भूमिका
यह मामला वैशाली जिले के सचिदानंद साह की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी प्रियंका कुमारी की तलाश के लिए पटना उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उनकी बेटी MBA करने के बाद पटना में एक गर्ल्स हॉस्टल में रहकर नौकरी कर रही थी, लेकिन अचानक गायब हो गई।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी का अपहरण कर लिया गया और हो सकता है कि उसकी हत्या कर दी गई हो। उन्होंने यह भी दावा किया कि बेटी की शादी के प्रमाण पत्र में अंबुज कुमार श्रीवास्तव (प्रतिवादी संख्या 5) का नाम दर्ज है, और उसी ने उसकी बेटी को गायब किया होगा।
हालांकि, पटना उच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया हो। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला पुलिस जांच के दायरे में आता है, इसलिए इस स्तर पर कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा।
मामले का संक्षिप्त विवरण
1. याचिकाकर्ता और प्रतिवादी
याचिकाकर्ता:
- सचिदानंद साह (पिता), निवासी – वैशाली जिला, बिहार।
- इन्होंने पटना हाईकोर्ट में अपनी बेटी प्रियंका कुमारी की गुमशुदगी को लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।
प्रतिवादी:
- बिहार सरकार (मुख्य सचिव, गृह विभाग)
- पटना पुलिस (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, बुद्धा कॉलोनी थाना, पटना)
- जांच अधिकारी, बुद्धा कॉलोनी थाना
- अंबुज कुमार श्रीवास्तव (बेटी का कथित पति)
2. घटना का विवरण और FIR
- प्रियंका कुमारी पटना के बोरिंग कैनाल रोड स्थित गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थी और नौकरी कर रही थी।
- 11 अप्रैल 2021 को पिता ने उसे फोन किया, लेकिन उसका नंबर बंद मिला।
- जब वे हॉस्टल पहुंचे, तो पता चला कि वह पिछले 15 दिनों से गायब थी।
- कमरे की तलाशी लेने पर एक शादी का प्रमाण पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि उसने अंबुज कुमार श्रीवास्तव से शादी कर ली है।
- जब पिता ने अंबुज से संपर्क किया, तो उसने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
- 13 मई 2021 को बुद्धा कॉलोनी थाना, पटना में FIR दर्ज कराई गई।
- FIR में अंबुज कुमार श्रीवास्तव, उसकी माँ सुनीता देवी और उसके पिता सुरेश प्रसाद पर धारा 363 (अपहरण), धारा 365 (गुप्त रूप से कैद करना), धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (अमानत में खयानत) के तहत केस दर्ज किया गया।
3. पुलिस जांच और याचिकाकर्ता की शिकायत
- पुलिस ने चार्जशीट सिर्फ अंबुज कुमार श्रीवास्तव के खिलाफ दाखिल की और कहा कि जांच अभी जारी है।
- याचिकाकर्ता ने पुलिस पर आरोप लगाया कि उनकी बेटी की कोई खोजबीन नहीं की जा रही और जांच केवल दिखावा है।
- उन्होंने हाईकोर्ट से अपील की कि पुलिस को बेटी को खोजने का आदेश दिया जाए।
पटना उच्च न्यायालय का निर्णय
1. क्या यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत आता है?
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) केवल उन्हीं मामलों में स्वीकार्य होती है, जहां किसी व्यक्ति को गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया हो।
- इस मामले में याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसकी बेटी को जबरदस्ती किसी ने बंधक बना रखा है।
- FIR में केवल संदेह व्यक्त किया गया था कि बेटी को किडनैप किया गया होगा।
2. क्या पुलिस जांच में लापरवाही हुई?
- न्यायालय ने माना कि पुलिस की जांच सही तरीके से नहीं चल रही थी।
- पुलिस ने 173(2) CrPC के तहत चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन पूरी जांच नहीं की।
- कोर्ट ने यह भी कहा कि चार्जशीट दाखिल करने का मकसद सिर्फ आरोपी की जमानत को रोकना था, न कि सच्चाई को सामने लाना।
3. हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी गई।
- याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह पुलिस जांच पर ध्यान केंद्रित करे और यदि जांच में लापरवाही हो रही हो तो अलग से निर्देश देने के लिए न्यायालय का रुख कर सकता है।
- पुलिस को आदेश दिया गया कि वह निष्पक्ष और त्वरित जांच करे।
इस फैसले के प्रभाव
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सही उपयोग
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) का उपयोग तभी किया जा सकता है, जब कोई व्यक्ति अवैध हिरासत में हो।
- यदि कोई व्यक्ति लापता है, तो इसकी जांच पुलिस द्वारा की जानी चाहिए, न कि सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जानी चाहिए।
2. पुलिस को जांच में सुधार करना होगा
- पटना हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर चिंता जताई और कहा कि जांच को एक निष्कर्ष तक पहुंचाना जरूरी है।
- चार्जशीट दाखिल करने का मकसद सिर्फ आरोपी को जेल में रखना नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चाई तक पहुंचना चाहिए।
3. गुमशुदा व्यक्तियों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया
- यदि कोई व्यक्ति लापता हो जाता है, तो पुलिस को सही तरीके से जांच करनी चाहिए।
- यदि पुलिस जांच में देरी कर रही हो, तो पीड़ित परिवार को बंदी प्रत्यक्षीकरण की जगह “मंडामस (Mandamus)” याचिका दाखिल करनी चाहिए, जिसमें अदालत पुलिस को तेजी से जांच करने का आदेश दे सकती है।
निष्कर्ष
यह मामला गुमशुदा व्यक्तियों की खोजबीन में पुलिस की भूमिका और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दायरे को स्पष्ट करता है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो कि कोई व्यक्ति अवैध हिरासत में है, तब तक बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि पुलिस को लापता व्यक्तियों के मामलों में निष्पक्ष और प्रभावी जांच करनी होगी, ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके।
पूरा
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTYjMTI3MCMyMDIxIzEjTg==-G1glyDLMk–ak1–k=


