भूमिका:
यह मामला ब्रॉड सन कमोडिटीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम बिहार सरकार से संबंधित है, जो कि पटना उच्च न्यायालय में दर्ज हुआ था। याचिकाकर्ता (ब्रॉड सन कमोडिटीज) ने राज्य सरकार द्वारा लगाए गए 1,39,50,39,924/- रुपये की रॉयल्टी मांग को चुनौती दी और यह दावा किया कि कंपनी ने कानूनी रूप से अपने अनुबंध का परित्याग (सरेन्डर) किया था। इस विवाद का मुख्य कारण बिहार सरकार द्वारा रेत खनन नीति में किया गया बदलाव और याचिकाकर्ता पर अवैध खनन के आरोप थे।
मामले की पृष्ठभूमि:
ब्रॉड सन कमोडिटीज प्राइवेट लिमिटेड को 2015 में बिहार के भोजपुर जिले के रेत घाटों के खनन अधिकार नीलामी के माध्यम से मिले थे। कंपनी ने 2019 तक लगातार इस व्यवसाय को संचालित किया, जिसके बाद बिहार सरकार ने बिहार सैंड माइनिंग पॉलिसी, 2019 लागू की।
सरकार ने 2019 के अंत में एक नया नियम लागू किया, जिससे पुराने पट्टेदारों (खननकर्ताओं) को 2021 तक अपने खनन अनुबंध बढ़ाने का विकल्प दिया गया। ब्रॉड सन कमोडिटीज ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और 31 मार्च 2021 तक रेत खनन जारी रखा।
विवाद की शुरुआत:
- कंपनी ने सरकार द्वारा तय किए गए पहले किस्त का भुगतान कर दिया, लेकिन अवैध रेत खनन और सरकारी मशीनरी की गैर-सहयोगात्मक नीति का हवाला देते हुए 26 अप्रैल 2021 को खनन अनुबंध से हटने (सरेन्डर) की मांग की।
- भोजपुर जिले के कलेक्टर ने इस अनुरोध को बिहार मिनरल्स (कन्सेशन, प्रिवेंशन ऑफ इल्लीगल माइनिंग, ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज) रूल्स, 2019 के तहत अस्वीकार कर दिया और कंपनी पर बकाया रॉयल्टी की मांग की।
- कंपनी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह दलील दी कि उसने खनन कार्य पहले ही बंद कर दिया था, इसलिए सरकार उसे बाकी की रॉयल्टी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
मामले की मुख्य दलीलें:
याचिकाकर्ता (कंपनी) की दलीलें:
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अनुबंध का परित्याग (Surrender of Settlement) कानून के अनुसार वैध था:
- कंपनी ने Rule 50 (1) of 2019 Rules के तहत खनन अधिकार छोड़ने का आवेदन दिया था।
- सरकार ने इस अनुरोध को गलत तरीके से खारिज किया और अनुचित रॉयल्टी की मांग की।
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अवैध रेत खनन और सरकारी असहयोग:
- कंपनी ने दावा किया कि भोजपुर जिले में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन हो रहा था, जिससे वैध खननकर्ता प्रभावित हो रहे थे।
- कंपनी ने सरकार से कई बार अवैध खनन रोकने की मांग की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
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परिवहन नीति में बदलाव:
- दिसंबर 2020 में सरकार ने 14-पहिया ट्रकों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे कंपनी के व्यापार को भारी नुकसान हुआ।
- इससे कंपनी की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था प्रभावित हुई और खनन कार्य करना असंभव हो गया।
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अनुबंध भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 56 के अनुसार शून्य (Void) हो गया:
- कंपनी ने यह तर्क दिया कि सरकार की नई नीतियों के कारण व्यवसाय जारी रखना असंभव (Impossibility of Performance) हो गया था।
- इस कारण अनुबंध स्वतः निरस्त हो गया और कंपनी पर किसी भी बकाया राशि का भुगतान करने की बाध्यता नहीं थी।
सरकार की दलीलें:
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कंपनी स्वयं अवैध खनन में लिप्त थी:
- सरकार ने दावा किया कि कंपनी ने अपने अनुबंधित क्षेत्र के बाहर रेत खनन किया और अवैध रूप से बिना ई-चालान के रेत का परिवहन किया, जिससे 15.84 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई।
- कंपनी के खिलाफ चांदी थाना कांड संख्या 30/2021 और सहार थाना कांड संख्या 37/2021 दर्ज किए गए।
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Rule 50 (1) का उल्लंघन किया गया:
- कंपनी ने खनन अनुबंध छोड़ने के लिए छह महीने की पूर्व सूचना नहीं दी, जो कि कानूनन अनिवार्य था।
- इस कारण अनुबंध का परित्याग (Surrender) वैध नहीं था, और कंपनी को पूरी रॉयल्टी का भुगतान करना होगा।
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Rule 77 (2) का गलत इस्तेमाल नहीं हो सकता:
- कंपनी ने तर्क दिया था कि Rule 77 (2) के तहत उसे अनुबंध से बाहर निकलने का अधिकार था, लेकिन सरकार का तर्क था कि यह नियम सिर्फ खनन अनुबंध देने के लिए लागू होता है, उसे छोड़ने के लिए नहीं।
- सरकार ने कहा कि कंपनी ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की थी और अब उसे बकाया राशि का भुगतान करना होगा।
अदालत का फैसला:
- कंपनी की याचिका खारिज कर दी गई।
- कोर्ट ने पाया कि कंपनी ने अपने अनुबंध के नियमों का पालन नहीं किया और उसने खनन अनुबंध छोड़ने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
- अदालत ने यह भी माना कि कंपनी अवैध खनन गतिविधियों में शामिल थी, जिसके चलते सरकार को राजस्व हानि हुई।
- नतीजतन, कंपनी को 1,39,50,39,924 रुपये की रॉयल्टी का भुगतान करना होगा।
निष्कर्ष:
यह मामला दिखाता है कि खनन क्षेत्र में सरकारी नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। यह निर्णय बिहार सरकार के खनन नीति को सख्ती से लागू करने के प्रयासों को मजबूत करता है।
हालांकि, इस मामले ने यह भी उजागर किया कि बिहार में अवैध खनन एक गंभीर समस्या बनी हुई है और सरकार को इसे रोकने के लिए अधिक प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
यह फैसला यह सिद्ध करता है कि:
- अनुबंधों को छोड़ने के लिए वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है।
- सरकार की नीतियों में बदलाव के बावजूद, कंपनियां अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकतीं।
- खनन व्यवसाय में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता है।
क्या यह फैसला भविष्य में खनन व्यवसाय को प्रभावित करेगा?
- यह फैसला खनन कंपनियों को यह स्पष्ट संकेत देता है कि अनुबंध से बाहर निकलना आसान नहीं होगा।
- सरकार को अवैध खनन रोकने और वैध खननकर्ताओं को उचित सुरक्षा प्रदान करने पर ध्यान देना होगा।
- कंपनियों को भविष्य में सरकारी नियमों का अधिक सावधानीपूर्वक पालन करना होगा।
यह फैसला कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सरकार को अवैध खनन को रोकने और कानूनी रूप से पट्टेदारों को जवाबदेह बनाने में मदद मिलेगी।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTMyNTEjMjAyMSMxI04=-qDMjX9vAHNE=


