यह मामला बच्चे की अभिरक्षा (कस्टडी) से संबंधित है, जिसमें पटना उच्च न्यायालय में एक पिता ने अपने चार वर्षीय बेटे शार्दुल की अभिरक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की। मामले की पृष्ठभूमि इस प्रकार है:
सुमित सौरव की शादी श्रद्धा मिश्रा से 2 मई 2014 को हुई थी। इस विवाह से एक बच्चे का जन्म हुआ। दुर्भाग्यवश, 23 अगस्त 2016 को श्रद्धा मिश्रा ने अपने माता-पिता के घर में आत्महत्या कर ली। इसके बाद 8 अक्टूबर 2016 को सुमित सौरव के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306, 304-बी/34 (दहेज मृत्यु और आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत एफआईआर दर्ज की गई। हालांकि 24 मई 2017 को उन्हें जमानत मिल गई।
बच्चे की अभिरक्षा मृतका के माता-पिता यानी बच्चे के नाना-नानी (लक्ष्मी नारायण मिश्रा और विनीता मिश्रा) के पास है। पिता सुमित सौरव ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बेटे की अभिरक्षा मांगी। उनका तर्क था कि हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत वह बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक है और उसे बच्चे की अभिरक्षा का प्राथमिक अधिकार है।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि:
1. यह याचिका पूरी तरह से बनती है
2. प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते याचिकाकर्ता को बच्चे की अभिरक्षा मिलनी चाहिए
हालांकि, पटना हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
1. सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के अनुसार बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी स्वीकार्य है जब बच्चे की हिरासत गैरकानूनी हो। इस मामले में बच्चा अपने नाना-नानी के साथ रह रहा है, जो पूरी तरह कानूनी है।
2. बच्चा अपनी मां की मृत्यु के बाद से ही नाना-नानी के साथ रह रहा है। मृतका ने पहले ही कुछ कार्यवाहियों में अपनी इच्छा जताई थी कि बच्चे का पालन-पोषण उसके माता-पिता करें।
3. याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 304 आईपीसी के तहत आपराधिक मामला लंबित है।
4. रिकॉर्ड में ऐसा कोई आरोप नहीं है कि बच्चे का पालन-पोषण ठीक से नहीं हो रहा है या उसे नाना-नानी से प्यार और स्नेह नहीं मिल रहा है।
5. याचिका में यह भी नहीं बताया गया है कि याचिकाकर्ता के परिवार में बच्चे की देखभाल कौन करेगा।
अदालत ने हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि कानून की दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का सर्वोत्तम हित है। मौजूदा परिस्थितियों में अदालत ने कोई निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं समझी और याचिका को खारिज कर दिया।
हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित कानूनों के तहत बच्चे की अभिरक्षा के लिए उचित कार्यवाही करने की छूट दी है। यानी वह नियमित सिविल कोर्ट में अभिरक्षा के लिए याचिका दायर कर सकते हैं।
इस मामले से कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आते हैं:
1. बच्चे की अभिरक्षा के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का हित होता है, न कि माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों का अधिकार।
2. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी स्वीकार्य है जब किसी की हिरासत गैरकानूनी हो। दादा-दादी या नाना-नानी द्वारा पोते-पोती की देखभाल गैरकानूनी नहीं मानी जा सकती।
3. अभिरक्षा के मामलों में अदालत कई कारकों को ध्यान में रखती है, जैसे:
– बच्चे का वर्तमान माहौल और देखभाल की स्थिति
– माता-पिता की योग्यता और परिस्थितियां
– बच्चे की भावनात्मक जरूरतें
– परिवार का माहौल
– लंबित आपराधिक मामले
4. प्राकृतिक अभिभावक होने का अधिकार निरपेक्ष नहीं है। इसे बच्चे के सर्वोत्तम हित के साथ संतुलित करना होता है।
यह केस आम लोगों के लिए कई महत्वपूर्ण सबक देता है:
1. बच्चों की अभिरक्षा के मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन करना महत्वपूर्ण है। भावनात्मक निर्णय लेने से बचना चाहिए।
2. बच्चे के हित को सर्वोपरि रखना चाहिए। व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर बच्चे की भलाई होनी चाहिए।
3. दादा-दादी या नाना-नानी द्वारा पोते-पोती की देखभाल एक स्वीकृत सामाजिक और कानूनी व्यवस्था है।
4. अभिरक्षा के मामलों में सही कानूनी प्रक्रिया का चयन महत्वपूर्ण है। हर मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उपयुक्त नहीं होती।
5. अभिरक्षा मांगने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि वह बच्चे की उचित देखभाल कर सकता है।
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