मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पश्चिम चंपारण जिले के बैरिया थाना कांड सं. 167/2018 से उत्पन्न हुआ। पुलिस ने बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 30(क) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273 के तहत एफआईआर दर्ज की।
एफआईआर इस सूचना के आधार पर दर्ज की गई कि एक मारुति वैन में भारी मात्रा में अवैध शराब ले जाई जा रही है। जब पुलिस ने वाहन को रोका, तो उसमें सवार व्यक्ति कथित रूप से भागने में सफल हो गए। वैन की तलाशी लेने पर पुलिस ने रॉयल स्टैग शराब के छह कार्टन बरामद किए, प्रत्येक कार्टन में 180 मिलीलीटर के 232 पीस थे।
याचिकाकर्ता, विक्की कुमार, का नाम इस एफआईआर में दिया गया था। इसके बाद उन्होंने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 750/2019 दायर कर पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनकी प्रार्थना थी कि एफआईआर को ही निरस्त कर दिया जाए, ताकि उनके विरुद्ध आपराधिक मामला शुरुआती चरण में ही समाप्त हो जाए।
अदालत ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
यह मामला 29 अप्रैल 2019 को पटना उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार सिंह के समक्ष आया। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं — याचिकाकर्ता की ओर से उनके अधिवक्ता और बिहार राज्य की ओर से उसके अधिवक्ता द्वारा।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि उनका नाम केवल संदेह के आधार पर एफआईआर में शामिल किया गया है। उनका कहना था कि जब वाहन को रोका गया, उस समय उन्हें मौके पर नहीं पकड़ा गया। उनके अनुसार, उन्हें कथित अपराध से जोड़ने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध नहीं थी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है कि वे किसी नशीले पदार्थ या शराब के निर्माण, कब्जे, क्रय, विक्रय, वितरण, संग्रहण, आयात, निर्यात, परिवहन या हटाने की गतिविधि में शामिल थे। इस आधार पर उनका कहना था कि याचिकाकर्ता को बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) के तहत अभियुक्त नहीं बनाया जा सकता था।
सरल शब्दों में, याचिकाकर्ता ने कहा: “मैं मौके पर मौजूद नहीं था, मेरा नाम सिर्फ संदेह के आधार पर आया है, और कोई सबूत नहीं है कि मैं शराब के कारोबार में था। इसलिए मेरे विरुद्ध दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया जाए।”
दूसरी ओर, राज्य ने रिट याचिका का विरोध किया। राज्य के अधिवक्ता ने बताया कि एफआईआर किस प्रकार दर्ज हुई। उन्होंने कहा कि पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि याचिकाकर्ता और अन्य लोग एक मारुति वैन से भारी मात्रा में अवैध शराब ले जा रहे हैं।
इस गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने वैन को रोका। हालांकि, वैन में यात्रा कर रहे लोग, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल बताए गए, मौके से भागने में सफल हो गए। जब पुलिस ने वैन की तलाशी ली, तो उन्हें रॉयल स्टैग शराब के छह कार्टन मिले, प्रत्येक कार्टन में 180 मिलीलीटर के 232 पीस थे।
राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपित व्यक्तियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल हैं, से संबंधित वाहन से भारी मात्रा में शराब की बरामदगी, मामला दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार है। चूंकि मद्यनिषेध अधिनियम की धारा 30(क) के तहत अपराध संज्ञेय है, इसलिए पुलिस पर मामला दर्ज करने का कर्तव्य था।
राज्य के अधिवक्ता ने आगे यह भी कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप, शराब की बरामदगी के साथ मिलकर, बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) के तहत prima facie अपराध को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं। अतः पुलिस की कार्रवाई में कोई अवैधता नहीं है।
दोनों पक्षों को सुनने और रिट याचिका के साथ संलग्न एफआईआर को देखने के बाद, न्यायालय ने आरोपों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। न्यायालय ने ध्यान दिया कि एफआईआर में याचिकाकर्ता के अवैध शराब के व्यापार में संलिप्त होने का विशेष आरोप दर्ज है।
अदालत ने यह दर्ज किया कि गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने वैन को रोका था। यद्यपि वैन में सवार लोग, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल बताए गए, भागने में सफल हो गए, फिर भी वाहन से बरामदगी महत्वपूर्ण थी: मारुति वैन के भीतर से रॉयल स्टैग शराब के छह कार्टन बरामद किए गए, जिनमें प्रत्येक में 180 मिलीलीटर के 232 पीस थे।
इसके बाद न्यायालय ने विधिक परिप्रेक्ष्य पर विचार किया। उसने उल्लेख किया कि बिहार राज्य में शराब और नशीले पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 को राज्य में शराब और नशीले पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध को लागू करने, प्रवर्तन करने और बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया है।
इस मामले में दर्ज एफआईआर विशेष रूप से उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) के तहत दर्ज की गई थी। यह समझने के लिए कि क्या एफआईआर से कोई अपराध प्रकट होता है, न्यायालय ने धारा 30 को संपूर्ण रूप से उद्धृत किया। यह धारा शराब या नशीले पदार्थों के अवैध आयात, निर्यात, परिवहन, निर्माण, कब्जा, बिक्री आदि के लिए दंड का प्रावधान करती है, और भांग की खेती, अवैध फैक्टरी चलाने, तथा शराब बनाने या पैक करने के लिए सामग्री या उपकरण के कब्जे जैसी संबंधित गतिविधियों को भी कवर करती है।
धारा 30(क) में व्यापक श्रेणी की गतिविधियों को शामिल किया गया है: किसी भी नशीले पदार्थ या शराब का निर्माण, कब्जा, क्रय, विक्रय, वितरण, संग्रहण, बॉटलिंग, आयात, निर्यात, परिवहन या हटाना, यदि यह अधिनियम, नियमों, आदेशों, अधिसूचनाओं या लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन में या अधिकार के बिना किया गया हो। इस धारा में बहुत कठोर दंड का प्रावधान है: कारावास की सजा, जो दस वर्ष से कम नहीं होगी और आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है, तथा जुर्माना, जो एक लाख रुपये से कम नहीं होगा और दस लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।
इस विधिक प्रावधान को उद्धृत करने के बाद, न्यायालय ने अपनी समझ स्पष्ट की। धारा 30(क) के अवलोकन से उसने माना कि जो भी व्यक्ति अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन में शराब या नशीले पदार्थ के निर्माण, कब्जे, क्रय, विक्रय, वितरण, संग्रहण, बॉटलिंग, आयात, निर्यात, परिवहन या हटाने की गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, वह इस कठोर दंड के लिए उत्तरदायी होगा।
इस प्रकार, न्यायालय के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या इस मामले की एफआईआर में ऐसे आरोप हैं जो याचिकाकर्ता को धारा 30(क) के दायरे में लाते हों। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इसका उत्तर हां है।
न्यायालय ने माना कि एफआईआर में लगाए गए आरोप स्पष्ट रूप से उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) के तत्वों को आकर्षित करते हैं। एफआईआर में कहा गया था कि याचिकाकर्ता और अन्य लोग मारुति वैन में भारी मात्रा में अवैध शराब लेकर जा रहे थे, जिसे पुलिस ने रोका। यह तथ्य कि सवार व्यक्ति भाग गए, इस आरोप को समाप्त नहीं करता; न ही यह तथ्य बदलता है कि उसी वाहन से तुरंत बाद भारी मात्रा में शराब बरामद की गई।
इसी आधार पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस दावे को अस्वीकार कर दिया कि उनका नाम केवल संदेह के आधार पर और बिना किसी सामग्री के एफआईआर में डाला गया है। न्यायालय ने यह नहीं जांचा कि याचिकाकर्ता वास्तव में दोषी हैं या नहीं; यह प्रश्न जांच और परीक्षण (ट्रायल) के लिए छोड़ दिया गया। अदालत ने केवल यह देखा कि क्या एफआईआर में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध प्रकट होता है जो पुलिस जांच को न्यायोचित ठहराए।
न्यायालय ने माना कि इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध मामला दर्ज करना अनुचित था। चूंकि एफआईआर में अवैध शराब से संबंधित विशिष्ट आरोप दर्ज थे और बरामदगी उन आरोपों का समर्थन करती थी, इसलिए पुलिस ने मामला दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने में अपने अधिकारों के भीतर ही कार्रवाई की।
पुलिस की कार्रवाई में कोई अवैधता या मनमानी न पाकर, न्यायालय ने हस्तक्षेप से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप, संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत दायर रिट याचिका खारिज कर दी गई।
इसके परिणामस्वरूप, बैरिया थाना कांड सं. 167/2018 की एफआईआर यथावत बनी रहती है, और बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273 के तहत आपराधिक कार्यवाही विधि के अनुसार आगे जारी रहेगी।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सभी व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके विरुद्ध बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के तहत मामले लंबित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जब शराब की बरामदगी हुई हो, तो पटना उच्च न्यायालय प्रारंभिक चरण में एफआईआर रद्द करने के प्रश्न पर अत्यंत सावधानी बरतता है।
भले ही आरोपी व्यक्ति को मौके पर गिरफ्तार न किया गया हो, यदि एफआईआर में उसका नाम दर्ज है और साथ ही शराब की बरामदगी का उल्लेख है, तो न्यायालय इसे जांच जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार मान सकता है। आमतौर पर न्यायालय तभी कार्यवाही रोकता है, जब एफआईआर में किसी भी प्रकार का अपराध प्रकट ही न होता हो।
यह निर्णय बिहार की शराबबंदी व्यवस्था के कठोर दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है। धारा 30(क) के तहत अत्यंत कठोर दंड का प्रावधान है, और न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पूर्ण शराबबंदी को लागू करने हेतु की गई पुलिस कार्रवाई में वह आसानी से हस्तक्षेप नहीं करेगा।
बिहार के निवासियों के लिए इसका अर्थ यह है कि शराब के भंडारण, परिवहन या लेन-देन में किसी भी प्रकार की संदिग्ध संलिप्तता गंभीर आपराधिक परिणाम जन्म दे सकती है, और यदि एफआईआर में विशेष आरोप तथा बरामदगी दर्ज है, तो एफआईआर रद्द कराने के प्रयास सफल होने की संभावना कम है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या बैरिया थाना कांड सं. 167/2018 की एफआईआर, जिसमें यह आरोप है कि याचिकाकर्ता अवैध शराब ले जाने में संलिप्त थे, को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत रद्द किया जाना चाहिए?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि एफआईआर में याचिकाकर्ता की संलिप्तता के स्पष्ट आरोप हैं और शराब की बरामदगी के साथ मिलकर यह बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम की धारा 30(क) को स्पष्ट रूप से आकर्षित करता है। मामला दर्ज करने और जांच करने में पुलिस की कार्रवाई न्यायोचित पाई गई, और रिट याचिका खारिज कर दी गई।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय या नज़ीर (case law) का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक रिट अधिकारिता वाद सं. 750/2019; बैरिया थाना कांड सं. 167/2018 से उत्पन्न
मामले का शीर्षक: Vicky Kumar v. The Principal Secretary, Department of Excise, Government of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2019(3) PLJR 459
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार सिंह
निर्णय की तिथि: 29-04-2019
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता के लिए अधिवक्ता श्री अशोक कुमार गुप्ता; प्रतिवादियों (बिहार राज्य एवं प्राधिकार) के लिए श्री कुमार मनीष, एससी-5
प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 एवं 227; बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 30(क); भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273
मामले का स्वरूप: शराबबंदी मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए दायर आपराधिक रिट याचिका
परिणाम: रिट याचिका खारिज; एफआईआर और जांच जारी रखने की अनुमति
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर मूल निर्णय देखें
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