मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पश्चिम चम्पारण के भैरोगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत गाँव बसगांव परसौनी में हुए एक निर्मम एसिड हमले से संबंधित है।
सूचना देने वाली युवती (सूचना‑दात्री) के लिखित बयान (फर्दबयान) के अनुसार, घटना की शुरुआत 26.01.2011 की शाम से हुई। वह और उसकी बहन प्रियंका लगभग 6:30 बजे शाम गाँव की दुकान से घर लौट रही थीं। एक धोबी के घर के पास, उनका पड़ोसी (बाद में अपीलकर्ता) खड़ा था और उन पर फब्तियाँ और अश्लील टिप्पणियाँ करने लगा।
उन्होंने इसका विरोध किया और उसे चेतावनी दी कि यदि वह ऐसा करता रहा तो वे उसे चप्पल से मारेंगी। वह नाराज़ हो गया और कथित रूप से धमकी दी कि वह उसकी बहन का चेहरा बिगाड़ देगा ताकि वह ससुराल न जा सके। इस झड़प के बाद, दोनों बहनें अपने घर वापस आ गईं।
उस रात 26/27.01.2011 के बीच, सूचना‑दात्री और प्रियंका एक कमरे में लकड़ी के खाट (चौंकी) पर सो रही थीं। उनकी बड़ी बहन रंजीता और माँ, बड़ी बहन के बच्चों के साथ उसी घर के दूसरे कमरे में सो रही थीं।
लगभग रात 1:00 बजे, जब रंजीता बच्चा को शौच कराने के लिए बाहर गई हुई थी और दरवाज़े के पास अलाव ताप रही थी, तब अपीलकर्ता कथित रूप से तीन अज्ञात व्यक्तियों के साथ घर में घुस आया। वे उस कमरे में गए जहाँ दोनों छोटी बहनें सो रही थीं, उनकी चेहरे से रज़ाई हटाई और उन पर एसिड उड़ेल दिया।
सूचना‑दात्री ने कहा कि दोनों बहनों के चेहरे, शरीर, कपड़े और बिस्तर जल गए। उन्होंने शोर मचाया। उनके परिवार वाले और ग्रामीण दौड़कर आए और दोनों घायल बहनों को पहले भैरोगंज रेलवे स्टेशन और वहाँ से एम.जे.के. अस्पताल, बेतिया ले जाया गया, जहाँ 27.01.2011 को लगभग दोपहर 1:00 बजे पुलिस ने सूचना‑दात्री का फर्दबयान दर्ज किया।
इसके आधार पर चौंतरवा (भैरोगंज) थाना कांड संख्या 12/2011 भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 448, 324, 326, 307, 509/34 के तहत अपीलकर्ता के विरुद्ध दर्ज किया गया तथा अन्य अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध अनुसंधान लंबित रखा गया।
जांच के बाद पुलिस ने अपीलकर्ता के विरुद्ध इन्हीं धाराओं के तहत अभियोग‑पत्र (चार्जशीट) समर्पित किया। मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेकर मामला सत्र न्यायालय में भेज दिया। यह मामला सत्र वाद संख्या 425/2011 के रूप में द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बगहा, पश्चिम चम्पारण के न्यायालय में चला।
सत्र न्यायालय ने धाराएँ 448, 326, 307 और 509 IPC के अंतर्गत आरोप तय किए। अपीलकर्ता ने दोष स्वीकार नहीं किया। अभियोजन की ओर से ग्यारह गवाहों की जिरह की गई, जिनमें दोनों पीड़ित बहनें, उनके परिजन, स्वतंत्र ग्रामीण, दो डॉक्टर और अन्वेषण अधिकारी (IO) शामिल थे। अपीलकर्ता का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज किया गया, जिसमें उसने पूर्ण रूप से निर्दोष होने का दावा किया और अपने बचाव में “हैंडिकैप सर्टिफिकेट” (प्रदर्श A) पेश किया।
18.03.2013 के निर्णय द्वारा सत्र न्यायालय ने अपीलकर्ता को धाराएँ 324, 326, 448 और 509 IPC के तहत दोषी ठहराया और 21.03.2013 को धारा 326 IPC के तहत आजीवन कारावास और 50,000/- रुपये जुर्माने (और भुगतान न करने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास) की सज़ा दी, साथ‑साथ अन्य धाराओं के तहत पृथक सज़ाएँ भी दीं।
इससे आहत होकर अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (डीबी) संख्या 700/2013 दायर की। द्वैधपीठ (डिवीजन बेंच) ने मामले की सुनवाई कर 15.01.2019 को मौखिक निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे जाकर अपीलकर्ता पर लगे आरोप सिद्ध कर दिए हैं।
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने कई आधारों पर दोषसिद्धि को चुनौती दी। उनका तर्क था कि केवल दो ही बहनें (PW-2 प्रियंका और PW-3 निशु) चश्मदीद गवाह हैं और अन्य सभी महत्त्वपूर्ण गवाह घटना के समय उपस्थित नहीं थे। उन्होंने कमरे में रोशनी के बारे में मतभेदों पर ज़ोर दिया, यह बताते हुए कि फर्दबयान में कहीं दीपक का उल्लेख नहीं है, जबकि बाद में न्यायालय में सूचना‑दात्री और उसकी बहन ने कहा कि दीपक जला हुआ था।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि PW-2 के अनुसार, रात लगभग 1:00 बजे काली रात थी और किसी प्रकार का प्रकाश‑स्रोत नहीं था, जिससे हमलावर की पहचान संदिग्ध हो जाती है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि रंजीता (PW-1) दरवाज़े पर अलाव ताप रही थी तो जब हमलावर घर में घुसा तो उसने उसे रोका या पीछा क्यों नहीं किया। इन और ऐसे अन्य बिंदुओं के आधार पर उन्होंने कहा कि अभियोजन साक्ष्य अविश्वसनीय हैं और अपीलकर्ता को झूठा फँसाया गया है।
वैकल्पिक रूप से, बचाव पक्ष ने निवेदन किया कि यदि दोषसिद्धि बरकरार रखनी ही हो, तो भी न्यायालय सज़ा कम कर दे क्योंकि अपीलकर्ता लगभग आठ वर्ष से हिरासत में है।
अतिरिक्त लोक अभियोजक ने सत्र न्यायालय की निष्कर्षों का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि सूचना‑दात्री (PW-3) ने अभियोजन की कहानी का पूर्ण समर्थन किया है और प्रियंका (PW-2) व रंजीता (PW-1) ने मुख्य घटनाओं की पुष्टि की है। दोनों डॉक्टरों के चिकित्सीय साक्ष्य एसिड हमले और चोटों की गम्भीरता से मेल खाते हैं। राज्य का तर्क था कि फर्दबयान में दीपक का उल्लेख न होना जैसे छोटे‑मोटे छूटे हुए तथ्य पूरे मामले को नहीं बिगाड़ सकते, विशेषकर जब अभियुक्त पड़ोसी हो, पीड़ितों को अच्छी तरह से जानता हो और कुछ ही घंटे पहले उन्हें धमका चुका हो।
उच्च न्यायालय ने पहले यह परखा कि वास्तव में कितने गवाहों ने हमला होते हुए देखा। उसने नोट किया कि कई ग्रामीणों और परिजन—PW-4 (सत्येन्द्र पांडे), PW-5 (जय चन्द्र पांडे), PW-6 (रामकान्त तिवारी), PW-8 (नवल तिवारी) और PW-9 (देवंती देवी)—ने एसिड उड़ेलते हुए नहीं देखा।
PW-4 ने कहा कि उसे घटना के बारे में अगली सुबह ही रंजीता से पता चला। किंतु रंजीता ने यह बात उसे बताने की पुष्टि नहीं की, अतः उसका बयान अप्रमाणित सुनी‑सुनाई (हियरसे) बात रहा और स्वीकार नहीं किया गया।
PW-5 ने स्वीकार किया कि घटना के समय वह घर पर सो रहा था और केवल शोर सुनकर लड़कियों के घर पहुँचा। उसने सुना कि नवल तिवारी की बेटियों पर एसिड डाला गया है और लोग कह रहे थे कि यह काम अपीलकर्ता ने किया। चूँकि उन लोगों में से कोई भी व्यक्ति न्यायालय में गवाही देने नहीं आया, उसका साक्ष्य भी केवल सुनी‑सुनाई बात रह गया।
PW-6 ने शुरू में दावा किया कि वह शौच से लौटते समय उसने अपीलकर्ता को एसिड उड़ेलने के बाद भागते देखा। परन्तु जिरह में उसने कहा कि घटना के समय वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था। इसलिए न्यायालय ने उसे केवल ऐसा व्यक्ति माना जिसने कथित रूप से अपीलकर्ता को भागते देखा, न कि एसिड उड़ेलते हुए चश्मदीद।
PW-8, जो पीड़िताओं के पिता हैं, ने कहा कि वे गन्ना लेकर रामनगर मिल में थे और उन्हें पत्नी से टेलीफोन पर हमले की सूचना मिली, लेकिन PW-9, माँ, ने इस विशेष दावे का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि वे दूसरे कमरे में सो रही थीं और उन्हें घटना का पता तब चला जब उनकी बेटी ने हमले के बाद उन्हें बताया। इसलिए न्यायालय ने मान लिया कि PW-9 भी चश्मदीद नहीं हैं।
इसके बाद पीठ ने सूचना‑दात्री PW-3 निशु कुमारी का महत्त्वपूर्ण साक्ष्य परखा। न्यायालय में उसने फर्दबयान में दी गई कहानी दोहराई: शाम का छेड़छाड़ की घटना, बहन को विकृत (चेहरा बिगाड़ने) करने की धमकी, और आधी रात को तीन अन्य व्यक्तियों के साथ घर में घुसना, रज़ाई हटाकर प्रियंका पर एसिड उड़ेलना, जो उस पर भी छिटक गया।
उसने घटना के बाद की स्थिति का वर्णन किया: दोनों बहनें दर्द से तड़प रही थीं, रिश्तेदार और ग्रामीण दौड़कर पहुँचे, और उन्हें भैरोगंज रेलवे स्टेशन के रास्ते अस्पताल ले जाया गया। उसने चोटों का विस्तार से ज़िक्र किया—प्रियंका का पूरा चेहरा, हाथ और शरीर बुरी तरह जल जाना, और स्वयं के हाथ, गर्दन, माथे और दाहिने पैर पर जलने की चोटें।
उच्च न्यायालय ने उसकी जिरह सावधानी से पढ़ी और ऐसा कुछ नहीं पाया जो उसकी उपस्थिति या यह कहानी कि अपीलकर्ता ने उन पर हमला किया, को हिला सके। न्यायालय ने कहा कि उसने कड़ी जिरह को सहा, फिर भी उसका बयान सुसंगत और विश्वसनीय रहा और वह स्वयं घायल गवाह है, जिससे उसके साक्ष्य को अत्यधिक वज़न मिलता है।
प्रियंका (PW-2) ने भी फर्दबयान और PW-3 के बयान के अनुरूप अभियोजन का समर्थन किया। उसने न्यायालय को बताया कि उसे और उसकी बहन को बेतिया अस्पताल में इलाज मिला और वह अभी भी इलाजरत है तथा दोनों आँखों से अंधी है। सत्र न्यायालय ने स्वयं देखा था कि उसका पूरा चेहरा और आँखें गंभीर जलन से विकृत हो चुकी हैं।
जिरह में प्रियंका ने, न्यायालय के प्रश्न के उत्तर में, स्पष्ट किया कि उसने स्वयं अपीलकर्ता को एसिड उड़ेलते हुए नहीं देखा, पर उसकी बहन ने उसे देखा। उच्च न्यायालय ने इसलिए PW-3 को मुख्य चश्मदीद और PW-2 को घायल गवाह माना, जिसका साक्ष्य घटना व हमले की प्रकृति की पुष्टि करता है, भले ही प्रत्यक्ष पहचान न हो।
न्यायालय ने अगली गवाह रंजीता (PW-1) की जाँच की। उसने मुख्य परीक्षा में स्वयं को चश्मदीद बताया। परंतु PW-2 व PW-3 के साक्ष्य और उसकी अपनी जिरह से यह स्पष्ट हो गया कि घटना के ठीक समय वह बच्चा को शौच कराने के लिए बाहर गई हुई थी और दरवाज़े पर अलाव ताप रही थी। वह केवल तब अंदर दौड़ी जब उसकी बहनों ने चीख‑पुकार की और उसने उन्हें पहले से जली हुई अवस्था में देखा। उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि उसने वास्तव में अपीलकर्ता को एसिड उड़ेलते हुए नहीं देखा और वह चश्मदीद नहीं है, यद्यपि उसने घटना के तुरंत बाद की परिस्थितियों को समर्थन दिया।
चिकित्सकीय पक्ष पर, PW-10 डॉ. श्रीकांत दुबे ने प्रियंका की जाँच की। उन्हें चेहरे, दोनों आँखों और बाएँ बाजू व अग्रबाहु पर सेकंड डिग्री जलन पाई गई। इन चोटों से चेहरे का विकृतिकरण और आँखों को पूरा बंद न कर पाने की स्थिति उत्पन्न हुई। उन्होंने इन्हें गंभीर चोटें बताया, जो किसी संक्षारक द्रव से हुई थीं। उन्होंने चोट का विवरण‑पत्र (प्रदर्श 4) सिद्ध किया।
PW-11 डॉ. के.एम.पी. परवे ने सूचना‑दात्री निशु की जाँच की। उन्हें उसके माथे, चेहरे के बाएँ हिस्से और गर्दन के एक छोटे भाग पर एसिड से जली हुई चोटें मिलीं। उन्होंने इन्हें संक्षारक पदार्थ (एसिड) से हुई साधारण चोटें बताया। उन्होंने चोट का विवरण‑पत्र और परिशिष्ट रिपोर्ट (प्रदर्श 5 और 5/1) सिद्ध किए। जिरह में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एसिड बर्न है, जो सल्फ्यूरिक या अन्य किसी भी एसिड से हो सकता है।
IO PW-7 भगिरथ प्रसाद ने बताया कि उसने घटनास्थल पर खाट और “टाट” (चटाई) पर एसिड के निशान—जलन के दाग—पाए, जो इस बात का समर्थन करते हैं कि जहाँ बहनें सो रही थीं, वहीं पर एसिड उड़ेला गया था।
बचाव पक्ष ने यह दिखाने की कोशिश की कि अपीलकर्ता शारीरिक रूप से विकलांग है और ऐसा कृत्य कर ही नहीं सकता। उन्होंने हैंडिकैप सर्टिफिकेट (प्रदर्श A) पेश किया और PW-2 ने जिरह में यह टिप्पणी की कि उसकी हाथ में विकलांगता है। हालांकि IO ने जिरह में कहा कि उसने स्वयं अपीलकर्ता की जाँच की और दोनों हाथ “तेजी से” काम कर रहे थे; उसे विकलांग नहीं कहा जा सकता। सत्र न्यायालय ने भी साक्ष्य दर्ज करते समय नोट किया कि यद्यपि अपीलकर्ता ने लकवे का दावा किया, वह कटघरे में सीधा और फुर्ती से खड़ा था। उच्च न्यायालय ने इन टिप्पणियों को स्वीकार कर विकलांगता के दावे को खारिज कर दिया।
अंधेरा और रोशनी के स्रोत के संबंध में तर्क पर, न्यायालय ने माना कि कमरे में दीपक को लेकर कुछ असंगति है। पर उसने माना कि यह बचाव पक्ष की मदद नहीं करता। अपीलकर्ता पड़ोसी था, जिसका घर केवल तीन घर छोड़कर था। कुछ ही घंटे पहले उसने निशु के सामने प्रियंका का चेहरा बिगाड़ने की धमकी दी थी।
इस निकटता और पूर्व घटना को देखते हुए न्यायालय ने माना कि PW-3 अपीलकर्ता की शारीरिक बनावट से भली‑भाँति परिचित थी और रात में भी उसकी पहचान कर सकती थी। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अपीलकर्ता ने यह कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया कि पीड़ित परिवार जैसा “घृणित और वीभत्स अपराध” में उसे क्यों झूठा फँसाएगा।
PW-3 के नेत्रसाक्ष्य, PW-2 और अन्य परिवेशीय गवाहों की पुष्टि, चिकित्सकीय रिपोर्टों और स्थल पर एसिड से जले निशानों के भौतिक साक्ष्य को साथ‑साथ लेकर उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे सिद्ध कर दिया है।
अतः न्यायालय ने धारा 326 IPC के तहत दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सज़ा, साथ ही धाराएँ 324, 448 और 509 IPC के तहत दी गई सज़ाओं को बरकरार रखा। न्यायालय ने सज़ा कम करने से इंकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह एक भयावह एसिड हमला था, जिसने पीड़िता का चेहरा पूरी तरह विकृत कर दिया, दोनों आँखों की दृष्टि छीन ली और साक्ष्य के अनुसार, यह उसकी नियोजित शादी से मात्र 10–15 दिन पहले हुआ।
अंत में, न्यायालय ने यह ध्यान दिलाया कि सत्र न्यायालय ने यह नहीं बताया कि विभिन्न सज़ाएँ एक साथ चलेंगी या क्रमवार। चूँकि अपीलकर्ता को धारा 326 IPC के तहत पहले ही आजीवन कारावास दी जा चुकी थी, उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि अन्य सभी धाराओं के अंतर्गत दी गई वास्तविक (सुब्स्टैंटिव) सज़ाएँ इसी आजीवन कारावास के साथ साथ (समानान्तर/एकसाथ) चलेंगी।
आपराधिक अपील खारिज कर दी गई।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर एसिड हमले और यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं के लिए।
पहला, न्यायालय ने घायल महिला पीड़िता की गवाही को मज़बूत और विश्वसनीय साक्ष्य माना, भले ही कुछ अन्य परिजन और ग्रामीण वास्तविक चश्मदीद न हों। यह दर्शाता है कि यदि मुख्य पीड़िता का बयान सुसंगत, स्पष्ट और चिकित्सकीय साक्ष्य से समर्थित हो, तो न्यायालय उस पर भरोसा कर दोषसिद्धि बरकरार रख सकता है।
दूसरा, निर्णय यह स्वीकार करता है कि प्रारंभिक रिपोर्ट में दीपक का उल्लेख न होने जैसी छोटी चूकें अपने‑आप में मामले को नहीं बिगाड़ेंगी, जब हमलावर पड़ोसी के रूप में जाना‑पहचाना हो और उसकी पहचान आवाज़, उपस्थिति और हालिया आचरण से हो चुकी हो।
तीसरा, न्यायालय ने दंड के प्रश्न पर कठोर रुख अपनाया। उसने आजीवन कारावास कम करने से इंकार कर दिया और एसिड हमले से हुई स्थायी शारीरिक और मानसिक क्षति—पूरे चेहरे का विकृतिकरण, दोनों आँखों की दृष्टि का जाना और युवा महिला की निकट भविष्य की शादी पर पड़े प्रभाव—पर ज़ोर दिया। यह संकेत देता है कि बिहार में न्यायालय ऐसे अपराधों को अत्यधिक गंभीरता से लेेंगे।
चौथा, यह निर्देश कि अन्य सभी सज़ाएँ आजीवन कारावास के साथ समानान्तर चलेंगी, यह स्पष्ट करता है कि एक ही मामले में अनेक दंडों को व्यावहारिक रूप से कैसे भोगा जाना है। इससे इसी प्रकार के मामलों में निचली अदालतों को मार्गदर्शन मिलता है।
समग्र रूप से यह निर्णय यह संदेश मज़बूती से देता है कि यौन उत्पीड़न से बढ़कर एसिड हमले तक पहुँचने वाले अपराधों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी और झूठी विकलांगता का दावा करने या मामूली असंगतियों का हवाला देकर दायित्व से बचने के प्रयास आसानी से सफल नहीं होंगे।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अभियोजन पक्ष यह साबित कर सका कि अपीलकर्ता ने दो बहनों पर एसिड हमला किया, और वह भी संदेह से परे स्तर पर?
- उत्तर: हाँ। न्यायालय ने कहा कि घायल चश्मदीद (PW-3) की सुसंगत और विश्वसनीय गवाही, जिसे चिकित्सकीय साक्ष्य, घटनास्थल की स्थिति और परिवेशीय परिस्थितियों से समर्थन मिला, ने अपीलकर्ता का दोष धाराएँ 324, 326, 448 और 509 IPC के अंतर्गत सिद्ध कर दिया।
- प्रश्न: क्या धारा 326 IPC के तहत दी गई आजीवन कारावास की सज़ा को, अपीलकर्ता की हिरासत अवधि और कथित विकलांगता को देखते हुए, कम किया जाना चाहिए?
- उत्तर: नहीं। न्यायालय ने विकलांगता के दावे को साक्ष्यहीन मानकर खारिज कर दिया और कहा कि पीड़िता को हुई गंभीर व जीवन बदल देने वाली चोटों को देखते हुए सज़ा कम करने का कोई आधार नहीं है।
- प्रश्न: IPC की अनेक धाराओं के अंतर्गत दी गई विभिन्न सज़ाएँ किस प्रकार चलनी चाहिए?
- उत्तर: उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि चूँकि अपीलकर्ता को धारा 326 IPC के तहत पहले ही आजीवन कारावास दी गई है, अतः अन्य संबद्ध धाराओं के अंतर्गत दी गई वास्तविक सज़ाएँ उसी के साथ समानान्तर (एकसाथ) चलेंगी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी भी पूर्वनिर्णीत मामले का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है। कोई पूर्व उदाहरण (केस लॉ) उद्धृत नहीं किया गया है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 700 of 2013; arising out of Chautarwa (Bhairoganj) P.S. Case No. 12 of 2011; Sessions Trial No. 425 of 2011
मामला शीर्षक: Chunnu Chaubey v. The State of Bihar
उद्धरण (Citation): 2019 (3) PLJR 320
पीठ (Coram): माननीय न्यायमूर्ति राकेश कुमार तथा माननीय न्यायमूर्ति प्रकाश चंद्र जायसवाल
पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 15.01.2019
सत्र न्यायालय: 2nd Additional Sessions Judge, Bagaha, West Champaran
संलग्न धाराएँ: भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 324, 326, 448, 509, 307, 34 (अंततः धाराएँ 324, 326, 448 और 509 IPC के तहत दोषसिद्धि)
अधिवक्ता: अपीलकर्ता की ओर से – श्री नवल किशोर सिंह, अधिवक्ता; श्री जितेन्द्र नाथ तिवारी, अधिवक्ता; श्री संजीब कुमार संजू। राज्य की ओर से – श्री एस.एन. प्रसाद, APP.
मामले का स्वरूप: एसिड हमले से संबंधित सत्र वाद में दोषसिद्धि और सज़ा के विरुद्ध आपराधिक अपील (द्वैधपीठ)।
निर्णय की प्रति का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के प्रमाणित निर्णय को देखें
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