मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बिहार के विभिन्न सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में फैकल्टी सदस्य के रूप में कार्यरत आठ डॉक्टरों द्वारा दायर किया गया था। वे श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुजफ्फरपुर; जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, भागलपुर; गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, बेतिया; नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल; गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, पूर्णिया; और दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल सहित संस्थानों में सहायक प्रोफेसर, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष जैसे पदों पर कार्यरत हैं।
तत्काल कारण राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा जारी 16 अप्रैल 2025 की एक सार्वजनिक सूचना थी। इस सूचना द्वारा NMC के नियमनाधीन सभी मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों को निर्देश दिया गया कि वे 1 मई 2025 से उपस्थिति दर्ज करने के लिए पूर्ण रूप से फेस-आधारित आधार प्रमाणीकरण पर शिफ्ट हों। उपस्थिति केवल कॉलेज के स्वीकृत जीपीएस स्थानों के 100 मीटर के दायरे में, फैकल्टी के फोन पर एक मोबाइल ऐप के माध्यम से दर्ज की जानी थी।
इस केंद्रीय सूचना के बाद, बिहार के राज्य स्वास्थ्य विभाग और व्यक्तिगत कॉलेजों ने कार्रवाई की। श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, मुजफ्फरपुर के प्राचार्य ने 21 अप्रैल 2025 के कार्यालय आदेश (संस्मरण संख्या 1128/25) के माध्यम से सभी विभागाध्यक्षों को 1 मई 2025 से फैकल्टी उपस्थिति के लिए फेस-आधारित आधार प्रमाणीकरण लागू करने का निर्देश दिया। बाद में, बिहार स्वास्थ्य विभाग के विशेष कार्य पदाधिकारी ने 30 अप्रैल 2025 के पत्र संख्या 414(17) द्वारा बिहार के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के प्राचार्यों एवं अधीक्षकों को इसी प्रणाली को अनिवार्य रूप से लागू करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता सिविल रिट क्षेत्राधिकार में पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आए। उन्होंने NMC की सार्वजनिक सूचना, प्राचार्य का कार्यालय आदेश तथा राज्य स्वास्थ्य विभाग के पत्र को रद्द करने की मांग की। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि न्यायालय प्राधिकारियों को फेस-आधारित आधार उपस्थिति लागू करने से रोके और इस योजना के तहत पहले से एकत्र किए गए सभी आंकड़ों को नष्ट (डिलीट) करने का निर्देश दे।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ताओं की मुख्य शिकायत यह थी कि उपस्थिति दर्ज करने के लिए अनिवार्य फेस-आधारित आधार प्रमाणीकरण, साथ ही जीपीएस लोकेशन साझा करना, संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत उनकी गोपनीयता और गरिमा के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों K.S. Puttaswamy (Privacy-9J.) v. Union of India, (2017) 10 SCC 1 और K.S. Puttaswamy (Aadhaar-5J.) v. Union of India, (2019) 1 SCC 1 पर विशेष रूप से भरोसा किया। उनका तर्क था कि इन फैसलों ने सूचनात्मक गोपनीयता को जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा माना है, और आधार के उपयोग को मुख्यतः सब्सिडी, लाभ और सेवाओं से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित रखा है।
याचिकाकर्ताओं ने आधार अधिनियम की धारा 7 का उल्लेख किया, जो केवल ऐसी सब्सिडी, लाभ या सेवाएं प्राप्त करने के लिए आधार-आधारित प्रमाणीकरण की अनुमति देती है जो भारत या राज्य के समेकित कोष से वित्तपोषित हों। उनका कहना था कि वेतनभोगी सरकारी डॉक्टरों की उपस्थिति के लिए आधार का उपयोग इस सीमित दायरे से परे है।
उन्होंने आधार अधिनियम की धाराएं 8, 23, 53 और 57 तथा Aadhaar Authentication for Good Governance (Social Welfare, Innovation, Knowledge) Rules, 2020, विशेषकर नियम 3 का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, आधार प्रमाणीकरण स्वैच्छिक है और केवल सीमित सुशासन उद्देश्यों के लिए ही, राज्य के उद्देश्य के अनुपातिक तरीके से, उपयोग किया जा सकता है।
उनके मुताबिक, जीपीएस के साथ अनिवार्य फेस-आधारित आधार उपस्थिति निरंतर निगरानी के बराबर है। यह डॉक्टरों को उनकी संवेदनशील पहचान और लोकेशन संबंधी डेटा साझा करने तथा अपने निजी मोबाइल फोन पर एक तृतीय-पक्ष ऐप इंस्टॉल करने के लिए बाध्य करता है, जबकि कथित तौर पर पर्याप्त डेटा सुरक्षा प्रावधान उपलब्ध नहीं हैं। उनका कहना था कि इससे जिम्मेदार चिकित्सा शिक्षकों को लगातार निगरानी में रखी गई “चल संपत्ति (चैटल्स)” तक सीमित कर दिया जाता है, जो गरिमा और पेशेवर स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
दूसरी ओर, NMC (प्रतिवादी 1–3) ने एक विस्तृत प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल किया। इसमें मेडिकल कॉलेजों में बायोमेट्रिक उपस्थिति के इतिहास का विवरण दिया गया। NMC ने सबसे पहले 20 अक्टूबर 2020 की राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से, जो National Medical Commission Act की धारा 57 के तहत जारी हुई थी, बायोमेट्रिक उपस्थिति शुरू की। स्वयं इस अधिसूचना को याचिकाकर्ताओं ने कभी चुनौती नहीं दी थी।
इसके बाद NMC ने कई संचार जारी किए: 1 अगस्त 2022 का पत्र (सभी संस्थानों को NIC Aadhaar Enabled Biometric Attendance System के बारे में सूचित करते हुए), 12 अगस्त 2022 की अधिसूचना, 20 अगस्त 2022 की NIC की अधिसूचना, 25 जनवरी 2023 को सभी मेडिकल कॉलेजों को यह प्रणाली लागू करने का NMC का निर्देश, और 2 जून 2023 की एक और राजपत्र अधिसूचना, जिसके द्वारा सभी मेडिकल कॉलेजों में आधार-आधारित उपस्थिति शुरू की गई। 16 अगस्त 2023 को आधार-सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति को अनिवार्य कर दिया गया। Medical Assessment and Rating Board (MARB) की 16 नवंबर 2023 की सार्वजनिक सूचना के माध्यम से Aadhaar Enabled Biometric Attendance System (AEBAS) के जरिए फेस आइडेंटिफिकेशन से उपस्थिति शुरू की गई। NMC की वार्षिक रिपोर्ट 2022–2023 में दर्ज है कि फिंगर-आधारित बायोमेट्रिक्स में कमियों के कारण AEBAS को अनिवार्य किया गया।
बिहार राज्य के महाधिवक्ता ने आधार-आधारित फेस उपस्थिति के साथ जीपीएस लोकेशन जोड़ने के व्यावहारिक कारणों पर जोर दिया। पहले, डॉक्टर आईरिस या फेस आइडेंटिफिकेशन के माध्यम से दूरस्थ स्थानों से भी बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज कर सकते थे, बिना वास्तविक रूप से अस्पताल में उपस्थित हुए। उदाहरण के तौर पर बताया गया कि चंडीगढ़ में कार्यरत एक डॉक्टर पटना में उपस्थिति दिखा सकता था। 100 मीटर के दायरे में जीपीएस टैगिंग जोड़ने के बाद ऐसे दुरुपयोग पर रोक लग गई। राज्य के अनुसार, यही असंतोष की वास्तविक वजह थी: वे डॉक्टर जो कार्यालय समय में समानांतर निजी प्रैक्टिस में लगे थे, उन्हें आशंका थी कि सख्त जीपीएस-आधारित उपस्थिति से सरकारी ड्यूटी से उनकी अनुपस्थिति उजागर हो जाएगी।
महाधिवक्ता ने यह भी इंगित किया कि याचिकाकर्ताओं ने जहां मूल अधिकारों के उल्लंघन का हवाला दिया, वहीं वे किसी ठोस कठिनाई या अपने डेटा के किसी विशिष्ट दुरुपयोग का उदाहरण देने में विफल रहे। दायर की गई याचिका में यह नहीं बताया गया कि इस प्रणाली के कारण वे किस खास संकट से गुजर रहे हैं।
भारत संघ की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने NMC और महाधिवक्ता की दलीलों को अपनाया।
न्यायमूर्ति विवेक चौधुरी ने सभी पक्षों की दलीलें सुनीं और आधार के कानूनी ढांचे तथा पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों की जांच की। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि गोपनीयता गरिमा का एक पहलू है और सूचनात्मक गोपनीयता अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, जैसा कि Puttaswamy में मान्यता दी गई। उसने यह भी नोट किया कि गोपनीयता में किसी भी हस्तक्षेप को आनुपातिकता की कसौटी पर परखा जाएगा: उसके लिए एक विधि होनी चाहिए, राज्य का वैध उद्देश्य होना चाहिए, और उपाय का उपयोग उस उद्देश्य के अनुपात में होना चाहिए।
हालाँकि, न्यायालय ने माना कि मेडिकल कॉलेजों में आधार-आधारित उपस्थिति को वैधानिक और कार्यपालिका संबंधी उपायों के माध्यम से लागू किया गया, जिनमें NMC Act के तहत अधिसूचनाएं और Good Governance Rules, 2020 (जिसमें 2025 में संशोधन किया गया) शामिल हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की 25 मार्च 2025 की परिपत्र द्वारा उन संस्थाओं के लिए मानक संचालन प्रक्रिया निर्धारित की गई जो नियम 3 में उल्लिखित उद्देश्यों — जैसे सुशासन और सार्वजनिक धन के लीकेज की रोकथाम — के लिए आधार प्रमाणीकरण का उपयोग करना चाहती हैं। न्यायालय ने इस ढांचे को सरकार के इस इरादे के रूप में पढ़ा कि वह आधार-आधारित उपस्थिति को सुशासन के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है।
महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं ने मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में फैकल्टी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए किसी वैकल्पिक विश्वसनीय तंत्र का सुझाव नहीं दिया। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली पहले से ही देशभर में, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी दफ्तरों सहित, व्यापक रूप से उपयोग में है।
बायोमेट्रिक उपस्थिति की वैधता का आकलन करने के लिए न्यायालय ने कई पूर्ववर्ती निर्णयों का सहारा लिया। उसने Rajesh Kumar Rathore v. State of Chhattisgarh (SLA (Crl.) No. 4116 of 2021) में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लेख किया, जिसमें न्यायालय ने आपराधिक न्यायालयों में जमानतदारों की वास्तविकता की जांच के लिए आधार डेटा के उपयोग को सुशासन का हिस्सा माना। उसने Union of India & Ors. v. Dillip Kumar Rout & Ors., Civil Appeal No. 13572 of 2015 (निर्णय दिनांक 29 अक्टूबर 2015) पर भरोसा किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने Principal Accountant General (A&E) के कार्यालय में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली की शुरुआत को बरकरार रखा और यह कहा कि कर्मचारियों से पूर्व परामर्श का न होना प्रणाली को अवैध नहीं बनाता।
पटना उच्च न्यायालय ने अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी उल्लेख किया। मद्रास उच्च न्यायालय की एक द्वैवपीठ ने W.P. No. 5569 of 2019 (Sri Thirupathy Venkatachalapathy) में सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों के लिए बायोमेट्रिक मशीनों की स्थापना को बरकरार रखा। W.P. No. 9314 of 2019 (Mrs. R. Annal v. State of Tamil Nadu & Ors.) में मद्रास उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए आधार-सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। उस निर्णय में यह जोर दिया गया कि करदाताओं के पैसों से वेतन पाने वाले शिक्षक सेवा नियमों से बंधे हैं और सार्वजनिक सेवा में रहते हुए अपनी पहचान छिपाए रखने का मूल अधिकार दावा नहीं कर सकते।
इसी प्रकार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने W.P. (C) No. 13239 of 2022 (Paramedical Technical Staff Welfare Association of MCD v. Government of NCT of Delhi & Anr.) में यह माना कि पैरामेडिकल स्टाफ की उपस्थिति के लिए MCD Smart App की शुरुआत न तो मनमानी है, न ही अनुचित, और यह कि सार्वजनिक प्राधिकारियों को नीतियां बनाने की स्वतंत्रता है।
इन सभी पूर्ववर्ती निर्णयों और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं की शिकायत निराधार है। बायोमेट्रिक उपस्थिति पहले से ही देशभर के मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में प्रचलित है। यह आशंका मात्र कि प्राधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग किया जा सकता है, किसी भी उदाहरण या साक्ष्य से समर्थित नहीं थी। न्यायालय ने कहा कि निराधार डर के आधार पर मूल अधिकारों की सुरक्षा हेतु रिट जारी नहीं किए जा सकते; याचिकाकर्ताओं को किसी विशेष, वास्तविक उल्लंघन को दिखाना होता है, जो वे नहीं कर पाए।
न्यायालय ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की दयनीय स्थिति, जिसमें अपर्याप्त संख्या में फैकल्टी, संविदा शिक्षक तथा तकनीकी और प्रशासनिक स्टाफ के साथ चल रहे सरकारी अस्पताल शामिल हैं, का भी न्यायिक संज्ञान लिया। इस परिप्रेक्ष्य में, फैकल्टी के लिए एक त्रुटिरहित उपस्थिति प्रणाली शुरू करने के NMC के प्रयास को न तो मनमाना और न ही असंवैधानिक कहा जा सकता है।
तदनुसार, न्यायालय ने रिट याचिका को प्रतिवाद पर खारिज कर दिया और व्ययों के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। साथ ही, न्यायालय ने NMC को एक महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया। न्यायालय ने देखा कि केवल उपस्थिति सुनिश्चित करना स्वास्थ्य क्षेत्र की गहरी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। इसलिए, न्यायालय ने NMC को निर्देश दिया कि वह राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त कार्रवाई करे कि वे चिकित्सा शिक्षण सेवा के रिक्त पदों को भरने के लिए समयबद्ध अवधि में भर्ती अभियान शुरू करें। इस निर्णय की प्रति सीधे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में NMC के सचिव को भेजने का आदेश दिया गया, ताकि इन टिप्पणियों को अधिमानतः छह माह के भीतर लागू किया जा सके।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार और उससे बाहर के डॉक्टरों, मेडिकल शिक्षकों, अस्पताल प्रशासकों और स्वास्थ्य प्राधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सरकारी मेडिकल फैकल्टी केवल गोपनीयता के उल्लंघन का दावा करके, बिना किसी विशिष्ट हानि या डेटा के दुरुपयोग को दिखाए, बायोमेट्रिक उपस्थिति से इंकार नहीं कर सकती।
सरकार और NMC जैसी नियामक संस्थाओं के लिए, यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में आधार-सक्षम बायोमेट्रिक और जीपीएस-आधारित उपस्थिति के उपयोग को सुशासन के एक साधन के रूप में समर्थन देता है। यह रेखांकित करता है कि जब ऐसी प्रशासनिक नीतियों का वैधानिक आधार हो और वे अनुपस्थिति रोकने जैसे वैध उद्देश्य को साधने के लिए हों, तो न्यायालय सामान्यतः उनमें दखल नहीं देगा।
इसी के साथ, न्यायालय ने यह भी माना कि केवल उपस्थिति पर निगरानी से कमज़ोर स्टाफ वाली स्वास्थ्य प्रणाली की मरम्मत नहीं हो सकती। राज्य सरकारों को रिक्त शिक्षण पदों को भरने के लिए प्रेरित करने संबंधी NMC को दिया गया निर्देश, जवाबदेही उपायों और पर्याप्त स्टाफिंग के बीच के संबंध को उजागर करता है। यदि उपस्थिति और स्टाफिंग दोनों में सुधार होता है, तो सरकारी मेडिकल कॉलेजों में मरीजों और छात्रों को लाभ मिलेगा।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फैकल्टी की उपस्थिति के लिए अनिवार्य आधार-आधारित फेस प्रमाणीकरण, जीपीएस के साथ, उनकी गोपनीयता के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है और आधार अधिनियम के दायरे से परे जाता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि बायोमेट्रिक उपस्थिति को सुशासन के लिए विधिपूर्वक लागू किया गया है, याचिकाकर्ता अपने डेटा के किसी ठोस उल्लंघन या दुरुपयोग को नहीं दिखा सके, और केवल आशंका के आधार पर प्रणाली को रद्द नहीं किया जा सकता। - प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी के लिए आधार-सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति शुरू करने संबंधी NMC के नीतिगत निर्णय में दखल दे सकता है?
उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक प्राधिकरणों को उपस्थिति संबंधी नीतियां बनाने की स्वतंत्रता है और ऐसी प्रणालियां, जो सभी हितधारकों के हित में हों, न तो मनमानी हैं और न ही असंवैधानिक।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- K.S. Puttaswamy (Privacy-9J.) v. Union of India, (2017) 10 SCC 1
- K.S. Puttaswamy (Aadhaar-5J.) v. Union of India, (2019) 1 SCC 1
- Binoy Viswam v. Union of India, (2017) 7 SCC 59
- Rajesh Kumar Rathore v. The State of Chhattisgarh, SLA (Crl.) No. 4116 of 2021, order dated 11 June 2021
- Union of India & Ors. v. Dillip Kumar Rout & Ors., Civil Appeal No. 13572 of 2015, judgment dated 29 October 2015
- Sri Thirupathy Venkatachalapathy v. State (case title as recorded), W.P. No. 5569 of 2019 and WMP No. 6339 of 2019, Madras High Court
- Mrs. R. Annal v. The State of Tamil Nadu & Ors., W.P. No. 9314 of 2019 and WMP Nos. 9863 & 9866 of 2019, Madras High Court
- Paramedical Technical Staff Welfare Association of MCD v. Government of NCT of Delhi & Anr., W.P. (C) No. 13239 of 2022 and CM Appl. 40117 of 2022, Delhi High Court
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 11111 of 2025
मामले का शीर्षक: Dr. Shyam Kumar Satyapal & Ors. v. The National Medical Commission & Ors.
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Bibek Chaudhuri
निर्णय की तिथि: 17-01-2026
उद्धरण: 2026 (2) PLJR 431
पक्षकारों के अधिवक्ता: याचिकाकर्ताओं के लिए: Ms. Shrishti Singh, Advocate; Mr. Pranav Kumar, Advocate; Mr. Saurabh Sunder, Advocate; Mr. Ashish Gaurav, Advocate. राज्य/प्रतिवादियों के लिए: Mr. P.K. Sahi, Advocate General; Mr. P.N. Sharma, AC to AG. NMC के लिए: Mr. Kumar Priya Ranjan, Senior Standing Counsel; Mr. Sudarshan Bharadwaj, Advocate. भारत संघ के लिए: Dr. K.N. Singh, Additional Solicitor General; Mr. Amit Kishore Sinha, Central Government Counsel.
मामले का स्वरूप: अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका, जिसमें मेडिकल कॉलेज फैकल्टी के लिए अनिवार्य आधार-सक्षम फेस और जीपीएस-आधारित उपस्थिति की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती दी गई और इसके कार्यान्वयन को रोकने तथा एकत्र किए गए डेटा को नष्ट करने के निर्देश मांगे गए।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 11111 of 2025
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