मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता भारतीय रेल के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्होंने भारतीय अभियांत्रिकी सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भारतीय रेलवे सेवा (मैकेनिकल इंजीनियर) में प्रवेश किया और 13.06.2005 को पूर्व मध्य रेलवे में पदस्थापित हुए।
याचिकाकर्ता के अनुसार, रेलवे में कार्य करते हुए उन्होंने पाया कि एक ठेकेदार, श्री आनंद राज, के पक्ष में एक त्रुटिपूर्ण अनुबंध के कारण वाहन अनुबंध के अंतर्गत लगभग 16 लाख रुपये की अतिरिक्त भुगतान हो गया था। उनका कहना है कि उन्होंने वसूली की कार्यवाही शुरू की और विधिवत प्रक्रिया के बाद अंततः लगभग 34 लाख रुपये ठेकेदार से वसूल किए गए।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस वसूली से खिन्न होकर ठेकेदार ने सीबीआई की मिलीभगत से 15.05.2007 को उनके विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया। यह मामला एक सीबीआई इंस्पेक्टर को सौंपा गया, जिसने सत्यापन रिपोर्ट दी। इसके आधार पर एफआईआर दर्ज हुई तथा याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया। बाद में उन्होंने पटना उच्च न्यायालय से क्रि. मिस्क. सं. 27616/2007 में जमानत प्राप्त की।
30.07.2008 को सीबीआई ने सीबीआई न्यायालय के समक्ष आरोपपत्र दाखिल किया। 09.08.2008 के आदेश द्वारा उस न्यायालय ने पूर्व-जाल और पश्चात्-जाल मेमोरेंडम के अभाव में संज्ञान लेने से इंकार कर दिया। हालांकि, 11.09.2008 को सीबीआई द्वारा ऐसे मेमोरेंडम उपलब्ध कराने के बाद सीबीआई न्यायालय ने संज्ञान ले लिया। याचिकाकर्ता का दावा है कि ये दस्तावेज गढ़े गए थे।
उन्होंने संज्ञान लेने के आदेश को क्रि. मिस्क. सं. 8861/2009 में चुनौती दी, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि वे ट्रायल कोर्ट के समक्ष डिस्चार्ज के लिए आवेदन दे सकते हैं। उनका डिस्चार्ज आवेदन 20.02.2013 को अस्वीकृत कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने क्रि. मिस्क. सं. 14016/2013 दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग की। उस कार्यवाही में, 23.06.2016 के आदेश द्वारा पटना उच्च न्यायालय ने आर.सी. सं. 12(A)/2007 से उत्पन्न सीबीआई विशेष वाद सं. 08/2007 की आगे की कार्यवाही पर स्थगन लगा दिया और मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया।
इस बीच, 19.12.2008 को प्रत्युत्तरदाता सं. 2 (महाप्रबंधक, पूर्व मध्य रेलवे) ने उसी आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ता के विरुद्ध एक प्रमुख दंड आरोपपत्र जारी किया। याचिकाकर्ता ने बार-बार कुछ दस्तावेजों, विशेषकर सीबीआई सत्यापन रिपोर्ट और रिश्वत की कथित मांग व स्वीकारोक्ति में प्रयुक्त मोबाइल/फोन नंबरों की आपूर्ति की मांग की। उन्होंने 06.08.2009, 29.10.2009 और 25.01.2010 को अभ्यावेदन भेजे, परंतु ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
वर्षों के दौरान कई जांच अधिकारियों की नियुक्ति और तब्दीली होती रही। पहले जांच अधिकारी की नियुक्ति 15.05.2010 को हुई। इसके बाद 2011 से 2017 के बीच कम से कम पांच और जांच अधिकारियों को बदला गया। कुछ ने दो-एक सुनवाई या प्रारंभिक जांच की, जबकि अन्य को किसी प्रभावी जांच से पूर्व ही बदल दिया गया।
जांच अधिकारियों के बदलते रहने के बावजूद मांगे गए सीबीआई से संबंधित दस्तावेज याचिकाकर्ता को नहीं दिए गए। 07.12.2017 को तत्कालीन जांच अधिकारी ने प्रारंभिक जांच की। याचिकाकर्ता ने पुनः प्रत्युत्तरदाता सं. 2 और 3 से वही दस्तावेज मांगे, परंतु उन्हें उपलब्ध कराने के बजाय अगली जांच तिथि 10.01.2018 निर्धारित कर दी गई।
अपने आपको प्रताड़ित महसूस करते हुए याचिकाकर्ता ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, पटना पीठ, के समक्ष ओ.ए. सं. 050/77/2018 दायर की। उनका मुख्य तर्क था कि चूंकि उच्च न्यायालय पहले ही क्रि. मिस्क. सं. 14016/2013 में आपराधिक कार्यवाही पर स्थगन लगा चुका है, इसलिए उन्हीं आरोपों पर आधारित विभागीय जांच भी स्थगित की जानी चाहिए।
18.01.2018 को अधिकरण ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय द्वारा आपराधिक मामले पर लगाए गए स्थगन के आलोक में विभागीय कार्यवाही पर रोक लगाने हेतु अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन दे। याचिकाकर्ता ने 25.01.2018 को विस्तृत अभ्यावेदन दाखिल किया। 15.02.2018 को अधिकरण ने रेलवे के अधिवक्ता को उस अभ्यावेदन पर निर्देश प्राप्त करने को कहा।
27.03.2018 को, याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर कार्रवाई करते हुए अनुशासनात्मक प्राधिकारी (प्रत्युत्तरदाता सं. 2) ने आपराधिक मामले के निपटारे तक विभागीय जांच पर रोक का आदेश पारित किया। इस आदेश के आधार पर याचिकाकर्ता ने ओ.ए. सं. 050/77/2018 वापस ले ली।
एक वर्ष से अधिक समय बाद, 16.05.2019 को अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने एक और आदेश जारी कर जांच अधिकारी को विभागीय जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया, जिससे पूर्ववर्ती स्थगन स्वतः समाप्त हो गया।
याचिकाकर्ता ने इस नए आदेश को चुनौती देते हुए पुनः अधिकरण के समक्ष ओ.ए. सं. 00595/2019 दायर की, जिसमें 07.06.2019 को अंतरिम स्थगन दिया गया। किंतु 16.02.2021 के अंतिम आदेश द्वारा अधिकरण ने उनकी याचिका खारिज कर दी और विभागीय जांच जारी रखने की अनुमति दी। यही अधिकरण का आदेश और 16.05.2019 का आधारभूत आदेश, पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट अधिकारिता वाद सं. 9204/2021 में चुनौती दिए गए।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न संकीर्ण किंतु महत्वपूर्ण था: क्या अनुशासनात्मक प्राधिकारी, जिसने 27.03.2018 को एक बार विभागीय जांच पर रोक लगा दी थी, सेवा नियमों में स्पष्ट पुनरीक्षण या पुनर्विचार की शक्ति के अभाव में, 16.05.2019 के आदेश द्वारा बाद में उसे पुनः शुरू कर सकता है?
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अनुशासनात्मक मामलों में अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है। एक बार जब वह कोई आदेश पारित कर देता है तो वह उस मामले में functus officio हो जाता है, अर्थात उसकी उस विषय में अधिकारिता समाप्त हो जाती है। वह किसी विशिष्ट वैधानिक प्रावधान के अभाव में अपने ही पूर्व आदेश को वापस नहीं ले सकता, न उसमें परिवर्तन कर सकता और न ही उसकी समीक्षा कर सकता है।
इसे समर्थन देने के लिए याचिकाकर्ता ने तीन निर्णयों पर भरोसा किया:
पहला, पटना उच्च न्यायालय का निर्णय यूनियन ऑफ इंडिया बनाम श्रीमती पुष्पा रानी, 2017 (4) पी.एल.जे.आर. 739, जिसमें यह माना गया कि यदि दंड पहले से ही किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा निर्धारित या अनुशंसित कर दिया गया है, तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी के स्वतंत्र रूप से मस्तिष्क लगाने का कोई अवसर नहीं रहता।
दूसरा, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एस.बी.आई. बनाम एस.एन. गोयल, (2008) 2 एस.सी.सी. (एल एंड एस) 678, जिसमें यह चर्चा की गई है कि कोई प्राधिकारी अर्ध-न्यायिक आदेश पारित करने के बाद कब functus officio हो जाता है।
तीसरा, पटना उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ का निर्णय नंद कुमार ठाकुर बनाम बिहार राज्य, 2014 (4) पी.एल.जे.आर. 210 (एफ.बी.), जिसमें यह ठहराया गया कि किसी न्यायालय, अधिकरण या अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के पास अपने ही आदेश की समीक्षा की अंतर्निहित शक्ति नहीं होती। समीक्षा या पुनरीक्षण की शक्ति केवल तभी प्रयोग की जा सकती है जब कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान हो, सिवाय आकस्मिक, टंकण या लिपिकीय त्रुटियों के संशोधन के।
तथ्यों के स्तर पर याचिकाकर्ता ने जोर दिया कि विभागीय कार्यवाही पर स्थगन अधिकरण के न्यायिक आदेशों के अनुपालन में दिया गया था तथा बाद में जांच पुनः शुरू करने का आदेश केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की सलाह पर आधारित था, न कि किसी स्वतंत्र न्यायिक मस्तिष्क के प्रयोग पर। उन्होंने लंबे विलंब, जांच अधिकारियों के बार-बार परिवर्तन तथा बचाव के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आपूर्ति न होने की भी शिकायत की और दलील दी कि इससे उनकी पदोन्नतियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
दूसरी ओर, रेलवे का पक्ष था कि रिश्वत का आरोप गंभीर है और विभागीय जांच को बिना और विलंब के निष्पादित किया जाना अत्यंत आवश्यक है। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता बार-बार स्थगन मांगकर जांच रोकने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि विभागीय और आपराधिक कार्यवाही को एक साथ चलाए जाने पर कोई पूर्ण कानूनी प्रतिबंध नहीं है।
प्रत्युत्तरदाताओं ने इंगित किया कि रेलवे सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1968 के नियम 25 और नियम 25A के तहत पुनरीक्षण या समीक्षा की शक्तियां केवल तभी उपलब्ध होती हैं जब अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा लगाए गए दंड के संबंध में अंतिम आदेश पारित हो चुका हो और उसे अपीलीय प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित कर दिया गया हो। ये प्रावधान यहाँ लागू नहीं होते, क्योंकि कोई अंतिम आदेश पारित ही नहीं हुआ था; केवल जांच प्रक्रिया का प्रबंधन किया जा रहा था।
उन्होंने तर्क दिया कि 27.03.2018 (स्थगन प्रदान करने वाला) और 16.05.2019 (जांच पुनः शुरू करने वाला) दोनों आदेश, जांच के संचालन को विनियमित करने वाले अर्धवर्ती प्रशासनिक आदेश थे, न कि अर्ध-न्यायिक निर्णय। ऐसे अंतरिम, प्रशासनिक निर्णयों से प्राधिकारी functus officio नहीं हो जाता।
प्रत्युत्तरदाताओं ने यह भी कहा कि अधिकरण ने 16.02.2021 के अपने आदेश के पैरा 14 में सही रूप से यह माना कि ये आदेश प्रशासनिक प्रकृति के थे। दोनों आदेशों का संप्रेषण उपमुख्य कार्मिक अधिकारी (राजपत्रित), महाप्रबंधक (कार्मिक) कार्यालय, पूर्व मध्य रेलवे, के माध्यम से उस प्रारूप में हुआ जो सामान्यतः प्रशासनिक पत्राचार में प्रयुक्त होता है।
विभागीय और आपराधिक कार्यवाहियों को साथ-साथ चलाने के समर्थन में रेलवे ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों—राजस्थान राज्य बनाम बी.के. मीणा, (1996) 6 एस.सी.सी. 417; स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम नीलम नाग, (2016) 9 एस.सी.सी. 491; तथा स्टैंजेन टोयोटेट्सु इंडिया (प्रा.) लिमिटेड बनाम गिरीश, (2014) 1 एस.सी.सी. (एल एंड एस) 641—का हवाला दिया।
उच्च न्यायालय ने पहले यह जांचा कि याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत निर्णय यहाँ लागू होते हैं या नहीं। उसने माना कि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पुष्पा रानी इसीलिए लागू नहीं होता क्योंकि CVC ने 31.07.2018 के परिपत्र सं. 814/2018 द्वारा यह दिशा-निर्देश जारी किए थे कि विभागीय और आपराधिक कार्यवाहियां साथ-साथ चलाई जा सकती हैं। यह परिपत्र सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के दिशा-निर्देशों पर आधारित था। इसी के आधार पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने स्थगन हटाया, जो पुष्पा रानी के मामले से भिन्न परिस्थिति थी।
इसी प्रकार, एस.बी.आई. बनाम एस.एन. गोयल को भी अनुपयुक्त माना गया, क्योंकि याचिकाकर्ता के मामले में अभी तक अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने विभागीय जांच में कोई अंतिम आदेश पारित ही नहीं किया था। 27.03.2018 और 16.05.2019 के आदेशों को प्रशासनिक, न कि अर्ध-न्यायिक, बताया गया।
नंद कुमार ठाकुर के मामले में पूर्ण पीठ के निर्णय को भी इसी आधार पर अलग रखा गया: अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अभी दोषसिद्धि या दंड के संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया था; उसने केवल जांच पर रोक लगाने और फिर उसे पुनः शुरू करने संबंधी एक अंतरिम आदेश पारित किया था।
इसके बाद न्यायालय ने विभागीय एवं आपराधिक कार्यवाहियों के समानांतर संचालन पर क़ानून की स्थिति पर चर्चा की। उसने ए.पी. एस.आर.टी.सी. बनाम मोहम्मद यूसुफ़ मियाँ, (1997) 2 एस.सी.सी. 699, से विस्तार से उद्धृत किया, जिसमें कहा गया कि विभागीय जांच और आपराधिक अभियोजन का उद्देश्य अलग-अलग है। आपराधिक कानून समाज की रक्षा के लिए अपराधों को दंडित करता है; जबकि विभागीय कार्यवाही सेवा में अनुशासन और कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए होती है। दोनों में प्रमाण का मानदंड और साक्ष्य के नियम भी भिन्न होते हैं।
कर्नाटक एस.आर.टी.सी. बनाम एम.जी. विट्टल राव, (2012) 1 एस.सी.सी. 442, पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने चार मुख्य सिद्धांत दोहराए: समानांतर कार्यवाहियों पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है; विभागीय जांच पर स्थगन केवल उन्हीं जटिल मामलों में उचित है जहाँ कर्मचारी की आपराधिक बचाव में वास्तविक क्षति की आशंका हो; ऐसे स्थगन का उपयोग जांच को अनावश्यक रूप से विलंबित करने के लिए नहीं होना चाहिए; और सामान्यतः, विभागीय कार्यवाही आपराधिक मुकदमे की लंबित अवस्था में भी जारी रह सकती है, सिवाय उन विरल मामलों के जहाँ तथ्य व साक्ष्य बिल्कुल समान एवं अत्यंत जटिल हों।
न्यायालय ने कैप्टन एम. पॉल एंथोनी बनाम भारत गोल्ड माइंस लिमिटेड, (1999) 3 एस.सी.सी. 679, का भी हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि विभागीय और आपराधिक दोनों कार्यवाहियां साथ-साथ चल सकती हैं, और यदि किसी लंबित आपराधिक मामले के कारण विभागीय कार्यवाही को पहले स्थगित कर दिया गया था, तो आपराधिक मुकदमा आगे नहीं बढ़ने या अनावश्यक रूप से लंबा खिंचने की स्थिति में विभागीय जांच पुनः शुरू की जा सकती है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए उच्च न्यायालय ने यह नोट किया कि वर्तमान मामले में आपराधिक मुकदमे पर 23.06.2016 से स्थगन लगा हुआ था और इसलिए वह आगे नहीं बढ़ रहा था। ऐसी स्थिति में, जैसा कि पहले ही एम. पॉल एंथोनी में मान्यता दी जा चुकी है, विभागीय जांच को वैध रूप से पुनः शुरू किया जा सकता था।
इसके बाद न्यायालय ने अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के संदर्भ में functus officio की अवधारणा का विश्लेषण किया। उसने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच आरोपपत्र की सेवा से शुरू होती है और दंडादेश, दोषमुक्ति या आरोपों के समापन के अंतिम आदेश तक चलती है। इस पूरे काल में अनुशासनात्मक प्राधिकारी को विभिन्न चरणों पर अनेक निर्णय लेने पड़ते हैं—जैसे जांच अधिकारी या प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति या परिवर्तन करना, या पुनः जांच (de novo enquiry) का आदेश देना।
यदि हर बार ऐसे अंर्तवर्ती निर्णय लेने पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी functus officio माना जाए, तो जांच का प्रबंधन असंभव हो जाएगा। वर्तमान मामले में ही छह जांच अधिकारियों को बदला जा चुका था। ऐसे अंतरिम प्रबंधात्मक निर्णयों को अंतिम अर्ध-न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने माना कि केवल वही अंतिम आदेश, जिसके द्वारा दंड दिया जाए या दोषमुक्ति हो, अनुशासनात्मक प्राधिकारी को functus officio बनाता है। विभागीय कार्यवाही पर रोक लगाने या उसे पुनः शुरू करने के आदेश मात्र प्रशासनिक कदम हैं और ये अर्ध-न्यायिक अधिकार के प्रयोग का गठन नहीं करते।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि विभागीय कार्यवाही पर स्थगन की मांग का एकमात्र वैध आधार यह हो सकता है कि जांच जारी रहने से कर्मचारी की आपराधिक मामले में बचाव को गंभीर क्षति पहुँचेगी, और वह भी सामान्यतः उन्हीं मामलों में जहाँ तथ्य और विधि के प्रश्न अत्यंत जटिल हों। ऐसे आधार का उपयोग विभागीय कार्यवाहियों को अनिश्चितकाल तक टालने के लिए नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह अवलोकन भी किया कि आपराधिक और विभागीय कार्यवाहियां पूरी तरह भिन्न हैं। आपराधिक कानून में अभियोजन पक्ष को दोष सिद्धि संदेह से परे स्तर पर सिद्ध करनी होती है; जबकि विभागीय कार्यवाहियों में सेवा नियमों के तहत संभावना के प्राबल्य (preponderance of probability) के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। आगे यह भी कहा गया कि समान आरोपों पर आपराधिक मुकदमे में बरी हो जाना भी स्वतः किसी दोषी कर्मचारी को विभागीय कार्रवाई से नहीं बचाता।
तथ्यों, दस्तावेजों और विधिक सिद्धांतों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि 16.05.2019 का अनुशासनात्मक प्राधिकारी का आदेश, जिसमें जांच अधिकारी को विभागीय जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था, विधिसम्मत है। फलस्वरूप, अधिकरण के 16.02.2021 के उस आदेश को भी बरकरार रखा गया जिसमें याचिकाकर्ता की मांग नामंजूर की गई थी। रिट याचिका खारिज कर दी गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों, विशेषकर रेलवे कर्मचारियों, के लिए व्यावहारिक महत्व रखता है, जो समान तथ्यों पर विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमों दोनों का सामना कर रहे हों।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि एक बार आपराधिक मामले पर स्थगन या विलंब हो जाने पर कर्मचारी उस स्थगन का सहारा लेकर विभागीय जांच को अनिश्चितकाल तक अवरुद्ध नहीं रख सकते। नियोक्ता अनुशासन बनाए रखने और अधिकारी की सेवा-स्थिति तय करने के लिए जांच पुनः शुरू कर सकता है।
दूसरा, यह समझाता है कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी का हर आदेश अर्ध-न्यायिक आदेश नहीं होता। जांच पर रोक लगाने या उसे पुनः शुरू करने जैसे अंतरिम निर्णयों को प्रशासनिक माना जाता है। इसलिए, परिस्थितियों के बदलने पर ऐसी व्यवस्थाओं में बदलाव करना संभव है, जिसके लिए किसी विशेष समीक्षा शक्ति का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं।
तीसरा, यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के उस स्थापित सिद्धांत को फिर पुष्ट करता है कि विभागीय और आपराधिक कार्यवाहियों के उद्देश्य अलग-अलग हैं, उनमें प्रमाण का मानदंड भिन्न है और वे सामान्यतः साथ-साथ चल सकती हैं। केवल विरल, जटिल मामलों में, और वह भी कर्मचारी के आपराधिक बचाव की वास्तविक सुरक्षा के लिए, विभागीय कार्यवाही पर स्थगन उचित हो सकता है।
कर्मचारियों और यूनियनों के लिए इसका अर्थ यह है कि लंबे समय से लंबित आपराधिक मुकदमे या आपराधिक न्यायालयों द्वारा दिए गए स्थगन आदेश विभागीय मामलों को स्वचालित रूप से स्थिर नहीं कर देते। विभागों के लिए यह निर्णय इस बात की कानूनी पुष्टि है कि वे आपराधिक मुकदमों की अनिश्चित प्रतीक्षा किए बिना जांचों को शीघ्रता से पूरा कर सकते हैं।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या वह अनुशासनात्मक प्राधिकारी, जिसने एक बार विभागीय जांच पर रोक लगा दी हो, किसी विशिष्ट वैधानिक समीक्षा शक्ति के बिना बाद में जांच पुनः शुरू कर सकता है, या पहले आदेश के बाद वह functus officio हो जाता है?
उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने माना कि विभागीय कार्यवाही को स्थगित करने या पुनः शुरू करने वाले आदेश प्रशासनिक और अंतरिम प्रकृति के होते हैं, न कि अंतिम अर्ध-न्यायिक आदेश। ऐसे आदेश पारित करने से अनुशासनात्मक प्राधिकारी functus officio नहीं होता और वह विधिवत रूप से जांच पुनः शुरू कर सकता है। -
प्रश्न: क्या विभागीय जांच को तब तक लंबित रखा जाना अनिवार्य है जब समान आरोपों पर आधारित आपराधिक मामला लंबित हो और उच्च न्यायालय द्वारा स्थगित भी कर दिया गया हो?
उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि समानांतर कार्यवाहियों पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। जहाँ आपराधिक मामला स्थगित या विलंबित हो, वहाँ विभागीय जांच पुनः शुरू कर उसे निष्कर्ष तक पहुँचाया जा सकता है, जब तक कि उसका जारी रहना किसी जटिल आपराधिक मामले में कर्मचारी की रक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित न करता हो। -
प्रश्न: क्या अर्ध-न्यायिक प्राधिकारियों की समीक्षा-शक्ति के अभाव संबंधी जो पूर्वनिर्णय हैं, वे इस मामले में विभागीय कार्यवाही पर स्थगन और पुनः आरंभ जैसे अंतरिम आदेशों पर भी लागू होते हैं?
उत्तर: न्यायालय ने कहा कि वे लागू नहीं होते। वे पूर्वनिर्णय दोषसिद्धि या दंड से संबंधित अंतिम अर्ध-न्यायिक निर्णयों की समीक्षा से जुड़े हैं, जबकि यहाँ केवल जांच के संचालन को विनियमित करने वाले अंतरिम, प्रशासनिक आदेशों की बात थी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रमुख निर्णय
- A.P. State Road Transport Corporation v. Mohd. Yousuf Miya, (1997) 2 SCC 699 : 1997 SCC (L & S) 548
- Karnataka State Road Transport Corporation v. M.G. Vittal Rao, (2012) 1 SCC 442 : (2012) 1 SCC (L & S) 171
- Capt. M. Paul Anthony v. Bharat Gold Mines Ltd., (1999) 3 SCC 679 : 1999 SCC (L & S) 810
- State of Rajasthan v. B.K. Meena and others, (1996) 6 SCC 417
- State Bank of India and others v. Neelam Nag and another, (2016) 9 SCC 491
- Stanzen Toyotetsu India (P) Ltd. v. Girish, (2014) 1 SCC (L & S) 641
- Union of India v. Smt. Pushpa Rani, 2017 (4) PLJR 739
- SBI v. S.N. Goyal, (2008) 2 SCC (L & S) 678
- Nand Kumar Thakur v. State of Bihar and others, 2014 (4) PLJR 210 (FB)
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता वाद सं. 9204/2021
मामले का शीर्षक: उग्रसेन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति विकास जैन एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण
उद्धरण: 2022 (1) पी.एल.जे.आर. 19
निर्णय की तिथि: 02.12.2021
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री एम.पी. दीक्षित, अधिवक्ता; श्री एस.के. दीक्षित, अधिवक्ता; श्री संजय कुमार चौबे, अधिवक्ता; सुश्री स्वस्तिका, अधिवक्ता
- प्रत्युत्तरदाताओं की ओर से: डॉ. आनंद कुमार, अधिवक्ता
मामले की प्रकृति: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश और विभागीय जांच पुनः शुरू करने संबंधी अनुशासनात्मक प्राधिकारी के निर्णय को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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