मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दो रिट याचिकाओं से उत्पन्न हुआ: सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 7282/2020, जो बिहार भर में कार्यरत 30 संविदा दंत चिकित्सकों द्वारा दायर किया गया था, और सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 10738/2020, जो मुज़फ़्फ़रपुर की एक संविदा दंत चिकित्सक द्वारा दायर किया गया था।
सभी याचिकाकर्ता योग्य दंत चिकित्सक थे, जो Dentists Act, 1948 के अंतर्गत पंजीकृत थे। उन्हें विभिन्न विज्ञापनों के क्रम में बिहार राज्य द्वारा संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था। प्रारंभ में उन्हें दैनिक वेतन पर लिया गया और सप्ताह में दो दिन काम करने की अनुमति दी गई। वर्ष 2011 में उनका पारिश्रमिक संशोधित कर 30,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया।
समय के साथ, इन संविदा दंत चिकित्सकों ने अपनी सेवाओं के नियमितीकरण की मांग शुरू कर दी। इस मांग पर ज़ोर देने के लिए वे हड़ताल पर चले गए। इससे 10.03.2015 को दंत चिकित्सकों के प्रतिनिधियों और स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव के बीच बैठक हुई। इस बैठक की कार्यवाही में दो प्रमुख बिंदु दर्ज किए गए: पहला, कि विभाग नियमितीकरण के प्रस्ताव पर महाधिवक्ता से विधिक राय प्राप्त करेगा और उसके बाद राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजेगा; और दूसरा, कि हड़ताल पर गए दंत चिकित्सकों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इस बैठक से पहले ही, बिहार दंत चिकित्सक सेवा नियमावली, 2014, जो संविधान के अनुच्छेद 309 के उपबंध के अधीन बनाई गई थी, 14.10.2014 को अधिसूचित हो चुकी थी। ये नियम राज्य में दंत चिकित्सक संवर्ग में नियमित भर्ती को नियंत्रित करते थे।
25.03.2015 को बिहार लोक सेवा आयोग ने 558 बेसिक ग्रेड दंत चिकित्सक पदों के लिए आवेदन आमंत्रित करते हुए विज्ञापन जारी किया। विज्ञापन के अनुसार चयन प्रक्रिया में, सरकारी अस्पतालों में पहले से कार्यरत दंत चिकित्सकों के कार्यानुभव को 100 अंकों में से 25 अंक का वेटेज दिया गया, जिससे याचिकाकर्ताओं जैसे संविदा दंत चिकित्सकों को स्पष्ट रूप से लाभ पहुंचाया गया।
इसके बाद स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव ने 31.03.2015 की दिनांक वाला एक पत्र संविदा डॉक्टरों और दंत चिकित्सकों के प्रतिनिधियों को संबोधित किया। इस पत्र में यह संकेत दिया गया कि आयोग द्वारा चयन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद यदि कुछ डॉक्टर/दंत चिकित्सक, जिनके पास आवश्यक योग्यता और दीर्घ संविदा सेवा है, चयनित नहीं होते हैं, तो विभाग विधि के अनुसार उनके नियमितीकरण हेतु नीति बनाने पर विचार करेगा।
25.03.2015 के विज्ञापन के तहत चयन प्रक्रिया पूरी की गई। बिहार के सभी संविदा दंत चिकित्सक नियमित नियुक्ति के लिए चयनित हो गए, सिवाय 73 के, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थे। अनेक नियमित नियुक्तियों के बावजूद शेष संविदा दंत चिकित्सकों, जिनमें वे भी शामिल थे जो चयनित नहीं हो सके, को कुछ समय तक कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई।
25.02.2020 को स्वास्थ्य विभाग ने ज्ञापन सं. 256 जारी कर यह निर्णय लिया कि चूंकि 2014 के नियमों के तहत नियमित नियुक्ति की जा चुकी है, अतः दंत चिकित्सकों की सभी संविदा नियुक्तियां समाप्त की जाएं। इसी आदेश ने वर्तमान रिट याचिकाओं को जन्म दिया, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने सेवा समाप्ति को चुनौती दी और अपनी सेवाओं की सुरक्षा की मांग की।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ताओं की मूल शिकायत यह थी कि राज्य सरकार संविदा दंत चिकित्सकों से किए अपने वादों से मुकर गई है। उन्होंने तीन प्रकार के आश्वासनों पर विशेष रूप से भरोसा किया:
पहला, 10.03.2015 की बैठक की कार्यवाही, जिसमें यह निर्णय दर्ज था कि स्वास्थ्य विभाग नियमितीकरण पर महाधिवक्ता से विधिक राय प्राप्त करेगा और उसके बाद सरकार को प्रस्ताव भेजेगा। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इससे यह वैध अपेक्षा (legitimate expectation) उत्पन्न हुई कि उनकी सेवाओं का नियमितीकरण किया जाएगा।
दूसरा, 31.03.2015 की दिनांक वाला प्रमुख सचिव द्वारा संविदा डॉक्टरों/दंत चिकित्सकों के प्रतिनिधियों को भेजा गया पत्र। इस पत्र में उल्लेख था कि यदि लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया के बाद कुछ संविदा डॉक्टर/दंत चिकित्सक चयनित नहीं हो पाते हैं, तो सरकार विधिक राय के आधार पर, विधि के अनुरूप उनके नियमितीकरण के लिए नीति बनाएगी।
तीसरा, स्वास्थ्य मंत्री द्वारा बिहार विधान सभा के पटल पर कथित रूप से दिया गया आश्वासन। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, मंत्री ने कहा था कि जिन 73 दंत चिकित्सकों के नाम आयोग द्वारा कम मेरिट के कारण अनुशंसित नहीं हो सके, उनके मामलों पर आयोग द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों की नियुक्ति के बाद नियमितीकरण के लिए विचार किया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन आश्वासनों से बाध्यकारी वादा बनता है, और बाद में 25.02.2020 की वह अधिसूचना, जिसके द्वारा उनकी संविदा सेवाएं समाप्त की गईं, उस वादे के विपरीत है। उनका कहना था कि राज्य promissory estoppel जैसे सिद्धांतों से बंधा हुआ है और किए गए वादों से पीछे नहीं हट सकता।
उन्होंने 17.09.2018 की सामान्य प्रशासन विभाग की संकल्प (ज्ञापन सं. 12534) पर भी भरोसा किया। इस संकल्प में संविदा कर्मचारियों के संबंध में समिति की अनुशंसा को स्वीकार करने का राज्य का निर्णय दर्ज था। समिति ने पाया था कि अनेक संविदा कर्मी नियमित भर्ती की लिखित परीक्षा या साक्षात्कार में असफल हो सकते हैं। उसने अनुशंसा की थी कि यदि नियमित नियुक्ति के बाद भी पद रिक्त रह जाएं, तो नई संविदा नियुक्तियां करने के बजाय, नियमित चयन में असफल हुए उन्हीं संविदा कर्मियों को रिक्त पदों पर संविदा के आधार पर समायोजित किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह नीति, मौजूदा संविदा दंत चिकित्सकों को सेवानिवृत्ति की आयु या योजना की समाप्ति तक, अथवा कम से कम तब तक जारी रखने का समर्थन करती है, जब तक सभी पद भर नहीं जाते।
इसके अतिरिक्त, मुज़फ़्फ़रपुर वाली याचिकाकर्ता के मामले (सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 10738/2020) में यह इंगित किया गया कि सिविल सर्जन-सह-मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी ने 15.02.2021 के पत्र द्वारा स्वास्थ्य विभाग को सूचित किया था कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, मुरौल, में नियमित दंत चिकित्सक की नियुक्ति न होने के कारण एक दंत चिकित्सक का पद रिक्त है, और इसलिए याचिकाकर्ता की सेवाएं संविदा आधार पर ली जा रही हैं। अधिवक्ता का तर्क था कि चूंकि पद अब भी रिक्त है, अतः उसका संविदा समाप्त करना किसी सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा और सार्वजनिक हित के प्रतिकूल होगा।
दूसरी ओर, राज्य का तर्क था कि संविदा कर्मचारी, एक बार नियमों के अनुसार नियमित नियुक्ति हो जाने पर, किसी पद पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं रखते। इस पर ज़ोर दिया गया कि बिहार लोक सेवा आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर बिहार दंत चिकित्सक सेवा नियमावली, 2014 के तहत दंत चिकित्सकों की नियमित नियुक्ति की जा चुकी है। चूंकि याचिकाकर्ताओं को अनुभव के लिए समुचित वेटेज दिया गया था और फिर भी वे चयनित नहीं हो सके, इसलिए वे सेवा जारी रखने या नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते।
न्यायालय ने पहले मूल कानूनी स्थिति स्पष्ट की: संविदा कर्मचारी को अनुबंध अवधि समाप्त होने के बाद या पद के विधिसम्मत नियमित चयन द्वारा भर जाने के बाद, सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं होता। इस सिद्धांत के आधार पर, जिन पदों पर पहले से ही नियमित नियुक्ति हो चुकी थी, उन पर कार्यरत संविदा दंत चिकित्सक यह अधिकारपूर्वक नहीं कह सकते कि उनकी संविदा नियुक्ति जारी रखी जाए।
याचिकाकर्ताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Surya Narayan Yadav v. Bihar State Electricity Board, (1985) 3 SCC 38 पर रखे गए भरोसे की न्यायालय ने सावधानीपूर्वक परीक्षा की। उस मामले में विद्युत बोर्ड ने अपने एक्स-कैडर प्रशिक्षु कर्मचारियों से बार-बार यह आश्वासन दिया था कि उन्हें बिना परीक्षा स्थायी रूप से समायोजित किया जाएगा और प्रोबेशन की अवधि के बाद उनकी पुष्टि कर दी जाएगी। उन आश्वासनों पर भरोसा कर कुछ प्रशिक्षुओं ने अन्यत्र नौकरी नहीं खोजी। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बोर्ड उन आश्वासनों का पालन करने के लिए बाध्य है।
पटना उच्च न्यायालय ने माना कि यहां तथ्य भिन्न हैं। दंत चिकित्सकों के मामले में कहीं भी यह स्पष्ट और निर्विवाद आश्वासन नहीं दिया गया था कि उनकी सेवाओं का नियमितीकरण किया ही जाएगा। जो आश्वासन दिया गया, वह सीमित था: कि नियुक्ति की प्रक्रिया महाधिवक्ता की विधिक राय प्राप्त होने के बाद पूरी की जाएगी। महाधिवक्ता की राय में यह इंगित किया गया कि अधिकांश दंत चिकित्सक नियमित भर्ती प्रक्रिया में संभवतः सफल हो जाएंगे और यदि कुछ असफल रह जाएं, तो सरकार विधि के अनुरूप उनके नियमितीकरण के संबंध में उपयुक्त कदमों पर विचार कर सकती है। बाद की 31.03.2015 की पत्राचार में भी केवल नीति बनाने के इरादे का संकेत था; यह नियमितीकरण का स्पष्ट वादा नहीं था।
न्यायालय ने promissory estoppel के तर्क पर भी विचार किया, जिसके लिए Supreme Court के निर्णय State of Jharkhand v. Brahmputra Metallics Ltd., Ranchi तथा उसमें उल्लेखित निर्णय Monnet Ispat and Energy Ltd. v. Union of India, (2012) 11 SCC 1 का हवाला दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि promissory estoppel के लिए स्पष्ट और निश्चित वादा होना आवश्यक है, और दूसरी पार्टी ने उस वादे के आधार पर अपने को किसी हानि की स्थिति में ला दिया हो। साथ ही, जो वादा विधि के प्रतिकूल हो, उसे लागू नहीं कराया जा सकता; सार्वजनिक प्राधिकरणों को promissory estoppel के आधार पर वैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
यहां, पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि:
याचिकाकर्ताओं की सेवाओं के नियमितीकरण का कोई स्पष्ट और दोटूक वादा नहीं किया गया था। पत्राचार में केवल नियमितीकरण पर विचार करने तथा “विधि के अनुसार” नीति बनाने की बात कही गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने यह न तो दलील के रूप में स्पष्ट रूप से रखा और न ही यह दिखाया कि उन्होंने किसी विशेष वादे पर भरोसा करते हुए अपनी स्थिति बदली या अपने को किसी हानि की स्थिति में ला दिया।
जो भी वादा बिहार दंत चिकित्सक सेवा नियमावली, 2014 के विपरीत होता, उसे लागू नहीं कराया जा सकता था, क्योंकि नियमित नियुक्तियां आयोग के माध्यम से वैधानिक भर्ती प्रक्रिया का पालन करते हुए ही की जानी थीं।
न्यायालय ने यह भी देखा कि चयन प्रक्रिया को संविदा दंत चिकित्सकों के हित में विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया था: 100 अंकों में से 25 अंक सरकारी अस्पतालों में कार्यानुभव के लिए सुरक्षित रखे गए थे। 558 पदों के विज्ञापित होने और इतने उच्च वेटेज के बावजूद, याचिकाकर्ता मेरिट सूची में स्थान नहीं बना सके। इससे उनके नियमितीकरण या निरंतर संविदा पर बने रहने के किसी भी अधिकार के दावे और अधिक कमज़ोर हो गए।
इसी के साथ न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर भी ध्यान दिया। राज्य ने स्वयं, सरकारी अधिवक्ता को दिए गए निर्देशों के माध्यम से, यह स्वीकार किया कि बिहार में दंत चिकित्सकों के 571 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 525 पर नियमित दंत चिकित्सक नियुक्त हैं, और 46 पद रिक्त हैं। विभाग ने इन रिक्तियों के लिए सामान्य प्रशासन विभाग से रोस्टर के अनुमोदन (roster clearance) भी प्राप्त कर लिया था। न्यायालय को यह भी बताया गया कि कुछ संविदा दंत चिकित्सकों को अब भी कार्य जारी रखने की अनुमति दी जा रही है।
न्यायालय ने 31.03.2015 के पत्राचार और 17.09.2018 की सामान्य प्रशासन विभाग की संकल्प, दोनों पर ध्यान दिया, जो यह दर्शाते थे कि जहां पद रिक्त रह जाते हैं, वहां विफल लेकिन योग्य संविदा कर्मियों को, नई संविदा नियुक्तियां करने के बजाय, संविदा पर जारी रखने की नीति-दृष्टि (policy inclination) राज्य की रही है।
हालांकि, न्यायालय ने न्यायिक शक्ति की सीमाओं के प्रति सतर्क रुख अपनाया। उसने माना कि न्यायिक पुनरीक्षण के अधिकार का प्रयोग करते हुए वह राज्य को किसी विशिष्ट व्यक्ति को संविदा पर नियुक्त करने का निर्देश नहीं दे सकता। फिर भी, जनहित को ध्यान में रखते हुए, यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता लंबे समय से संविदा पर दंत चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं और पद रिक्त हैं, राज्य को यह विचार करना चाहिए कि उन रिक्त पदों के विरुद्ध उन्हें संविदा पर लगाया जाए।
तदनुसार, यह सामान्य कानूनी स्थिति बरक़रार रखते हुए कि संविदा दंत चिकित्सक नियमित रूप से पद भर जाने के बाद नियमितीकरण या सेवा जारी रखने का कोई अधिकार नहीं रखते, न्यायालय ने स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव को यह निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं एवं समान स्थिति वाले अन्य व्यक्तियों को रिक्त दंत चिकित्सक पदों के विरुद्ध संविदा आधार पर नियुक्त करने के संबंध में अंतिम निर्णय लें, इस स्पष्ट शर्त के साथ कि ऐसी संविदा नियुक्ति नियमित नियुक्ति होते ही स्वतः समाप्त हो जाएगी।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं से यह आश्वासन लेने की कोई आवश्यकता नहीं है कि वे नियमित नियुक्ति के बाद सेवा जारी रखने का दावा नहीं करेंगे। न्यायालय के मत में, संविदा नियुक्ति, अनुबंध अवधि समाप्त होने पर या नियमों के अनुसार पद पर नियमित नियुक्ति होने पर, स्वतः समाप्त हो जाती है। अतः वैधानिक ढांचा पहले से ही यह सुनिश्चित करता है कि नियमित भर्ती के बाद याचिकाकर्ता सेवा जारी रखने पर ज़ोर नहीं दे सकते।
अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया कि वे न्यायालय के आदेश की प्राप्ति या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से एक माह के भीतर यह निर्णय ले लें। इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ दोनों रिट याचिकाओं का निस्तारण कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के संविदा स्वास्थ्य पेशेवरों, विशेषकर संविदा दंत चिकित्सकों के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि संविदा नियुक्ति से न तो स्थायी पद का अधिकार उत्पन्न होता है और न ही वैधानिक नियमों के अंतर्गत नियमित भर्ती के बाद सेवा जारी रखने का। राजनीतिक या प्रशासनिक आश्वासन, अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए भर्ती नियमों को निरस्त नहीं कर सकते।
इसी के साथ, पटना उच्च न्यायालय ने व्यावहारिक स्थिति को भी स्वीकार किया: सरकारी अस्पतालों में दंत चिकित्सकों के अनेक पद रिक्त हैं और संविदा दंत चिकित्सक वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं। न्यायालय ने सरकार को उन्हें नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया, लेकिन यह स्पष्ट संकेत दिया कि जनहित में, राज्य को नियमित नियुक्ति होने तक रिक्त पदों के विरुद्ध संविदा पर उनकी सेवाएं लेनी चाहिए।
संविदा कर्मियों के लिए व्यापक रूप से यह निर्णय यह दर्शाता है कि सरकार के आंतरिक पत्र-व्यवहार, जिनमें “नियमितीकरण पर विचार” करने या “नीति बनाने” की बात हो, स्वयं में कानूनी वादा नहीं होते। जब तक राज्य कोई स्पष्ट और विधिसम्मत नीति या नियम जारी नहीं करता, न्यायालय ऐसे पत्राचार को बाध्यकारी मानने में संकोच करेगा।
राज्य के दृष्टिकोण से यह निर्णय स्पष्टता और स्थिरता की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जब कोई विभाग संविदा कर्मचारियों के लिए नीति बनाने की बात करता है और बाद में उस पर अमल नहीं करता, तो इससे भ्रम और मुकदमेबाज़ी पैदा होती है। अतिरिक्त मुख्य सचिव को एक माह के भीतर स्पष्ट निर्णय लेने के न्यायालयीय निर्देश से प्रशासन को अंतिम रूप और पारदर्शिता की ओर धकेला गया है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या संविदा दंत चिकित्सकों को बिहार दंत चिकित्सक सेवा नियमावली, 2014 के तहत नियमित नियुक्तियां हो जाने के बाद सेवा जारी रखने या नियमितीकरण का कानूनी अधिकार है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि संविदा कर्मचारियों को अनुबंध अवधि समाप्त होने के बाद या वैधानिक नियमों के तहत नियमित चयन के माध्यम से पद भर जाने के बाद उस पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है, और याचिकाकर्ताओं से नियमितीकरण का कोई स्पष्ट वादा भी नहीं किया गया था।
प्रश्न: क्या बिहार राज्य को promissory estoppel या पूर्व आश्वासनों के आधार पर उन संविदा दंत चिकित्सकों को नियमित या स्थायी रूप से समायोजित करने के लिए बाध्य किया जा सकता है जो नियमित भर्ती प्रक्रिया में असफल रहे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने कहा कि नियमितीकरण का कोई स्पष्ट और श्रेणीबद्ध वादा नहीं था; पत्राचार में केवल “विधि के अनुसार” नीति बनाने के इरादे का ज़िक्र था, और जो भी वादा वैधानिक नियमों के विपरीत हो, उसे promissory estoppel के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।
प्रश्न: जब रिक्तियां बनी हुई हों, तो लंबे समय से कार्यरत संविदा दंत चिकित्सकों को क्या राहत दी जा सकती है?
उत्तर: न्यायालय ने नियुक्ति का सीधा निर्देश तो नहीं दिया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को यह निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं तथा समान रूप से स्थित अन्य संविदा दंत चिकित्सकों को रिक्त पदों के विरुद्ध संविदा पर लगाने पर विचार करें, यह स्पष्ट रूप से दर्ज करते हुए कि ऐसी संविदा नियुक्तियां नियमित नियुक्ति होते ही समाप्त हो जाएंगी, और इस संबंध में एक माह के भीतर निर्णय लें।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Surya Narayan Yadav v. Bihar State Electricity Board and Others, (1985) 3 SCC 38 – तथ्यों के आधार पर भिन्न मानकर अनुपयोगी ठहराया गया।
- State of Jharkhand and Others v. Brahmputra Metallics Ltd., Ranchi and Others, Civil Appeal Nos. 3860/3862 of 2020; 2020 SCC Online SC 968 – promissory estoppel पर संदर्भित, परंतु तथ्यों के आधार पर अनुपयुक्त पाया गया।
- Monnet Ispat and Energy Ltd. v. Union of India and Others, (2012) 11 SCC 1 – इस सिद्धांत के लिए उद्धृत कि promissory estoppel के आधार पर विधि के विपरीत कार्रवाई के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
- Najma v. Government of NCT of Delhi, W.P. (C) No. 8956 of 2020, निर्णय दिनांक 22.07.2021 (दिल्ली उच्च न्यायालय) – याचिकाकर्ताओं द्वारा भरोसा किया गया; न्यायालय ने वर्तमान मामले को इससे भिन्न माना।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 7282/2020 तथा सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 10738/2020
मामले का शीर्षक: Dr. Vikash Kumar & Ors. बनाम The State of Bihar & Ors.; तथा Dr. Shahina Shaukat बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2022 (1) PLJR 891
न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति Chakradhari Sharan Singh
निर्णय की तिथि: 08-10-2021
अधिवक्ता:
- C.W.J.C. सं. 7282/2020 में याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री P.K. Shahi, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री Vikas Kumar।
- C.W.J.C. सं. 7282/2020 में प्रतिवादियों की ओर से: श्री Ajay Behari Sinha, GA 8; श्री Kishore Kumar Sinha; श्री Shashi Shekhar।
- C.W.J.C. सं. 10738/2020 में याचिकाकर्ता की ओर से: सुश्री Nivedita Nirvikar, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री Zainul Abedin; श्री Shailesh Kumar।
- C.W.J.C. सं. 10738/2020 में प्रतिवादियों की ओर से: श्री Nagendra Prasad Yadav, SC 23; श्री Kishore Kumar Sinha।
मामले का स्वरूप: संविदा दंत चिकित्सकों की संविदा नियुक्तियां समाप्त करने के आदेश को चुनौती देने तथा सेवा जारी रखने/नियमितीकरण की मांग करने वाली सिविल रिट याचिकाएं।
पूर्ण निर्णय की लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 7282 of 2020 with CWJC No. 10738 of 2020
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