“POCSO केस में हाईकोर्ट का सख्त रुख – बिना ठोस सबूत के सजा नहीं”

 

भूमिका

यह मामला बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के मफस्सिल थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जिसमें सिकंदर पटेल नामक व्यक्ति पर 12 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगाया गया था। निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 4 के तहत दोषी करार देते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी

आरोपी ने इस सजा को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहां न्यायालय ने साक्ष्यों की कमी और अभियोजन की कमजोर दलीलों के आधार पर सजा को रद्द कर दिया और आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया


मामले का संक्षिप्त विवरण

1. अभियुक्त और अभियोजन पक्ष

अभियुक्त:

  • सिकंदर पटेल, पिता – बैद्यनाथ पटेल, निवासी – मिर्जापुर, थाना – बेतिया मफस्सिल, जिला – पश्चिम चंपारण।
  • इस पर आरोप था कि उसने 28 सितंबर 2013 की रात 8 बजे 12 वर्षीय नाबालिग पीड़िता के साथ खेत में बलात्कार किया

अभियोजन पक्ष:

  1. राज्य सरकार (बिहार पुलिस और अभियोजन विभाग)
  2. पीड़िता और उसके परिवार के सदस्य।

2. घटना और FIR का विवरण

  • पीड़िता 28 सितंबर 2013 की रात 8 बजे शौच के लिए खेत गई थी
  • आरोप था कि आरोपी ने उसे पकड़कर जबरन खेत में घसीटा, उसके कपड़े उतारे और उसके साथ दुष्कर्म किया
  • डर के कारण पीड़िता ने घटना की जानकारी तुरंत किसी को नहीं दी, लेकिन उसके व्यवहार से परिवार को शक हुआ और 30 सितंबर 2013 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई
  • पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर की और मुकदमा शुरू हुआ

3. ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) का निर्णय

  • निचली अदालत ने 7 जनवरी 2020 को सिकंदर पटेल को दोषी ठहराया और 28 जनवरी 2020 को उसे 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई
  • 15,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया, जिसका भुगतान न करने पर 2 साल की अतिरिक्त सजा का प्रावधान किया गया
  • अदालत ने फैसला सुनाने में निम्नलिखित आधार दिए:
    • पीड़िता ने अपने बयान में वही बातें कहीं, जो FIR में लिखी थीं
    • पीड़िता के मेडिकल परीक्षण में उसके नाबालिग होने की पुष्टि हुई
    • POCSO एक्ट की धारा 29 और 30 के तहत आरोपी पर अपराध की प्रबल संभावना थी और उसने इसे झुठलाने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं किए

पटना उच्च न्यायालय का निर्णय

1. मुख्य आपत्तियाँ और बचाव पक्ष की दलीलें

आरोपी के वकील उमेश चंद्र वर्मा ने निचली अदालत के फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए निम्नलिखित दलीलें दीं:

  1. पीड़िता ने पहले आरोपी को पहचानने से इनकार किया था
    • पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि घटना के समय अंधेरा था, इसलिए वह चेहरे से किसी को पहचान नहीं पाई
    • गाँव के लोगों ने ही आरोपी का नाम लिखवाया था, न कि पीड़िता ने स्वयं।
  2. POCSO एक्ट के तहत अभियोजन पक्ष नाबालिग होने का ठोस प्रमाण देने में असफल रहा
    • पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए कोई जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल का रिकॉर्ड या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए
    • मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता की उम्र लगभग 15 साल बताई गई, जो सटीक उम्र साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी
  3. पीड़िता और उसके पिता के बयान विरोधाभासी थे
    • पीड़िता के पिता (PW 3) ने कहा कि पीड़िता ने सिर्फ इतना बताया था कि आरोपी ने उसका हाथ पकड़ा था
    • लेकिन पीड़िता (PW 4) ने कहा कि उसके साथ बलात्कार हुआ था।
    • यह विरोधाभास अभियोजन की कहानी को कमजोर करता है
  4. जांच अधिकारी (IO) को गवाही के लिए नहीं बुलाया गया
    • पुलिस अधिकारी, जिसने चार्जशीट दाखिल की थी, को अदालत में पेश नहीं किया गया
    • बिना उसकी गवाही के FIR और जांच रिपोर्ट की सत्यता साबित नहीं की जा सकती
  5. POCSO एक्ट की धारा 29 और 30 का गलत इस्तेमाल किया गया
    • कानून के अनुसार, पहले अभियोजन पक्ष को आरोप साबित करना होता है, उसके बाद आरोपी को निर्दोष साबित करना पड़ता है।
    • लेकिन अभियोजन पक्ष प्रारंभिक साक्ष्य देने में ही असफल रहा

2. हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

पटना हाईकोर्ट ने इन तर्कों को मानते हुए निचली अदालत के फैसले को गलत करार दिया और कहा कि:

  1. पीड़िता का बयान पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं था, क्योंकि उसने घटना के तुरंत बाद आरोपी का नाम नहीं लिया और बाद में अपने बयान बदल दिए।
  2. न्यायालय को संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराना चाहिए
  3. POCSO एक्ट में आरोपी के खिलाफ धाराओं को तभी लागू किया जा सकता है, जब पीड़िता की उम्र नाबालिग होने के पुख्ता सबूत हों
  4. जांच अधिकारी (IO) की गवाही के बिना अभियोजन की कहानी अधूरी थी
  5. सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट से उम्र तय नहीं की जा सकती, जब तक अन्य दस्तावेज मौजूद न हों

3. हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  • पटना उच्च न्यायालय ने सिकंदर पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया
  • निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया गया
  • सिकंदर पटेल को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया

इस फैसले के प्रभाव

1. यौन अपराध मामलों में प्रमाणिकता का महत्व

  • बलात्कार और POCSO एक्ट के मामलों में अभियोजन पक्ष को पुख्ता सबूत देने होंगे
  • यदि पीड़िता के बयान में विरोधाभास हो, तो न्यायालय उसे स्वीकार नहीं करेगा

2. POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्धि के लिए उम्र साबित करना जरूरी

  • आरोपी को सिर्फ अनुमानित मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती
  • बच्चों के मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल रिकॉर्ड और अन्य प्रमाण आवश्यक हैं

3. अभियोजन पक्ष को जांच प्रक्रिया में सुधार करना होगा

  • जांच अधिकारी (IO) को गवाही के लिए अनिवार्य रूप से पेश करना होगा
  • केवल पीड़िता के बयान के आधार पर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती

निष्कर्ष

यह मामला यौन अपराधों में साक्ष्य और प्रक्रिया की कमजोरियों को उजागर करता है। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए ठोस सबूत आवश्यक हैं

इस फैसले से भविष्य में POCSO और IPC की धारा 376 के तहत मामलों में साक्ष्य के महत्व को और मजबूत किया जाएगा

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MjQjNzQ5IzIwMjAjMSNO-LjxD–am1–r6DWHc=

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News