प्रकरण की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पूरबिया ज़िला स्थित रूपौली प्रखंड पंचायत समिति की प्रमुख के रूप में निर्वाचित हुई थीं। उनके कार्यकाल के दौरान, समिति के निर्वाचित सदस्यों में से एक-तिहाई से अधिक ने बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 की धारा 44(3)(i) के तहत उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का निश्चय किया।
अविश्वास प्रस्ताव पर विचार करने हेतु विशेष बैठक बुलाए जाने के लिए एक लिखित अभ्यावेदन (रिक्विज़िशन) इन सदस्यों द्वारा तैयार किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, सदस्यों के हस्ताक्षर पहले एक कोरे कागज़ पर लिए गए और बाद में उसे अभ्यावेदन के रूप में बदल दिया गया। उनका आरोप था कि पूर्ववर्ती चुनाव में हारने वाले कुछ प्रत्याशी, सदस्यों को उकसा कर उन्हें पद से हटवाना चाहते थे।
मुख्य विवाद इस बात पर केंद्रित था कि यह अभ्यावेदन किस प्रकार से तामील (सर्व) किया गया और विशेष बैठक किस तरह बुलाई गई। क़ानून की मांग है कि ऐसा अभ्यावेदन पहले प्रमुख के समक्ष प्रस्तुत किया जाए और उसकी प्रति कार्यपालक पदाधिकारी को दी जाए। इस मामले में यह अभ्यावेदन सीधे प्रखंड विकास पदाधिकारी–cum–कार्यपालक पदाधिकारी (प्रतिवादी सं. 6) के कार्यालय में 03.07.2018 को जमा कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्हें धारा 44(3)(i) में निर्धारित विधि के अनुसार कोई अभ्यावेदन कभी प्राप्त ही नहीं हुआ। उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट अधिकारिता मामला संख्या 13513/2018 दायर कर अभ्यावेदन और विशेष बैठक के लिए जारी बाद की नोटिस, दोनों को चुनौती दी। वाद लंबित रहने के दौरान 16.07.2018 को विशेष बैठक हुई, अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ और उन्हें प्रमुख के पद से हटा दिया गया। इसके बाद उन्होंने एक अंतरिम आवेदन दायर कर विशेष बैठक, अविश्वास प्रस्ताव और प्रमुख के पुनः चुनाव की नोटिस — तीनों को निरस्त करने की माँग की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद के माध्यम से, घटनाओं के क्रम, पक्षकारों के आचरण और बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 सहित बिहार राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी निर्देशों का विस्तार से परीक्षण किया।
याचिकाकर्ता की मूल दलील थी कि पूरा प्रक्रिया प्रारंभ से ही अवैध थी। उन्होंने 2006 के अधिनियम की धारा 44(3)(i) पर भरोसा किया, जो प्रमुख के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया निर्धारित करती है। उनके अनुसार:
- दिनांक शून्य (प्रस्तुत 02.07.2018/03.07.2018) का अभ्यावेदन सीधे कार्यपालक पदाधिकारी (प्रतिवादी सं. 6) के कार्यालय में जमा कर दिया गया, बिना पहले उनके (प्रमुख) समक्ष प्रस्तुत किए।
- चूँकि अभ्यावेदन का विधिवत् प्रस्तुतीकरण नहीं हुआ, इसलिए कार्यपालक पदाधिकारी की दिनांक 08.07.2018 (पत्र सं. 1256) वाली नोटिस, जिसमें 16.07.2018 को विशेष बैठक बुलाने की बात थी, अवैध थी।
- प्रमुख के रूप में उन्हें अधिकतम सात दिनों तक अभ्यावेदन पर विचार करने और स्वयं विशेष बैठक बुलाने का अधिकार था, और केवल उनकी चूक की स्थिति में ही उप–प्रमुख या एक-तिहाई सदस्य आगे बढ़ सकते थे।
- फलस्वरूप, 16.07.2018 की विशेष बैठक और उन्हें पद से हटाने वाला प्रस्ताव, दोनों दोषग्रस्त थे, और बाद में “रिक्त” पद पर प्रमुख के चुनाव के लिए जारी नोटिस भी वैध नहीं थी।
अंतरिम आवेदन में उन्होंने न्यायालय से प्रार्थना की कि (क) 16.07.2018 की विशेष बैठक की कार्यवाही, तथा (ख) उप–खंडीय पदाधिकारी की 10.08.2018 की वह नोटिस, जिसमें प्रमुख के पुनः चुनाव की तिथि निर्धारित की गई थी, दोनों को निरस्त किया जाए।
निजी प्रतिवादियों और कार्यपालक पदाधिकारी ने अपने प्रत्युत्तर हलफ़नामों में भिन्न तस्वीर प्रस्तुत की। उनका कहना था कि:
- समिति के एक-तिहाई से अधिक सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित अभ्यावेदन 02.07.2018 को इस उद्देश्य से लाया गया था कि उसे प्रमुख को तामील कराया जाए।
- याचिकाकर्ता सेवा से बचने के लिए कार्यालय से अनुपस्थित रहती थीं; जब 02.07.2018 और 03.07.2018 को सेवा का प्रयास किया गया, तब वे “जानबूझकर अनुपस्थित” रहीं।
- कार्यपालक पदाधिकारी ने पत्र सं. 1209, दिनांक 03.07.2018 जारी कर अभ्यावेदन याचिकाकर्ता को अग्रेषित किया और उनसे 15 दिनों के भीतर (अर्थात 16.07.2018 तक) विशेष बैठक बुलाने का अनुरोध किया।
- इस पत्र (परिशिष्ट ‘A’) पर प्रक्रिया सर्वर (चपरासी) की टीप के अनुसार, 03.07.2018 को वे नहीं मिलीं और 04.07.2018 को उन्होंने अभ्यावेदन लेने से इनकार कर दिया।
- इस इनकार की स्थिति में, कार्यपालक पदाधिकारी ने बिहार राज्य निर्वाचन आयोग के 16.09.2008 के निर्देशों (परिशिष्ट ‘B’) के आलोक में अपने कार्यालय पर सेवा को ही प्रमुख पर सेवा माना।
- इसके बाद कार्यपालक पदाधिकारी ने 07.07.2018 (परिशिष्ट ‘C’) को उप–प्रमुख से विशेष बैठक की तिथि तय करने का अनुरोध किया और उप–प्रमुख ने 08.07.2018 (परिशिष्ट ‘D’) के पत्र से 16.07.2018 की तिथि निर्धारित की, जिससे सभी सदस्यों को सात साफ़ दिन की नोटिस मिल सके।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने इन प्रत्युत्तर एवं पूरक प्रत्युत्तर हलफ़नामों में उल्लिखित तथ्यों को विशेष रूप से नकारने के लिए कोई प्रत्युत्तर हलफ़नामा (रिजॉइंडर) दायर नहीं किया।
न्यायालय ने पहले इस प्रत्युत्तर की अनुपस्थिति पर ध्यान दिया। उसने यह माना कि प्रतिवादियों द्वारा प्रस्तुत तथ्यात्मक विवरण — कि याचिकाकर्ता ने सेवा से बचने और नोटिस लेने से इनकार करने का आचरण किया — वस्तुतः निर्विवाद हैं, क्योंकि याचिकाकर्ता ने शपथपत्र पर इनका खंडन करना नहीं चुना।
अभिलेख से न्यायालय ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
- अविश्वास प्रस्ताव हेतु अभ्यावेदन वास्तव में 02.07.2018 को लाया गया था।
- याचिकाकर्ता 02.07.2018 को कार्यालय नहीं आ रही थीं और अभ्यावेदन की सेवा के प्रयासों के दौरान वे अनुपस्थित बनी रहीं।
- कार्यपालक पदाधिकारी का दिनांक 03.07.2018 का पत्र, जिसमें अभ्यावेदन अग्रेषित कर 15 दिनों के भीतर बैठक बुलाने को कहा गया था, उसे 04.07.2018 को उन्होंने प्रक्रिया सर्वर के समक्ष लेने से इनकार कर दिया, जैसा कि टीप में दर्ज है।
- इन सबके बावजूद याचिकाकर्ता ने 07.07.2018 तक कोई कदम नहीं उठाया, ताकि 16.07.2018 तक बैठक बुलाई जा सके।
इसके बाद न्यायालय ने बिहार राज्य निर्वाचन आयोग के 16.09.2008 के निर्देशों, विशेष रूप से उप–बंध (iv) और (v), जो परिशिष्ट ‘B’ के रूप में अभिलेख पर थे, की जाँच की। इन निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि:
- यदि प्रमुख अविश्वास प्रस्ताव के अभ्यावेदन को प्राप्त करने से बचती हैं, तो कार्यपालक पदाधिकारी को की गई सेवा, प्रमुख पर की गई वैध सेवा मानी जाएगी।
- इसके बाद कार्यपालक पदाधिकारी का दायित्व होगा कि वह प्रमुख को सूचित करे कि वे 15 दिनों के भीतर विशेष बैठक बुलाएँ।
- सभी सदस्यों को सात साफ़ दिन की नोटिस सुनिश्चित करने के लिए, विशेष बैठक बुलाने की नोटिस अभ्यावेदन प्राप्त होने के 2–3 दिनों के भीतर जारी की जानी चाहिए।
- यदि प्रमुख ऐसी तिथि तय करती हैं जिससे सात साफ़ दिन की नोटिस संभव न हो, तो माना जाएगा कि उन्होंने जानबूझकर विवाद उत्पन्न करने का प्रयास किया है, और ऐसी स्थिति में कार्यपालक पदाधिकारी उस तिथि पर नोटिस जारी नहीं करेगा; इसके बदले उप–प्रमुख या एक-तिहाई सदस्य सात दिन की अनिवार्य अवधि का पालन करते हुए नोटिस जारी कर सकते हैं।
इन निर्देशों को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि एक बार जब याचिकाकर्ता ने अभ्यावेदन तथा नोटिस की सेवा से बचने और फिर उसे लेने से इनकार करने का रवैया अपनाया, तो कार्यपालक पदाधिकारी के पास निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। 07.07.2018 तक उसके लिए यह आवश्यक था कि वह 16.07.2018 तक होने वाली बैठक के लिए सात साफ़ दिन की नोटिस सुनिश्चित करे। अतः 07.07.2018 को उप–प्रमुख को तिथि तय करने के लिए कहना और 08.07.2018 को उप–प्रमुख द्वारा नोटिस जारी करना, दोनों उचित थे।
याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय के एकल पीठ के पूर्व निर्णय गीता देवी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, 2015 (1) PLJR 790 पर भरोसा किया, जिसमें यह ज़ोर दिया गया था कि यदि प्रमुख बैठक नहीं बुलाती तो भी अभ्यावेदन–दाता सदस्यों को सात दिन प्रतीक्षा करनी होगी। किंतु न्यायालय ने इस मामले को भिन्न माना।
न्यायालय ने देखा कि गीता देवी में बिहार राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पीठ के संज्ञान में नहीं लाए गए थे। जबकि वर्तमान मामले में ये निर्देश परिशिष्ट ‘B’ के रूप में अभिलेख पर थे और विशेष रूप से उस स्थिति से संबंधित थे, जब प्रमुख सेवा से बचती हैं। इसलिए परिवर्तित तथ्यात्मक एवं विधिक संदर्भ में पूर्व निर्णय याचिकाकर्ता की सहायता नहीं कर सकता था।
निजी प्रतिवादियों ने यह दलील भी दी कि मान लिया जाए कि धारा 44(3)(i) अनिवार्य है, तब भी उसके उल्लंघन मात्र से किसी पक्ष को रिट अधिकारिता में राहत स्वतः नहीं मिल जाती, विशेषकर तब जब उस उल्लंघन में स्वयं उस पक्ष के आचरण का योगदान हो। इस संदर्भ में उन्होंने उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं:
- जसवंतसिंह मथुरा सिंह एवं अनr बनाम अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन, AIR 1991 SC 2130
- कृष्णलाल बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, (1994) 4 SCC 422
- बाबूलाल बद्रीप्रसाद वर्मा बनाम सूरत म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन एवं अन्य, 2008 (12) SCC 401
- ITC Limited बनाम Blue Coast Hotels Limited एवं अन्य, (2018) 15 SCC 99
उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से ITC Limited बनाम Blue Coast Hotels Limited का संदर्भ लिया। उस मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि यद्यपि SARFAESI अधिनियम, 2002 की धारा 13(3-A) अनिवार्य है और बैंक ने इसका पालन नहीं किया था, फिर भी उधारकर्ता के आचरण एवं अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय राहत देने से इंकार कर सकता है। इसी तर्क को अपनाते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि भले ही धारा 44(3)(i) अनिवार्य हो, फिर भी जब याचिकाकर्ता का स्वयं का आचरण दोषपूर्ण हो, तो रिट न्यायालय विवेकाधीन राहत देने से इनकार कर सकता है।
वास्तविक तथ्यों पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने 02.07.2018 एवं उसके बाद कार्यालय से अनुपस्थित रहकर, और 03.07.2018 की ज्ञापन की प्रति प्राप्त करने से इनकार कर, जानबूझकर सेवा से बचने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में उन्हें यह शिकायत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि अभ्यावेदन विधि के अनुसार उनके समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय ने अन्य सदस्यों पर नोटिस की सेवा की भी जाँच की। प्रतिवादी सं. 4 से 6 के प्रत्युत्तर हलफ़नामे के परिशिष्ट ‘E’ श्रेणी से न्यायालय को यह संतोष हुआ कि पंचायत समिति के सभी सदस्यों को विशेष बैठक की नोटिस विधिवत् तामील की गई थी और 16.07.2018 को वास्तव में अविश्वास प्रस्ताव पारित हुआ।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता सद्भावनापूर्वक कार्य नहीं कर रही थीं और वे केवल विधिक तकनीकीताओं के सहारे विशेष बैठक के आयोजन को रोकने का प्रयास कर रही थीं। इन समस्त परिस्थितियों को देखते हुए, तथा यह ध्यान में रखते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत प्रदान करना न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है, न्यायालय ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
अंततः न्यायालय ने माना कि कार्यपालक पदाधिकारी के 07.07.2018 के पत्र के आलोक में 16.07.2018 की विशेष बैठक के लिए 08.07.2018 को उप–प्रमुख द्वारा नोटिस जारी करने में कोई त्रुटि नहीं थी। परिणामस्वरूप, अभ्यावेदन, कार्यपालक पदाधिकारी की नोटिस, विशेष बैठक, अविश्वास प्रस्ताव और बाद की चुनाव–सूचना — सभी को रद्द करने से संबंधित याचिकाकर्ता की माँगें अस्वीकार कर दी गईं। रिट याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों और सदस्यों, विशेषकर प्रमुखों एवं उप–प्रमुखों के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि कोई प्रमुख केवल कार्यालय से अनुपस्थित रहकर या नोटिस लेने से इनकार कर के अविश्वास प्रस्ताव को रोक या टाल नहीं सकती।
पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि जब प्रमुख जानबूझकर अभ्यावेदन प्राप्त करने से बचती हैं, तो कार्यपालक पदाधिकारी पर की गई सेवा, प्रमुख पर वैध सेवा मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में कार्यपालक पदाधिकारी और उप–प्रमुख का दायित्व है कि वे 15 दिनों के भीतर, और सात साफ़ दिन की नोटिस के साथ, सदस्यों को विश्वास परीक्षण का अधिकार दिलाने हेतु प्रक्रिया को आगे बढ़ाएँ।
निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट–शक्ति विवेकाधीन है। यदि राहत चाहने वाला नेता स्वयं कथित प्रक्रिया–उल्लंघन में योगदान देता है, तो न्यायालय कठोर या अनिवार्य विधिक प्रावधानों के बावजूद उसकी सहायता करने से इनकार कर सकता है।
जमीनी–स्तर की राजनीति के लिए यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि पंचायत निकायों के भीतर की लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ — जैसे अविश्वास प्रस्ताव — केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर विफल नहीं की जा सकतीं, जब समग्र प्रक्रिया और सदस्यों की भागीदारी निष्पक्ष हो और नेता ने दुर्भावनापूर्ण आचरण किया हो।
क़ानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या प्रमुख के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का अभ्यावेदन, बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 की धारा 44(3)(i) के अनुसार सीधे उनके समक्ष प्रस्तुत न किए जाने के कारण अमान्य था?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि चूँकि प्रमुख ने जानबूझकर सेवा से बचाव किया और बाद में सेवा से इनकार किया, इसलिए निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत कार्यपालक पदाधिकारी पर की गई सेवा वैध थी और अभ्यावेदन की प्रक्रिया दोषरहित मानी जाएगी। - प्रश्न: क्या 16.07.2018 को आयोजित विशेष बैठक और अविश्वास प्रस्ताव इस आधार पर अवैध थे कि उप–प्रमुख ने बैठक की तिथि समय से पूर्व तथा अधिकार–विहीन होकर तय कर दी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि कार्यपालक पदाधिकारी ने 15 दिन की सीमा के भीतर सात साफ़ दिन की नोटिस सुनिश्चित करने के लिए उप–प्रमुख से तिथि तय करने का विधिसम्मत अनुरोध किया था और उप–प्रमुख द्वारा निर्धारित तिथि पर की गई बैठक एवं प्रस्ताव वैध थे। - प्रश्न: क्या कथित प्रक्रिया–दोषों के बावजूद उच्च न्यायालय को अपने विवेकाधीन रिट अधिकारिता का प्रयोग कर याचिकाकर्ता की पदच्युति को निरस्त करना चाहिए था?
उत्तर: नहीं। याचिकाकर्ता द्वारा सेवा से बचाव और असद्भावनापूर्ण आचरण को देखते हुए न्यायालय ने अपना विवेक प्रयोग करने से इनकार किया और रिट याचिका खारिज कर दी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- गीता देवी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य, 2015 (1) PLJR 790 (पटना उच्च न्यायालय) – तथ्यों के आधार पर तथा इस कारण से अलग माना गया कि वहाँ निर्वाचन आयोग के निर्देशों पर विचार नहीं हुआ था।
- Bharat Petroleum Corporation Ltd. and another बनाम N.R. Vairamani and another, (2004) 8 SCC 579 – इस सिद्धांत के लिए उद्धृत कि निर्णय अपने तथ्यों पर ही नज़ीर होते हैं और तथ्यों में मामूली परिवर्तन भी बड़ा अंतर पैदा कर सकता है।
- Jaswantsingh Mathura Singh & Anr. बनाम Ahmedabad Municipal Corporation, AIR 1991 SC 2130 – निजी प्रतिवादियों द्वारा परित्याग (वेवर) और आचरण के प्रभाव के संबंध में उद्धृत।
- Krishnalal बनाम State of J & K, (1994) 4 SCC 422 – समान सिद्धांतों पर उद्धृत।
- Babulal Badriprasad Varma बनाम Surat Municipal Corporation & Others, 2008 (12) SCC 401 – परित्याग और अनिवार्य प्रावधानों के संबंध में निजी प्रतिवादियों द्वारा उद्धृत।
- ITC Limited बनाम Blue Coast Hotels Limited and Others, (2018) 15 SCC 99 – न्यायालय द्वारा इस बात के लिए अपनाया गया कि अनिवार्य प्रावधानों के उल्लंघन की स्थिति में भी, पक्षकार के आचरण के आधार पर विवेकाधीन राहत से इनकार किया जा सकता है।
प्रकरण के विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 13513/2018
वाद–शीर्षक: नीतू कुमारी बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
उद्धरण: 2019 (3) PLJR 513
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद
निर्णय की तिथि: 14.03.2019 (C.A.V.; CAV तिथि 08.03.2019)
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री एस.बी.के. मंगलं, अधिवक्ता
- राज्य/आधिकारिक प्रतिवादियों की ओर से: श्री अजय, सरकारी अधिवक्ता–5; श्री प्रतिक कुमार सिन्हा, सह–परामर्शदाता GA–5
- राज्य निर्वाचन आयोग (पंचायत) की ओर से: श्री अमित श्रीवास्तव, अधिवक्ता के सह–परामर्शदाता
- निजी प्रतिवादी (पंचायत समिति सदस्य एवं उप–प्रमुख) की ओर से: श्री कुमार कौशिक, अधिवक्ता; श्री बिजेन्द्र कुमार सिंह, अधिवक्ता; श्री कमलेश कुमार महाराणा, अधिवक्ता
वाद का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका — अविश्वास प्रस्ताव से संबंधित अभ्यावेदन एवं नोटिसों को चुनौती देते हुए, विशेष बैठक, अविश्वास प्रस्ताव तथा बाद की चुनाव–सूचना को निरस्त करने की माँग।
निर्णय का लिंक: पूरे पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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