मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 24.08.2011 को लगभग 3:30 बजे दोपहर में जिला गया, थाना बोधगया के अंतर्गत ग्राम जांपुर में विद्युत विभाग द्वारा की गई छापेमारी से उत्पन्न हुआ। विद्युत बोर्ड द्वारा आदेश संख्या XII, Misc. No. 109/87-682 के तहत एक छापेमार दल का गठन किया गया था।
दल में कार्यपालक अभियंता (सूचक), अन्य विभागीय कर्मी, तत्कालीक उप कार्यपालक दंडाधिकारी सह प्रखंड कृषि पदाधिकारी, तथा पुलिस व सशस्त्र बल शामिल थे। निरीक्षण के दौरान उन्होंने यह दावा किया कि एक प्लास्टिक निर्माण इकाई को एक LT लाइन से टोका लगाकर अवैध रूप से बिजली लेते हुए पाया गया।
विद्युत विभाग के अनुसार, अभियुक्त का पूर्व विद्युत कनेक्शन उसके गोदाम, गोदाम रोड, बोधगया बाज़ार पर बकाया राशि के भुगतान न करने के कारण पहले ही काटा जा चुका था। आरोप लगाया गया कि उसके बाद उसने ग्राम जांपुर में सीधे LT लाइन से बिजली लेना शुरू कर दिया।
छापेमार दल ने एक जप्ति सूची (प्रदर्श-2) तैयार की, जिसमें एक स्टार्टर, विभिन्न HP क्षमता के चार मोटर, PVC तारें तथा संबंधित सामानों की जप्ति दर्ज की गई। सात व्यक्तियों को छापेमार दल के सदस्य के रूप में दिखाया गया। कथित चोरी के कारण विद्युत विभाग को हुए नुकसान का आकलन FIR में Rs. 43,77,888/- बताया गया।
छापेमारी के समय, परिसर पर अनिल पांडे नामक एक व्यक्ति उपस्थित पाया गया। उसे अभियुक्त का केयरटेकर बताया गया और मौके पर ही पकड़ लिया गया। कार्यपालक अभियंता द्वारा दिए गए लिखित आवेदन पर बोधगया थाना कांड संख्या 158/2011, धारा 135, Electricity Act, 2003 के तहत अनिल पांडे और वर्तमान अपीलार्थी दोनों के विरुद्ध दर्ज किया गया।
जांच के बाद पुलिस ने अनिल पांडे को निर्दोष मानते हुए उसके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल नहीं किया। केवल अपीलार्थी को Electricity Act की धारा 135 के अंतर्गत अभियोजन के लिए भेजा गया। Special Judge, Electricity, Magadh Area, Gaya ने cognizance लिया और 13.02.2013 के आदेश द्वारा अपीलार्थी को तलब कर उस पर आरोपों की व्याख्या की। कोई औपचारिक आरोप (formal charge) तय नहीं किया गया।
विचारण के दौरान अभियोजन ने आठ गवाहों की परीक्षा की, जिनमें से अधिकांश छापेमार दल के सदस्य थे, और लिखित FIR, जप्ति सूची, औपचारिक FIR तथा 12.06.2012 को अपीलार्थी द्वारा दिया गया Rs. 50,000/- का indemnity bond सहित दस्तावेज़ों को सिद्ध किया। अपीलार्थी ने धारा 313 CrPC के तहत अपने बयान में आरोपों से इंकार किया और स्वयं को निर्दोष बताया। उसने कोई प्रतिरक्षा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
ट्रायल कोर्ट ने उसे Electricity Act, 2003 की धारा 135(1) के तहत दोषी ठहराया और तीन वर्ष का कठोर कारावास तथा Rs. 5,000/- जुर्माने की सज़ा दी, जिसके भुगतान न करने पर चार माह के साधारण कारावास का प्रावधान रखा। FIR में आंके गए Rs. 43,77,888/- के नुकसान को आधार मानते हुए, अदालत ने उसका तीन गुना, अर्थात Rs. 1,31,33,664/- को विद्युत विभाग को हुए नुकसान के लिए अतिरिक्त जुर्माने के रूप में लगाया।
इससे आहत होकर अपीलार्थी ने पटना उच्च न्यायालय में Criminal Appeal (SJ) No. 168 of 2014 दायर की। यह अपील माननीय श्री न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह की पीठ द्वारा सुनवाई के उपरांत 21.01.2026 को निस्तारित की गई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने FIR, जप्ति सूची, सभी अभियोजन गवाहों (PW-1 से PW-7) के साक्ष्य और दोनों पक्षों द्वारा रखे गए विधिक तर्कों की सावधानीपूर्वक जांच की। केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या अभियोजन ने विधिसम्मत रूप से यह साबित किया कि जांपुर स्थित परिसर पर हुई बिजली चोरी के लिए अपीलार्थी जिम्मेदार था।
अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता ने इंगित किया कि यह निर्विवाद था कि छापेमारी के समय अपीलार्थी मौके पर मौजूद नहीं था। उसके विरुद्ध मामला मुख्यतः इस बात पर आधारित था कि अनिल पांडे ने कथित रूप से छापेमार दल को क्या बताया, और इस धारणा पर कि वह परिसर अपीलार्थी का है या उसके नियंत्रण में है।
रक्षा पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलार्थी का उस परिसर पर कब्जा, नियंत्रण या स्वामित्व था। छापेमारी के समय कई लोग इकट्ठा हो गए थे, फिर भी आस-पड़ोस के किसी स्वतंत्र गवाह की परीक्षा नहीं की गई। जांच अधिकारी (IO) को विचारण के दौरान गवाह के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे रक्षा के अनुसार गंभीर क्षति हुई, क्योंकि केवल IO ही यह स्पष्ट कर सकता था कि पुलिस ने किस प्रकार अपीलार्थी को उस परिसर से जोड़ा और क्या स्थानीय जांच की गई।
यह भी प्रस्तुत किया गया कि जप्ति सूची में वर्णित जब्त सामानों को कभी ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, फिर भी ट्रायल कोर्ट ने यह प्रतिकूल अनुमान लगाया कि ये सामान बिजली चोरी के लिए उपयोग में लाए गए। आगे, रक्षा ने यह भी इंगित किया कि Electricity Act, 2003 की धारा 126 तथा Bihar Electricity Supply Code, 2007 के Clause 11.2.3 के अंतर्गत अवैध उपयोग से हुए नुकसान के आकलन की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
दूसरी ओर, Additional Public Prosecutor ने तर्क दिया कि FIR और छापेमार दल के गवाहों के साक्ष्य से अपीलार्थी की संलिप्तता स्पष्ट है। उन्होंने इस तथ्य पर बल दिया कि अपीलार्थी ने ट्रायल कोर्ट में एक आवेदन देकर जब्त विद्युत उपकरणों की रिहाई अपने पक्ष में मांगी थी, जिसे 10.04.2012 को स्वीकृत कर लिया गया। राज्य के अनुसार, यह आचरण इस बात की स्वीकारोक्ति है कि उपकरण और परिसर अपीलार्थी के ही थे।
राज्य ने यह भी कहा कि IO की परीक्षा न होना घातक नहीं है क्योंकि कार्यपालक दंडाधिकारी (PW-7) सहित सभी महत्वपूर्ण गवाहों ने अभियोजन के मामले का समर्थन किया।
उच्च न्यायालय ने पहले अपीलार्थी और परिसर के बीच संबंध के प्रश्न पर विचार किया। उसने नोट किया कि छापेमार दल के सभी गवाहों, जिनमें PW-7 भी शामिल हैं, ने स्वीकार किया कि छापेमारी के समय अनिल पांडे मौके पर मौजूद था और उसे अपीलार्थी का केयरटेकर बताया गया। अवैध रूप से बिजली उपयोग की जिम्मेदारी मुख्यतः पांडे द्वारा किए गए कथित खुलासे के आधार पर अपीलार्थी पर डाली गई।
हालाँकि, न्यायालय ने रेखांकित किया कि जांच के दौरान पुलिस ने स्वयं अनिल पांडे को निर्दोष पाया और उसे विचारण के लिए नहीं भेजा। जबकि घटनास्थल पर कई स्वतंत्र व्यक्ति इकट्ठा हो गए थे, फिर भी किसी को तलाशी और जप्ति का गवाह नहीं बनाया गया। यह भी नहीं कहा गया कि उन्होंने सहयोग से इंकार किया।
ऐसी स्थिति में न्यायालय ने माना कि IO की परीक्षा “अत्यंत महत्वपूर्ण” थी, विशेषकर इसलिए क्योंकि अपीलार्थी मौके पर मौजूद नहीं था। केवल IO ही बता सकता था कि परिसर के स्वामित्व या नियंत्रण की जांच हेतु कौन-कौन से कदम उठाए गए, क्या पड़ोसियों से पूछताछ की गई, और किस आधार पर परिसर का कब्जा अपीलार्थी को सौंपा गया। IO की परीक्षा न करके अभियोजन ने अपीलार्थी को इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर IO से जिरह करने के उसके बहुमूल्य अधिकार से वंचित कर दिया। न्यायालय ने पाया कि इससे अपीलार्थी को “गंभीर क्षति” हुई।
न्यायालय ने PW-7, जो कार्यपालक दंडाधिकारी सह प्रखंड कृषि पदाधिकारी थे और छापेमार दल के एक महत्वपूर्ण स्वतंत्र अधिकारी थे, की गवाही का भी बारीकी से परीक्षण किया। मुख्य परीक्षा में PW-7 ने कहा कि परिसर पर मिले अनिल पांडे ने प्रारंभ में स्वामी का नाम बताने से इंकार कर दिया था। लेकिन जिरह में उन्होंने स्वीकार किया कि बाद में पांडे ने अपीलार्थी का नाम बताया। न्यायालय ने इस विरोधाभास पर ध्यान दिया।
PW-7 ने आगे स्वीकार किया कि उन्होंने अपीलार्थी को बिजली चोरी करते नहीं देखा और उसका नाम केवल अनिल पांडे से प्राप्त सूचना के आधार पर लिया। उन्होंने यह भी माना कि मौके पर अपीलार्थी के स्वामित्व या टाइटल को दर्शाने वाला कोई दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया। अन्य अभियोजन गवाहों की गवाही भी इसी प्रकार की थी: परिसर को अपीलार्थी से जोड़ने की उनकी जानकारी केवल अनिल पांडे से प्राप्त सूचना पर आधारित थी, न कि किसी दस्तावेज़, स्थानीय जांच या प्रत्यक्ष अवलोकन पर।
इन्हीं आधारों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन स्वामित्व, कब्जे या नियंत्रण के किसी भी रूप में अपीलार्थी और परिसर के बीच कोई विश्वसनीय कड़ी स्थापित करने में विफल रहा। यह निष्कर्ष पूरे मामले की जड़ पर प्रहार करता है, क्योंकि जब तक यह संबंध साबित न हो, उस स्थल पर हुई बिजली चोरी के लिए आपराधिक दायित्व अपीलार्थी पर नहीं डाला जा सकता।
इसके बाद न्यायालय ने इस तर्क पर विचार किया कि Electricity Act की धारा 135(1)(a) के तहत कोई औपचारिक आरोप तय नहीं किया गया था। यद्यपि न्यायालय ने स्वीकार किया कि यह अपराध अधिकतम तीन वर्ष के कारावास से दंडनीय है, परंतु उसे इस आधार पर अपीलार्थी को विशेष रूप से हुई किसी क्षति का उल्लेख नहीं मिला। उसने माना कि केवल औपचारिक आरोप न तय होने से ही ट्रायल निरस्त नहीं हो जाता, क्योंकि अपीलार्थी को आरोप का स्पष्ट ज्ञान था और उसने उसी के अनुसार अपना बचाव किया।
अगले चरण में न्यायालय ने जब्त वस्तुओं के प्रस्तुत न किए जाने के प्रश्न पर विचार किया। उसने नोट किया कि तारें, मोटर और स्टार्टर जब्त किए जाने की बात कही गई, परंतु इन्हें ट्रायल कोर्ट के समक्ष कभी प्रस्तुत नहीं किया गया। Supreme Court के निर्णय Mahaveer vs. State of Maharashtra and Another (2025 SCC OnLine SC 2180) पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने देखा कि क़ानून के तहत बिजली चोरी की विधिक धारणा स्वतः लागू नहीं हो जाती। इस धारणा को लागू करने के लिए पहले यह साबित होना आवश्यक है कि वास्तव में कृत्रिम या अवैध साधन का उपयोग किया गया।
न्यायालय ने Jitendra and Another vs. State of M.P. ((2004) 10 SCC 562) का भी उल्लेख किया, जिसमें Supreme Court ने माना कि जब किसी मामले का आधार विशेष सामग्रियों की जप्ति हो, तो “सर्वोत्तम साक्ष्य” वही जब्त सामग्री होती है, जिसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर प्रदर्श के रूप में चिह्नित किया जाना चाहिए। केवल मौखिक साक्ष्य या पंचनामा गंभीर अपराधों में पर्याप्त नहीं होते।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने ठहराया कि ऐसे बिजली चोरी के मामले में, जहाँ अभियुक्त को मौके पर नहीं पकड़ा गया और वह परिसर से किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार करता है, वहां जब्त विद्युत उपकरणों को बिना किसी स्पष्टीकरण के अदालत के समक्ष प्रस्तुत न करना एक गंभीर त्रुटि है। यह अभियोजन के विरुद्ध जाता है और कथित जप्ति पर भरोसा करना असुरक्षित बनाता है।
इसके बाद न्यायालय ने अभियोजन द्वारा अपीलार्थी के उस आवेदन पर निर्भर करने की समीक्षा की, जिसमें उसने जब्त सामानों की रिहाई मांगी थी। न्यायालय ने स्वीकार किया कि ऐसा आवेदन दायर किया गया था और स्वीकृत भी हुआ, लेकिन यह रेखांकित किया कि परिसर से अपीलार्थी के संबंध को साबित करने का अभियोजन का मूल दायित्व इससे स्थानांतरित नहीं हो सकता। महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस आवेदन को विचारण के दौरान प्रदर्श के रूप में चिन्हित नहीं किया गया, न ही अपीलार्थी का सामना इससे कराते हुए उससे परिस्थितियों की व्याख्या मांगी गई। इसलिए न्यायालय ने इस आवेदन को ऐसा स्वीकारोक्ति पत्र मानने से इंकार कर दिया, जिसके आधार पर आपराधिक दायित्व डाला जा सके।
अंत में न्यायालय ने Rs. 43,77,888/- के कथित नुकसान की गणना के तरीके पर विचार किया। उसने पाया कि न तो FIR में और न ही जप्ति सूची में यह दर्शाया गया कि इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया गया। Electricity Act की धारा 126 का संदर्भ लेते हुए न्यायालय ने रेखांकित किया कि जब अवैध उपयोग पाया जाता है तो Assessing Officer को एक अस्थायी आकलन करना होता है, उसे संबंधित व्यक्ति या परिसर के प्रभारी को देना होता है और आपत्ति दाखिल करने का अवसर देना होता है।
वर्तमान मामले में धारा 126 या Bihar Electricity Supply Code, 2007 के Clause 11.2.3 के अनुपालन का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने केवल FIR में उल्लेखित राशि के आधार पर उसके तीन गुने, अर्थात Rs. 1,31,33,664/- का जुर्माना लगा दिया। उच्च न्यायालय ने माना कि यह दृष्टिकोण विधि-सम्मत नहीं है। किसी अभियुक्त पर इतना भारी वित्तीय बोझ डालने से पहले अदालत को संतुष्ट होना चाहिए कि आकलन पूरी तरह क़ानून के अनुसार किया गया है, जो यहां नहीं हुआ।
इन सभी पहलुओं को एक साथ देखते हुए न्यायालय ने माना कि अभियोजन “दुर्दशापूर्ण रूप से विफल” रहा है यह साबित करने में कि अपीलार्थी का उस परिसर से कोई संबंध था या वह वहां प्लास्टिक इकाई को चोरी की बिजली से चला रहा था। मामले की नींव को न्यायालय ने “कमज़ोर और अविश्वसनीय” बताया। परिणामस्वरूप, दोषसिद्धि का निर्णय और सज़ा का आदेश रद्द कर दिए गए और अपील स्वीकार कर ली गई।
चूंकि अपीलार्थी पहले से ही जमानत पर था, न्यायालय ने उसे और उसके जमानतदारों को जमानत बंधपत्रों से मुक्त कर दिया और निर्णय की प्रति आवश्यक अनुपालन के लिए ट्रायल कोर्ट को भेजने का निर्देश दिया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिन पर बिजली चोरी के आरोप लगते हैं, विशेषकर व्यवसायी और छोटे औद्योगिक इकाइयों के संचालक।
पहला, यह दिखाता है कि विद्युत विभाग और पुलिस केवल ऐसे कथनों पर निर्भर होकर आपराधिक दायित्व नहीं ठोक सकते कि “केयरटेकर ने कहा कि यह फलां का है”। उन्हें दस्तावेज़ों, स्थानीय जांच या विश्वसनीय गवाहों के माध्यम से यह विधिवत साबित करना होगा कि परिसर का स्वामित्व या नियंत्रण किसके पास है।
दूसरा, जब मामला तार, मोटर आदि जैसे उपकरणों की जप्ति पर आधारित हो, तो उन सामानों को अदालत में प्रस्तुत करना आवश्यक है। केवल मौखिक कथन या जप्ति सूची पर्याप्त नहीं है, खासकर जब अभियुक्त को मौके पर नहीं पकड़ा गया हो।
तीसरा, भारी नुकसान का दावा करने और भारी जुर्माना मांगने से पहले अधिकारियों को Electricity Act की धारा 126 और Bihar Electricity Supply Code की प्रक्रिया का पालन करना होगा। विधिवत आकलन, नोटिस और आपत्ति दर्ज करने का अवसर देना अनिवार्य है।
साधारण नागरिकों के लिए यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि बिजली चोरी जैसे मामलों में भी निष्पक्ष सुनवाई, उचित साक्ष्य और विधिसम्मत प्रक्रिया के बुनियादी नियमों का पालन अनिवार्य है। यदि अभियोजन इन बिंदुओं पर असफल रहता है, तो दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अभियोजन यह साबित कर सका कि अपीलार्थी जांपुर स्थित उस परिसर का स्वामी, कब्जेदार या नियंत्रक था जहाँ कथित रूप से बिजली चोरी हुई?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अपीलार्थी को परिसर से जोड़ने वाला कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था; मामला मुख्यतः अनिल पांडे के खुलासे पर आधारित था, जिसे बाद में निर्दोष पाया गया, और कोई स्वतंत्र गवाह या दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया। - प्रश्न: क्या जब्त उपकरणों को प्रस्तुत किए बिना और जांच अधिकारी की परीक्षा किए बिना न्यायालय बिजली चोरी की धारणा सुरक्षित रूप से लागू कर सकता था और दोषसिद्धि बरकरार रख सकता था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जब्त सामानों की अनुपस्थिति और IO की परीक्षा न होने से अपीलार्थी को गंभीर क्षति हुई और क़ानूनी धारणा लागू करना संभव नहीं रहा, जिससे दोषसिद्धि अस्थिर हो गई। - प्रश्न: क्या Rs. 43,77,888/- के कथित नुकसान के आधार पर लगाया गया भारी जुर्माना Electricity Act की धारा 126 और Bihar Electricity Supply Code के अनुपालन के बिना वैध था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि धारा 126 और Clause 11.2.3 के अनुसार विधिसम्मत नुकसान-आकलन का कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए Rs. 1,31,33,664/- का जुर्माना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सका।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Mahaveer vs. State of Maharashtra and Another, 2025 SCC OnLine SC 2180
- Jitendra and Another vs. State of M.P., (2004) 10 SCC 562
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (SJ) No. 168 of 2014; arising out of Bodh Gaya P.S. Case No. 158 of 2011; Trial No. 208/13/189/14; G.R. No. (E) 49 of 2011
मामले का शीर्षक: Md. Maksood Alam vs. State of Bihar
Citation: 2024(2) PLJR 541
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Shailendra Singh
निर्णय की तिथि: 21.01.2026
अधिवक्ता:
- अपीलार्थी की ओर से: Mr. Sumeet Kumar Singh, Advocate; Mrs. Deepali Singh, Advocate; Mr. Anmol Kumar, Advocate; Mr. Kumar Vikram, Advocate; Mr. Amarendra Kumar, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. Anand Mohan Prasad Mehta, Additional Public Prosecutor
मामले का स्वरूप: Electricity Act, 2003 की धारा 135(1) के तहत Special Judge, Electricity, Magadh Area, Gaya द्वारा पारित दोषसिद्धि और सज़ा के विरुद्ध आपराधिक अपील।
अंतिम परिणाम: दोषसिद्धि और सज़ा निरस्त; अपील स्वीकार; अपीलार्थी और जमानतदार जमानत बंधपत्रों से मुक्त।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment
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