परिचय
यह मामला पटना हाईकोर्ट में दाखिल एक सिविल याचिका से संबंधित है, जिसमें पति, विश्वजीत कुमार, ने अपने खिलाफ पारित गुजारा भत्ता (maintenance) के आदेश को चुनौती दी थी। यह मामला परिवार न्यायालय, पटना द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध दायर किया गया था, जिसमें पत्नी श्वेता कुमारी को ₹12,000 प्रति माह, उनके पुत्र को ₹3,000 प्रति माह, और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹10,000 देने का आदेश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
- शादी: विश्वजीत कुमार और श्वेता कुमारी की शादी 6 फरवरी 2006 को हुई थी।
- संतान: इस विवाह से 10 नवंबर 2008 को एक पुत्र का जन्म हुआ।
- विवाद और एफआईआर:
- शादी के कुछ वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ गए।
- 27 जून 2012 को श्वेता कुमारी ने अपने पति के खिलाफ 498A IPC (दहेज उत्पीड़न) का केस दर्ज कराया।
- इस केस में, पटना हाईकोर्ट ने पति को अग्रिम जमानत (pre-arrest bail) दी, लेकिन शर्त रखी कि वह पत्नी को ₹8,000 प्रति माह देगा।
- गुजारा भत्ता का दावा:
- 4 जून 2015 को पत्नी ने CRPC धारा 125 के तहत ₹1,50,000 प्रति माह गुजारा भत्ता के लिए कोर्ट में अर्जी दी।
- उनका दावा था कि उनके पति एक मरीन इंजीनियर हैं और ₹5 लाख प्रति माह कमाते हैं, उनके पास पटना में संपत्ति और 5 एकड़ कृषि भूमि है, जिससे वे ₹3 लाख प्रति वर्ष कमाते हैं।
- पत्नी ने कहा कि वह बेरोजगार हैं और अपने बेटे के साथ अपने माता-पिता के घर पर रह रही हैं।
पति की दलीलें
- पति ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि:
- पत्नी अपनी मर्जी से ससुराल छोड़कर गई थी, इसलिए उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए।
- पत्नी द्वारा लगाए गए झूठे केस के कारण उन्हें अपनी मरीन इंजीनियर की नौकरी छोड़नी पड़ी, और अब वह सिर्फ ₹12,000 प्रति माह की नौकरी कर रहे हैं।
- उन्हें अपने माता-पिता और अविवाहित बहन का भी खर्च उठाना पड़ता है।
- उनकी पत्नी खुद हाजीपुर के बी.डी. पब्लिक स्कूल में शिक्षिका हैं और ₹15,000 प्रति माह कमाती हैं।
- चूंकि हाईकोर्ट पहले ही ₹8,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दे चुका था, इसलिए परिवार न्यायालय का अतिरिक्त ₹4,000 प्रति माह देना अनुचित है।
पत्नी का पक्ष
- पत्नी ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
- उन्होंने 2015 में स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी, क्योंकि उन्हें अपने बेटे की देखभाल करनी थी।
- वह पूरी तरह से आर्थिक रूप से असहाय हैं और उनकी कोई आय नहीं है।
- पति ने जानबूझकर अपनी आय को कम करके दिखाने की कोशिश की है, ताकि उन्हें कम गुजारा भत्ता देना पड़े।
अदालत का फैसला
पटना हाईकोर्ट ने पति की अपील क्यों खारिज की?
न्यायालय ने पूरे मामले का गहराई से विश्लेषण किया और निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
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गुजारा भत्ता से बचने के लिए बहाने नहीं बनाए जा सकते
- कोर्ट ने कहा कि एक पढ़ा-लिखा, योग्य व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि वह सिर्फ ₹12,000 महीना कमा रहा है।
- पति पहले ₹5 लाख प्रति माह कमाते थे, और उनके पास अब भी बेहतर कमाई के विकल्प हैं।
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गुजारा भत्ता सिर्फ जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन के लिए दिया जाता है
- न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि पत्नी को “जानवरों की तरह जीने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता,” बल्कि उसे वह जीवन स्तर मिलना चाहिए जो वह पति के साथ रहते हुए पाती।
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“अपनी मर्जी से घर छोड़ने” का तर्क अस्वीकार किया गया
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना के कारण घर छोड़ने को मजबूर हुई, तो उसे गुजारा भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता।
- केवल पति द्वारा “वापस लौटने” की अपील करने से पत्नी पर घर लौटने का कोई कानूनी दायित्व नहीं बनता।
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पहले से दिए गए ₹8,000 के अलावा ₹4,000 देना गलत नहीं
- चूंकि पहले ₹8,000 का आदेश जमानत की शर्त के रूप में दिया गया था, इसलिए परिवार न्यायालय ने इसे ध्यान में रखते हुए अंतरिम भत्ता ₹12,000 तय किया और कुल ₹4,000 अतिरिक्त बढ़ाया।
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पत्नी की नौकरी का कोई प्रमाण नहीं
- पति यह साबित करने में असफल रहे कि उनकी पत्नी अभी भी शिक्षिका के रूप में काम कर रही हैं और ₹15,000 प्रति माह कमा रही हैं।
- अदालत ने पत्नी की बेरोजगारी को सही माना।
अंतिम निर्णय
- हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया और पति की अपील खारिज कर दी।
- न्यायालय ने कहा कि पति एक शारीरिक रूप से सक्षम और शिक्षित व्यक्ति हैं, जो अच्छा कमा सकते हैं, इसलिए पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से बचने का कोई बहाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
इस मामले में न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि पति की वित्तीय स्थिति और पत्नी की ज़रूरतों को संतुलित करना आवश्यक है। पति यह दावा नहीं कर सकते कि उनकी आय बहुत कम है, जबकि वे पहले ₹5 लाख प्रति माह कमाते थे। इसके अलावा, महिला को केवल जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने के लिए गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।
यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने वैवाहिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
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