“पटना उच्च न्यायालय का अहम फैसला: एलपीजी डीलरशिप विवाद में याचिका खारिज”

 

भूमिका:

इस
केस में याचिकाकर्ता गुरिया
कुमारी ने IOCL द्वारा उनके एलपीजी डीलरशिप
आवेदन को अस्वीकार करने
के निर्णय को रद्द करने
की मांग की थी।
IOCL ने यह तर्क दिया
कि याचिकाकर्ता चयन प्रक्रिया के
समय आवश्यक भूमि स्वामित्व मानदंडों
को पूरा नहीं करती
थीं।

मामले
की पृष्ठभूमि:

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IOCL ने
17 जून 2017 को हिन्दी दैनिकदैनिक जागरण में एक विज्ञापन
प्रकाशित किया, जिसमें मधुबनी जिले के बासोपट्टी ब्लॉक के छिटौनी स्थान पर एक ग्रामीण एलपीजी वितरक (LPG Distributor) के चयन के
लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे।

·       
याचिकाकर्ता
समेत अन्य उम्मीदवारों ने
आवेदन किया, और 10 जनवरी 2019 को आयोजित लॉटरी ड्रॉ में याचिकाकर्ता सफल घोषित हुईं।

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चयन
के बाद, याचिकाकर्ता ने
₹20,000/- की सुरक्षा राशि जमा की
और फ़ील्ड वेरिफिकेशन के लिए आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत किए।

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याचिकाकर्ता
ने गोदाम और शोरूम के
लिए दो अलगअलग भूखंडों की लीज़ डीड (लीज अनुबंध) प्रस्तुत की, जिसकी अवधि 15 वर्ष की थी।

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26 जून
2019
को IOCL के क्षेत्रीय प्रबंधक, बेगूसराय कार्यालय ने याचिकाकर्ता की पात्रता रद्द कर दी, यह कहते हुए
कि याचिकाकर्ता के पास आवेदन के समय आवश्यक भूमि स्वामित्व नहीं था।

·       
इसके
बाद, IOCL ने 19 नवंबर 2019 को पुनः ड्रॉ आयोजित किया, जिसमें अन्य उम्मीदवार (प्रतिवादी संख्या 6 – रानी कुमारी) को विजेता घोषित कर दिया।

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इस
फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता
ने पटना उच्च न्यायालय
में रिट याचिका (CWJC No. 23654 of 2019) दायर की।

IOCL द्वारा आवेदन
निरस्त करने का कारण:

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IOCL ने
यह तर्क दिया कि
याचिकाकर्ता ने आवेदन करते समय आवश्यक भूमि स्वामित्व शर्तों को पूरा नहीं किया था।

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याचिकाकर्ता
ने जो भूमि लीज़ पर दी थी, उसकी शर्तों में यह उल्लेख था कि लीज़ की अवधि उस दिन से शुरू होगी, जिस दिन IOCL द्वारा डीलरशिप (LOI – Letter of
Intent)
जारी की जाएगी।

·       
चूँकि
आवेदन के समय तक भूमि प्रभावी रूप से याचिकाकर्ता के अधिकार में नहीं थी, इसलिए उसे चयन प्रक्रिया
से अयोग्य घोषित कर दिया गया।

·       
IOCL ने
यह भी तर्क दिया
कि याचिकाकर्ता ने 14 मई 2019 को एकसुधारित लीज़ डीडप्रस्तुत की, लेकिन यह आवेदन की
तिथि (2017) के बाद की
थी, जो चयन प्रक्रिया
के नियमों के खिलाफ थी।

याचिकाकर्ता
की दलील:

·       
याचिकाकर्ता
का कहना था कि
उनकी लीज़ डीड पहले से ही वैध थी और केवल स्पष्टीकरण
के लिए एकसुधारित
लीज़ डीड’ (Rectification Lease
Deed) तैयार की गई थी।

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याचिकाकर्ता
ने शंकर कुमार भगत बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (2019 PLJR
663) जैसे पिछले मामलों का हवाला दिया,
जिसमें अदालत ने भविष्य की तिथि से प्रभावी होने वाली लीज़ डीड को मान्यता दी थी।

·       
उन्होंने
दावा किया कि आईओसीएल
ने तकनीकी कारणों से उनका आवेदन रद्द किया, जबकि उनकी पात्रता
पूरी तरह से सही
थी।

न्यायालय
का निर्णय:

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न्यायाधीश
मोहित कुमार शाह ने सभी तथ्यों
और प्रस्तुत तर्कों को ध्यान में
रखते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

·       
न्यायालय
ने माना कि IOCL ने सही प्रक्रिया का पालन किया है, और याचिकाकर्ता आवेदन के समय आवश्यक भूमि स्वामित्व शर्तों को पूरा नहीं कर रही थीं।

·       
अदालत
ने नीरज कुमार बनाम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (2009 (3)
PLJR 591) के मामले का संदर्भ देते
हुए कहा कि आवेदन
पत्र जमा करने के बाद मूल दस्तावेजों में संशोधन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

·       
न्यायालय
ने यह भी स्पष्ट
किया कि याचिकाकर्ता ने आवेदन के समय वह भूमि स्वामित्व प्रमाणित नहीं किया था, जो चयन मानदंडों में आवश्यक था।

·       
इसलिए,
IOCL द्वारा की गई चयन प्रक्रिया को न्यायालय ने सही ठहराया और कहा कि
याचिकाकर्ता को डीलरशिप देने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।

इस
निर्णय का प्रभाव:

1.      एलपीजी डीलरशिप चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा: यह निर्णय स्पष्ट
करता है कि आवेदन
पत्र जमा करने के बाद दस्तावेज़ों में बदलाव स्वीकार्य नहीं हैं।

2.      आवेदकों को अधिक सतर्कता बरतने की सलाह: जो लोग भविष्य
में IOCL या अन्य सरकारी
कंपनियों की चयन प्रक्रियाओं
में भाग लेंगे, उन्हें
आवेदन पत्र भरते समय सभी आवश्यक दस्तावेज़ों को पूरी तरह जांच कर जमा करना चाहिए।

3.      कानूनी प्रक्रिया को मजबूत करने वाला निर्णय: यह निर्णय इस
बात को भी रेखांकित
करता है कि न्यायालय
चयन प्रक्रिया में किसी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराएगा।

निष्कर्ष:

पटना
उच्च न्यायालय ने इस फैसले
में IOCL की चयन प्रक्रिया
को सही माना और
याचिकाकर्ता की दलीलों को
खारिज कर दिया। यह
फैसला सरकारी कंपनियों में निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय है। इस निर्णय से
यह भी स्पष्ट होता
है कि किसी भी आवेदन के समय दिए गए दस्तावेज़ों की वैधता और प्रामाणिकता बहुत महत्वपूर्ण होती है, और बाद में किसी प्रकार का संशोधन स्वीकार्य नहीं होगा।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

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