यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दायर एक सिविल रिट याचिका (संख्या 12844/2021) से संबंधित है, जिसमें भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, पटना पीठ द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता (भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधिकारी) ने इस मामले को उच्च न्यायालय में यह कहते हुए प्रस्तुत किया कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण द्वारा 17 जनवरी 2020 को पारित आदेश अवैध है। इस आदेश में प्रतिवादी श्री बिजय कुमार को उनके रिटायरमेंट से संबंधित बकाया राशि (Earned Leave, Group Insurance और Medical Allowance) देने के निर्देश दिए गए थे, जिनका भुगतान सरकार द्वारा रोका गया था।
प्रतिवादी ने दावा किया कि:
- उनकी सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद भी उन्हें उनकी संपूर्ण पेंशन और भत्ते नहीं मिले थे।
- कोई वैध कारण बताए बिना उनकी बकाया राशि रोकी गई थी।
- सरकार ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनके वेतन का पुनर्मूल्यांकन कर लिया और अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली कर ली।
सरकार का पक्ष:
भारत सरकार ने अधिकरण के आदेश को रद्द करवाने के लिए निम्नलिखित दलीलें दीं:
-
गलत वेतन निर्धारण:
- प्रतिवादी को गलत वेतन संरचना के कारण अधिक वेतन दिया गया था, जिसे सुधारते हुए सरकार ने अतिरिक्त राशि की वसूली की।
- प्रतिवादी को पहले एसीपी (ACP – Assured Career Progression) के तहत ₹4200 ग्रेड पे मिलना चाहिए था, लेकिन गलती से ₹4600 दिया गया।
- इसी तरह, दूसरे एसीपी के तहत ₹4600 की जगह ₹4800 और एमएसीपी (MACP – Modified Assured Career Progression) के तहत ₹4800 की जगह ₹5400 का ग्रेड पे मिला।
-
प्रतिवादी का स्वयं दिया गया ‘अंडरटेकिंग’ (Undertaking):
- प्रतिवादी ने एक लिखित सहमति पत्र दिया था, जिसमें कहा गया था कि यदि उनके वेतन का गलत निर्धारण होता है और सरकार को अधिक भुगतान करना पड़ता है, तो वे उस अतिरिक्त राशि को वापस करने के लिए बाध्य होंगे।
- सरकार का कहना था कि इस लिखित सहमति के बावजूद, प्रतिवादी ने अधिकरण में इस वसूली को चुनौती दी, जो अनुचित है।
-
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला:
- सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के “Punjab & Haryana High Court बनाम जगदेव सिंह” (2016) 14 SCC 267 के फैसले को आधार बनाया, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई कर्मचारी लिखित रूप से अधिक भुगतान की राशि वापस करने की सहमति देता है, तो वह सरकार द्वारा की गई वसूली को चुनौती नहीं दे सकता।
- इसके विपरीत, अधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट के ही “State of Punjab बनाम रफीक मसीह” (2015) 4 SCC 334 केस का हवाला देते हुए निर्णय सुनाया, जिसमें कहा गया था कि रिटायर हो चुके कर्मचारी से सरकार अधिक भुगतान की वसूली नहीं कर सकती।
प्रतिवादी (बिजय कुमार) का पक्ष:
- रिटायरमेंट के बाद उन्हें मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
- वेतन पुनर्निर्धारण का निर्णय सरकार ने बिना कोई सूचना दिए किया, जिससे वे पहले से तय बजट और योजनाओं में नुकसान उठाने के लिए मजबूर हुए।
- उन्हें किसी भी धोखाधड़ी या गलत जानकारी के आधार पर वेतन नहीं दिया गया था, बल्कि सरकार की ही गलती से अधिक भुगतान हुआ था।
- उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला दिया, जहां सेवानिवृत्त कर्मचारियों से अधिक भुगतान की वसूली को अनुचित ठहराया गया था।
पटना हाईकोर्ट का फैसला:
-
प्रतिवादी द्वारा दिया गया लिखित अंडरटेकिंग मान्य है।
- हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी ने स्पष्ट रूप से सरकार को यह अधिकार दिया था कि यदि वेतन पुनर्निर्धारण के कारण कोई अतिरिक्त राशि दी जाती है, तो सरकार उसे वसूल सकती है।
- इसलिए, सरकार का यह निर्णय उचित था कि अतिरिक्त राशि को वसूल किया जाए।
-
रफीक मसीह केस लागू नहीं होता:
- अदालत ने कहा कि रफीक मसीह केस उन कर्मचारियों पर लागू होता है, जिन्होंने कोई अंडरटेकिंग नहीं दी थी।
- बिजय कुमार ने लिखित सहमति दी थी, इसलिए उन पर यह केस लागू नहीं होगा।
-
अधिकरण का आदेश खारिज किया गया:
- पटना हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने गलत कानूनी दृष्टिकोण अपनाया और सरकार के खिलाफ आदेश दिया।
- इसलिए, अधिकरण द्वारा पारित आदेश को रद्द किया जाता है।
-
सरकार को वसूली करने की अनुमति:
- हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा प्रतिवादी की पेंशन से की गई वसूली वैध थी और सरकार को वह राशि लौटाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
निष्कर्ष:
इस फैसले के तहत, पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि:
- यदि किसी कर्मचारी ने लिखित रूप से सहमति दी हो कि गलत वेतन निर्धारण के कारण अतिरिक्त भुगतान की गई राशि वापस की जाएगी, तो वह सरकार की वसूली को चुनौती नहीं दे सकता।
- रिटायरमेंट के बाद गलत तरीके से वसूली का मामला तभी अवैध होगा जब कोई लिखित अंडरटेकिंग न दी गई हो।
- सरकार की कार्यवाही कानूनी रूप से वैध थी, और बिजय कुमार को वह राशि वापस नहीं मिलेगी।
इस फैसले का व्यापक प्रभाव:
- रिटायर कर्मचारियों को सावधानी बरतनी होगी:
- यह मामला स्पष्ट करता है कि किसी भी सरकारी योजना या ग्रेड पे से जुड़े फैसलों को समझने के बाद ही सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने चाहिए।
- सरकार की स्थिति मजबूत हुई:
- इस फैसले से सरकार को यह अधिकार मिला कि वह गलत वेतन निर्धारण के कारण दिए गए अतिरिक्त वेतन को वसूल सके, यदि कर्मचारी ने पहले से ही ऐसा करने की सहमति दी हो।
- अन्य सरकारी मामलों में मिसाल बनेगा:
- यह निर्णय भविष्य में कई अन्य मामलों में संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, खासकर सरकारी कर्मचारियों के वेतन निर्धारण और पेंशन मामलों में।
अंतिम शब्द:
पटना हाईकोर्ट का यह फैसला सरकार के पक्ष में गया, जिससे स्पष्ट हुआ कि अगर कर्मचारी ने पहले से सहमति दी हो, तो सरकार की वसूली अवैध नहीं मानी जाएगी। यह निर्णय रिटायरमेंट फंड और सरकारी कर्मचारियों के वेतन पुनर्निर्धारण के मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर (precedent) बनेगा।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:
https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTI4NDQjMjAyMSMxI04=-mGtnJXku–am1—-ak1–4=


