यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दाखिल एक सिविल रिट याचिका (संख्या 557/2021) से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता नीलू सिन्हा ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) के एक डीलरशिप आवंटन के खिलाफ अपील दायर की थी।
मामले का सारांश:
नीलू सिन्हा और प्रतिवादी संख्या 5 (बबीता कुमारी) दोनों ने किसान सेवा केंद्र (Kisan Seva Kendra) की डीलरशिप के लिए आवेदन किया था, जिसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन द्वारा नालंदा जिले में एक निश्चित स्थान के लिए आमंत्रित किया गया था। चयन प्रक्रिया के तहत लॉटरी ड्रॉ के माध्यम से बबीता कुमारी को डीलरशिप के लिए चुना गया।
नीलू सिन्हा ने आपत्ति दर्ज कराई कि बबीता कुमारी द्वारा पेश किया गया भूखंड मानकों के अनुसार नहीं था, क्योंकि:
- भूमि का स्वामित्व वैध नहीं था।
- विज्ञापन में निर्दिष्ट आवश्यक भूमि आकार (35×35 मीटर या 1225 वर्ग मीटर) के अनुसार वह भूमि पर्याप्त नहीं थी।
याचिकाकर्ता की शिकायत IOCL के सक्षम अधिकारियों ने जांच के बाद खारिज कर दी, और इस निर्णय को चुनौती देते हुए यह रिट याचिका दायर की गई।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां और निर्णय:
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संयुक्त मापन (Joint Measurement):
- IOCL ने याचिकाकर्ता की शिकायत पर जांच कराई और 2 अगस्त 2019 को अंचल अमीन (भूमि मापन अधिकारी) की मौजूदगी में एक संयुक्त मापन किया गया, जिसमें याचिकाकर्ता भी उपस्थित थी।
- इस मापन के अनुसार, प्रतिवादी की भूमि डीलरशिप के लिए आवश्यक न्यूनतम क्षेत्रफल की शर्तों को पूरा करती थी।
- याचिकाकर्ता ने भी अपनी याचिका में इस मापन को स्वीकार किया।
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भूमि अधिग्रहण का प्रश्न:
- याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत 40 डिसमिल भूमि में से 9 डिसमिल भूमि बिहार सरकार द्वारा राज्य राजमार्ग (SH-71) निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी।
- अगर यह 9 डिसमिल भूमि निकाल दी जाए, तो प्रतिवादी के पास केवल 31 डिसमिल भूमि बचती है, जो डीलरशिप के लिए अपर्याप्त होगी।
- IOCL के अनुसार, विज्ञापन में 40 डिसमिल भूमि की कोई बाध्यता नहीं थी, बल्कि केवल 35×35 मीटर (30.27 डिसमिल) की आवश्यकता थी, जो प्रतिवादी के पास उपलब्ध थी।
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न्यायालय का निष्कर्ष:
- चूंकि IOCL ने निर्धारित मापदंडों के अनुसार भूमि की जाँच की और पाया कि वह आवश्यक मानकों को पूरा करती है, अतः याचिकाकर्ता की आपत्ति को अस्वीकार करना गलत नहीं था।
- याचिकाकर्ता ने अंचल अमीन की रिपोर्ट (8 फरवरी 2020) को प्रस्तुत किया, जिसमें 9 डिसमिल भूमि के अधिग्रहण का उल्लेख था, लेकिन यह रिपोर्ट IOCL को समय पर नहीं दी गई थी।
- न्यायालय ने माना कि IOCL द्वारा किया गया निर्णय कानूनन सही था और इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।
अंतिम निर्णय:
न्यायालय ने याचिका को अस्वीकृत (Dismiss) कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता का दावा निराधार है। चूंकि डीलरशिप आवंटन प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं पाई गई, इसलिए उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
संक्षेप में: इस मामले में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन द्वारा किसान सेवा केंद्र के डीलरशिप आवंटन को चुनौती दी गई थी, लेकिन न्यायालय ने पाया कि आवंटन सही तरीके से किया गया था और याचिकाकर्ता का दावा न्यायोचित नहीं था।
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