मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पटनाविश्वविद्यालय की घटक इकाई मगध महिला कॉलेज में दैनिक वेतन के आधार पर नियोजित श्रेणी-III एवं श्रेणी-IV के कर्मचारी थे। उन्हें 1995 से 1997 के बीच, विज्ञापन और साक्षात्कार के बाद, चयन समिति — जिसमें प्राचार्य, विभागाध्यक्ष और बर्सर शामिल थे — की अनुशंसा पर, पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 के तहत कुलपति की स्वीकृति से लिया गया था।
उन्होंने स्वीकृत रिक्त पदों पर लगभग दो दशकों तक निरंतर रूप से कार्य किया और नियमित, स्थायी प्रकृति का कार्य किया। वर्षों तक उन्हें दैनिक वेतन भोगी के रूप में भुगतान किया गया, जो कई बार वैधानिक न्यूनतम वेतन से भी कम था, और उन्हें आंशिक भुगतान के लिए उप श्रम आयुक्त के समक्ष जाना पड़ा।
2003 में, पटना विश्वविद्यालय की सीनेट ने कुलपति की अध्यक्षता में अवशोषण समिति गठित की। कई बैठकों के बाद, इस समिति ने अपनी 05.11.2003 की रिपोर्ट में अनुशंसा की कि 31.12.2000 तक स्वीकृत पदों के विरुद्ध नियुक्त और सेवा में निरंतर कार्यरत दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को अवशोषित किया जाए। इस अनुशंसा में याचिकाकर्ताओं के नाम भी शामिल थे।
इस रिपोर्ट के आधार पर, उसी सूची से कई दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को 29.01.2004, 04.04.2006, 05.12.2011 और 29.12.2011 के कार्यालय आदेशों से नियमित कर दिया गया। किंतु, समान रूप से स्थित होने के बावजूद याचिकाकर्ताओं को बाहर रखा गया।
उन्होंने पहले 05.11.2003 की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन हेतु पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया (सीडब्ल्यूजेसी सं. 1080/2005)। वह मामला 03.01.2011 को तत्कालीन विधिक स्थिति के मद्देनज़र बिना अंतिम राहत के निपटाया गया। इसके बाद भी याचिकाकर्ता कार्य करते रहे।
2015 में, उन्होंने फिर से सीडब्ल्यूजेसी सं. 6125/2015 के माध्यम से न्यायालय से संपर्क किया, जिसमें सीनेट समिति के निर्णय के प्रवर्तन और अपनी सेवाओं के नियमितीकरण की मांग की। 08.07.2015 को न्यायालय ने प्राचार्य और पटना विश्वविद्यालय को नोटिस जारी कर प्रति-शपथपत्र दाखिल करने को कहा।
इसी बीच, पटना विश्वविद्यालय कॉलेज कर्मचारी संघ ने लंबित मांगों, जिनमें दैनिक वेतन भोगी कर्मियों का नियमितीकरण भी शामिल था, को लेकर 10.08.2015 से हड़ताल का आह्वान किया। 08.09.2015 की बैठक की कार्यवाही और 09.09.2015 को कुलपति द्वारा स्वीकृत मुद्दों में दर्ज था कि हड़ताल में भाग लेने वाले किसी भी कर्मचारी के साथ कोई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इस समझौते के बावजूद, 10.09.2015 को प्राचार्य ने एक पत्र भेजा, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता 10.08.2015 से 09.09.2015 तक ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हुए। याचिकाकर्ताओं ने इसका खंडन किया और मध्य अगस्त तक की उपस्थिति प्रविष्टियां तथा 17.08.2015 और 31.08.2015 के पत्रों के तहत एक याचिकाकर्ता द्वारा किए गए आधिकारिक कार्यों के दस्तावेज़ प्रस्तुत किए।
11.09.2015 को उन्होंने जॉइनिंग रिपोर्ट दी, किंतु कथित रूप से उन्हें उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने नहीं दिया गया और उनसे चार्ज, चाबियां एवं अभिलेख जमा करने को कहा गया। अंततः, 19.09.2015 के कार्यालय आदेश द्वारा, जो प्राचार्य के निर्देश पर प्रधान लिपिक द्वारा कुलपति के कथित दूरभाषीय आदेशों का हवाला देते हुए जारी हुआ, उन्हें सूचित किया गया कि हड़ताल पर रहने के कारण उनकी सेवाओं की अब कॉलेज में आवश्यकता नहीं है और वे अभिलेख नामित सहकर्मियों को सौंप दें।
याचिकाकर्ताओं ने 19.09.2015 की इस सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देते हुए सीडब्ल्यूजेसी सं. 18289/2015 दायर किया और पुनर्बहाली तथा परिणामी लाभों की मांग की; साथ ही, सीडब्ल्यूजेसी सं. 6125/2015 में लंबित अपने नियमितीकरण के आग्रह को भी आगे बढ़ाया। दोनों रिट याचिकाओं की संयुक्त रूप से सुनवाई की गई।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा के माध्यम से, पहले यह विचार किया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद क्या रिट याचिकाएं ग्राह्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय M/s Godrej Sara Lee Ltd. v. Excise and Taxation Officer-cum-Assessing Authority पर भरोसा करते हुए, न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को व्यापक रिट अधिकार प्रदान करता है। यह सिद्धांत कि पक्षकारों को सामान्यतः वैकल्पिक वैधानिक उपाय अपनाने चाहिए, केवल सुविधा और विवेक का नियम है, क्षेत्राधिकार पर रोक नहीं। जहां प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, अधिकार क्षेत्र का अभाव, राज्य की मनमानी कार्रवाई या मौलिक अधिकारों का हनन हो, वहां रिट याचिकाएं स्वीकार की जा सकती हैं।
यहां, याचिकाकर्ता केवल सेवा शर्तों की शिकायत नहीं कर रहे थे, बल्कि सेवा समाप्ति की वैधता को चुनौती दे रहे थे। उन्होंने अनुच्छेद 14, 16 और 21 के उल्लंघन, प्रतिशोध न करने के समझौते के उल्लंघन और मूल प्रक्रिया का पालन न करने का आरोप लगाया। न्यायालय ने माना कि ऐसे प्रश्न लोक विधि (public law) के क्षेत्र के हैं। उसने पटना विश्वविद्यालय की इस आपत्ति को अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता को श्रम न्याय प्रणाली के पास जाना चाहिए था, और रिट याचिकाओं को ग्राह्य माना।
इसके बाद न्यायालय ने 19.09.2015 के विवादित आदेश के स्वरूप को देखा। आदेश के पाठ, जिसे निर्णय में उद्धृत किया गया, में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि याचिकाकर्ता 10.08.2015 से 09.09.2015 तक हड़ताल पर थे, कि कुलपति के दूरभाषीय निर्देशों पर उनका कार्य वापस लिया जा रहा है और हड़ताल पर रहने के कारण उनकी सेवाओं की अब कॉलेज में आवश्यकता नहीं है।
न्यायालय ने माना कि ऐसा आदेश “कलंकपूर्ण (stigmatic)” है। यह कर्मचारियों पर कदाचार का आरोप लगाता है, अर्थात हड़ताल पर रहना और ड्यूटी से अनुपस्थित रहना। कानून में, दैनिक वेतन भोगी भी ऐसे आरोपों के आधार पर विधिवत विभागीय जांच के बिना हटाए नहीं जा सकते। नियोक्ता को कारण बताओ नोटिस देना, आरोप पत्र तैयार करना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए जांच करना आवश्यक है।
यह निर्विवाद था कि कोई आरोप पत्र जारी नहीं किया गया, सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया और याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध कोई जांच नहीं हुई। आगे, हड़ताल स्वयं 08.09.2015 के समझौते से समाप्त हो चुकी थी, जिसे 09.09.2015 को स्वीकृति मिली थी, और जिसमें हड़ताल अवधि के लिए दंडात्मक कार्रवाई न करने का आश्वासन था। इसके बावजूद हड़ताल को सेवा समाप्ति का आधार बनाकर कॉलेज और विश्वविद्यालय ने अपने ही समझौते के विपरीत कार्य किया। अतः न्यायालय ने आदेश को अवैध, मनमाना, प्राकृतिक न्याय एवं बाध्यकारी समझौते के उल्लंघन वाला ठहराया।
न्यायालय ने तब यह स्थिति भी परखी कि मान लें, सेवा समाप्ति केवल दैनिक वेतन भोगी कर्मियों की “साधारण छुट्टी (simple disengagement)” है और उस पर कोई कलंक नहीं है। औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(oo) के तहत, “छंटनी (retrenchment)” का अर्थ है किसी कार्यकार (workman) की सेवा समाप्ति, जो अनुशासनात्मक दंड के अतिरिक्त किसी भी कारण से हो, कुछ अपवादों को छोड़कर।
न्यायालय ने पाया कि कोई भी वैधानिक अपवाद लागू नहीं होता। न तो यह अधिवर्षता (superannuation), स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति, अनुबंध का नवीनीकरण न होना, निरंतर अस्वस्थता या अन्य अपवर्जित श्रेणी का मामला था। अतः दैनिक वेतन कार्य की साधारण समाप्ति भी “छंटनी” मानी जाएगी।
औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25F छंटनी से पूर्व अनिवार्य शर्तें निर्धारित करती है: एक माह का नोटिस या उसके बदले वेतन तथा सेवा समाप्ति के समय छंटनी मुआवज़े का भुगतान। प्रतिवादियों ने यह दावा भी नहीं किया कि 19.09.2015 का आदेश जारी करते समय कोई नोटिस पे या मुआवज़ा दिया गया। न्यायालय ने माना कि इस अनुपालनहीनता से छंटनी शून्य (void ab initio) और विधि में अस्थिर हो जाती है।
एक और गंभीर दोष यह था कि आदेश कुलपति के दूरभाषीय निर्देशों पर आधारित बताया गया। न्यायालय ने बल देकर कहा कि नागरिक परिणामों वाली सेवा समाप्ति, सक्षम प्राधिकारी के लिखित आदेश द्वारा ही की जा सकती है, न कि प्रधान लिपिक के माध्यम से प्रेषित मौखिक या दूरभाषीय निर्देशों से। ऐसी अनौपचारिक हिदायतों का कोई विधिक मूल्य नहीं है।
न्यायालय ने यह भी जांचा कि क्या औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25G में निहित “आखिर में आए, पहले जाए (last-come-first-go)” के सिद्धांत का पालन किया गया था। यह नियम निर्धारित करता है कि छंटनी के समय सामान्यतः संबंधित श्रेणी में सबसे कनिष्ठ कर्मचारी को पहले हटाया जाना चाहिए, जब तक कि दर्ज कारणों के साथ उससे विचलन न किया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से कहा कि उन्हें 1995-1997 में रखा गया था और कई दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी, जिन्हें बाद में नियुक्त किया गया, अभी भी कार्यरत थे, जिनमें विष्णु प्रसाद, मदन कुमार (टंकक), बिनोद प्रसाद (चालक), विजय कुमार सिंह (चपरासी), अखिलेश कुमार (चपरासी) और रीता देवी (रूटीन क्लर्क) शामिल हैं। प्रतिवादियों ने कोई वरिष्ठता सूची या यह दिखाने वाला सामग्री प्रस्तुत नहीं किया कि याचिकाकर्ता सबसे कनिष्ठ थे या उनके द्वारा धारित पद समाप्त कर दिए गए थे।
न्यायालय ने इस चुप्पी से प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला। उसने माना कि याचिकाकर्ताओं को चुन-चुनकर हटाना, जबकि कनिष्ठ और समान रूप से स्थित अन्य दैनिक वेतन भोगी कार्यरत रहे, “आखिर में आए, पहले जाए” के सिद्धांत के स्पष्ट उल्लंघन और अनुच्छेद 14 एवं 16 के विपरीत शत्रुतापूर्ण भेदभाव का द्योतक है।
प्रतिवादियों ने सेवा समाप्ति को न्यायोचित ठहराने के लिए राज्य सरकार की नीतिगत निर्णयों पर भरोसा किया: 10.05.1991 का संकल्प ज्ञापन, जिसमें दैनिक वेतन भोगियों के अवशोषण के लिए 10.05.1986 की कट-ऑफ तिथि तय की गई; 07.10.2009 और 04.03.2011 के पत्र, जिनमें नई नियुक्तियों पर पूर्ण प्रतिबंध और निम्न स्तरीय गतिविधियों के आउटसोर्सिंग की अनुमति दी गई। न्यायालय ने कहा कि ये नीतियां मुख्यतः भावी नियुक्तियों और पदों के युक्तिकरण को नियंत्रित करती हैं।
ऐसा कोई सामग्री नहीं था जिससे यह सिद्ध हो कि याचिकाकर्ताओं की सेवा इसलिए समाप्त की गई क्योंकि उनके पद समाप्त कर दिए गए थे या उनका कार्य आउटसोर्स किया गया था। विश्वविद्यालय ने याचिकाकर्ताओं के पदों से संबंधित कोई आउटसोर्सिंग या पुनर्गठन का आदेश प्रस्तुत नहीं किया। अतः न्यायालय ने माना कि इन प्रतिबंध और आउटसोर्सिंग नीतियों पर आश्रित होकर की गई सेवा समाप्ति विधि-सम्मत रूप से टिक नहीं सकती।
सीडब्ल्यूजेसी सं. 6125/2015 की ओर मुड़ते हुए, न्यायालय ने विचार किया कि क्या 05.11.2003 की सीनेट समिति की अनुशंसाओं के आधार पर याचिकाकर्ता पटना विश्वविद्यालय सेवा में नियमितीकरण/अवशोषण के हकदार हैं।
न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को निर्विवाद पाया: याचिकाकर्ताओं को विज्ञापन और साक्षात्कार के बाद विधिवत चयन प्रक्रिया से लिया गया; उन्हें स्वीकृत रिक्त पदों पर नियुक्त किया गया; नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में कुलपति ने उनकी नियुक्ति को स्वीकृत किया; वे 1995–1997 से निरंतर कार्यरत रहे; और अवशोषण के लिए गठित सीनेट समिति, जिसकी अध्यक्षता कुलपति कर रहे थे, ने 31.12.2000 की कट-ऑफ तिथि निर्धारित करते हुए उनके अवशोषण की अनुशंसा की। याचिकाकर्ता इस कट-ऑफ के भीतर ही थे।
न्यायालय ने माना कि ये नियुक्तियां “पीछे के दरवाजे (backdoor)” से की गई या अवैध नियुक्तियां नहीं थीं। अधिक से अधिक इन्हें अनियमित कहा जा सकता है, क्योंकि कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति के स्थान पर दैनिक वेतन पर लिया गया। ऐसी अनियमितता, दीर्घकालिक निरंतर सेवा और संस्थागत स्वीकृति से दूर हो गई (cured) मानी गई।
विश्वविद्यालय ने समिति की अनुशंसाओं को चुनिंदा रूप से लागू किया; उसी सूची के कुछ व्यक्तियों को नियमित किया, जबकि याचिकाकर्ताओं का नियमितीकरण नहीं किया। न्यायालय ने इस “पिक-एंड-चूज़” को स्पष्ट रूप से मनमाना और अनुच्छेद 14 के प्रतिकूल बताया।
इसके बाद न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, विशेषतः State of Karnataka v. Uma Devi के प्रभाव का विश्लेषण किया। उसने कहा कि Uma Devi, स्वीकृत पदों पर न्यायालय के आदेशों के बिना दस वर्ष या अधिक कार्य कर चुके अनियमित, परंतु अवैध नहीं, कर्मचारियों पर एकमुश्त विचार की अनुमति देता है। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता पूरी तरह इस अपवाद के अंतर्गत आते हैं।
निर्णय में बाद के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों — Dharam Singh v. State of U.P., Shripal v. Nagar Nigam, Ghaziabad और Jaggo v. Union of India — पर भरोसा किया गया, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने लम्बे समय तक “अस्थायीवाद (ad-hocism)” को, दैनिक वेतन और अस्थायी व्यवस्थाओं के दुरुपयोग तथा चुनिंदा नियमितीकरण को निंदनीय बताया। इन निर्णयों में कहा गया है कि जहां कर्मचारी स्वीकृत पदों पर लम्बी सेवा दे चुके हों और समान रूप से स्थित अन्य को नियमित कर दिया गया हो, वहां नियमितीकरण से इन्कार अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि बदलती हुई राज्य नीतियों और कट-ऑफ तिथियों पर विश्वविद्यालय का भरोसा, 2003 की समिति अनुशंसाओं से उत्पन्न याचिकाकर्ताओं की अर्जित और वैध अपेक्षा को पूर्वप्रभाव से समाप्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियां वस्तुतः नियमित थीं और उन्होंने नियमितीकरण का सशक्त न्यायसंगत अधिकार अर्जित कर लिया था।
अंततः, राहत तय करते समय न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं ने 2005 में ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और पहले रिट को 2011 में गुण-दोष पर निर्णय दिए बिना समाप्त कर दिया गया था। न्यायालय ने 2015 में, और भी लंबी सेवा के बाद, वर्तमान रिट दायर किए जाने को एक नया और परिपक्व कारण कार्रवाई माना। न्याय और प्रशासनिक सुविधा के संतुलन के लिए, न्यायालय ने नियमितीकरण की तिथि 2003 के बजाय 17.04.2015, अर्थात सीडब्ल्यूजेसी सं. 6125/2015 दाखिल करने की तिथि से मानने का निर्देश दिया।
परिणामतः, न्यायालय ने 19.09.2015 की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया, चार सप्ताह के भीतर पुनर्बहाली का निर्देश दिया, सेवा समाप्ति से पुनर्बहाली तक की पूरी अवधि को निरंतर सेवा माना, और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को जिन स्वीकृत पदों पर वे काम कर रहे थे, उन पर 17.04.2015 से अवशोषित/नियमित किया जाए, तथा सभी परिणामी मौद्रिक और सेवा लाभ दिए जाएं।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय विश्वविद्यालयों और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं में स्वीकृत पदों पर वर्षों तक काम कर रहे दैनिक वेतन और अस्थायी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि दैनिक वेतन भोगियों को भी, कथित कदाचार जैसे हड़ताल में भागीदारी, के आरोप पर बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के नहीं हटाया जा सकता। किसी का आजीविका मौखिक या दूरभाषीय निर्देश से समाप्त नहीं की जा सकती। लिखित आदेश, नोटिस और सुनवाई का अवसर अनिवार्य है।
दूसरा, न्यायालय दैनिक वेतन भोगियों पर भी श्रम कानून की सुरक्षा लागू करता है। उनकी सेवाओं की साधारण समाप्ति भी “छंटनी” मानी जाएगी, जिसके लिए पूर्व नोटिस और मुआवज़ा, तथा “आखिर में आए, पहले जाए” के सिद्धांत का पालन आवश्यक है। वरिष्ठ कर्मचारियों को चुनिंदा निशाना बनाकर कनिष्ठों को जारी रखना अवैध और असंवैधानिक है।
तीसरा, निर्णय इस विचार को मज़बूती देता है कि जो कर्मचारी निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से, स्वीकृत पदों पर, लंबे समय तक काम कर चुके हैं, विशेषकर जहां नियोक्ता स्वयं उनके अवशोषण की अनुशंसा कर चुका हो और उसी सूची के अन्य को नियमित कर चुका हो, वे नियमितीकरण के मजबूत अधिकार के हकदार हैं।
बिहार भर के कर्मचारियों के लिए यह निर्णय संकेत देता है कि पटना उच्च न्यायालय तकनीकी नीतियों से परे जाकर यह देखने को तैयार है कि राज्य और उसके विश्वविद्यालय निष्पक्ष, सुसंगत और संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या रिट याचिका इसलिए बाधित थी क्योंकि याचिकाकर्ता औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत जा सकते थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने रिट याचिका को ग्राह्य माना क्योंकि चुनौती मनमानी और असंवैधानिक सेवा समाप्ति के विरुद्ध थी, जिससे वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के बावजूद अनुच्छेद 226 आकर्षित होता है। - प्रश्न: क्या 19.09.2015 का आदेश दैनिक वेतन भोगियों की वैध साधारण छुट्टी था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि यह आदेश कलंकपूर्ण था, कथित हड़ताल भागीदारी पर आधारित था, बिना जांच, नोटिस या सक्षम प्राधिकारी के अधिकार के पारित हुआ, और साथ ही औद्योगिक विवाद अधिनियम की धाराएं 25F और 25G का पालन किए बिना की गई अवैध छंटनी भी था। - प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता पटना विश्वविद्यालय सेवा में नियमितीकरण के हकदार थे?
उत्तर: हां। न्यायालय ने माना कि स्वीकृत पदों पर उनकी लंबी, निरंतर सेवा; प्रारंभिक निष्पक्ष चयन; 05.11.2003 की सीनेट समिति की अनुशंसाओं में उनका नाम; और उसी सूची से अन्य के चुनिंदा नियमितीकरण ने उन्हें 17.04.2015 से अवशोषण/नियमितीकरण का हकदार बना दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- M/s Godrej Sara Lee Ltd. v. Excise and Taxation Officer-cum-Assessing Authority & Ors., Civil Appeal No. 5393 of 2010
- State of Uttar Pradesh v. Mohd. Nooh, 1958 SCR 595
- Whirlpool Corporation v. Registrar of Trade Marks, Mumbai & Others, (1998) 8 SCC 1
- Assistant Commissioner of State Tax v. M/s Commercial Steel Limited, 2021 SCC OnLine SC 884
- State of Karnataka v. Uma Devi, AIR 2006 SC 1806
- Dharam Singh v. State of U.P., Civil Appeal No. 8558 of 2018
- Shripal & Another v. Nagar Nigam, Ghaziabad, 2025 SCC OnLine SC 221
- Jaggo v. Union of India, 2025 (1) PLJR 165
- Deepak Kumar v. State of Bihar & Ors., CWJC No. 10507 of 1997 and MJC No. 1741 of 2002 (referred for background policy)
मामले का विवरण
मामला संख्या: CWJC No. 18289 of 2015 with CWJC No. 6125 of 2015
मामले का शीर्षक: Madhwi Jha & Ors. v. The Patna University & Ors.
साइटेशन: 2026(1) PLJR 560
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Alok Kumar Sinha
निर्णय की तिथि: 23-12-2025
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से (दोनों मामलों में): Mr. Sidharth Prasad, Advocate; Mr. Om Prakash Kumar, Advocate; साथ में Mr. Sunit Kumar, Ms. Swetang Sinha, Mr. Shashank Shekhar, Mr. Shantam Kriti (in CWJC 18289/2015)
- प्रतिवादी / राज्य की ओर से: Mr. Digvijay Singh, Advocate
- पटना विश्वविद्यालय की ओर से: Mr. Mrigank Mauli, Senior Advocate; Mr. Manish Dhari Singh, Advocate
- मगध महिला कॉलेज की ओर से: Mrs. Kalpana, Advocate
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिकाएं, जिनमें दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की सेवा समाप्ति/छुट्टी को चुनौती दी गई और स्वीकृत पदों पर नियमितीकरण/अवशोषण हेतु बंदी प्रत्यक्षीकरण (mandamus) की मांग की गई।
निर्णय की प्रति का लिंक: पूरे पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि
बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं,
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