मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 1978 में बिहार के कृषि विभाग में कनिष्ठ सांख्यिकी सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था। लगभग तीन दशक सेवा देने के बाद, उन्हें जिला कृषि पदाधिकारी के अधीन दरभंगा में जिला योजना एवं मूल्यांकन पदाधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया।
वर्ष 2010 में उन्हें दरभंगा के कनिष्ठ पादप संरक्षण पदाधिकारी (JPPO) का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। इस पद पर कार्य करते समय, दरभंगा के अरविंद होटल के कक्ष संख्या 104 में एक निगरानी (विजिलेंस) छापा पड़ा। कथित रूप से कुछ अधिकारियों को वहां रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया।
दिनांक 16.05.2011 को याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोप पत्र जारी किया गया। उन पर आरोप था कि वे उन अधिकारियों के साथ होटल के कमरे में मौजूद थे और उनके कब्जे से एक मोबाइल फोन और एक Sony कैमरा बरामद हुआ। इसी आधार पर उनकी उपस्थिति को भ्रष्टाचार में संलिप्तता माना गया। यह कोई विशिष्ट आरोप नहीं था कि उन्होंने स्वयं किसी से रिश्वत मांगी या स्वीकार की, या कि उनके पास से कोई रिश्वत की राशि बरामद हुई।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत Town (Darbhanga) P.S. Case No. 86 of 2011/Special Case No. 8 of 2011 के रूप में प्राथमिकी दर्ज की गई। आपराधिक मामला अभी भी लंबित है। याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया और बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमावली, 2005, जिसे प्रायः बिहार CCA नियम, 2005 कहा जाता है, के तहत विभागीय कार्यवाही आरंभ की गई।
अन्वेषण पदाधिकारी ने 11.01.2013 को अपनी प्रतिवेदन (रिपोर्ट) प्रस्तुत की। बाद में 19.03.2014 की दिनांकित द्वितीय कारण बताओ सूचना (सेकंड शो कॉज नोटिस) याचिकाकर्ता को दी गई। अंततः, कृषि विभाग के उप सचिव द्वारा निर्गत अधिसूचना संख्या 411, दिनांक 06.11.2014 के माध्यम से, याचिकाकर्ता को बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 14(xi) के अंतर्गत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। राज्य के अनुसार, इस बर्खास्तगी को मंत्रिपरिषद की स्वीकृति प्राप्त थी।
याचिकाकर्ता 31.01.2016 को सेवा से सेवानिवृत्त हो गए, किंतु तब तक वे बर्खास्त की स्थिति में थे। उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में CWJC No. 5278 of 2015 दायर कर बर्खास्तगी को चुनौती दी। साथ ही, उन्होंने बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 24(2) के अंतर्गत पुनरीक्षण याचिका भी दाखिल की।
दिनांक 27.08.2018 को उच्च न्यायालय ने CWJC No. 5278 of 2015 का निपटारा करते हुए सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह पुनरीक्षण याचिका का स्वतंत्र रूप से गुण-दोष के आधार पर निर्णय करे। इस आदेश के अनुपालन में, याचिकाकर्ता को 11.12.2018 और 08.01.2019 को व्यक्तिगत सुनवाई दी गई। तथापि, कृषि विभाग के सचिव द्वारा जारी अधिसूचना संख्या 129, दिनांक 08.03.2021 के माध्यम से पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और बर्खास्तगी बरकरार रखी गई।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने वर्तमान रिट याचिका CWJC No. 1430 of 2022 दाखिल की, जिसमें 06.11.2014 की दंडादेश तथा 08.03.2021 के पुनरीक्षण आदेश दोनों को चुनौती दी गई और सेवानिवृत्ति के बाद परिणामी लाभ की मांग की गई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के माननीय श्री न्यायमूर्ति डॉ. अंशुमान ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी और पुनरीक्षण आदेश को कई आधारों पर चुनौती दी: साक्ष्य के अभाव, बिहार CCA नियम, 2005 के उल्लंघन तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के हनन के आधार पर।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि आरोप पत्र में मूल आरोप केवल इतना था कि वे उस होटल के कमरे में उपस्थित थे जहां अन्य लोग रिश्वत लेते पकड़े गए। उन पर स्वयं रिश्वत मांगने या स्वीकार करने का कोई आरोप नहीं था और न ही उनके कब्जे से कोई धनराशि बरामद हुई। केवल एक मोबाइल और एक सरकारी Sony कैमरा उनकी कब्जे से जब्त किया गया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, अन्वेषण पदाधिकारी की अपनी निष्कर्ष भी इसी को पुष्ट करती हैं। जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से कहा गया कि उनके पास से कोई रिश्वत की राशि बरामद नहीं हुई। सरकारी कैमरा की बरामदगी से उनकी यह व्याख्या पुष्ट होती थी कि वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को यह दिखाने के लिए होटल गए थे कि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे हो रहा है।
अन्वेषण पदाधिकारी ने यह अवश्य उल्लेख किया कि अवकाश (हॉलीडे) के दिन होटल का कमरा बुक करना संदेह उत्पन्न करता है। फिर भी उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता संभवतः अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर कार्य कर रहे थे। इन निष्कर्षों के बावजूद, अन्वेषण पदाधिकारी ने आश्चर्यजनक रूप से निष्कर्ष दे दिया कि याचिकाकर्ता पर अपने वरिष्ठों को रिश्वत लेने में सहायता करने का आरोप सिद्ध हो गया है। “सहायता करने” की यह भूमिका मूल आरोप पत्र में कहीं भी उल्लिखित नहीं थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जांच कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण थी क्योंकि किसी भी गवाह की जिरह नहीं की गई और न ही किसी दस्तावेज को किसी गवाह के माध्यम से सिद्ध किया गया। प्रस्तुती अधिकारी ने केवल अपने लिखित/मौखिक प्रस्तुतिकरण पर ही भरोसा किया। इस प्रकार, विभागीय जांच में लागू “प्रमाणों की प्रबल संभावना” (preponderance of probabilities) के मानक पर भी कोई विधिसम्मत साक्ष्य उपलब्ध नहीं था।
दिनांक 19.03.2014 की द्वितीय कारण बताओ सूचना को भी चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि नोटिस की भाषा से ही यह स्पष्ट था कि दंडाधिकारी पहले से ही भारी दंड लगाने का मन बना चुके थे, क्योंकि उसमें कहा गया कि गंभीर आरोप सिद्ध हो चुके हैं। उन्होंने 12.04.2014 को उत्तर दाखिल किया, जो विभाग को 16.04.2014 को प्राप्त हुआ, परंतु बाद की बर्खास्तगी अधिसूचना में यह दर्शाया गया कि उन्होंने समय पर उत्तर नहीं दिया। यह, उनके अनुसार, पक्षपात और मस्तिष्क का उचित प्रयोग न होने (non-application of mind) को दर्शाता है।
याचिकाकर्ता ने आगे यह भी इंगित किया कि बिहार लोक सेवा आयोग ने भी बर्खास्तगी के प्रस्ताव से सहमति नहीं दी थी। इसके बावजूद, सामान्य प्रशासन विभाग से राय लेकर तथा मंत्रिमंडल की स्वीकृति प्राप्त कर विभाग ने नियम 14(xi) के अंतर्गत चरम दंड बर्खास्तगी ही दे डाली।
याचिकाकर्ता ने कई न्यायिक निर्णयों पर भरोसा किया। Oryx Fisheries Private Limited v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अर्ध-न्यायिक कार्यवाही में कारण बताओ सूचना ऐसी होनी चाहिए जो वास्तविक एवं निष्पक्ष अवसर प्रदान करे। Brij Bihari Singh v. Bihar State Financial Corporation में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि किसी अभियुक्त कर्मचारी को आरोप और साक्ष्य की जानकारी होना, गवाहों की उपस्थिति में सुनने और जिरह करने का अवसर मिलना, तथा सामग्री का प्रतिवाद करने की सुविधा मिलना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय के निर्णय Dr. Janardan Prasad Sukumar v. State of Bihar पर भी भरोसा किया, जिसमें विभागीय कार्यवाही में निष्पक्ष अवसर की आवश्यकता पर बल दिया गया और यह कहा गया कि प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन से ऐसी कार्यवाहियां अवैध हो जाती हैं।
दूसरी ओर, राज्य ने कार्यवाही का बचाव किया। राज्य के अधिवक्ता ने याचिकाकर्ता के सेवा इतिहास और आरोपों की गंभीरता का उल्लेख किया। राज्य के अनुसार, बिहार CCA नियम, 2005 के तहत विधिवत विभागीय जांच की गई और अन्वेषण पदाधिकारी ने विस्तृत प्रतिवेदन देकर आरोप सिद्ध माने। द्वितीय कारण बताओ सूचना जारी की गई और याचिकाकर्ता का पक्ष विचारने के बाद दंडाधिकारी ने बर्खास्तगी का दंड दिया, जिसे बाद में पुनरीक्षण में भी बरकरार रखा गया।
राज्य ने यह भी कहा कि दो अन्य अधिकारी, मनोज कुमार और सत्य नारायण मोची, पर भी समान कार्यवाही की गई और उन्हें भी दंडित किया गया, जिससे यह सिद्ध होता है कि कोई भेदभाव नहीं हुआ। अतः राज्य का तर्क था कि यह रिट याचिका केवल एक निष्पादित विभागीय मामले को दोबारा खोलने का प्रयास है, जिसे खारिज किया जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों की समीक्षा के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने कुछ प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया।
पहले, न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि आरोप पत्र में आरोप केवल इतना था कि याचिकाकर्ता उन अन्य लोगों के साथ होटल के कमरे में मौजूद थे जहां रिश्वत ली जा रही थी और उनके कब्जे से एक मोबाइल व कैमरा जब्त हुआ। प्राथमिकी दर्ज हुई और आपराधिक मामला लंबित है। किंतु विभागीय जांच में न तो किसी गवाह की जिरह हुई और न ही दस्तावेजों को विधिवत सिद्ध किया गया। फिर भी अन्वेषण पदाधिकारी ने निष्कर्ष दे दिया कि याचिकाकर्ता ने अन्य अधिकारियों की रिश्वत लेने में सहायता की।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि जांच प्रतिवेदन में स्वयं यह दर्ज है कि याचिकाकर्ता के पास से कोई रिश्वत की राशि बरामद नहीं हुई। उनके पास सरकारी कैमरा होना इस बात का समर्थन करता है कि वे आधिकारिक उद्देश्य से वहां गए थे। अवकाश के दिन होटल कमरा बुक करने पर संदेह हो सकता है, परंतु केवल संदेह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।
दूसरे, न्यायालय ने आरोप पत्र और दंडादेश के बीच गंभीर असंगति पाई। दंडादेश में दंडाधिकारी ने ऐसे उल्लेख किया मानो याचिकाकर्ता को उनके कब्जे से रिश्वत की रकम बरामद होने और उसे स्वीकार करने के कारण ट्रैप टीम ने गिरफ्तार किया हो। यह स्पष्ट रूप से गलत था क्योंकि आरोप पत्र में उनके पास से किसी रिकवरी का आरोप नहीं था और जांच प्रतिवेदन में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उनसे कोई रकम बरामद नहीं हुई। अतः दंडाधिकारी ने ऐसे आरोप पर दंड दे दिया जो आरोप पत्र में था ही नहीं।
तीसरे, न्यायालय “आश्चर्यचकित” था कि किसी भी गवाह, यहां तक कि शिकायतकर्ता तक की भी, आरोप सिद्ध करने के लिए जिरह नहीं की गई। याचिकाकर्ता को प्रतिपरीक्षा (क्रॉस-एग्जामिनेशन) का कोई अवसर नहीं दिया गया। न्यायालय ने इसे बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 19 तथा प्राकृतिक न्याय के व्यापक सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन माना।
इसके समर्थन में, न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Roop Singh Negi v. Punjab National Bank पर भरोसा किया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि विभागीय कार्यवाही अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) होती है। अन्वेषण पदाधिकारी को अपने निष्कर्ष अभिलेख पर लाए गए साक्ष्यों पर आधारित करने होते हैं। आपराधिक जांच के दौरान एकत्र सामग्री, जैसे प्राथमिकी, स्वतः विभागीय जांच में साक्ष्य नहीं बन जाती, जब तक कि उसे गवाहों के माध्यम से सिद्ध न किया जाए। जहां “नो एविडेंस” की स्थिति हो, वहां उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत हस्तक्षेप कर सकता है।
न्यायालय ने यह भी माना कि Brij Bihari Singh में प्रतिपादित सिद्धांत सीधे लागू होते हैं: किसी अभियुक्त कर्मचारी को आरोप और गवाही दोनों की जानकारी होनी चाहिए, उसे गवाहों को सुनने और प्रतिपरीक्षा करने का निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए तथा उसे साक्ष्य के प्रतिवाद की अनुमति होनी चाहिए। जहां जांच प्रतिवेदन केवल ipse dixit, अनुमान और अटकलों (conjectures and surmises) पर आधारित हो, वह टिक नहीं सकता।
आगे, पटना उच्च न्यायालय ने Dr. Janardan Prasad Sukumar के निर्णय के अनुपात (ratio) को प्रासंगिक पाया और यह टिप्पणी की कि वर्तमान मामले की विभागीय कार्यवाही में यह mala fide उद्देश्य झलकता है कि किसी भी तरह याचिकाकर्ता पर, जबकि उसके पास से कोई बरामदगी नहीं हुई थी, बर्खास्तगी थोप दी जाए।
न्यायालय ने Laxmi Devi Sugar Mills Ltd. के मामले को भिन्न मानते हुए उसे अनुपयुक्त बताया, क्योंकि वह निर्णय Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 से संबंधित था, जिसका यहां कोई अनुप्रयोग नहीं था।
बिहार CCA नियम, 2005 की ओर लौटते हुए न्यायालय ने माना कि एक बार दंडाधिकारी ने नियम 17(3) से (23) के तहत नियमित जांच करने का निर्णय ले लिया तो वह इन प्रक्रियाओं का कठोर अनुपालन करने के लिए बाध्य था और वह नियम 19 का सहारा नहीं ले सकता था। अन्वेषण प्रतिवेदन को स्वीकार करते हुए, उससे भिन्न कारण देना और वह भी बिना किसी साक्ष्य के, नियम 19 पढ़ा गया नियम 17 के उल्लंघन के समान है।
यह तर्क कि दो अन्य अधिकारियों को भी दंडित किया गया, इस पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता के प्रत्युत्तर से यह नोट किया कि उन अधिकारियों के पास से वास्तव में धन बरामद हुआ था, जिनमें से एक को सेवा से हटाया गया और दूसरे की पेंशन में 10% कटौती की गई। चूंकि याचिकाकर्ता के पास से कोई धन बरामद नहीं हुआ और उसकी जांच में गंभीर प्रक्रियागत त्रुटियां थीं, इसलिए उनके मामले तुलनीय नहीं हैं।
इस विश्लेषण के आधार पर, पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा बिहार CCA नियम, 2005 का घोर उल्लंघन हुआ है। दोष सिद्धि के निष्कर्ष का कोई साक्ष्यात्मक आधार नहीं था।
तदनुसार, न्यायालय ने तीन चीजें रद्द कर दीं: 11.01.2013 की जांच प्रतिवेदन, 06.11.2014 को उप सचिव द्वारा निर्गत स्मारपत्र संख्या 411 के तहत जारी बर्खास्तगी आदेश तथा कृषि विभाग, बिहार के सचिव द्वारा 08.03.2021 को स्मारपत्र संख्या 129 के तहत पारित पुनरीक्षण आदेश।
इसके बाद न्यायालय ने प्रतिवादी प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे दंडादेश रद्द होने के फलस्वरूप याचिकाकर्ता के भुगतान एवं देयताओं के अधिकार के संबंध में, निर्णय की प्रति प्राप्त होने से तीन महीने के भीतर निर्णय लें। इन निर्देशों के साथ रिट याचिका स्वीकृत की गई और सभी अंतरिम प्रार्थना पत्रों का निपटारा कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार एवं अन्य स्थानों के सरकारी कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर उनके लिए जिनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमों के साथ-साथ विभागीय कार्यवाही भी चल रही है।
पहले, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल उस स्थान पर उपस्थित होने मात्र से, जहां भ्रष्टाचार हो रहा हो, बिना संलिप्तता के ठोस साक्ष्य के, किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। मात्र संदेह, प्रमाण नहीं होता।
दूसरे, न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि विभागीय जांच केवल औपचारिकता नहीं है। प्राधिकारियों को गवाहों की जिरह करनी होगी, प्रतिपरीक्षा की अनुमति देनी होगी और निष्कर्ष साक्ष्य के आधार पर देने होंगे। प्राथमिकी, ट्रैप मेमो और जांच कागजात तब तक साक्ष्य नहीं माने जा सकते जब तक कि उन्हें गवाहों के माध्यम से सिद्ध न किया जाए।
तीसरे, निर्णय यह दर्शाता है कि यदि दंडादेश ऐसे आरोप पर आधारित हो जो आरोप पत्र में कभी दर्ज ही नहीं था, तो ऐसा दंडादेश टिक नहीं सकता। किसी व्यक्ति को दंडित करने से पहले उसे यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि उस पर कौन-सा आरोप लगाया गया है।
चौथे, यहां तक कि जब सरकार भ्रष्टाचार उन्मूलन का लक्ष्य रखती है, तब भी उसे विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करना ही होगा। न्यायालय ने रेखांकित किया कि बिहार CCA नियम, 2005 एवं प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की स्थिति में अनुच्छेद 226 के अंतर्गत न्यायिक हस्तक्षेप होगा।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए यह निर्णय यह भी दिखाता है कि यदि सेवानिवृत्ति से पहले बर्खास्तगी के आदेश पारित हो गए हों, तो भी न्यायालय उन्हें रद्द कर सकता है और विभाग को उनके देयकों और लाभों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दे सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या किसी सरकारी सेवक को कथित रिश्वत प्रकरण में संलिप्तता के आधार पर, जबकि उसके पास से कोई रिश्वत की राशि बरामद न हुई हो और विभागीय जांच में कोई गवाह न जिरह किया गया हो, सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जब कोई विधिसम्मत साक्ष्य उपलब्ध न हो और जांच बिहार CCA नियम, 2005 तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन में की गई हो, तो ऐसी बर्खास्तगी टिकाऊ नहीं है और उसे निरस्त किया जाना चाहिए।
प्रश्न: क्या दंडादेश वैध है यदि वह आरोप पत्र में उल्लिखित आरोप से भिन्न आरोप के आधार पर पारित किया गया हो?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि आरोप पत्र में वर्णित न किए गए, नए या परिवर्तित आरोप के आधार पर दंड देना प्राकृतिक न्याय के विपरीत है। इस मामले में दंडादेश दोषपूर्ण था क्योंकि उसमें यह मान लिया गया कि याचिकाकर्ता के पास से रिश्वत की राशि बरामद हुई, जबकि यह आरोप पत्र और जांच प्रतिवेदन दोनों के विपरीत था।
प्रश्न: विभागीय जांच में बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 17 और 19 के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का अनुपालन न होने का क्या प्रभाव है?
उत्तर: गैर-अनुपालन, जैसे कि नियमित जांच करने का निर्णय लेने के बाद भी गवाहों की जिरह न करना या प्रतिपरीक्षा का अवसर न देना, नियमों तथा प्राकृतिक न्याय का गंभीर उल्लंघन है। ऐसी जांच पर आधारित निष्कर्षों को निरस्त किया जाना अनिवार्य है।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank & Ors., (2009) 2 SCC 570.
- Union of India v. H.C. Goel, AIR 1964 SC 364; (1964) 4 SCR 718 (Roop Singh Negi के भीतर उद्धृत)।
- Oryx Fisheries Private Limited v. Union of India & Ors., (2010) 13 SCC 427 (विचारित, आंशिक रूप से लागू)।
- Laxmi Devi Sugar Mills Ltd. v. Nand Kishore Singh, AIR 1957 SC 7 (इस मामले में अनुपयुक्त ठहराया गया)।
- Brij Bihari Singh v. Bihar State Financial Corporation & Ors., (2015) 17 SCC 541.
- Dr. Janardan Prasad Sukumar v. The State of Bihar through the Chief Secretary & Ors., 2025 (1) PLJR 625.
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1430 of 2022
मामले का शीर्षक: Bipin Kumar v. The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Dr. Anshuman
निर्णय की दिनांक: 06.01.2026
उद्धरण: 2026 (1) PLJR 589
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Ms. Surya Nilambari, Advocate
- प्रतिवादियों (राज्य बिहार एवं कृषि विभाग के प्राधिकारी) की ओर से: Mr. Anant Kr. Singh (SC15)
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें कृषि विभाग के एक सरकारी कर्मचारी से संबंधित विभागीय जांच प्रतिवेदन, बर्खास्तगी आदेश और पुनरीक्षण याचिका की अस्वीकृति को चुनौती दी गई।
चुनौती दिए गए प्रमुख विभागीय आदेश:
- दिनांक 11.01.2013 की जांच प्रतिवेदन।
- बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 14(xi) के तहत बिहार के कृषि विभाग के उप सचिव द्वारा जारी स्मारपत्र संख्या 411 दिनांक 06.11.2014 में निहित बर्खास्तगी अधिसूचना।
- कृषि विभाग, बिहार के सचिव द्वारा जारी स्मारपत्र संख्या 129 दिनांक 08.03.2021 में निहित पुनरीक्षण अस्वीकृति आदेश।
अंतिम परिणाम: रिट याचिका स्वीकृत; जांच प्रतिवेदन, बर्खास्तगी आदेश और पुनरीक्षण आदेश निरस्त; प्रतिवादियों को निर्देश कि निर्णय की प्रति प्राप्त होने से तीन महीने के भीतर याचिकाकर्ता के भुगतान एवं देयताओं के हक के संबंध में निर्णय लें।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 1430 of 2022
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