जीवविज्ञान शिक्षक नियुक्ति से इनकार को चुनौती स्वीकार — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पुराने विज्ञापनों के तहत शिक्षक नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। पटना उच्च न्यायालय ने शेष जीवविज्ञान अभ्यर्थियों पर विचार करने से सरकार के इनकार को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारी ने एकमुश्त विशेष नियुक्ति पर आरक्षण नियमों को गलत ढंग से लागू किया था। विभाग को अब निर्धारित समय-सीमा के भीतर याची की सुनवाई कर पुनः निर्णय लेना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार के राष्ट्रीयकृत माध्यमिक विद्यालयों और प्रोजेक्ट स्कूलों में जीवविज्ञान और गणित के शिक्षकों की बहुत पुराने भर्ती प्रक्रियाओं से संबंधित है।

1988 में, विद्यालय सेवा बोर्ड (Bihar Staff Selection Commission का पूर्ववर्ती) ने विषय शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन सं. 1/88 जारी किया। आठ विषयों के अभ्यर्थियों का चयन कर उनकी नियुक्ति की गई।

हालांकि, विभिन्न कारणों से शिक्षा विभाग ने जीवविज्ञान और गणित के चयनित अभ्यर्थियों की लगभग पाँच वर्षों तक नियुक्ति नहीं की। इस अवधि में, राज्य ने शिक्षकों के लिए नई आरक्षण नीति लागू की।

1995 में, बदली हुई आरक्षण नीति के अनुरूप समायोजन के लिए, विज्ञापन सं. 1/88 की निरंतरता में एक अन्य विज्ञापन सं. 1/95 जारी किया गया। 8.10.1998 और 21.5.1999 को विद्यालय सेवा बोर्ड ने 1056 जीवविज्ञान और 552 गणित अभ्यर्थियों की संस्तुति की।

अन्य विषयों के शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई। लेकिन जीवविज्ञान और गणित के शिक्षकों को फिर से छोड़ दिया गया। वर्ष 2000 तक नियुक्ति पत्र जारी नहीं किए गए।

याचिकाकर्ता, जो मेधासूची में क्रम संख्या 710 (Roll No. 1379) पर स्थान प्राप्त जीवविज्ञान अभ्यर्थी थे, अन्य समान रूप से स्थित अभ्यर्थियों के साथ मिलकर पटना उच्च न्यायालय में कई रिट याचिकाओं (जिनमें CWJC No. 2994/2000, 7732/2000, 8926/2000, 9259/2000, 12625/2000, 3920/2001, 752/2001 एवं 3773/2001 शामिल हैं) के माध्यम से पहुँचे। 15.2.2001 को एकल न्यायाधीश ने इन रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए राज्य को अद्यतन रिक्तियों की गणना कर तीन माह के भीतर नियुक्ति करने का निर्देश दिया (2001 (2) PLJR 110 में प्रकाशित)।

राज्य ने अनेक Letters Patent Appeal (LPA Nos. 439, 445, 446, 447, 1347, 1354, 1360 और 1435 of 2001) दायर किए। 16.12.2004 को खंडपीठ ने इन अपीलों को खारिज कर एकल न्यायाधीश के आदेश के अनुपालन का निर्देश दिया।

इसके बाद राज्य ने Supreme Court में SLP (Civil) Nos. 6369–6376 of 2005 दायर कीं। इनके लंबित रहने के दौरान, बिहार ने Panchayat Teachers Appointment Rules, 2006 लागू किए और सभी रिक्त पदों को पंचायती राज संस्थाओं को हस्तांतरित कर दिया। नई नियमावली के अंतर्गत 3000 से अधिक जीवविज्ञान शिक्षक पदों का विज्ञापन किया गया।

राज्य ने Supreme Court के समक्ष यह दलील दी कि 2006 के नए नियमों के कारण पुरानी प्रक्रिया के तहत नियुक्ति संभव नहीं है। Supreme Court ने इस रुख को अस्वीकार कर दिया। 28.08.2012 को उसने SLPs खारिज कर दीं और लंबे विलंब का संज्ञान लेते हुए संस्तुत अभ्यर्थियों की नियुक्ति का निर्देश दिया।

Supreme Court के आदेश के बाद भी शिक्षा विभाग ने नियुक्ति नहीं की। 2012 में पटना उच्च न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिकाएँ दायर की गईं।

न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन के लिए राज्य ने “The Bihar Nationalized Secondary School Teacher’s Special Appointment Rule, 2013” बनाया। इसके तहत जीवविज्ञान के 329 और गणित के 312 पदों को एक बारगी विशेष नियुक्ति के लिए, dying cadre के रूप में, केवल विज्ञापन 1/88 और 1/95 के अभ्यर्थियों तक सीमित रखते हुए सृजित किया गया।

याचिकाकर्ता की शिकायत इसलिए उत्पन्न हुई कि आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के न जुड़ने या उपलब्ध न होने के कारण अनेक जीवविज्ञान पद रिक्त रहने के बावजूद उनकी नियुक्ति नहीं की गई। उनका अभ्यावेदन 20.03.2018 के मेमो सं. 84 द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया, जिससे वर्तमान रिट याचिका (CWJC No. 4108 of 2019) दायर हुई।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद यह था कि क्या शिक्षा विभाग, बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991/1992 के तहत तीन लगातार वर्षों तक विज्ञापन न होने के आधार पर यह कह कर कि पद आरक्षित वर्ग के हैं, शेष पैनल अभ्यर्थियों से जीवविज्ञान शिक्षक के रिक्त पद न भरने से इनकार कर सकता है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 2013 के विशेष नियुक्ति नियम विशेष रूप से पूर्ववर्ती न्यायालय के आदेशों को लागू करने और विज्ञापन 1/88 और 1/95 के अंतर्गत संस्तुत जीवविज्ञान और गणित शिक्षकों की नियुक्ति के लिए ही बनाए गए थे। इन नियमों ने एकमुश्त, dying cadre सृजित किया: विशेष रूप से नियुक्त व्यक्तियों के सेवानिवृत्त या मृत्यु होते ही ये पद समाप्त हो जाने थे।

उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि राज्य ने 1983 Rules के तहत Class III कर्मचारियों के पदोन्नति के लिए 30% रिक्तियां अलग रख कर, जबकि बाद के 1997 और 2004 के नियमों ने इस 30% को समाप्त कर दिया था, जीवविज्ञान के पदों को 329 और गणित के पदों को 312 तक गलत तरीके से सीमित कर दिया। अवमानना कार्यवाही में उच्च न्यायालय ने राज्य की रिक्ति-गणना स्वीकार नहीं की थी और नई गणना की अनुमति दी थी।

वास्तव में की गई नियुक्तियों के संबंध में, याचिकाकर्ता ने एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया की ओर संकेत किया:

पहले, 2013 में, मेमो सं. 438 दिनांक 22.06.2013 के तहत 329 जीवविज्ञान अभ्यर्थियों को नियुक्ति-पत्र जारी किए गए, परंतु केवल 226 ने जॉइन किया। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता या अनुपस्थिति के कारण एक सौ तीन सीटें रिक्त रह गईं।

दूसरे, 2016 में, आगे जीवविज्ञान नियुक्तियाँ की गईं—मेमो सं. 27 दिनांक 05.01.2016, 458 दिनांक 29.02.2016 और 849 दिनांक 18.04.2016 के माध्यम से 80 अभ्यर्थियों की नियुक्ति हुई। SC, ST और BC-I अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता के कारण पुनः साठ सीटें रिक्त रह गईं।

तीसरे, 28.09.2016 के उच्च न्यायालय के आदेश के बाद, जिसमें निर्देश दिया गया कि Class III कर्मचारियों के लिए अलग रखी गई 30% कोटा वाली रिक्तियां भी उपलब्ध कराई जाएँ (क्योंकि उन पदों पर कोई नियुक्ति नहीं हो रही थी), राज्य ने जीवविज्ञान रिक्तियों की पुनर्गणना कर उन्हें 407 बताया और मेमो सं. 128 दिनांक 21.08.2017 के माध्यम से अधिसूचित किया।

इसके अनुपालन में, 22.08.2017 से 28.08.2017 के बीच केवल 300 जीवविज्ञान अभ्यर्थियों को नियुक्ति-पत्र जारी किए गए, क्योंकि शेष मेधासूची में आरक्षित वर्ग (SC, ST और BC-I) के अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं थे। परिणामस्वरूप, SC/ST/BC-I के लिए आरक्षित 107 पद पात्र अभ्यर्थियों के अभाव में रिक्त रह गए, और 28 पद न जॉइन करने के कारण खाली रह गए।

इस प्रकार, याचिकाकर्ता का दावा था कि 135 विशेष जीवविज्ञान पद रिक्त रह गए। कुल मिलाकर, उनके अनुपूरक हलफनामे के अनुसार, सभी चरणों को मिलाकर 270 जीवविज्ञान सीटें रिक्त थीं और प्राधिकारियों ने आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को काउंसलिंग के लिए पहले ही तीन अवसर दे दिए थे, जो असफल रहे।

याचिकाकर्ता ने Bihar Reservation of Vacancies in Posts and Services (for SC, ST and other Backward Classes) Act, 1991 की धारा 4(6) पर भरोसा किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब आरक्षित अभ्यर्थी उपलब्ध न हों, तो रिक्तियां परस्पर विनिमय की जा सकती हैं या सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से भरी जा सकती हैं। चूँकि Special Rules केवल एकमुश्त नियुक्ति की अनुमति देते हैं और किसी नए विज्ञापन पर रोक लगाते हैं, ऐसे में पदों को स्थायी रूप से रिक्त छोड़ देना पूर्ववर्ती न्यायालयी निर्देशों तथा Special Rules के उद्देश्य को निरर्थक बना देता है।

उन्होंने अतः प्रार्थना की कि इन रिक्त जीवविज्ञान पदों पर उनकी तथा अन्य शेष पैनल अभ्यर्थियों की नियुक्ति के लिए निर्देश दिया जाए और मेमो सं. 84 दिनांक 20.03.2018, जिसके द्वारा Principal Secretary ने यह कहते हुए डी-आरक्षण से इनकार किया कि पदों का डी-आरक्षण केवल तीन लगातार वर्षों के विज्ञापन के बाद ही संभव है, को निरस्त किया जाए।

राज्य ने अपने विस्तृत प्रत्युत्तर हलफनामे में यह रुख अपनाया कि जीवविज्ञान विषय में, उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप 789 रिक्तियां गणना की गई थीं। 50% खुली श्रेणी की सभी रिक्तियां और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित रिक्तियां “zone of merit” के अंतर्गत आने वाले अभ्यर्थियों से भर दी गईं।

राज्य ने यह इंगित किया कि याचिकाकर्ता BC वर्ग से संबंधित हैं और उनकी मेधासूची क्रम संख्या 710 है, जबकि BC वर्ग में नियुक्ति केवल क्रम संख्या 619 तक की गई थी। इसलिए, उनकी मेरिट स्थिति अपने वर्ग की नियुक्ति-सीमा के भीतर नहीं आती और वे नियुक्ति का वैध अधिकार दावा नहीं कर सकते।

अनभरी आरक्षित वर्ग की सीटों के संबंध में, राज्य ने तर्क दिया कि Bihar Reservation Act, 1992 के तहत डी-आरक्षण के लिए तीन लगातार भर्ती वर्ष हेतु विज्ञापन का प्रकाशन आवश्यक है। केवल ऐसी चक्र के बाद, और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की निरंतर अनुपलब्धता की स्थिति में ही रिक्तियों का डी-आरक्षण किया जा सकता है।

राज्य ने यह भी बल दिया कि Niyojan Niyamawali, 2006 के बाद नियमित वेतनमान वाले assistant teacher पद अस्तित्व में नहीं रहे और उन्हें निश्चित वेतन वाले पदों में परिवर्तित कर दिया गया, इसलिए Special Appointment Rules, 2013 और बाद में 2017 के तहत नए पद सृजित करने पड़े। ये विशेष पद dying posts थे जिन पर एक बार ही नियुक्ति होनी थी; नियुक्त व्यक्तियों के सेवानिवृत्त या मृत्यु होते ही ये पद समाप्त हो जाने थे। अतः, राज्य के अनुसार, इन पदों का तीन लगातार वर्षों तक विज्ञापन करना संभव ही नहीं था और परिणामस्वरूप डी-आरक्षण का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इसी तर्क के आधार पर Principal Secretary ने मेमो सं. 84 दिनांक 20.03.2018 द्वारा डी-आरक्षण से इनकार कर दिया।

Justice Anjani Kumar Sharan ने तर्कों और अभिलेखों पर विचार किया। अनुच्छेद 15 में न्यायालय ने पहले यह दर्ज किया कि यह निर्विवाद तथ्य है कि संबंधित रिक्तियां SC/ST और BC-I अभ्यर्थियों के उपलब्ध न होने के कारण पहले से ही रिक्त पड़ी थीं और यह नियुक्ति Special Appointment Rules, 2013 और 2017 के तहत एकमुश्त प्रक्रिया थी। यह भी स्वीकार था कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता और कुछ अभ्यर्थियों के न जॉइन करने के कारण 135 पद रिक्त थे।

इसके बाद न्यायालय ने Bihar Reservation Act, 1992 के अधीन विधिक स्थिति का परीक्षण किया। अधिनियम के अनुसार यदि आरक्षित रिक्तियां अभ्यर्थियों की अनुपलब्धता के कारण भरी नहीं जा सकें, तो उन्हें तीन लगातार वर्षों के लिए विज्ञापित करना आवश्यक है। केवल तीन असफल भर्ती प्रयासों के बाद ही वे आरक्षित पद डी-आरक्षित कर backlog के रूप में माने जा सकते हैं।

किन्तु इस मामले में न्यायालय ने उल्लेख किया कि Special Appointment Rules ने एक बारगी उपाय का प्रावधान किया है और आगे किसी विज्ञापन पर रोक लगा दी है। इस विशेष भर्ती स्वरूप के कारण तीन-वर्षीय विज्ञापन की शर्त का शाब्दिक पालन करना असंभव था।

अतः न्यायालय ने माना कि Principal Secretary का मेमो सं. 84 दिनांक 20.03.2018, जिसने केवल तीन विज्ञापनों के अभाव के आधार पर डी-आरक्षण से इनकार किया, विधि के अनुरूप नहीं था। एक ऐसे dying cadre की एकमुश्त नियुक्ति में ऐसी प्रक्रिया पर जोर देना, जिसका अनुपालन संभव ही नहीं, विधिक रूप से अस्थिर है।

न्यायालय ने स्वयं याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष नियुक्ति का आदेश दिए बिना मेमो सं. 84 को निरस्त कर दिया और पुनर्निर्णय का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता को Principal Secretary/Additional Chief Secretary, शिक्षा विभाग के समक्ष, निर्णय की प्रमाणित प्रति सहित, विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया।

Principal Secretary/Additional Chief Secretary (प्रतिवादी सं. 3) को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता या उनके अधिवक्ता की व्यक्तिगत सुनवाई कर, अभ्यावेदन दाखिल किए जाने की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर उपयुक्त आदेश पारित करें।

न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि यदि निर्दिष्ट अवधि में अभ्यावेदन का निस्तारण नहीं किया गया, तो प्रतिवादी सं. 3 को न्यायालय के आदेश के अनुपालन न करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ रिट याचिका स्वीकार कर ली गई।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन अनेक अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें दशकों पहले सरकारी शिक्षक पदों के लिए संस्तुति मिल चुकी थी, परंतु प्रशासनिक विलंब और बाद में भर्ती नियमों में बदलाव के कारण उनकी नियुक्ति नहीं हो पाई।

पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जब सरकार स्वयं Special Appointment Rules के माध्यम से एक विशेष, एकमुश्त भर्ती योजना बनाती है, तो वह ऐसी सामान्य आरक्षण प्रक्रियाओं के पीछे नहीं छिप सकती जिन्हें उस ढाँचे में लागू कर पाना ही असंभव हो।

जहाँ आरक्षित पद बार-बार रिक्त रह जाते हैं क्योंकि कोई पात्र अभ्यर्थी सामने नहीं आता और आगे का विज्ञापन भी निषिद्ध है, वहाँ सरकार शेष पैनल अभ्यर्थियों को स्थायी रूप से बाहर रखने के बजाय अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य है।

यह फैसला यह संदेश भी देता है कि प्राधिकारियों को पूर्ववर्ती न्यायालयी निर्देशों का अक्षरशः और भाव से पालन करना चाहिए। तर्कसंगत और विधिसम्मत निर्णय न लेने की स्थिति में उनके आदेश रद्द किए जा सकते हैं और अनुपालन में विलंब के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय हो सकती है।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या शिक्षा विभाग, Bihar Reservation Act, 1991/1992 के तहत तीन लगातार विज्ञापनों पर जोर देते हुए Special Appointment Rules, 2013 और 2017 के अंतर्गत अनभरे आरक्षित वर्ग के जीवविज्ञान शिक्षक पदों का डी-आरक्षण करने से इनकार कर सकता था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जहाँ विशेष, एकमुश्त भर्ती में आगे विज्ञापन की अनुमति ही नहीं है, वहाँ इस आधार पर डी-आरक्षण से इनकार करने वाला मेमो सं. 84 दिनांक 20.03.2018 विधि-सम्मत नहीं था और इसलिए उसे निरस्त किया जाना आवश्यक था।
  • प्रश्न: उस याचिकाकर्ता को क्या राहत दी जानी चाहिए, जो संस्तुत जीवविज्ञान शिक्षक है किंतु रिक्त पद होने के बावजूद उसकी नियुक्ति नहीं हुई थी?
    उत्तर: न्यायालय ने प्रत्यक्ष नियुक्ति का आदेश नहीं दिया, बल्कि याचिकाकर्ता को विस्तृत अभ्यावेदन दाखिल करने का निर्देश दिया। Principal Secretary/Additional Chief Secretary को उसे व्यक्तिगत रूप से सुन कर आठ सप्ताह के भीतर उपयुक्त निर्णय लेना होगा, अन्यथा अनुपालन न होने पर उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही उत्पन्न होगी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय में 2001 (2) PLJR 110 में प्रकाशित पूर्ववर्ती पटना उच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख और उस पर भरोसा किया गया है, जिसके द्वारा समान रूप से स्थित जीवविज्ञान और गणित अभ्यर्थियों की रिट याचिकाएँ स्वीकार कर नियुक्ति के निर्देश दिए गए थे।
  • न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि 16.12.2004 को LPAs में राज्य की अपीलें खारिज की गईं तथा 28.08.2012 को Supreme Court द्वारा SLP (Civil) Nos. 6369–6376 of 2005 खारिज कर दी गईं, यद्यपि Supreme Court के विशिष्ट उद्धरण संख्या पाठ में उपलब्ध नहीं हैं।

मामले का विवरण

केस नंबर: Civil Writ Jurisdiction Case No. 4108 of 2019

केस शीर्षक: Anil Kumar v. The State of Bihar and Ors.

उद्धरण: 2024 (2) PLJR 673

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Anjani Kumar Sharan

निर्णय की तिथि: 19.03.2024

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Amit Srivastava, Senior Advocate; Mr. Girish Pandey, Advocate; Mr. Rakesh Kumar, Advocate
  • राज्य/प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Subhash Chandra Mishra, Standing Counsel 16

मामले का स्वरूप: विशेष नियुक्ति नियमों के अंतर्गत जीवविज्ञान शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए mandamus की माँग तथा आरक्षित वर्ग की रिक्तियों के डी-आरक्षण से इनकार करने वाले मेमो सं. 84 दिनांक 20.03.2018 को निरस्त करने के लिए दायर सिविल रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: आधिकारिक पटना उच्च न्यायालय का निर्णय यहाँ देखें

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