब न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह रह गया कि जब एक प्रभावी वैधानिक अपील उपलब्ध है, तब भी क्या उसे अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करना चाहिए।

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय राज्य जम्मू एवं कश्मीर बनाम आर. के. ज़ल्पुरी एवं अन्य, AIR 2016 Supreme Court 3006, का हवाला दिया। उस निर्णय के पैरा 20 को उद्धृत किया गया, जिसमें आगे चलकर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णय City and Industrial Development Corporation बनाम Dosu Aardeshir Bhiwandiwala एवं अन्य का उल्लेख था।

उस अंश में, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226 के तहत अधिकारिता के प्रयोग के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए थे, जिनमें यह देखा जाना शामिल है कि क्या:

  • रिट याचिका में जटिल और विवादित तथ्यात्मक प्रश्न शामिल हैं;
  • सभी महत्वपूर्ण तथ्य प्रकट किए गए हैं;
  • याचिकाकर्ता के पास विवाद के समाधान के लिए कोई वैकल्पिक या प्रभावी उपाय उपलब्ध है;
  • अनावश्यक विलंब और लापरवाही (laches) है;
  • दावा प्रथमदृष्टया सीमा से स्पष्ट रूप से बंधित है; एवं
  • राहत प्रदान करना लोक नीति के प्रतिकूल होगा या किसी वैध विधि द्वारा निषिद्ध है।

पटना उच्च न्यायालय ने यह नोट किया कि आर. के. ज़ल्पुरी से निकला एक स्पष्ट सिद्धांत यह है कि जब किसी आहत व्यक्ति के पास वैधानिक अपील का उपाय उपलब्ध हो, तो उसे अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जाने से पहले उस उपाय का उपभोग करना चाहिए।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता को सीधे रिट याचिका दायर करने के बजाय ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 की धारा 7(I) के तहत वैधानिक अपीलीय उपाय अपनाना चाहिए था। कंपनी द्वारा उठाए गए मुद्दे — जैसे कि आदेश गैर-विस्तृत है या नहीं, हर्जाना यांत्रिक रूप से लगाया गया या नहीं, अथवा कार्यवाही सीमा से बंधित थी या नहीं — इन सबका समुचित परीक्षण अपीलीय प्राधिकारी द्वारा किया जा सकता था।

अतः न्यायालय ने पाया कि अपीलीय तंत्र को दरकिनार करने का कोई औचित्य नहीं है। उसने रिट याचिका को “पूर्वकालीन” (pre-mature) बताया, क्योंकि याचिकाकर्ता ने अभी तक सामान्य वैधानिक अपील की प्रक्रिया का अनुसरण ही नहीं किया था।

इसी आधार पर, याचिकाकर्ता की क्षतिपूर्ति, ब्याज, सीमा अथवा प्राकृतिक न्याय से संबंधित दलीलों के गुण-दोषों पर विस्तार से निर्णय किए बिना ही, न्यायालय ने अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करने से इनकार कर दिया।

रिट याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि एक प्रभावी वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है। तथापि, न्यायालय ने स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता सुरक्षित रखी कि वह ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 की धारा 7(I) के तहत उपयुक्त मंच के समक्ष वैधानिक उपाय का आह्वान कर सकता है।

इस प्रकार, तात्कालिक परिणाम यह है कि हर्जाना और ब्याज से संबंधित विवादित आदेश तब तक प्रभावी रहेंगे, जब तक कि सक्षम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा उन्हें निरस्त या संशोधित नहीं किया जाता।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय ईपीएफ कानून के अधीन आने वाले नियोक्ताओं और प्रतिष्ठानों, विशेष रूप से बिहार में स्थित, के लिए महत्वपूर्ण है।

पहला, यह पुनः रेखांकित करता है कि जब ईपीएफ प्राधिकारी धारा 14B के तहत हर्जाना या धारा 7Q के तहत ब्याज लगाने के आदेश पारित करते हैं और अधिनियम द्वारा अपील का प्रावधान किया गया है, तो सामान्य मार्ग यही है कि ऐसे आदेशों को पहले अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष चुनौती दी जाए, न कि सीधे रिट अधिकारिता में।

दूसरा, “गैर-विस्तृत आदेश”, “यांत्रिक आदेश” या “प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन” जैसे आरोप भी हमेशा उच्च न्यायालय को वैधानिक अपील को दरकिनार कर सीधे दखल देने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। न्यायालय नोटिस और आदेश की वास्तविक भाषा पर दृष्टि डालकर यह देखेगा कि क्या वास्तव में सुनवाई का अधिकार छीना गया था।

तीसरा, कर्मचारी और नियोक्ता दोनों यह समझ सकते हैं कि पटना उच्च न्यायालय अपेक्षा करता है कि पक्षकार पहले ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम के तहत उपलब्ध उपायों का उपयोग करें। केवल अपवादस्वरूप परिस्थितियों में, जहाँ अधिकारिता का स्पष्ट अभाव, प्राकृतिक न्याय का घोर उल्लंघन, या अन्य गंभीर विधिक त्रुटियाँ हों, न्यायालय प्रत्यक्ष हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है।

व्यावहारिक रूप से, इसका अर्थ है कि किसी भी प्रतिष्ठान को, जिस पर ईपीएफ हर्जाना या ब्याज लगाया गया हो, धारा 7(I) के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर अपील दायर करने और वहाँ सभी तथ्यात्मक एवं विधिक प्रतिरक्षाएँ प्रस्तुत करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या कोई कंपनी धारा 7(I) ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 के तहत वैधानिक अपील दाखिल किए बिना सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ईपीएफ हर्जाना एवं ब्याज आदेश को चुनौती दे सकती है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जब प्रभावी वैधानिक अपील का उपाय उपलब्ध है, तो कंपनी को पहले अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जाना होगा। रिट याचिका को पूर्वकालीन मानकर खारिज कर दिया गया।
  • प्रश्न: क्या ईपीएफ प्राधिकारी द्वारा जारी शो कॉज नोटिस से ही यह स्पष्ट हो जाता था कि हर्जाना लगाने का निर्णय पहले ही ले लिया गया था, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन होता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने नोटिस के प्रासंगिक भाग को उद्धृत करने के बाद पाया कि उसमें स्पष्ट रूप से हर्जाना लगाने से पूर्व सुनवाई का अवसर देने की बात कही गई थी। अतः इस चरण पर ऑडी ऑल्टरम पार्टम के उल्लंघन की दलील अस्वीकार कर दी गई।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • State of Jammu and Kashmir v. R.K. Zalpuri and others, AIR 2016 Supreme Court 3006 (विशेष रूप से पैरा 20, जिसमें City and Industrial Development Corporation v. Dosu Aardeshir Bhiwandiwala and Others का उल्लेख है, जो अनुच्छेद 226 की अधिकारिता की सीमाओं पर है)।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 13337 of 2022

मामले का शीर्षक: Mehrotra Engineering Works Private Limited v. The Employees Provident Fund Organisation & Ors.

उल्लेख (Citation): 2023 (1) PLJR 789

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice P. B. Bajanthri

निर्णय की तिथि: 11-01-2023

याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Ashish Giri, Advocate; Mr. Rajan Prakash, Advocate; Mr. Sumit Kr. Jha, Advocate; Ms. Riya Giri, Advocate

प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Rajiv Kr. Verma, Senior Advocate; Mr. Madhav Krishna, Advocate

न्यायालय में उपस्थित प्रतिवादी प्राधिकारी: Mr. Manish Mani, Regional Provident Fund Commissioner-II, Muzaffarpur (pursuant to earlier order)

मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका, जिसमें धारा 14B के अंतर्गत ईपीएफ हर्जाना और धारा 7Q के अंतर्गत ब्याज को चुनौती दी गई; धारा 7(I) ईपीएफ एवं एमपी अधिनियम, 1952 के तहत वैधानिक अपीलीय उपाय का उपभोग न किए जाने के कारण, अपील करने की स्वतंत्रता के साथ खारिज।

Link to judgement ; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTMzMzcjMjAyMiMxI04=-1jJIjGSpCzE=

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