यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दर्ज सिविल रिट याचिका संख्या 11567/2017 से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ता राजेंद्र मिश्रा ने राज्य सरकार द्वारा उनके वेतन पुनरीक्षण से संबंधित आदेश को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति अंजना मिश्रा द्वारा 17 जनवरी 2020 को इस मामले में फैसला सुनाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
राजेंद्र मिश्रा 1985 में बिस्कोमान राइस मिल प्रोजेक्ट, रोहतास में सहायक पद पर नियुक्त हुए थे। बाद में बिहार सरकार ने कई अक्षम बोर्डों और निगमों को बंद करने का निर्णय लिया, जिसके तहत वहां कार्यरत कर्मियों को राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में समायोजित किया गया। इसी क्रम में मिश्रा को 1996 में समाज कल्याण विभाग के अधीन आईसीडीएस (समेकित बाल विकास सेवा) निदेशालय में प्रतिनियुक्त किया गया।
मामले का मुद्दा
मिश्रा को 6वें वेतन पुनरीक्षण का लाभ दिया गया था, लेकिन 2011 में समाज कल्याण विभाग के सचिव ने एक आदेश जारी कर कहा कि गलत वेतन निर्धारण के कारण उन्हें जो अतिरिक्त राशि (₹1,03,429/-) दी गई थी, उसे वापस लिया जाएगा। मिश्रा ने इस फैसले को गलत ठहराते हुए उच्च न्यायालय में चुनौती दी और अनुरोध किया कि उनके वेतन से की गई कटौती को वापस किया जाए।
याचिकाकर्ता का पक्ष
- मिश्रा और अन्य कर्मियों को सरकार ने विधिवत आईसीडीएस निदेशालय में समायोजित किया था।
- पटना उच्च न्यायालय पहले ही इसी तरह के एक अन्य मामले में आदेश दे चुका था कि ऐसे कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए और उनके वेतन व सेवा शर्तें भी राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान होंगी।
- सरकार ने अन्य कर्मचारियों को समान लाभ दिए, लेकिन मिश्रा से इसे वापस लेने का निर्णय अन्यायपूर्ण था।
सरकार का पक्ष
- सरकार का कहना था कि बिस्कोमान कर्मचारियों को 6वें वेतन आयोग का लाभ नहीं मिल सकता क्योंकि उनका मूल विभाग (बिस्कोमान) उन्हें केवल 5वें वेतन आयोग के अनुसार भुगतान कर रहा था।
- सरकार के अनुसार, मिश्रा केवल प्रतिनियुक्ति पर थे, और वे राज्य सरकार के स्थायी कर्मचारी नहीं थे, इसलिए वे उच्च वेतनमान के पात्र नहीं थे।
- सरकार ने झारखंड उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रतिनियुक्त कर्मचारियों को राज्य सरकार की सुविधाएँ नहीं मिल सकतीं।
न्यायालय का निर्णय
- न्यायालय ने पाया कि मिश्रा को केवल प्रतिनियुक्ति पर नहीं रखा गया था, बल्कि राज्य सरकार ने उनकी सेवा का विधिवत समायोजन किया था।
- न्यायालय ने माना कि सरकार ने पहले ही इसी तरह के अन्य कर्मचारियों को समान वेतनमान प्रदान किया था, इसलिए मिश्रा के मामले में भेदभाव करना अनुचित था।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि झारखंड उच्च न्यायालय का मामला बिहार राज्य की स्थिति से अलग था क्योंकि बिहार सरकार ने मिश्रा जैसे कर्मचारियों को पहले ही समायोजित कर लिया था।
- न्यायालय ने सरकार द्वारा लिए गए ₹1,03,429/- की कटौती को अवैध ठहराया और उसे तीन महीने के भीतर वापस करने का आदेश दिया।
निष्कर्ष
यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण जीत थी, जिन्हें राज्य सरकार ने प्रतिनियुक्ति पर रखने के बाद स्थायी रूप से समायोजित किया था। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यदि सरकार स्वयं ऐसे कर्मचारियों को समायोजित करती है, तो उन्हें वेतनमान और सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि यदि कोई कर्मचारी सरकार द्वारा समायोजित किया गया है, तो वह सरकारी सेवाओं और वेतनमान का हकदार होगा, और प्रशासन उसे अनुचित रूप से वंचित नहीं कर सकता।
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTE1NjcjMjAxNyMxI04=-12zca4SjSQo=


