पटना उच्च न्यायालय में प्रस्तुत प्रशांत कुमार बनाम भारत संघ मामले में याचिकाकर्ता प्रशांत कुमार, जो कि रक्षा मंत्रालय के अधीन ऑर्डनेंस फैक्ट्री में संयुक्त महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत थे, ने एक अनुशासनात्मक दंड के खिलाफ न्यायालय का रुख किया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता के विरुद्ध रक्षा मंत्रालय द्वारा अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई थी, जिसमें उन्हें दो वेतन वृद्धि रोकने तथा दो वेतन ग्रेड कम किए जाने का दंड दिया गया था। इस आदेश को केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), पटना पीठ के समक्ष चुनौती दी गई थी, लेकिन न्यायाधिकरण ने उनकी याचिका को 3 जनवरी 2019 को खारिज कर दिया था। न्यायाधिकरण के इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रशांत कुमार ने पटना उच्च न्यायालय में वर्ष 2021 में याचिका दायर की।
सरकार की आपत्ति: अत्यधिक देरी से दायर याचिका
मंत्रालय के अधिवक्ता ने न्यायालय के समक्ष यह आपत्ति उठाई कि याचिकाकर्ता ने दो वर्ष से अधिक की देरी के बाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इस दौरान, उन्होंने न तो कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत किया और न ही कोई ठोस तथ्य कि प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में देरी क्यों हुई।
याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता ने देरी का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि –
- स्थानांतरण के कारण संचार बाधा: वर्ष 2016 में उनका स्थानांतरण ऑर्डनेंस फैक्ट्री नालंदा (बिहार) से देहरादून (उत्तराखंड) कर दिया गया था, जिससे उनके और उनके वकील के बीच संपर्क टूट गया।
- मोबाइल नंबर बदलने की समस्या: उन्होंने दावा किया कि उनका पुराना मोबाइल नंबर बंद हो गया था, जिससे वे अपने वकील से संपर्क नहीं कर सके।
- कोरोना महामारी का प्रभाव: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान वे और उनके परिवार के सदस्य संक्रमण के शिकार हो गए, जिससे मामला और लंबित हो गया।
उन्होंने आग्रह किया कि परिस्थितिजन्य कारणों के कारण हुई इस देरी को न्यायालय द्वारा उपेक्षित किया जाए और उनके मामले को सुना जाए।
न्यायालय का निर्णय
पटना उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विकास जैन और न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दलीलों को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने निम्नलिखित कारणों से याचिका खारिज कर दी –
- अनुचित विलंब: न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने लगभग पाँच वर्षों तक अपने मामले की स्थिति को लेकर कोई सक्रियता नहीं दिखाई। 2016 से 2021 तक वे अपने वकील से संपर्क कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
- अस्पष्ट और असंतोषजनक स्पष्टीकरण: मोबाइल नंबर बदलने और संचार बाधा की दलील को अवास्तविक माना गया क्योंकि कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया था।
- न्याय केवल सतर्क याचिकाकर्ताओं के लिए: न्यायालय ने कहा कि न्याय उन्हीं लोगों को प्राप्त होता है जो अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहते हैं। विलंब को न्यायोचित ठहराने के लिए ठोस कारण प्रस्तुत करने आवश्यक होते हैं।
निष्कर्ष
पटना उच्च न्यायालय ने याचिका को “अनुचित विलंब और निष्क्रियता” के आधार पर खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का पांच वर्षों तक निष्क्रिय रहना न्याय की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है, और अनुशासनात्मक दंड को चुनौती देने की उनकी याचिका समय सीमा से बाहर होने के कारण विचारणीय नहीं थी।
इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी सेवा में अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के विरुद्ध अपील में सतर्कता और समयबद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई व्यक्ति अनुशासनात्मक दंड के खिलाफ न्याय की उम्मीद करता है, तो उसे उचित समय सीमा के भीतर अपनी अपील प्रस्तुत करनी चाहिए, अन्यथा न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर सकता है।
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