अप्रकटीकरण के कारण उम्मीदवारी रद्दीकरण निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2025

इस मामले में, चयनित पुलिस अभ्यर्थी की नियुक्ति को ऑनलाइन फॉर्म में पुराने आपराधिक मामलों का उल्लेख न करने के कारण रद्द कर दिया गया था। पटना उच्च न्यायालय ने यह जांचा कि यह अप्रकटीकरण धोखाधड़ी था या क्षम्य भूल। न्यायालय ने रद्दीकरण आदेश को निरस्त करते हुए प्राधिकरण को मामले पर पुनः नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। अब न्यायालय के अवलोकनों के आलोक में याचिकाकर्ता की पात्रता का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने बिहार पुलिस में सहायक अवर निरीक्षक के पद के लिए बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग द्वारा जारी विज्ञापन संख्या 01/2017 के अनुपालन में आवेदन किया।

आवेदन के साथ, अभ्यर्थियों को एक अभ्यावेदन प्रपत्र भरना था जिसमें किसी भी आपराधिक मामला, प्राथमिकी (FIR), गिरफ्तारी, विचारण, दोषसिद्धि, बरी, या सद्व्यवहार के लिए बांड आदि के संबंध में स्पष्ट उत्तर देना अनिवार्य था।

इस अभ्यावेदन में, याचिकाकर्ता ने किसी भी पूर्व या लंबित आपराधिक मामला, गिरफ्तारी, विचारण, दोषसिद्धि, बरी अथवा बांड से संबंधित सभी प्रश्नों के उत्तर “नहीं” में दिए।

याचिकाकर्ता ने प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा तथा शारीरिक परीक्षण उत्तीर्ण किया। तत्पश्चात आयोग द्वारा जारी पत्रांक 211/आयोग दिनांक 09.03.2019 के माध्यम से उसे सहायक अवर निरीक्षक के पद पर चयनित किया गया, जिसमें उसे मूल अभिलेखों एवं पहचान प्रमाण के साथ ज्वॉइन करने का निर्देश दिया गया।

27.05.2019 को याचिकाकर्ता ने घोषणा प्रपत्र के साथ अपना योगदान (ज्वॉइनिंग) प्रस्तुत किया। सत्यापन के दौरान 27.04.2019 को उसने वजीरगंज थाना के दो आपराधिक मामलों का खुलासा किया: मामला संख्या 50 वर्ष 2011 तथा मामला संख्या 111 वर्ष 2019।

इस खुलासे के बाद उप पुलिस अधीक्षक (गृह), आई.जी. कार्यालय, मगध रेंज, गया ने पत्रांक 1412 दिनांक 03.09.2019 द्वारा उसकी ज्वॉइनिंग को आपराधिक मामलों के अंतिम निस्तारण तक “स्थगित” (on hold) रखा।

इसके उपरांत की गई जांच तथा गया के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की ओर से प्राप्त नए चरित्र सत्यापन प्रतिवेदन से यह स्पष्ट हुआ कि मामला संख्या 50 वर्ष 2011 में याचिकाकर्ता बरी हो चुका था और मामला संख्या 111 वर्ष 2019 उसके विरुद्ध “असत्य” पाया गया, जिस पर अंतिम प्रपत्र प्रस्तुत कर दिया गया था तथा न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया था।

इन परिणामों के बावजूद, बिहार विशेष कार्य बल, पुलिस उप महानिरीक्षक (अभियान), (प्रतिवादी संख्या 4) ने पत्रांक 22 दिनांक 25.01.2021 द्वारा याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को रद्द कर दिया और प्रारंभिक अभ्यावेदन में आपराधिक मामलों के “छिपाने” के आधार पर उसे पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय, माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार की पीठ, ने एक केंद्रीय प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया: क्या ऑनलाइन अभ्यावेदन प्रपत्र में अपने आपराधिक मामलों का उल्लेख न करने की याचिकाकर्ता की विफलता इतनी गंभीर दमन (suppression) या धोखाधड़ी थी कि उसे पुलिस सेवा से स्थायी रूप से अयोग्य ठहराया जा सके।

सबसे पहले, न्यायालय ने निर्विवाद तथ्यात्मक क्रम को दर्ज किया। अभ्यावेदन प्रपत्र में याचिकाकर्ता ने आपराधिक पूर्ववृत्त से संबंधित सभी पाँच प्रश्नों पर “नहीं” का विकल्प चुना था। बाद में, चरित्र सत्यापन के दौरान उसने स्वेच्छा से निम्नलिखित का खुलासा किया:

(a) वजीरगंज थाना कांड संख्या 50 वर्ष 2011, भारतीय दंड संहिता की धारा 447, 341, 307, 504 तथा 354/34 के अंतर्गत, जिसमें सत्र वाद संख्या 154 वर्ष 2016 में 30.08.2019 के निर्णय द्वारा उसे बरी कर दिया गया; तथा

(b) वजीरगंज थाना कांड संख्या 111 वर्ष 2019, भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 354 तथा 504/34 के अंतर्गत, जिसमें वह मूल रूप से आरोपित नहीं था, जाँच के दौरान उसका नाम सामने आया, किंतु अंतिम प्रपत्र (अंतिम प्रपत्र संख्या 127/2019 दिनांक 06.07.2019) में मामला उसके विरुद्ध असत्य पाया गया और न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया गया।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कंप्यूटर आधारित फॉर्म भरते समय उससे भूल हो गई क्योंकि वह कंप्यूटर से भलीभांति परिचित नहीं था। उसने यह भी रेखांकित किया कि चरित्र सत्यापन के समय उन्हीं मामलों का खुलासा उसने स्वयं किया, जिसके फलस्वरूप विस्तृत चरित्र प्रतिवेदनों की मांग हुई। उन प्रतिवेदनों से पुष्टि हुई कि कोई मामला लंबित नहीं है और उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल दोषसिद्धि नहीं है।

उसने यह भी तर्क दिया कि मूल विवाद साधारण ग्रामीण झगड़े से संबंधित थे — एक पारिवारिक खेत में पशुओं के अवैध चराई को लेकर और दूसरा दो समूहों के बीच हल्की हाथापाई और गाली-गलौज से संबंधित। उसका कहना था कि ऐसे मामले, जो बरी होने या बंद होने पर समाप्त हो चुके हों, किसी युवा व्यक्ति के पूरे करियर को नष्ट नहीं करने चाहिए, विशेषकर तब जबकि उसने बाद में सचाई भी बता दी हो।

याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों पर भरोसा किया: Avtar Singh बनाम Union of India, Commissioner of Police बनाम Sandeep Kumar, Commissioner of Police Delhi बनाम Dhaval Singh, Rajasthan Rajya Vidyut Prasaran Nigam Ltd. बनाम Anil Kanwariya, Pawan Kumar बनाम Union of India, तथा Ravindra Kumar बनाम State of UP। उसने पटना उच्च न्यायालय के दो एकलपीठीय निर्णयों Sonu Kumar बनाम State of Bihar तथा Rakesh Kumar Singh बनाम State of Bihar पर भी निर्भरता जताई, जिनमें समान प्रकार के प्रारंभिक फॉर्म में अप्रकटीकरण को बाद में चरित्र सत्यापन प्रपत्र में सुधार दिया गया था और उम्मीदवारी रद्दीकरण को निरस्त कर दिया गया था।

राज्य तथा आयोग ने यह कड़ा रुख अपनाया कि पुलिस भर्ती में उच्चतम स्तर की ईमानदारी एवं पारदर्शिता अपेक्षित है। उनका तर्क था कि आपराधिक मामलों के संबंध में किसी भी प्रकार की गलत जानकारी, चाहे बाद में खुलासा कर दिया जाए या अभ्यर्थी बरी ही क्यों न हो जाए, पुलिस में जनता के भरोसे को आघात पहुँचाती है।

उन्होंने बिहार पुलिस मैनुअल के नियम 673 और नियम 668 पर विशेष रूप से भरोसा किया:

नियम 673 में प्रावधान है कि सत्यापन रोल से यह प्रमाणित होना चाहिए कि अभ्यर्थी द्वारा अपने पूर्ववृत्त के संबंध में दिया गया वक्तव्य सत्य है, और यदि चरित्र खराब पाया जाए या वक्तव्य असत्य हो, तो “उसे बल से हटा दिया जाएगा”।

नियम 668 सत्य चरित्र सत्यापन की अपेक्षा करता है और यह कहता है कि आपराधिक पूर्ववृत्त के बारे में किसी प्रकार की असत्य घोषणा अभ्यर्थी को अयोग्य बना देती है।

राज्य का तर्क था कि आवेदन के समय याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से सभी प्रश्नों के उत्तर “नहीं” में दिए, जबकि उसके विरुद्ध आपराधिक मामला लंबित था। उनके अनुसार यह जानबूझकर किया गया दमन था और बिहार पुलिस मैनुअल का उल्लंघन, जो रद्दीकरण को न्यायोचित ठहराता है। उन्होंने Avtar Singh तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय State of Madhya Pradesh बनाम Parvez Khan पर भरोसा किया और पटना उच्च न्यायालय के निर्णय Union of India बनाम Bindeshwari Prasad का भी उल्लेख किया, जिसमें अप्रकटीकरण के कारण उम्मीदवारी अस्वीकार कर दी गई थी।

इसके बाद न्यायालय ने सार्वजनिक रोजगार में आपराधिक पूर्ववृत्त के दमन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित विधिक सिद्धांतों की ओर रुख किया। उसने उल्लेख किया कि:

Devendra Kumar बनाम State of Uttaranchal में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाना स्वयं में नैतिक अधमता (moral turpitude) का कृत्य है, जो मूल आपराधिक मामले से भिन्न है, और व्यक्ति के बाद में बरी या आरोपमुक्त होने पर भी सेवा समाप्ति को न्यायसंगत बना सकता है।

S.P. Chengalvaraya Naidu बनाम Jagannath में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मिथ्याप्रस्तुति या धोखाधड़ी से प्राप्त नियुक्तियाँ विधि की दृष्टि में मान्य नहीं रह सकतीं।

हालाँकि, न्यायालय ने Jainendra Singh, Avtar Singh, Mohammed Imran, Ravindra Kumar, Umesh Chandra Yadav, Satish Chandra Yadav आदि के अनेक निर्णयों का भी परीक्षण किया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि:

चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन अनिवार्य है, विशेषकर अनुशासित बलों में।

हर अप्रकटीकरण के मामले का यांत्रिक रूप से एक ही तरह से निपटान नहीं किया जाना चाहिए; नियोक्ता को विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करते हुए विशेष परिस्थितियों पर विचार करना होगा।

तुच्छ मामलों में, विशेषकर जहाँ बरी हो चुका हो और अभ्यर्थी बाद में सत्यतापूर्वक तथ्य प्रकट कर दे, नियोक्ता अपने विवेक से इस त्रुटि को क्षमा कर सकता है।

जहाँ पूर्ण प्रकटीकरण भी हो, वहाँ भी यदि पूर्ववृत्त अनुपयुक्तता दर्शाते हों तो नियोक्ता नियुक्ति से इनकार कर सकता है; परन्तु जहाँ अप्रकटीकरण हो, वहाँ भी प्राधिकार को प्रकरण की गंभीरता, कार्यवाही की अवस्था और पद की प्रकृति पर विचार करना आवश्यक है।

Sandeep Kumar तथा Dhaval Singh में सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से यह बल दिया कि “युवा तो युवा ही रहेंगे”, युवावस्था की छोटी- मोटी भूलों के कारण किसी को जीवनभर के लिए अपराधी नहीं ठहराया जाना चाहिए, और बाद का सत्य प्रकटीकरण प्रारंभिक त्रुटि को दूर करने के रूप में माना जा सकता है।

इसके बाद पटना उच्च न्यायालय ने इन सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू किया।

उसने यह पाया कि:

प्रतिवादी संख्या 4 द्वारा अंतिम निर्णय के समय याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं था और न ही कोई दोषसिद्धि थी।

मामले तुच्छ प्रकृति के थे, जो पशुओं की चराई संबंधी छोटे विवाद और समूहों के बीच हाथापाई से उत्पन्न हुए थे।

याचिकाकर्ता ने चरित्र सत्यापन के समय स्वयं इन मामलों का खुलासा किया, जिसके परिणामस्वरूप प्राधिकारियों ने उसकी ज्वॉइनिंग को स्थगित रखा, न कि उसकी उम्मीदवारी तत्काल रद्द कर दी।

गया के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने 08.09.2020 की ताज़ा सत्यापन रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बरी होने और दूसरे मामले के “असत्य” पाए जाने तथा उसके बंद होने का उल्लेख किया।

न्यायालय ने Sonu Kumar तथा Rakesh Kumar Singh में दिए गए तर्क को स्वीकार किया कि यदि प्रारंभिक प्रपत्र में किया गया अप्रकटीकरण बाद में चरित्र सत्यापन प्रपत्र में सत्य प्रकटीकरण द्वारा सुधार दिया जाए, तो उसे स्वतः घातक नहीं माना जाना चाहिए।

न्यायालय ने 09.09.2024 की प्रस्तावित संकल्पना का भी संज्ञान लिया, जिसे पुलिस उप महानिरीक्षक, प्रशासन, बिहार, पटना द्वारा Avtar Singh के अनुरूप जारी किया गया था, जिसमें कहा गया कि अप्रकटीकरण के मामलों में नियुक्ति प्राधिकारी को प्रत्येक मामले के गुण-दोष (merits) पर निर्णय लेना होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में न्यायालय ने माना कि प्राधिकारी ने उम्मीदवारी रद्द करते समय विशेष तथ्यों एवं परिस्थितियों पर निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार नहीं किया। उसने रेखांकित किया कि विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग युक्तिसंगत होना चाहिए, न कि यांत्रिक, विशेषकर तब जबकि फॉर्म भरते समय याचिकाकर्ता की आयु लगभग 22 वर्ष थी और बाद में उसने सत्यता से सब कुछ प्रकट कर दिया था।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Anil Kanwariya को तथ्यात्मक रूप से भिन्न माना। उस मामले में अभ्यर्थी आवेदन के समय ही दोषसिद्ध था, उसने दोषसिद्धि को छिपाया और केवल बाद में Probation of Offenders Act के तहत राहत माँगी। इसके विपरीत, यहाँ याचिकाकर्ता ने सत्यापन के चरण में ही स्वेच्छा से अपने मामलों का खुलासा किया और अंतिम नियुक्ति निर्णय से पूर्व ही या तो बरी हो चुका था अथवा निर्दोष पाया जा चुका था।

अंततः पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि रद्दीकरण आदेश, पत्रांक 22 दिनांक 25.01.2021, विधिसम्मत नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने उक्त आदेश को निरस्त करते हुए प्रतिवादी संख्या 4 को निर्देश दिया कि वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों तथा न्यायालय की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करे।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार के हजारों युवा नौकरीप्रार्थियों के लिए, विशेषकर पुलिस एवं अन्य अनुशासित बलों में नियुक्ति के इच्छुक अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।

इससे यह पुष्टि होती है कि यद्यपि फॉर्मों में ईमानदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है, फिर भी हर गलती के साथ समान कठोरता से व्यवहार नहीं किया जा सकता। जहाँ अभ्यर्थी बाद में पूर्ण सत्य प्रकट कर देता है, मामले तुच्छ प्रकृति के हों और उनमें बरी या निस्तारण हो चुका हो, वहाँ किसी के करियर को नष्ट करने से पहले प्राधिकारी को समग्र परिस्थितियों पर विचार करना अनिवार्य है।

अभ्यर्थियों के लिए संदेश स्पष्ट है: आपराधिक मामलों का विवरण सदैव ईमानदारी से दें। परंतु यदि कोई वास्तविक भूल हो जाए और बाद में उसे सुधार लिया जाए, तो पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय दर्शाता है कि स्वतः निष्कासन के बजाय निष्पक्ष पुनर्विचार की अभी भी संभावना रहती है।

विभागों के लिए यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि बिहार पुलिस मैनुअल जैसे नियमों का अनुप्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Avtar Singh, Sandeep Kumar एवं अन्य मामलों में दिए गए मार्गदर्शन के अनुरूप होना चाहिए। अप्रकटीकरण के मामलों में “एक ही प्रकार का कठोर नियम” (one-size-fits-all) अपनाना स्वीकार्य नहीं है।

विधिक प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या प्रारंभिक आवेदन प्रपत्र में लंबित या पूर्व आपराधिक मामलों का उल्लेख न करना, जिन्हें बाद में चरित्र सत्यापन के दौरान स्वेच्छा से प्रकट कर दिया जाए, इतना गंभीर दमन माना जाएगा कि पुलिस सेवा के लिए उम्मीदवारी के स्वतः रद्दीकरण को न्यायोचित ठहराया जा सके?
    उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, याचिकाकर्ता द्वारा बाद में किया गया स्वैच्छिक प्रकटीकरण, मामलों की तुच्छ प्रकृति तथा उसके बरी/निर्दोष पाए जाने को ध्यान में रखकर यह माना कि स्वतः रद्दीकरण उचित नहीं था। रद्दीकरण आदेश को निरस्त कर दिया गया और प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह उम्मीदवारी पर वस्तुनिष्ठ रूप से पुनर्विचार करे।
  • प्रश्न: क्या बिहार पुलिस मैनुअल के नियम 668 और 673 को किसी भी प्रकार के असत्य या अधूरे आपराधिक पूर्ववृत्त प्रकटीकरण के मामले में यांत्रिक रूप से लागू किया जाना चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने माना कि यद्यपि ये नियम सत्यनिष्ठा की माँग करते हैं और वक्तव्य असत्य होने पर हटाने की अनुमति देते हैं, फिर भी इनका अनुप्रयोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अनुरूप होना चाहिए। प्राधिकारियों को अपराध की प्रकृति, मामले की अवस्था एवं परिणाम, बाद के प्रकटीकरण तथा समग्र तथ्यों का परीक्षण करना होगा, न कि कठोर thumb rule के रूप में नियमों को लागू करना।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Avtar Singh v. Union of India and Others, (2016) 8 SCC 471
  • Commissioner of Police and Others v. Sandeep Kumar, (2011) 4 SCC 644
  • Commissioner of Police Delhi and Another v. Dhaval Singh, (1999) 1 SCC 246
  • Rajasthan Rajya Vidyut Prasaran Nigam Ltd. v. Anil Kanwariya, (2021) 10 SCC 136
  • Pawan Kumar v. Union of India, (2023) 12 SCC 317
  • Ravindra Kumar v. State of UP and Others, (2024) 5 SCC 264
  • State of Madhya Pradesh v. Parvez Khan, (2015) 2 SCC 591
  • Devendra Kumar v. State of Uttaranchal and Others, (2013) 9 SCC 363
  • S.P. Chengalvaraya Naidu v. Jagannath, (1994) 1 SCC 1
  • Jainendra Singh v. State of U.P. Tr. Prinl. Sec. Home and Others, (2012) 8 SCC 748
  • Mohammed Imran v. State of Maharashtra and Others, (2019) 17 SCC 696 (as quoted in Ravindra Kumar)
  • Umesh Chandra Yadav v. Northern Railway, (2022) 14 SCC 244
  • Satish Chandra Yadav v. Union of India and Others, (2023) 7 SCC 536
  • Sonu Kumar v. The State of Bihar and Others, C.W.J.C. No. 6827 of 2023 (Patna High Court)
  • Rakesh Kumar Singh v. The State of Bihar and Others, C.W.J.C. No. 15943 of 2023 (Patna High Court)
  • The Union of India and Others v. Bindeshwari Prasad, C.W.J.C. No. 10560 of 2019 (Patna High Court, as referred)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 12746 of 2021

वाद का शीर्षक: Umesh Kumar Chaudhary v. The State of Bihar & Ors.

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 713

वकील:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Ranjeet Kumar, Advocate
  • राज्य बिहार की ओर से: Mr. Suman Kumar Jha, AC to AAG-3
  • बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग की ओर से: Mr. Vivek Anand Amritesh, Advocate

मामले का स्वरूप: रिट याचिका (सेवा/नियुक्ति – बिहार पुलिस में सहायक अवर निरीक्षक के पद के लिए उम्मीदवारी रद्दीकरण)

निर्णय की तिथि: 27-03-2025

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

अंतिम परिणाम: विवादित रद्दीकरण आदेश (पत्रांक 22 दिनांक 25.01.2021) निरस्त; प्रतिवादी संख्या 4 को याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश। रिट याचिका स्वीकृत; व्यय के संबंध में कोई आदेश नहीं।

Link to judgement; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTI3NDYjMjAyMSMxI04=-ZYIKAorLUAc=

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