सड़क टेंडर रद्द करने के विरुद्ध रिट याचिका खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2025

एक ठेकेदार ने ग्रामीण सड़क टेंडर को रद्द करने को चुनौती दी और अपने पक्ष में कार्य आवंटित करने की मांग की। पटना उच्च न्यायालय ने विभाग के टेंडर रद्द कर पुनः-टेंडर जारी करने के निर्णय को बरकरार रखा। न्यायालय ने यह पाया कि द्वितीय न्यूनतम बोलीदाता के पक्ष में कोई प्रवर्तनीय अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ था। रिट याचिका खारिज कर दी गई और प्राधिकरण को नए टेंडर की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार द्वारा मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क उन्नयन योजना (MMGSUY) के अंतर्गत जारी एक प्रमुख टेंडर से उत्पन्न हुआ।

Notice Inviting Tender (NIT) क्रमांक RRRSMP-15/2024-25 दिनांक 27.02.2025 “Initial Rectification, Minor Improvement, Surface Renewal, Construction of Bridge/Drainage/Protection Work including Operation and Management” के लिए जारी किया गया था, जो ग्रामीण सड़कों के सुदृढ़ीकरण और प्रबंधन से संबंधित था। इस रिट मामले में विवाद विशेष रूप से पैकेज क्रमांक RRRSMP/24-25 Sasaram-1/11 से संबंधित था, जिसकी कुल अनुबंध राशि 3520.452 लाख रुपये थी।

कुल मिलाकर दस बोलीदाताओं, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, ने भाग लिया। इंजीनियर-इन-चीफ की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति ने 06.05.2025 को बैठक की और मेमो संख्या 1643 दिनांक 08.05.2025 द्वारा सात बोलीदाताओं, जिनमें M/s Shanti Construction भी शामिल थी, को तकनीकी रूप से उत्तरदायी (technically responsive) तथा तीन को गैर-उत्तरदायी घोषित किया। बोलीदाताओं को आपत्तियाँ दर्ज करने के लिए पाँच कार्य दिवसों का समय दिया गया।

याचिकाकर्ता, जो बिहार ठेकेदार पंजीकरण नियमावली, 2007 के अंतर्गत पंजीकृत श्रेणी-1 ठेकेदार है, ने 16.05.2025 को तीन तकनीकी रूप से योग्य घोषित बोलीदाताओं के विरुद्ध आपत्तियाँ दाखिल कीं, जिनका मुख्य आधार M/s Shanti Construction की बोली क्षमता (bid capacity) पर चुनौती थी।

समिति ने 10.06.2025 को पुनः बैठक की और मेमो संख्या 2220 दिनांक 12.06.2025 के माध्यम से अपने पूर्व निर्णय को दोहराया। असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने 13.06.2025 को फिर आपत्ति दर्ज की और विशेष रूप से यह दर्शाया कि औरंगाबाद डिवीजन में पहले से आवंटित कार्यों को समायोजित करने के बाद Shanti Construction की बोली क्षमता अपर्याप्त रह जाती है।

इसी आधार पर, क्षेत्रीय कार्यपालक अभियंता से प्रतिवेदन माँगा गया। कार्यपालक अभियंता ने 26.06.2025 की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि M/s Shanti Construction के पास आवश्यक बोली क्षमता नहीं है। इसके बावजूद, तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति ने मेमो संख्या 2469 दिनांक 30.06.2025 द्वारा Shanti Construction की बोली को एक बार फिर तकनीकी रूप से उत्तरदायी घोषित कर दिया, बिना यह दर्ज किए कि उसने कार्यपालक अभियंता की रिपोर्ट से असहमति के क्या कारण हैं।

समिति ने तत्पश्चात 01.07.2025 को मेमो संख्या 2477 के माध्यम से एक अन्य निर्णय जारी किया, जिसमें पूर्व निष्कर्ष को ही दुहराया गया, उसी दिन जब पूर्व निर्णय अपलोड किया गया था, और न तो कोई नया सामग्री उपलब्ध था और न ही आपत्ति अवधि समाप्त हुई थी।

05.07.2025 को वित्तीय बोलियाँ खोली गईं। M/s Shanti Construction को न्यूनतम बोलीदाता (L-1) पाया गया, जिसने अनुमानित दर से 5.77% कम दर उद्धृत की थी; याचिकाकर्ता L-2 था, जिसने अनुमानित दर से 5.05% कम दर उद्धृत की थी।

इसके बाद, समिति ने पुनः Shanti Construction की बोली क्षमता की जाँच की। 12.07.2025 की बैठक में यह पाया गया कि Tender ID 139610 और Tender ID 139568 के अंतर्गत पहले से आवंटित कार्यों को समायोजित करने के बाद, Shanti Construction के पास वर्तमान कार्य, जिसकी राशि 3714.50482 लाख रुपये थी, के लिए पर्याप्त बोली क्षमता नहीं बचती। चूँकि वित्तीय बोलियाँ पहले ही खोली जा चुकी थीं, सभी बोलीदाताओं को अब L-1 की दरों की जानकारी हो चुकी थी, और गोपनीयता भंग मानी गई।

इसी आधार पर, समिति ने पूरे टेंडर को रद्द कर पुनः विज्ञापन जारी करने की सिफारिश करने का निर्णय लिया। यह निर्णय मेमो संख्या 2611 दिनांक 14.07.2025 के माध्यम से सूचित किया गया।

याचिकाकर्ता ने 16.07.2025 की संचार के द्वारा Shanti Construction द्वारा उद्धृत L-1 दर पर कार्य निष्पादित करने की तत्परता व्यक्त की और अनुरोध किया कि उसे द्वितीय न्यूनतम बोलीदाता के रूप में कार्य आवंटित किया जाए। इसके बजाय, विभाग ने रद्दीकरण को लागू करते हुए 22.07.2025 की दिनांकित (26.07.2025 को अपलोड) Short Notice Inviting Tender क्रमांक RRRSMP-15/2025-26 जारी किया, जिसमें वही कार्य समान नियम एवं शर्तों के साथ पुनः विज्ञापित किया गया।

इसके पश्चात, याचिकाकर्ता ने इस रिट याचिका के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय की शरण ली, जिसमें मेमो संख्या 2469, 2477 और 2611, साथ ही 22.07.2025 की दिनांकित नए Short NIT को रद्द करने और उसे L-1 दर पर कार्य आवंटित करने की दिशा-निर्देश देने की प्रार्थना की गई।

न्यायालय ने क्या परीक्षण किया और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय मुख्य न्यायाधीश के साथ पीठ पर बैठे माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा के द्वारा दिए गए निर्णय में, पूरे टेंडर प्रक्रिया का सावधानीपूर्वक अनुक्रमण किया और याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए प्रत्येक प्रमुख आक्षेप का परीक्षण किया।

मुख्य शिकायतें निम्नलिखित थीं:

(i) कि कार्यपालक अभियंता की प्रतिकूल रिपोर्ट, जिसमें बोली क्षमता की कमी दर्शाई गई थी, के बावजूद M/s Shanti Construction को तकनीकी रूप से उत्तरदायी घोषित करते हुए तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति ने मनमाने ढंग से और बिना कारण बताए कार्य किया;

(ii) कि 01.07.2025 को (मेमो संख्या 2477) पूर्व निर्णय को बिना किसी परिस्थिति परिवर्तन के दोहराना अस्थिरनीय (unsustainable) था;

(iii) कि समिति के पास वित्तीय बोलियाँ खोले जाने के बाद तकनीकी पात्रता का पुनर्मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं था और 14.07.2025 का निर्णय coram non judice था; और

(iv) कि एक बार जब L-1 अयोग्य पाया गया, तो विभाग L-2 (याचिकाकर्ता) की ओर जाने के लिए बाध्य था, विशेषकर तब जब वह L-1 दरों पर कार्य करने को तैयार था।

दूसरी ओर, राज्य ने यह तर्क दिया कि सभी कार्य Standard Bidding Document (SBD) और NIT के प्रावधानों, विशेषकर क्लॉज 33, के दायरे में रहकर किए गए, जिसमें Engineer-in-Chief को अनुबंध आवंटन से पूर्व किसी भी समय बिना कारण बताए बोली प्रक्रिया रद्द करने का अधिकार दिया गया है।

राज्य ने यह भी इंगित किया कि आपत्तियों पर बार-बार विचार किया गया, कार्यपालक अभियंता से रिपोर्ट ली गई, और समिति ने तकनीकी मुद्दों की समीक्षा के लिए कई बार (06.05.2025, 10.06.2025, 27.06.2025, 01.07.2025 और 12.07.2025) बैठक की। अंतत:, जब यह स्पष्ट हो गया कि L-1 के पास पर्याप्त बोली क्षमता नहीं है और दरों की गोपनीयता भंग हो चुकी है, तो एकमात्र न्यायसंगत उपाय पूरे टेंडर को रद्द कर पुनः-टेंडर करना था।

न्यायालय ने पाँच प्रश्न निर्धारित किए और एक-एक कर उनका उत्तर दिया।

पहले प्रश्न पर, न्यायालय ने स्वीकार किया कि 26.06.2025 की कार्यपालक अभियंता की रिपोर्ट से स्पष्ट रूप से यह पता चलता था कि Shanti Construction की बोली क्षमता आवश्यक मानक से कम थी। समिति का 30.06.2025 का निर्णय (मेमो संख्या 2469), जिसमें Shanti Construction की बोली को उत्तरदायी घोषित किया गया, यद्यपि रिपोर्ट को नज़रअंदाज करने के कारण दर्ज नहीं किए गए, को न्यायालय ने “किसी हद तक मनमानी और मस्तिष्क का समुचित उपयोग न करने” का प्रतीक बताया।

हालाँकि, न्यायालय ने साथ ही यह भी बल दिया कि बाद में जब बोली क्षमता की कमी और गोपनीयता भंग होने की बात स्वीकार कर ली गई और पूरे टेंडर को रद्द कर दिया गया, तो यह कदम एक “सुधारात्मक उपाय” (corrective measure) के रूप में कार्य करता है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के Michigan Rubber (India) Ltd. v. State of Karnataka, Afcons Infrastructure Ltd. v. Nagpur Metro Rail Corporation Ltd. और Montecarlo Ltd. v. NTPC Ltd. जैसे निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित है कि तकनीकी क्षमता का आकलन करने में टेंडर प्राधिकारी सर्वोत्तम स्थिति में होते हैं और न्यायालय केवल स्पष्ट mala fide या चरम मनमानी के मामलों में ही हस्तक्षेप कर सकते हैं।

इस प्रकार, समिति के पूर्व दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए भी न्यायालय ने यह माना कि अंततः टेंडर रद्द कर पुनः-टेंडर करने का निर्णय किसी भी पूर्व त्रुटि को निष्प्रभावी कर देता है और इससे mala fide का संकेत नहीं मिलता।

दूसरे प्रश्न पर, 01.07.2025 के निर्णय (मेमो संख्या 2477) के संबंध में, न्यायालय ने फिर इंगित किया कि जिस दिन पूर्व निर्णय अपलोड किया गया, उसी दिन बिना किसी नए तथ्य या कारण के, और मौजूदा प्रतिकूल रिपोर्ट के बावजूद, पूर्व निर्णय को दोहराना आदर्श प्रशासनिक आचरण नहीं था। न्यायालय ने इसे “प्रक्रियात्मक कमी” (procedural lapse) माना।

फिर भी, न्यायालय ने यह तर्क दिया कि चूँकि उत्तरदाताओं ने शीघ्र ही बोली क्षमता का पुनर्मूल्यांकन किया, समस्या को पहचाना और पूरे टेंडर को रद्द कर दिया, इसलिए व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह कमी “हानिरहित” (harmless) हो गई। न्यायालय के लिए महत्वपूर्ण बात यह थी कि विभाग ने अंतत: गलती को स्वीकार कर उसे सुधारने का कदम उठाया, न कि एक अयोग्य बोलीदाता को कार्य आवंटित करवाने की दिशा में आगे बढ़ा।

तीसरे प्रश्न पर, न्यायालय ने यह विचार किया कि क्या L-1 की अपर्याप्त बोली क्षमता और गोपनीयता भंग होने के आधार पर 14.07.2025 के मेमो संख्या 2611 द्वारा टेंडर रद्द करना NIT के क्लॉज 33 के अंतर्गत वैध था। उक्त क्लॉज विशेष रूप से Engineer-in-Chief को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी बोली को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है और अनुबंध आवंटन से पहले किसी भी समय बिना कारण बताए पूरी बोली प्रक्रिया रद्द कर सभी बोलियों को अस्वीकार कर सकता है।

न्यायालय ने रद्दीकरण के पीछे दो ठोस कारणों पर ध्यान दिया:

(i) पुनर्गणना से यह सामने आया कि पहले से आवंटित कार्यों को समायोजित करने के बाद Shanti Construction के पास टेंडर किए गए कार्य के लिए आवश्यक बोली क्षमता नहीं थी; और

(ii) वित्तीय बोलियाँ पहले ही खोली जा चुकी थीं, इसलिए सभी बोलीदाताओं को L-1 की दरों की जानकारी हो गई थी, जिसका अर्थ है कि यदि अब शेष बोलीदाताओं पर विचार किया जाता, तो पूर्व टेंडर की गोपनीयता और निष्पक्षता को बनाए नहीं रखा जा सकता था।

न्यायालय ने माना कि ये कारण तार्किक, वस्तुनिष्ठ थे और क्लॉज 33 तथा Afcons और Michigan Rubber में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के दायरे में आते हैं। ऐसे परिदृश्य में टेंडर रद्द कर पुनः-टेंडर करना “प्रशासनिक विवेक के विधिसम्मत और बुद्धिसंगत प्रयोग” के रूप में वर्णित किया गया।

चौथे प्रश्न पर, न्यायालय ने याचिकाकर्ता के इस दावे पर विचार किया कि L-2 के रूप में, और L-1 की दर पर कार्य करने की तत्परता के साथ, उसे अनुबंध मिलना चाहिए। न्यायालय ने पहले यह नोट किया कि याचिकाकर्ता ने रिट याचिका में अपने पक्ष में अनुबंध आवंटन के लिए स्पष्ट रूप से कोई विशिष्ट प्रार्थना तक नहीं की थी।

और अधिक बुनियादी रूप से, न्यायालय ने यह ठहराया कि केवल इस कारण कि कोई अन्य बोलीदाता अयोग्य पाया गया है, किसी भी बोलीदाता को सरकारी अनुबंध पाने का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। NIT के क्लॉज 33 में रद्दीकरण की अनुमति है; विभाग के लिए L-2 तक जाने की कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के W.B. State Electricity Board v. Patel Engineering Co. Ltd. निर्णय पर भरोसा किया, जिसमें यह कहा गया है कि प्राधिकारी किसी भी बोलीदाता को उसके उद्धृत मूल्य पर अनुबंध देने के लिए बाध्य नहीं है।

न्यायालय ने हाल के निर्णय Prakash Asphaltings And Toll Highways (India) Ltd. v. Mandeepa Enterprises & Others का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने टेंडर शर्तों की पवित्रता पर जोर दिया और यह माना कि वित्तीय बोलियों को बाद में किए गए समायोजनों द्वारा बदला या “बचाया” नहीं जा सकता, भले ही इससे सार्वजनिक राजस्व को लाभ हो सकता हो। इसी तर्क को लागू करते हुए, न्यायालय ने यह माना कि बोलियाँ खोले जाने के बाद L-1 दरों को मिलाने की याचिकाकर्ता की बाद की पेशकश कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। सार्वजनिक हित को टेंडर नियमों की अवहेलना कर केवल सबसे सस्ती दरें प्राप्त करने तक सीमित नहीं किया जा सकता।

अतः, याचिकाकर्ता के पास L-2 के रूप में अनुबंध दिलाए जाने का कोई प्रवर्तनीय वैधानिक अधिकार नहीं था।

पाँचवें प्रश्न पर, जो अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र की सीमा से संबंधित था, न्यायालय ने Jagdish Mandal v. State of Orissa, Tata Cellular v. Union of India और Michigan Rubber के प्रस्थापित सिद्धांतों को दोहराया। न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक कार्रवाई को mala fide, मनमानी और अतार्किकता से मुक्त रखना है, न कि व्यावसायिक निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन करना या तकनीकी विशेषज्ञों के स्थान पर न्यायालय की राय को प्रतिस्थापित करना।

इस मामले में, न्यायालय ने पाया कि उत्तरदाताओं ने तकनीकी और वित्तीय दोनों स्तरों पर कई दौर की जाँच की, रिपोर्टें प्राप्त कीं, और अंतत: क्लॉज 33 के तहत अधिकार का प्रयोग करते हुए टेंडर रद्द कर पुनः-टेंडर करने का निर्णय लिया। पूरी प्रक्रिया में “मस्तिष्क का प्रयोग और प्रशासनिक सावधानी” दृष्टिगोचर हुई और पक्षपात या दुर्भावना (bad faith) का कोई संकेत नहीं मिला।

अंत में, न्यायालय ने ठहराया कि यद्यपि कारण दर्ज करने और कार्यपालक अभियंता की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देने में प्रारंभिक स्तर पर कुछ कमी रही, परंतु टेंडर रद्द कर पुनः विज्ञापन जारी करने की अंतिम कार्रवाई वैध, निष्पक्ष और विभाग की वैधानिक शक्ति के दायरे में थी। L-2 के रूप में निराश बोलीदाता याचिकाकर्ता अनुच्छेद 226 का उपयोग कर सार्वजनिक टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता के ऊपर अपने निजी व्यावसायिक हित को थोप नहीं सकता।

तदनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई, उत्तरदाताओं को विधि के अनुसार पुनः-टेंडर की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी गई। व्यय (costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया और सभी लंबित अंतरिम प्रार्थना पत्र निपटाए गए माने गए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय ठेकेदारों और सरकारी विभागों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

ठेकेदारों के लिए, यह स्पष्ट करता है कि L-2 होना, या यहाँ तक कि L-1 की दर से काम करने की तत्परता जताना भी, टेंडर रद्द हो जाने की स्थिति में कार्य पाने का कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं करता। एक बार जब बोलियाँ खुल जाएँ और गोपनीयता भंग हो जाए, तो प्राधिकारी पूरे टेंडर को रद्द कर नई प्रक्रिया शुरू कर सकता है, बजाय इसके कि अनुबंध को क्रमवार नीचे की ओर स्थानांतरित करे।

प्रशासन के लिए, पटना उच्च न्यायालय यह पुष्टि करता है कि जब भी बोली क्षमता या गोपनीयता भंग होने के बारे में वास्तविक चिंता हो, तो अनुबंध आवंटन से पहले टेंडर रद्द किया जा सकता है, बशर्ते निर्णय ईमानदार हो और सार्वजनिक हित में हो। मूल्यांकन में पहले यदि कुछ गलतियाँ हो भी जाएँ, तो रद्दीकरण और पुनः-टेंडर जैसे सुधारात्मक कदम आमतौर पर न्यायालय द्वारा कायम रखे जाएँगे।

निर्णय यह भी पुनर्स्थापित करता है कि न्यायालय टेंडर संबंधी निर्णयों में केवल तभी हस्तक्षेप करेंगे जब स्पष्ट mala fide, पक्षपात या घोर मनमानी हो। यह कि किसे L-1 या L-2 माना जाए, या बाद में सुधार द्वारा ठीक की जा सकने वाली सामान्य प्रक्रियात्मक कमियाँ, प्रायः टेंडर प्रक्रिया को निरस्त कराने का आधार नहीं बनेंगी।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या कार्यपालक अभियंता की बोली क्षमता संबंधी प्रतिकूल रिपोर्ट के बावजूद M/s Shanti Construction को तकनीकी रूप से उत्तरदायी घोषित करने का तकनीकी बोली मूल्यांकन समिति का निर्णय मनमाना था?
    उत्तर: हाँ, 30.06.2025 का निर्णय बिना कारण के था और मनमानी को दर्शाता था, किन्तु बाद में पूरे टेंडर को रद्द कर पुनः-टेंडर करने की कार्रवाई ने सुधारात्मक उपाय के रूप में कार्य कर उस दोष को दूर कर दिया।
  • प्रश्न: L-1 की बोली क्षमता अपर्याप्त पाई जाने और गोपनीयता भंग हो जाने के बाद 14.07.2025 के मेमो संख्या 2611 द्वारा टेंडर रद्द करना, NIT के क्लॉज 33 के अंतर्गत वैध था?
    उत्तर: हाँ, न्यायालय ने माना कि यह रद्दीकरण क्लॉज 33 के तहत विवेक के विधिसम्मत और बुद्धिसंगत प्रयोग का उदाहरण था, जो वस्तुनिष्ठ कारणों पर आधारित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुरूप था।
  • प्रश्न: क्या याचिकाकर्ता, L-2 होते हुए और L-1 दरों पर काम करने की तत्परता के बावजूद, अनुबंध दिए जाने की कोई कानूनी माँग कर सकता था?
    उत्तर: नहीं, न्यायालय ने माना कि L-2 के पास अनुबंध पाने का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं है; टेंडर शर्तें और क्लॉज 33 रद्दीकरण की अनुमति देते हैं और बाद में L-1 की दरों से मेल खाने की पेशकश टेंडर नियमों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • Michigan Rubber (India) Ltd. v. State of Karnataka, (2012) 8 SCC 216
  • Afcons Infrastructure Ltd. v. Nagpur Metro Rail Corporation Ltd., (2016) 16 SCC 818
  • Montecarlo Ltd. v. NTPC Ltd., (2016) 15 SCC 272
  • W.B. State Electricity Board v. Patel Engineering Co. Ltd. and Others, (2001) 2 SCC 451
  • Prakash Asphaltings And Toll Highways (India) Ltd. v. Mandeepa Enterprises & Others, Civil Appeal No. 11418 of 2025
  • Jagdish Mandal v. State of Orissa and Others, (2007) 14 SCC 517
  • Tata Cellular v. Union of India, (1994) 6 SCC 651

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 11886 of 2025

मामले का शीर्षक: Basant Kumar v. The State of Bihar & Others

उद्धरण: 2025(4) PLJR 653

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ (Coram): माननीय मुख्य न्यायाधीश; माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा

निर्णय की तिथि: 09.10.2025

CAV तिथि: 24.09.2025

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: श्री प्रभात रंजन, अधिवक्ता; श्री अंश प्रसाद, अधिवक्ता; श्री शुभम प्रकाश, अधिवक्ता

प्रतिवादियों के अधिवक्ता: श्री पी.के. शाही, महाधिवक्ता; श्री विकास कुमार, अधिवक्ता

प्रतिवादी प्राधिकारी: बिहार राज्य, अतिरिक्त मुख्य सचिव, ग्रामीण कार्य विभाग के माध्यम से, तथा अन्य अधिकारी जिनमें Engineer-in-Chief, Chief Engineer-2 (Gaya), Superintending Engineer (Work Circle Sasaram), Nodal Officer MMGSUY और Executive Engineer (Works Division Sasaram-1) शामिल हैं

मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें सार्वजनिक निर्माण अनुबंध में तकनीकी मूल्यांकन निर्णयों, टेंडर रद्दीकरण और पुनः-टेंडर को चुनौती दी गई

निर्णय का लिंक: पूरा पटना उच्च न्यायालय निर्णय देखें

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