मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्त्री एक ऐसे सरकारी कर्मचारी की विधवा है, जिसकी सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद उसे स्वास्थ्य विभाग में दयाभाव के आधार पर नियुक्त किया गया।
सिविल सर्जन–सह–चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया द्वारा निर्गत 16.01.2011 के मेमो संख्या 142 के द्वारा उसे चतुर्थवर्गीय पद पर नियुक्त किया गया। वेतनमान 4440-7440 रुपये तथा ग्रेड पे 1300 रुपये निर्धारित किया गया।
यह नियुक्ति 07.12.2010 की बैठक में जिला दयाभाव नियुक्ति समिति की अनुशंसा पर की गई थी। जिला पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया ने 09.12.2010 के मेमो संख्या 743 के माध्यम से उसका मामला अनुशंसित किया। उसने अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, कुष्ठ उन्मूलन इकाई, बेतिया में कार्यभार ग्रहण किया।
याचिकाकर्त्री का कहना है कि नियुक्ति के समय वह इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकी थी। उसके अनुसार, इस योग्यता के बावजूद उसे केवल चतुर्थवर्गीय पद पर नियुक्त किया गया, जबकि उसी जिले में 2011 में इंटरमीडिएट योग्यता वाले अन्य दयाभाव से नियुक्त व्यक्तियों को तृतीयवर्गीय पद दिए गए।
बाद में राज्य सरकार ने समूह “घ” (चतुर्थवर्गीय) के उन कर्मचारियों के लिए, जिनके पास मैट्रिक या उससे उच्चतर योग्यता है, 15% कोटे के अंतर्गत लिपिकीय पदों पर पदोन्नति की नीति लागू की। इसी नीति के आधार पर याचिकाकर्त्री का मामला अनुशंसित हुआ और उसे लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) के पद पर पदोन्नत कर दिया गया।
हालाँकि, 2022 में स्वास्थ्य विभाग ने उसकी पदोन्नति पर आपत्ति उठाई और उसे पुनः चतुर्थवर्गीय पद पर वापस भेज दिया, जिसके विरुद्ध उसने पटना उच्च न्यायालय के सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत यह रिट याचिका दायर की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्त्री की मुख्य शिकायत निदेशक–मुख्य, स्वास्थ्य सेवाएँ, बिहार, पटना द्वारा निर्गत 07.10.2022 के मेमो संख्या 893 के विरुद्ध थी। इस मेमो द्वारा उसे LDC (तृतीयवर्गीय) पद से पदावनत कर चतुर्थवर्गीय पद पर, सिविल सर्जन, बेतिया के अधीन भेज दिया गया।
उसने इसके परिणामस्वरूप निर्गत आदेश, 03.11.2022 के मेमो संख्या 2031, जो सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया द्वारा जारी किया गया था, को भी चुनौती दी। इस मेमो द्वारा उसे लिपिक पद से पदावनत कर चतुर्थवर्गीय कार्यालय परिचारक के पद पर पुनः नियुक्त किया गया और अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सेनुवरिया (मझौलिया) में पदस्थापित किया गया।
याचिकाकर्त्री ने दोनों आदेशों को रद्द करने तथा उसे सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया के अधीन LDC के रूप में 5200-20200 रुपये के वेतनमान तथा 1900 रुपये ग्रेड पे पर कार्य जारी रखने की दिशा–निर्देश की मांग की।
चतुर्थवर्गीय से तृतीयवर्गीय पद पर पदोन्नति संबंधी राज्य नीति
न्यायालय ने याचिकाकर्त्री द्वारा राज्य सरकार के 02.12.2013 के अधिसूचना (परिशिष्ट-3) पर किए गए भरोसे पर ध्यान दिया, जो निदेशक–मुख्य, स्वास्थ्य सेवाएँ, बिहार, पटना द्वारा जारी की गई थी। यह अधिसूचना राज्य कार्यक्रम पदाधिकारियों (कुष्ठ, मलेरिया, फाइलेरिया, क्षय रोग, अंधत्व), चिकित्सा महाविद्यालयों/अस्पतालों के अधीक्षकों/प्राचार्यों तथा बिहार के सभी सिविल सर्जनों को संबोधित थी।
इस अधिसूचना के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग के 23.03.2011 के पत्र के आधार पर, समूह “घ” के मैट्रिक योग्यता वाले कर्मचारियों को, वरिष्ठता एवं रोस्टर के आधार पर, 15% कोटे के अंतर्गत लिपिकीय कोटि में पदोन्नति प्रदान करने का प्रावधान किया गया।
फलस्वरूप, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (कुष्ठ), राज्य कुष्ठ उन्मूलन कार्यालय, बिहार, पटना द्वारा 25.05.2015 के मेमो संख्या 209 जारी किया गया। इस मेमो के द्वारा सभी जिला/प्रभारी जिला कुष्ठ उन्मूलन पदाधिकारियों को राष्ट्रीय कुष्ठ कार्यक्रम के अंतर्गत कार्यरत चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों की मैट्रिक की मूल प्रमाण–पत्रों को अधिरोहित कर, उन्हें लिपिक पद पर पदोन्नति हेतु एकत्र करने का निर्देश दिया गया।
इसके अनुपालन में, अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी–सह–आहर एवं व्ययन पदाधिकारी, कुष्ठ नियंत्रण इकाई, पश्चिम चंपारण, बेतिया ने 12.06.2015 के पत्र संख्या 15 द्वारा राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी (कुष्ठ), बिहार, पटना को पत्र प्रेषित किया। इस पत्र में याचिकाकर्त्री का मामला तृतीयवर्गीय पद पर पदोन्नति हेतु अनुशंसित किया गया तथा उसकी शैक्षणिक योग्यता सहित सभी आवश्यक कागजात संलग्न किए गए।
पदोन्नति और विभागीय परीक्षा
इस अनुशंसा के आधार पर 27.07.2016 के मेमो संख्या 266 निदेशक (अतिरिक्त), स्वास्थ्य सेवाएँ–सह–राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी (कुष्ठ), बिहार, पटना द्वारा निर्गत किया गया। इस मेमो के द्वारा याचिकाकर्त्री को 5200-20200 रुपये के वेतनमान तथा 1900 रुपये ग्रेड पे के साथ LDC के पद पर पदोन्नत किया गया और राज्य कुष्ठ उन्मूलन कार्यालय, बेतिया में पदस्थापित किया गया।
इस पदोन्नति को प्रभावी बनाने हेतु 14.02.2017 के मेमो संख्या 309 सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया, जिसके माध्यम से पदोन्नति तथा पदस्थापन की औपचारिक सूचना दी गई। तत्पश्चात याचिकाकर्त्री ने 26.12.2017 तथा 27.12.2017 को आयोजित विभागीय परीक्षा में भाग लिया और सफल घोषित हुई। परिणाम सूची में उसका नाम क्रम संख्या 7 पर था।
कारण बताओ नोटिस और पदावनयन
इस समस्त पृष्ठभूमि के बावजूद, कई वर्षों बाद निदेशक–मुख्य, स्वास्थ्य सेवाएँ, बिहार, पटना द्वारा 10.03.2022 के पत्र संख्या सं०सं०-11/एल० (सथा०)-05/2018-192 (11) के माध्यम से याचिकाकर्त्री को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि उसकी पदोन्नति रद्द क्यों न कर दी जाए।
नोटिस में यह आधार बताया गया कि उसकी पदोन्नति विभागीय अधिसूचना संख्या 1060(4) दिनांक 01.12.2014 के उल्लंघन में की गई है, जिसके अनुसार जिलों में लिपिकीय कोटि के लिए नियुक्ति प्राधिकारी सिविल सर्जन तथा चिकित्सा महाविद्यालय/अस्पतालों में अधीक्षक होता है। नोटिस में कहा गया कि राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी (कुष्ठ), बिहार, पटना को पदोन्नति देने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
इसके पश्चात 30.03.2022 के पत्र संख्या सं०सं०-11/एल० (सथा०)-05/2018-257(11) के द्वारा पुनः स्मरण–पत्र भेजा गया, जिसमें याचिकाकर्त्री से एक सप्ताह के अंदर अपना प्रतिवेदन देने को कहा गया।
याचिकाकर्त्री ने 26.03.2022 तथा 12.04.2022 दिनांकित विस्तृत प्रतिवेदन दाखिल किए, जिनमें सभी दस्तावेज संलग्न किए गए तथा यह स्पष्ट किया गया कि उसकी पदोन्नति 15% पदोन्नति नीति के तहत हुई थी, न कि दयाभाव के आधार पर और न ही किसी अयोग्य प्राधिकारी द्वारा।
इसके बावजूद, निदेशक–मुख्य (रोग नियंत्रण, जनस्वास्थ्य, पैरामेडिकल) स्वास्थ्य सेवाएँ, बिहार, पटना द्वारा 07.10.2022 के मेमो संख्या 893(11) से उसे पुनः चतुर्थवर्गीय पद पर पदावनत कर दिया गया। इसके आधार पर सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया द्वारा 03.11.2022 के मेमो संख्या 2031 जारी कर पदावनयन लागू किया गया और उसे अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सेनुवरिया, मझौलिया में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के रूप में पदस्थापित किया गया।
न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्त्री की दलीलें
याचिकाकर्त्री ने तर्क दिया कि:
पहला, उसकी पदोन्नति कोई नई दयाभाव आधारित रियायत नहीं थी। वह पहले ही दयाभाव के आधार पर चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के रूप में विधिवत नियुक्त हो चुकी थी। बाद की तृतीयवर्गीय पद पर पदोन्नति राज्य की 15% पदोन्नति नीति के तहत योग्य चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के लिए की गई थी।
दूसरा, उसके पास 2009 से इंटरमीडिएट की योग्यता थी और वह नीति के तहत पदोन्नति हेतु शैक्षणिक योग्यता की शर्तों को पूर्णतः पूरा करती थी। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा जारी एडमिट कार्ड, अंक–पत्र एवं प्रोविजनल प्रमाण–पत्र सहित दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
तीसरा, उसकी पदोन्नति की अनुशंसा के समय सभी संबंधित दस्तावेज सक्षम प्राधिकारी को अग्रसारित किए गए थे। सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया ने राज्य की नीति के आधार पर पदोन्नति आदेश जारी किया था। अतः प्रति–हलफनामे में यह कहना कि पदोन्नति दयाभाव के आधार पर की गई, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
चौथा, विवादित पदावनयन आदेश एक अव्याख्यात्मक (नॉन–स्पीकिंग) आदेश है। उसमें केवल इतना कहा गया है कि याचिकाकर्त्री का कारण बताओ का उत्तर विचार करने के बाद पदोन्नति रद्द करने का निर्णय लिया गया, परंतु कोई कारण नहीं बताया गया। राज्य द्वारा प्रति–हलफनामे में बाद में कारण प्रस्तुत करना विधिसम्मत नहीं है।
इस सिद्धांत के लिए उसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Mohinder Singh Gill & Another vs The Chief Election Commissioner, New Delhi & Others, (1978) 1 SCC 405 पर भरोसा किया, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया कि कोई भी आदेश उसमें उल्लिखित कारणों के आधार पर ही टिक सकता है या गिर सकता है, उसे बाद में हलफनामों के माध्यम से नए कारण देकर वैध नहीं ठहराया जा सकता।
राज्य का पक्ष
राज्य का तर्क था कि स्वास्थ्य सेवाएँ निदेशक (अतिरिक्त)–सह–राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी (कुष्ठ) को चतुर्थवर्गीय से तृतीयवर्गीय पद पर पदोन्नति देने का अधिकार–क्षेत्र नहीं था। पत्र संख्या 1060(4) दिनांक 11.12.2014 के अनुसार तृतीयवर्गीय पदों के लिए नियुक्ति प्राधिकारी जिले में सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी तथा चिकित्सा अस्पताल में अधीक्षक होता है।
राज्य ने सामान्य प्रशासन विभाग की अधिसूचना संख्या 13293 दिनांक 05.10.1991 की धारा 9 (क) पर भी भरोसा किया और कहा कि दयाभाव के आधार पर नियुक्त व्यक्ति को बाद में पदोन्नति या कैडर परिवर्तन के रूप में लाभ नहीं दिया जा सकता। राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि लिपिकों के लिए नियमों के अनुसार 85% LDC पद प्रत्यक्ष भर्ती द्वारा आयोग की अनुशंसा पर भरे जाते हैं और 15% पद इंटरमीडिएट/10+2 योग्यता रखने वाले समूह–डी कर्मचारियों की वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति द्वारा भरे जाते हैं। पदोन्नति वाले पद विभागीय पदोन्नति समिति की अनुशंसा पर ही भरे जाने हैं।
तथ्यों और कानून का न्यायालय द्वारा मूल्यांकन
न्यायालय ने पहले यह पुष्टि की कि याचिकाकर्त्री की प्रारंभिक दयाभाव आधारित चतुर्थवर्गीय नियुक्ति, जिला दयाभाव नियुक्ति समिति तथा जिला पदाधिकारी के माध्यम से निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर की गई थी।
मुख्य प्रश्न यह था कि बाद में तृतीयवर्गीय लिपिक पद पर उसकी पदोन्नति क्या राज्य की नीति के अनुरूप तथा सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई थी, और क्या पदावनयन आदेश विधि की कसौटी पर खरा उतरता है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विशेष रूप से याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता से पूछा कि जब राज्य यह दावा कर रहा है कि उसके पास केवल “माध्यमा” योग्यता है, तब अभिलेख पर कोई शैक्षणिक दस्तावेज क्यों नहीं है। जवाब में मूल दस्तावेज (एडमिट कार्ड, अंक–पत्र और प्रोविजनल प्रमाण–पत्र) न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जिनसे सिद्ध होता था कि उसने 2009 में इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
इन दस्तावेजों तथा रिट याचिका के परिशिष्ट-5 का अवलोकन कर न्यायालय ने पाया कि ये शैक्षणिक प्रमाण–पत्र उसकी तृतीयवर्गीय पद पर पदोन्नति की अनुशंसा के समय ही सक्षम प्राधिकारी को भेजे गए थे।
न्यायालय ने यह दर्ज किया कि पदोन्नति आदेश सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया द्वारा, राज्य सरकार के नीति–निर्णय के आधार पर जारी किया गया था। अतः यह पदोन्नति दयाभाव के आधार पर नहीं, बल्कि आवश्यक शैक्षणिक योग्यता रखने वाले चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के लिए आरक्षित 15% कोटे के अंतर्गत, 02.12.2013 तथा 25.05.2015 की अधिसूचनाओं के अनुसार की गई थी।
न्यायालय ने यह भी देखा कि विवादित मेमो संख्या 893(11) दिनांक 07.10.2022 पारित करते समय निदेशक–मुख्य, स्वास्थ्य सेवाएँ या तो इस नीति–निर्णय से अनभिज्ञ थे या उन्होंने जानबूझकर केवल 01.12.2014 के पत्र संख्या 1060 के खंड 2(6) पर ही भरोसा किया, जो नियुक्ति से संबंधित था, पदोन्नति से नहीं।
न्यायालय ने आगे यह भी रेखांकित किया कि निदेशक–मुख्य ने, जो भी कारण हों, याचिकाकर्त्री द्वारा दायर कारण बताओ/प्रतिवेदन पर कोई विचार तक नहीं किया और गलत आधारों पर पदावनयन आदेश पारित कर दिया।
प्रतिवादीगण ने अपने प्रति–हलफनामे में 01.12.2014 की अधिसूचना संख्या 1060(4) के खंड-15 पर भरोसा किया, जो विभागीय पदोन्नति समिति की अनुशंसा पर पदोन्नति की प्रक्रिया निर्धारित करता है। परंतु न्यायालय ने इंगित किया कि न तो प्रति–हलफनामे में और न ही रिट याचिका में यह स्पष्ट किया गया कि वास्तव में वह प्रक्रिया अपनाई गई थी या नहीं। केवल प्राधिकारी की क्षमता के प्रश्न पर ही जोर दिया गया था।
न्यायालय के अंतिम निर्देश
इस विश्लेषण के आधार पर न्यायालय ने माना कि विवादित पदावनयन आदेश टिकाऊ नहीं हैं।
न्यायालय ने निदेशक–मुख्य, स्वास्थ्य सेवाएँ, बिहार सरकार, पटना द्वारा निर्गत 07.10.2022 के मेमो संख्या 893(11) तथा सिविल सर्जन–सह–मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पश्चिम चंपारण, बेतिया द्वारा निर्गत 03.11.2022 के मेमो संख्या 2031 को निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने प्रतिवादी प्राधिकारियों को यह स्वतंत्रता दी कि वे यह सत्यापित करें कि याचिकाकर्त्री को पदोन्नति देते समय 01.12.2014 के पत्र संख्या 1060(4) के खंड-15 में वर्णित प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।
यदि जाँच में यह पाया जाए कि प्रक्रिया का पालन किया गया था, तो आगे किसी आदेश की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन यदि यह पाया जाए कि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो वे विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करते हुए तथा याचिकाकर्त्री को समुचित नोटिस देकर, पुनः कार्यवाही प्रारंभ कर सकते हैं।
न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भी प्रदान की: चूँकि याचिकाकर्त्री 03.11.2022 तक पदोन्नत पद पर अपना दायित्व निर्वहन कर चुकी है, इसलिए उस अवधि के लिए उसके विरुद्ध किसी प्रकार की वसूली या अन्य प्रतिकूल आदेश पारित नहीं किया जाएगा।
इन निर्देशों और स्पष्टीकरणों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय विशेष रूप से बिहार के चतुर्थवर्गीय सरकारी कर्मचारियों, खासकर दयाभाव के आधार पर नियुक्त विधवाओं के लिए, जिन्हें बाद में विभागीय नीतियों के तहत पदोन्नति मिलती है, अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब पदोन्नति किसी सामान्य नीति–निर्णय के आधार पर दी जाती है, तो उसे साधारण रूप से अवैध दयाभाव आधारित लाभ मानकर रद्द नहीं किया जा सकता। प्राधिकारियों को पदोन्नति के पीछे वास्तविक शक्ति–स्रोत और नीति को देखना होगा।
निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि उच्च अधिकारी लिखित नीतियों की उपेक्षा नहीं कर सकते और पदोन्नति रद्द करने से पहले कर्मचारी के उत्तर एवं दस्तावेजों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना अनिवार्य है। ऐसे आदेश जो कर्मचारी के पद और वेतन को प्रभावित करते हैं, उनमें स्पष्ट कारण होने चाहिए। बाद में न्यायालय में दाखिल प्रतिवेदनों के माध्यम से दिए गए औचित्य किसी दोषपूर्ण आदेश को वैध नहीं ठहरा सकते।
इसके अतिरिक्त, यदि यह संदेह भी हो कि पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी तरह अपनाई गई थी या नहीं, तब भी कर्मचारी को पहले से किए गए कार्य हेतु आर्थिक दंड नहीं दिया जा सकता। जिस अवधि में कर्मचारी ने वास्तव में पदोन्नत पद पर काम किया हो, उस अवधि के लिए कोई वसूली नहीं की जा सकती।
अल्प–आय वर्ग के कर्मचारियों, विशेषकर दिवंगत कर्मचारियों की विधवाओं के लिए, यह मनमाने पदावनयन और वसूली आदेशों के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या याचिकाकर्त्री की चतुर्थवर्गीय से तृतीयवर्गीय लिपिक पद पर पदोन्नति को इस आधार पर रद्द किया जा सकता था कि वह कथित रूप से अयोग्य प्राधिकारी द्वारा तथा अधिसूचना संख्या 1060(4) दिनांक 01.12.2014 के उल्लंघन में दी गई थी?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि पदावनयन आदेश अवैध हैं और उन्हें निरस्त कर दिया, यह अंकित करते हुए कि पदोन्नति राज्य की 15% पदोन्नति नीति के तहत योग्य चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के लिए की गई थी, न कि दयाभाव आधारित लाभ के रूप में। -
प्रश्न: पदावनयन आदेशों को निरस्त करने के बाद राज्य, यदि चाहे, तो याचिकाकर्त्री की पदोन्नति के संबंध में कौन–से कदम उठा सकता है?
उत्तर: न्यायालय ने प्राधिकारियों को यह अनुमति दी कि वे जाँच करें कि 01.12.2014 के पत्र संख्या 1060(4) के खंड-15 में वर्णित प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं। यदि प्रक्रिया का पालन किया गया था, तो किसी और कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है; यदि नहीं, तो वे केवल विधि–सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए तथा याचिकाकर्त्री को नोटिस देकर पुनः कार्यवाही कर सकते हैं, परंतु 03.11.2022 तक की अवधि के लिए किसी प्रकार की वसूली नहीं की जा सकेगी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद
- Mohinder Singh Gill & Another vs The Chief Election Commissioner, New Delhi & Others, (1978) 1 SCC 405.
मामले का विवरण
वाद संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 16617 of 2022
वाद शीर्षक: Anupam Dvivedi vs The State of Bihar & Others
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Ritesh Kumar
निर्णय की तिथि: 03.02.2026
साइटेशन: 2026(2) PLJR 312
याचिकाकर्त्री के अधिवक्ता: Mr. Abhay Shankar Singh, Advocate; Mr. Akshansh Shanker Singh, Advocate; Mr. Barun Kumar Singh, Advocate; Mr. Amit Kumar Mishra, Advocate
राज्य/प्रतिवादियों के अधिवक्ता: Mrs. Vijaya Laxmi Srivastava, AC to SC-23
वाद का स्वरूप: स्वास्थ्य विभाग में तृतीयवर्गीय (LDC) से चतुर्थवर्गीय पद पर पदावनयन/वापसी के आदेशों को चुनौती देते हुए दायर सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत रिट याचिका।
निर्णय की लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर मूल निर्णय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
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