“पटना उच्च न्यायालय का फैसला: निराधार एफआईआर हुई रद्द”

 

यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दर्ज किया गया था और इसमें याचिकाकर्ता मोहम्मद जमाल अख्तर ने एक आपराधिक प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द करने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

एफआईआर (संख्या 37/2019) चनपटिया थाना, पश्चिम चंपारण में जूनियर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर राजीव कुमार सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता, जो रेडियंट पब्लिक स्कूल के प्रबंध निदेशक हैं, ने स्कूल की इमारत को इस तरह से बनाया कि उसका कुछ हिस्सा 11 केवी ट्रांसमिशन लाइन के ऊपर आ गया। इससे बिजली दुर्घटना की संभावना बनी रहती थी। इसी आधार पर पुलिस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 353 (लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या बल प्रयोग) और 188 (लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवहेलना) के तहत मामला दर्ज किया।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर में दर्ज आरोप पूरी तरह से निराधार हैं और इनसे किसी भी आपराधिक धारा को लागू नहीं किया जा सकता।

  • धारा 353 का उल्लंघन नहीं हुआ:
    एफआईआर में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता ने किसी लोक सेवक पर हमला किया या जबरन बल प्रयोग किया। इसलिए यह धारा लागू नहीं हो सकती।
  • धारा 188 का उल्लंघन नहीं हुआ:
    याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई विधिवत जारी आदेश के उल्लंघन का प्रमाण नहीं था। कानून के अनुसार, धारा 188 के तहत मामला दर्ज करने के लिए किसी लोक सेवक द्वारा लिखित शिकायत जरूरी होती है, जो इस मामले में नहीं की गई थी।

न्यायालय का निर्णय

न्यायालय ने दोनों धाराओं की विस्तार से व्याख्या की और पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इन धाराओं के तहत कोई मामला नहीं बनता।

  • चूंकि कोई लोक सेवक पर हमले या बल प्रयोग का आरोप नहीं था, इसलिए धारा 353 लागू नहीं हो सकती।
  • कोई आधिकारिक आदेश की उल्लंघना सिद्ध नहीं हुई, इसलिए धारा 188 भी लागू नहीं हो सकती।
  • इसके अलावा, धारा 188 के तहत कानूनी कार्यवाही के लिए लोक सेवक की लिखित शिकायत आवश्यक होती है, जो इस मामले में मौजूद नहीं थी।

निष्कर्ष

अदालत ने मामले को निराधार मानते हुए चनपटिया थाना केस संख्या 37/2019 को रद्द कर दिया। इस फैसले से स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए आरोपों का विधि-सम्मत होना आवश्यक है। यदि आरोपों में कानून की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो ऐसे मामलों को अदालत निरस्त कर सकती है।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTYjMTE5OSMyMDE5IzEjTg==-PacCPER5QGw=

 


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