भूमिका:
यह मामला संजय यादव बनाम बिहार सरकार से संबंधित है, जिसमें पटना उच्च न्यायालय ने एक हत्या के मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर अपना फैसला दिया। यह मामला 2006 में पश्चिम चंपारण जिले में एक राजनीतिक हत्या से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता संजय यादव को हत्या (IPC की धारा 302/34) और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने 27 नवंबर 2013 को दोषसिद्धि सुनाई और 29 नवंबर 2013 को सजा सुनाई, जिसके तहत आजीवन कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इसके अलावा, आर्म्स एक्ट के तहत 3 साल की सजा और 5,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया।
इस फैसले के खिलाफ संजय यादव ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दायर की।
मामले की पृष्ठभूमि:
30 मई 2006 को संजय यादव और अन्य पर बाबूलाल प्रसाद की हत्या करने का आरोप लगाया गया।
बाबूलाल प्रसाद मुखिया चुनाव के उम्मीदवार थे और चुनावी प्रचार के दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी।
घटना का विवरण:
- शाम 6:15 बजे: बाबूलाल प्रसाद अपने बेटों और सहयोगियों के साथ गांव में प्रचार कर रहे थे।
- पुरवारी टोला, फत्तू छपर: जब वे इस स्थान पर पहुंचे, तो संजय यादव, नागेंद्र यादव और मुकेश यादव अपने साथियों के साथ घात लगाकर बैठे थे।
- अचानक गोलीबारी:
- संजय यादव ने सबसे पहले गोली चलाई, जिससे बाबूलाल घायल हो गए।
- नागेंद्र यादव ने दूसरी गोली चलाई, जो उनके चेहरे पर लगी।
- मुकेश यादव ने तीसरी गोली चलाई, जिससे बाबूलाल की मौके पर ही मौत हो गई।
- हमलावरों के नारे: हमला करने के बाद सभी आरोपी “संजय यादव जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए फरार हो गए।
पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया:
एफआईआर और जांच:
- जे कुमार (मृतक का बेटा) ने घटना की सूचना दी।
- पुलिस ने संजय यादव, नागेंद्र यादव और मुकेश यादव के खिलाफ मामला दर्ज किया।
- एफआईआर में आरोप: राजनीतिक दुश्मनी और चुनावी साजिश के कारण हत्या।
- पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट: बाबूलाल के चेहरे, छाती और पेट में गोलियों के घाव पाए गए।
- जांच अधिकारी: सुमन महतो ने घटनास्थल पर छानबीन की, शव परीक्षण रिपोर्ट जुटाई और गवाहों के बयान दर्ज किए।
- चार्जशीट: 2007 में संजय यादव को मुख्य आरोपी मानते हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई।
ट्रायल कोर्ट का फैसला:
- 2010 में सेशंस ट्रायल शुरू हुआ।
- 2013 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-1, बेतिया, ने संजय यादव को दोषी ठहराया।
- दोषसिद्धि: IPC धारा 302/34 और आर्म्स एक्ट धारा 27 के तहत।
- सजा:
- आजीवन कारावास
- ₹10,000 का जुर्माना (न भरने पर 1 साल अतिरिक्त कैद)
- आर्म्स एक्ट के तहत 3 साल की सजा और ₹5,000 का जुर्माना
अपील और उच्च न्यायालय में सुनवाई:
संजय यादव ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की और कहा कि:
- उनके खिलाफ सबूत अपर्याप्त हैं।
- मौका-ए-वारदात की सही जानकारी नहीं दी गई।
- गवाहों के बयान विरोधाभासी हैं।
- एफआईआर में बताए गए सभी आरोपी बाद में निर्दोष बताए गए, फिर सिर्फ संजय यादव को दोषी क्यों ठहराया गया?
- उनकी राजनीतिक दुश्मनी के कारण उन्हें झूठा फंसाया गया।
हाईकोर्ट की सुनवाई में प्रमुख बिंदु:
- गवाहों के विरोधाभासी बयान:
- कुछ गवाहों ने संजय यादव को हमलावर बताया, लेकिन कई ने कहा कि उन्होंने हमलावरों को नहीं पहचाना।
- एक गवाह ने कहा कि हत्या किसी और ने की, लेकिन पुलिस ने संजय यादव को फंसा दिया।
- पुलिस जांच में विसंगतियां:
- पुलिस की फोरेंसिक रिपोर्ट हत्या के तरीके और हमलावरों की संख्या पर स्पष्ट नहीं थी।
- हत्या का सही स्थान दर्ज नहीं किया गया था।
- राजनीतिक दुश्मनी का मुद्दा:
- संजय यादव ने दावा किया कि मृतक के परिवार से उनकी पुरानी रंजिश थी, इसलिए उन्हें झूठा फंसाया गया।
- एफआईआर और मेडिकल रिपोर्ट में अंतर:
- एफआईआर में कहा गया कि पहली गोली पेट में लगी, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह जानकारी अलग थी।
हाईकोर्ट का फैसला:
- पटना उच्च न्यायालय ने संजय यादव की अपील स्वीकार कर ली और निचली अदालत के फैसले को पलट दिया।
- अपर्याप्त सबूतों और जांच की खामियों के कारण संजय यादव को बरी कर दिया गया।
- कोर्ट ने कहा कि संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष:
- यह मामला राजनीति और अपराध के गठजोड़ को उजागर करता है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मात्र संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
- संजय यादव को पर्याप्त सबूतों की कमी के कारण रिहा किया गया।
- इस फैसले ने पुलिस जांच में पारदर्शिता की जरूरत को भी रेखांकित किया।
क्या यह मामला भविष्य में राजनीतिक हत्याओं पर असर डालेगा?
- यह फैसला पुलिस और न्याय व्यवस्था के लिए एक सबक है कि किसी भी मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
- राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कराने की प्रवृत्ति पर यह एक मिसाल हो सकता है।
- यह केस बिहार में चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
यह मामला राजनीतिक हत्याओं, पुलिस जांच की कमियों और न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को दर्शाता है। पटना हाईकोर्ट का फैसला इस बात का सबूत है कि न्यायपालिका बिना उचित प्रमाण के किसी को दोषी नहीं ठहराएगी।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NSM3NyMyMDE0IzEjTg==-RsPQXIxvRcE=


