पटना उच्च न्यायालय का फैसला (2022): छह साल की बच्ची के अपहरण मामले में बिहार पुलिस की लापरवाही पर सख्त टिप्पणी, जांच सीबीआई को सौंपी गई

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें एक छह साल की बच्ची के अपहरण की जांच को बिहार पुलिस से लेकर सीबीआई (CBI) को सौंप दिया गया। अदालत ने कहा कि स्थानीय पुलिस ने इस गंभीर मामले में न तो तेजी दिखाई, न ही वैज्ञानिक तरीके से जांच की, जिससे पीड़ित परिवार के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है।

यह मामला मुजफ्फरपुर जिले का है, जहाँ एक पिता की छह साल की बेटी 16 फरवरी 2021 को घर के सामने बने सरस्वती पूजा पंडाल से लापता हो गई थी। पिता ने तुरंत धारा 363 आईपीसी (अपहरण) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई, लेकिन पुलिस ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

पिता ने कई बार वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस महानिरीक्षक (IG) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को शिकायतें भेजीं। उन्होंने बताया कि कुछ लोग उनसे संपर्क कर रहे हैं, जो बेटी को छोड़ने के बदले रुपये मांग रहे हैं और धमकी भी दे रहे हैं। इसके बावजूद पुलिस ने कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की।

आखिरकार, जब मामला पटना उच्च न्यायालय पहुँचा, तो माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने खुद केस डायरी देखी और पाया कि जांच केवल “कागजी कार्रवाई” बनकर रह गई थी। पुलिस अधिकारियों ने कई जगह “किए गए प्रयासों का कोई परिणाम नहीं मिला” जैसी औपचारिक पंक्तियाँ लिखीं लेकिन वास्तव में कोई जांच नहीं की।

अदालत ने पाया कि एक संदिग्ध व्यक्ति आकाश कुमार ने बयान दिया था कि उसका भाई अपनी तीन साल की बेटी को मानव तस्करी करने वाले गिरोह को बेच चुका है, लेकिन न तो जांच अधिकारी और न ही डीएसपी ने इस बयान को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि यह पुलिस की असंवेदनशीलता का स्पष्ट उदाहरण है।

अदालत ने यह भी कहा कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद पुलिस ने न तो सीसीटीवी फुटेज जब्त की, न ही बच्ची की तस्वीर को TrackTheMissingChild.gov.in वेबसाइट पर अपलोड किया, और न ही आसपास के थानों को कोई तत्काल अलर्ट भेजा।

न्यायालय ने बार-बार डीएसपी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मुजफ्फरपुर को बुलाया और उनसे व्यक्तिगत रूप से जवाब मांगा। अदालत ने एक विशेष जांच टीम (SIT) बनाने का आदेश दिया, लेकिन यह आदेश भी देरी से लागू किया गया।

अंत में, न्यायालय ने माना कि पुलिस ने इस मामले में संवेदनशीलता और तत्परता दोनों की कमी दिखाई है, जिससे पिता का न्याय पाने का मौलिक अधिकार (Article 21) प्रभावित हुआ।

अदालत ने कहा कि जब राज्य एजेंसियां नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं कर पातीं, तब न्यायालय का यह कर्तव्य बनता है कि वह हस्तक्षेप करे। इसी कारण अदालत ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया।

साथ ही अदालत ने मुजफ्फरपुर के एसएसपी को निर्देश दिया कि वे इस मामले में जांच में लापरवाही करने वाले सभी पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें और उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई करें।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर

  • बच्चों की सुरक्षा पर न्यायालय की सख्ती: यह फैसला बताता है कि यदि राज्य पुलिस किसी बच्चे के अपहरण के मामले में लापरवाही करती है, तो न्यायालय सीबीआई को जांच सौंप सकता है।
  • मौलिक अधिकारों की रक्षा: यह फैसला दोहराता है कि हर नागरिक को निष्पक्ष, शीघ्र और सही जांच का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
  • पुलिस जवाबदेही: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी जवाबदेह हैं यदि वे समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करते।
  • बिहार पुलिस के लिए चेतावनी: इस फैसले ने पूरे पुलिस तंत्र को यह संदेश दिया कि संवेदनशील मामलों में देरी और औपचारिक जांच स्वीकार्य नहीं है।
  • संस्थागत सुधार की आवश्यकता: अदालत ने यह भी कहा कि राज्य में बच्चों और महिलाओं से जुड़े अपराधों की जांच के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों और विशेष इकाइयों की आवश्यकता है।

कानूनी मुद्दे और निर्णय

  • क्या स्थानीय पुलिस की जांच निष्पक्ष और तत्पर थी?
    ➤ नहीं। अदालत ने पाया कि पुलिस ने कोई गंभीर या वैज्ञानिक जांच नहीं की।
  • क्या याचिकाकर्ता का निष्पक्ष और शीघ्र जांच का अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन हुआ?
    ➤ हाँ। जांच में देरी और असंवेदनशीलता मौलिक अधिकारों का हनन है।
  • क्या जांच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए थी?
    ➤ हाँ। न्यायालय ने माना कि केवल सीबीआई के माध्यम से ही निष्पक्ष और भरोसेमंद जांच संभव है।
  • लापरवाह पुलिस अधिकारियों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाएं?
    ➤ एसएसपी, मुजफ्फरपुर को निर्देश दिया गया कि वे सभी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करें।

पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय

  • State of West Bengal v. Committee for Protection of Democratic Rights (2010) 3 SCC 571
  • K.V. Rajendran v. Superintendent of Police, CBCID (2013) 12 SCC 480
  • Vinay Tyagi v. Irshad Ali (2013) 5 SCC 762
  • Dwarka Nath v. ITO, AIR 1966 SC 81
  • Amar Nath Poddar v. State of Bihar (2021) 2 PLJR 571

न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय

  • Committee for Protection of Democratic Rights (2010) 3 SCC 571
  • K.V. Rajendran (2013) 12 SCC 480
  • Vinay Tyagi (2013) 5 SCC 762

मामले का शीर्षक

पीड़िता के पिता (याचिकाकर्ता) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य

केस नंबर

Criminal Writ Jurisdiction Case No. 936 of 2021

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 209

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • याचिकाकर्ता की ओर से: श्री हंस लाल कुमार, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से: श्री मोहम्मद नदीम सिराज, सरकारी अधिवक्ता-5
  • सीबीआई की ओर से: सुश्री निवेदिता निर्विकार, वरिष्ठ अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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