परिचय
यह मामला बिहार राज्य में गैर-औपचारिक शिक्षा योजना (Non-Formal Education Scheme) से जुड़े प्रशिक्षकों (Instructors) और पर्यवेक्षकों (Supervisors) के पुनर्वास से संबंधित है। इस योजना को समाप्त करने के बाद, राज्य सरकार ने केवल पर्यवेक्षकों को पुनर्वासित किया, लेकिन प्रशिक्षकों को कोई राहत नहीं दी गई। इस भेदभाव को लेकर प्रशिक्षकों ने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसका निर्णय राज्य सरकार के खिलाफ गया। सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, जिससे यह मामला हाई कोर्ट की दो जजों की खंडपीठ (Letters Patent Appeal – LPA) में पहुंचा।
मामले की पृष्ठभूमि
बिहार सरकार ने राज्य में अशिक्षा को दूर करने के लिए गैर-औपचारिक शिक्षा योजना चलाई थी। इस योजना के तहत प्रशिक्षकों और पर्यवेक्षकों को नियुक्त किया गया था। प्रशिक्षकों की संख्या पर्यवेक्षकों से लगभग पाँच गुना अधिक थी। लेकिन 2001 में यह योजना बंद कर दी गई, जिससे ये सभी कर्मचारी बेरोजगार हो गए।
सरकार ने 2010 में एक नीति बनाई, जिसके तहत सिर्फ गैर-औपचारिक पर्यवेक्षकों को पुनर्वासित किया गया, लेकिन प्रशिक्षकों को किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी गई। इस फैसले के खिलाफ प्रशिक्षकों ने पटना उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
एकल पीठ का निर्णय (Single Judge Decision)
न्यायमूर्ति ने माना कि प्रशिक्षक और पर्यवेक्षक दोनों ही एक समान स्थिति में थे क्योंकि दोनों की नौकरियां योजना के बंद होने के कारण गई थीं। उन्होंने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पर्यवेक्षक अधिक वेतन (₹600 प्रति माह) पाते थे और उनकी संख्या कम थी, जबकि प्रशिक्षकों को ₹200 प्रति माह मिलते थे और वे अधिक संख्या में थे।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकार प्रशिक्षकों को भी पुनर्वासित करे, क्योंकि वे भी बेरोजगारी की मार झेल रहे थे।
राज्य सरकार की अपील (LPA 1489/2011)
राज्य सरकार ने एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी और उच्च न्यायालय की खंडपीठ में अपील दायर की। सरकार ने तर्क दिया कि:
- प्रशिक्षकों और पर्यवेक्षकों के कार्य और योग्यताएँ अलग-अलग थीं।
- प्रशिक्षकों की संख्या बहुत अधिक थी, जिससे उन्हें पुनर्वासित करना संभव नहीं था।
- सरकार के पास सीमित संसाधन थे, इसलिए केवल पर्यवेक्षकों को पुनर्वास देना तर्कसंगत था।
खंडपीठ ने राज्य सरकार के इन तर्कों को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि जब योजना बंद हुई, तो प्रशिक्षक और पर्यवेक्षक दोनों एक समान स्थिति में आ गए। इसलिए केवल एक वर्ग को लाभ देना और दूसरे को अनदेखा करना असंवैधानिक था।
खंडपीठ का निर्णय (Division Bench Judgment)
खंडपीठ ने निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
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समानता का अधिकार (Right to Equality) का उल्लंघन:
सरकार का यह निर्णय कि केवल पर्यवेक्षकों को पुनर्वास मिलेगा और प्रशिक्षकों को नहीं, अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के खिलाफ था। -
प्रशिक्षकों और पर्यवेक्षकों की एक समान स्थिति:
दोनों ही वर्गों की नौकरियां योजना बंद होने के कारण गई थीं, इसलिए उनके बीच कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता था। -
सरकार की जिम्मेदारी:
सरकार कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों पर कार्य करती है, इसलिए उसका कर्तव्य बनता है कि वह अपने कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करे। -
संख्या का तर्क निराधार:
सरकार ने कहा था कि प्रशिक्षकों की संख्या बहुत अधिक थी, लेकिन कोर्ट ने यह पाया कि वास्तविक रूप में संख्या बहुत कम रह गई थी, क्योंकि:- कुछ प्रशिक्षक झारखंड राज्य में चले गए थे।
- कुछ ने अन्य नौकरियाँ ढूंढ ली थीं।
- कुछ सेवानिवृत्त हो चुके थे।
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पुनर्वास योजना का विस्तार:
कोर्ट ने आदेश दिया कि जिस नीति के तहत पर्यवेक्षकों को पुनर्वास दिया गया था, उसी नीति को प्रशिक्षकों पर भी लागू किया जाए।
निष्कर्ष
पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सरकार की अपील को खारिज कर दिया और आदेश दिया कि प्रशिक्षकों को भी सरकारी विभागों में समुचित नौकरियों में समायोजित किया जाए। हालांकि, इस पुनर्वास योजना का लाभ केवल उन्हीं प्रशिक्षकों को मिलेगा जो योजना समाप्त होने के समय कम से कम तीन वर्षों तक कार्यरत थे।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्वास प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए और जो प्रशिक्षक सेवानिवृत्त हो चुके हैं या नौकरी करने की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।
महत्वपूर्ण प्रभाव
- इस फैसले से हजारों प्रशिक्षकों को लाभ मिला, जो वर्षों से बेरोजगारी झेल रहे थे।
- यह निर्णय समानता के अधिकार और कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों को मजबूत करता है।
- राज्य सरकार को भविष्य में ऐसी योजनाओं को बंद करते समय अपने कर्मचारियों के पुनर्वास की स्पष्ट नीति बनानी होगी।
समाप्ति
यह मामला सरकारी नीतियों में न्यायसंगतता और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा था। कोर्ट का फैसला यह दिखाता है कि सरकार को अपने निर्णयों में निष्पक्षता और संवेदनशीलता रखनी चाहिए ताकि किसी भी वर्ग को अन्याय का सामना न करना पड़े।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMjEzOTEjMjAxMSMxI08=-YvMDb3A4u–ak1–g=


