विभाजन अपील को नए निर्णय के लिए पुनर्विचारार्थ भेजा गया – पटना उच्च न्यायालय, 2025

पटना उच्च न्यायालय ने पारिवारिक भूमि विभाजन विवाद में प्रथम अपील के आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने माना कि औरंगाबाद के वाद अपीलीय न्यायालय ने स्वयं अपना स्वतंत्र मंतव्य नहीं बनाया और केवल वाद-न्यायालय के निष्कर्षों की नकल कर दी। मामला नए, कारणयुक्त निर्णय के लिए पुनः उसी न्यायालय को भेजा गया है। वादी के पक्ष में पारित विभाजन डिक्री अब निचली अपीलीय अदालत में पुनर्विचाराधीन है।

वाद की पृष्ठभूमि

यह वाद बिहार राज्य के जिला औरंगाबाद, ग्राम पररिया स्थित पुश्तैनी भूमि को लेकर लंबे समय से चल रहे पारिवारिक विवाद से संबंधित है। प्रतिवादी (अपील में उत्तरदाता), जो वादी थे, ने अपने 8 आना (आधा) हिस्से के विभाजन के लिए संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में विभाजन वाद संख्या 172/2004 उप न्यायाधीश‑प्रथम, औरंगाबाद के समक्ष दायर किया। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि अंतिम डिक्री के बाद सर्वे‑जानकार अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति की जाए और उन्हें उनके अलग किए गए हिस्से पर कब्जा दिलाया जाए।

वादपत्र में वादी ने वाद से संबंधित भूमि का विवरण दिया और मूल प्रतिवादी, स्व. जटुनी गोपे @ रामजतन यादव तथा अन्य पारिवारिक सदस्यों से अपने संबंध को स्पष्ट करने के लिए विस्तृत वंशावली सारणी दी। उनके अनुसार, ग्राम पररिया की खाता संख्या 25 की भूमि कैडस्ट्रल सर्वे (C.S.) खतियान में पालीत गोपे, पुत्र पाती गोपे के नाम दर्ज थी और खाता संख्या 31 रांगू गोपे, पुत्र मंगरू गोपे के नाम दर्ज थी।

उन्होंने दलील दी कि यद्यपि C.S. खतियान में पालीत गोपे और रांगू गोपे अलग‑अलग दर्ज थे, लेकिन वे संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य थे और खाता संख्या 25 एवं 31 की भूमि पर संयुक्त कब्जे में थे। रांगू गोपे की संतानहीन अवस्था में तथा संयुक्तता की स्थिति में मृत्यु होने पर, उसकी हिस्सेदारी उसके निकटतम संबंधी को हस्तांतरित हो गई। वादी का कहना था कि इसके फलस्वरूप पालीत गोपे दोनों खातों के एकमात्र स्वामी हो गए।

पालीत गोपे की मृत्यु के बाद उनके पीछे तीन पुत्र छूटे – झगारू (झागरू) गोपे, रौड़ी गोपे और देवा गोपे – जो सभी संयुक्त अवस्था में थे। बाद में रौड़ी की संतानहीन मृत्यु पर उसका हिस्सा उसके दोनों सहोदर भाई झगारू और देवा के पास ही रहा। इसके बाद झगारू की मृत्यु हुई, जिनके पीछे उनका पुत्र जटुनी गोपे (मूल प्रतिवादी) और उनका सहोदर भाई देवा जीवित रहे, और देवा की मृत्यु पर उनके पीछे वादी, बलिराम, जीवित रहे।

वादी के अनुसार, झगारू और देवा की मृत्यु के बाद जटुनी गोपे वादी और प्रतिवादी से गठित संयुक्त परिवार के कर्ता और प्रबंधक बन गए। वादी का दावा था कि वाद की संपत्ति पुश्तैनी या सहभौमिक (कॉपार्सनरी) संपत्ति है, जिसमें वे और प्रतिवादी दोनों समान रूप से हितधारक हैं, शीर्षक और कब्जा संयुक्त है और न तो पालीत के पुत्रों के बीच और न ही वादी तथा प्रतिवादी के बीच कभी विभाजन हुआ।

विवाद तब न्यायालय में आया जब, वादी के अनुसार, प्रतिवादी ने बिना विभाजन के संयुक्त संपत्ति का हस्तांतरण करने का प्रयास किया। वादी ने भाग बाँधकर विभाजन (metes and bounds द्वारा) की मांग की, जिसे अंततः प्रतिवादी ने अस्वीकार कर दिया, और इसी कारण विभाजन वाद दायर किया गया।

समन तामील होने पर मूल प्रतिवादी जटुनी गोपे ने वाद का प्रतिरोध किया। उन्होंने लिखित बयान दाखिल कर वाद की ग्राह्यता को चुनौती दी और कहा कि वादी का कोई लोकस स्टैंडी नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से वादी की वंशावली से इनकार किया और कहा कि वादी का उनके परिवार से कोई संबंध नहीं है। उनका दावा था कि वादी के पिता देवा गोपे स्व. पालीत गोपे के पुत्र नहीं थे और न ही उनके अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार के सदस्य थे। उन्होंने अमा गोपे के परिवार की अपनी ओर से एक पृथक वंशावली सारणी भी दी।

वाद‑न्यायालय ने आठ मुद्दे तैयार किए। उसने मुद्दा संख्या 5, 6 और 7 को मुख्य मुद्दे मानकर निर्णय हेतु लिया और शेष को औपचारिक करार दिया। दोनों पक्षों की दलीलों, मौखिक साक्ष्य और दस्तावेजी साक्ष्य का विचार कर उप न्यायाधीश‑प्रथम, औरंगाबाद ने 30.04.2008 को वाद डिक्री कर दिया और माना कि वादी वाद की संपत्ति में आधे हिस्से का हकदार है।

इसके विरुद्ध प्रतिवादी ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश‑तृतीय, औरंगाबाद के समक्ष विभाजन अपील संख्या 18/2008/115/2018 दायर की। निम्न अपीलीय न्यायालय ने 20.06.2019 के अपने निर्णय एवं डिक्री द्वारा अपील खारिज कर दी और वाद‑न्यायालय की डिक्री की पुष्टि की।

उक्त अपीलीय निर्णय को चुनौती देते हुए मूल प्रतिवादी के विधिक उत्तराधिकारी, जो अब अपीलकर्ता हैं, ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील संख्या 424/2019 दायर की।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

द्वितीय अपील में पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति खातिम रज़ा के माध्यम से, पहले दो महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों की पहचान की:

(I) क्या अपीलीय न्यायालय ने सिविल वाद संहिता (CPC) के आदेश XLI नियम 31 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किसी भी निर्धारण बिंदु (point of determination) को विन्यस्त किए बिना निर्णय पारित किया?

(II) क्या अपीलीय न्यायालय का निर्णय स्वतंत्र कारणों से रहित था और उसने केवल वाद‑न्यायालय के निर्णय की नकल करते हुए उसे अनुमोदित किया?

इन प्रश्नों का समुचित मूल्यांकन करने के लिए उच्च न्यायालय ने वाद की पृष्ठभूमि पर पुनः दृष्टि डाली। वादी का दावा संयुक्त हिन्दू परिवार और सहभौमिक अधिकारों पर आधारित था, जो सामान्य पूर्वज पालीत गोपे और उनके पुत्रों से अवतरित बताकर अंततः 8 आना हिस्से का दावा किया गया। प्रतिवादी का बचाव मुख्यतः दो आधारों पर आधारित था – संबंध (वंशावली) का निषेध और एक पूर्व दर्ज राययत द्वारा भूमि के एक भाग की कथित पूर्व बिक्री।

वंशावली के संबंध में वाद‑न्यायालय ने पाया कि दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत गवाह न तो परिवार के सदस्य थे, न ही पड़ोसी, और न ही उन्हें पारिवारिक वृक्ष के बारे में किसी विशेष जानकारी के साधन प्राप्त थे। विश्वसनीय मौखिक साक्ष्य के अभाव में वाद‑न्यायालय ने प्रदर्श‑1, चकबंदी खतियान, पर भरोसा किया, जिसमें वादी और प्रतिवादी को एक ही शाखा से आने वाला तथा समान हिस्सेदार दिखाया गया था। चूंकि इस दस्तावेज को प्रतिवादी ने न तो विवादित किया और न ही अविश्वसनीय बताया, अतः वाद‑न्यायालय ने वादी की वंशावली सारणी को सही माना। यही निष्कर्ष बाद में निम्न अपीलीय न्यायालय ने यांत्रिक ढंग से अनुमोदित कर दिया।

शीर्षक और कब्जे के संबंध में प्रतिवादी एक कथित लेन‑देन पर निर्भर रहे – यह दावा कि खाता संख्या 31 के दर्ज धारक रांगू गोपे ने 21.07.1926 को 75 रुपये में विधिक आवश्यकता के लिए अपनी पूरी जमीन झागरू गोपे की पत्नी नगिना देवी के पक्ष में अविभाजित विक्रय पत्र (प्रदर्श‑D) द्वारा बेच दी। यह कहा गया कि उसी दिन विक्रय का मेमोरेंडम लिखा गया, कब्जा सुपुर्द कर दिया गया और नगिना का नाम पूर्व जमींदार के अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया। उनकी मृत्यु पर उनके पति झागरू और फिर उनके पुत्र जटुनी कथित रूप से राययत के रूप में कब्जे में आ गए। इस आधार पर प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि वाद की भूमि वादी की पुश्तैनी या सहभौमिक संपत्ति नहीं है।

प्रतिवादी ने अनेक दस्तावेज पेश किए, जिनमें शामिल हैं:

प्रदर्श‑A (वकालतनामा), प्रदर्श‑A1 (लिखित बयान पर अधिवक्ता का हस्ताक्षर), प्रदर्श‑B से B5 (किराया रसीदें), प्रदर्श‑C से C2 (जमींदारी रसीदें), और प्रदर्श‑D (अविभाजित विक्रय पत्र)। वादी ने प्रदर्श‑1 (कंसोलिडेशन/चकबंदी खतियान), प्रदर्श‑2 (कैडस्ट्रल सर्वे खतियान) और एक पंचनामा प्रदर्श‑X के रूप में दाखिल किया। दोनों पक्षों ने व्यापक मौखिक साक्ष्य भी दिए – वादी की ओर से आठ गवाह और प्रतिवादी की ओर से चौदह गवाह।

वाद‑न्यायालय ने पूर्व विभाजन और रांगू द्वारा कथित बिक्री संबंधी मुद्दा संख्या 6 और 7 का परीक्षण किया। उसने माना कि पक्षकारों के बीच किसी पूर्व विभाजन का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत जमींदारी रसीदों को उसने स्वयं प्रतिवादी के साक्ष्य में विरोधाभासों के कारण अविश्वसनीय माना। 75 रुपये के अविभाजित विक्रय पत्र (प्रदर्श‑D) को वाद‑न्यायालय ने अविभाजित दस्तावेज मानते हुए प्रतिवादी के विशिष्ट शीर्षक या कब्जे को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

द्वितीय अपील में अपीलकर्ताओं ने निम्न अपीलीय न्यायालय के निर्णय पर यह कहकर प्रहार किया कि उसने स्वतंत्र रूप से इस साक्ष्य का मूल्यांकन नहीं किया और आदेश XLI नियम 31 CPC का पालन नहीं किया। उनका तर्क था कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने निर्धारण के बिंदु तैयार नहीं किए, मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया और केवल वाद‑न्यायालय के निष्कर्षों की नकल कर दी। यह कहा गया कि इस प्रकार की कार्य‑पद्धति ने प्रथम अपील में तथ्यों और विधि दोनों पर पूर्ण पुनःसुनवाई के उनके मूल्यवान अधिकार का हनन किया।

अपीलकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि दोनों निचली अदालतों ने केवल अविभाजित होने के आधार पर ही प्रदर्श‑D को खारिज कर दिया, जबकि पंजीकरण अधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत 100 रुपये से कम मूल्य के विक्रय पत्र का पंजीकरण वैकल्पिक है, अनिवार्य नहीं। उनका कहना था कि अपीलीय न्यायालय ने इस पहलू पर कोई विचार ही नहीं किया।

दूसरी ओर, उत्तरदाता ने समवर्ती निष्कर्षों का समर्थन किया। Parmanand Yadav & Anr. v. Jagdeo Yadav & Ors. (2014) 3 PLJR 827 पर भरोसा करते हुए यह तर्क रखा गया कि तथ्यों पर समवर्ती निष्कर्ष, भले ही त्रुटिपूर्ण हों, द्वितीय अपील में विचलित नहीं किए जा सकते। उत्तरदाता ने संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 पर भी भरोसा किया और यह रेखांकित किया कि 100 रुपये से कम मूल्य की अचल संपत्ति की बिक्री या तो पंजीकृत विलेख से होनी चाहिए या कब्जे के सुपुर्द‑करने से, और मात्र सांकेतिक सुपुर्दगी पर्याप्त नहीं है। उत्तरदाता ने इंगित किया कि प्रतिवादी प्रदर्श‑D से उत्पन्न वास्तविक कब्जा सिद्ध करने में विफल रहे और दोनों निचली अदालतों ने उनके दावे को अस्वीकार कर सही किया।

उत्तरदाता का यह भी कहना था कि न्यून अपीलीय न्यायालय ने सारतः वाद‑न्यायालय के निष्कर्षों पर विचार किया है और इस तरह आदेश XLI नियम 31 CPC की पर्याप्त रूप से अनुपालना की है। इस तर्क के समर्थन में गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्णय Gopendra Goswami & Ors. v. Haradhan Das & Ors., AIR 2009 Gauhati 41 पर भरोसा किया गया, कि जहां अपीलीय न्यायालय वाद‑न्यायालय से सहमत हो, वहां उसे सभी साक्ष्य या कारणों को दोहराने की आवश्यकता नहीं है।

पटना उच्च न्यायालय ने अपीलीय निर्णय का सूक्ष्म परीक्षण किया। उसे यह मिला कि निम्न अपीलीय न्यायालय के निर्णय के पैरा संख्या 10, 11, 12 और 13 के निष्कर्ष वाद‑न्यायालय के निर्णय के पैरा संख्या 8, 9, 10 और 11 की केवल हू‑ब‑हू नकल हैं। अपीलीय न्यायालय द्वारा कोई स्वतंत्र विश्लेषण या न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग नहीं दिखता।

उच्च न्यायालय ने प्रथम अपीलों के संबंध में स्थापित विधिक स्थिति को दोहराया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय P.V. Nagesh & Anr. v. H.V. Sreenivasa Murthy, (2010) 3 SCC 530 तथा Malluru Mallappa (Dead) Through LRs v. Kuruvathappa & Ors., (2020) 4 SCC 313 का संदर्भ लेते हुए यह रेखांकित किया गया कि आदेश XLI नियम 31 CPC के अनुसार अपीलीय न्यायालय के निर्णय में निम्नलिखित बातों का उल्लेख होना अनिवार्य है:

(a) निर्धारण के बिंदु,
(b) उन पर निर्णय,
(c) निर्णय के कारण, तथा
(d) जहां डिक्री को पलटा या परिवर्तित किया जाता है, वहां अपीलकर्ता को प्रदान की जाने वाली राहत।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रथम अपील एक मूल्यवान अधिकार है। पूरे वाद की तथ्यों और विधि दोनों पर पुनःसुनवाई का द्वार प्रथम अपील में खुला रहता है। अतः अपीलीय न्यायालय द्वारा सचेत मस्तिष्क का प्रयोग दिखना चाहिए, सभी मुद्दों और साक्ष्यों से निपटना चाहिए तथा अपने स्वतंत्र कारण देने चाहिए।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि निम्न अपीलीय न्यायालय इन अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहा। उसने न तो निर्धारण के बिंदु विन्यस्त किए और न ही साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया। उसने मात्र वाद‑न्यायालय के निष्कर्षों को बिना स्वतंत्र तर्क के अपना लिया। उच्च न्यायालय ने माना कि इससे अपीलकर्ताओं को गंभीर पूर्वाग्रह पहुँचा और यह आदेश XLI नियम 31 CPC का अनुपालन न करने के समान है, जिसके परिणामस्वरूप अपीलीय निर्णय त्रुटिपूर्ण हो गया।

उच्च न्यायालय ने यह भी नोट किया कि 100 रुपये से कम मूल्य के विक्रय पत्र के पंजीकरण तथा संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 के अंतर्गत उसके प्रभाव से संबंधित प्रश्न पर निम्न अपीलीय न्यायालय ने समुचित दृष्टिकोण से विचार नहीं किया। इस प्रकार प्रथम अपील में महत्वपूर्ण विधिक एवं तथ्यात्मक प्रश्न अनुत्तरित रह गए।

इन परिस्थितियों में पटना उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों का उत्तर अपीलकर्ताओं के पक्ष में दिया। उसने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश‑तृतीय, औरंगाबाद द्वारा विभाजन शीर्षक अपील संख्या 18/2008/115/2018 में 20.06.2019 को पारित निर्णय एवं डिक्री को निरस्त कर दिया। मामला विधि के अनुरूप नए सिरे से अपील का निर्णय करने हेतु निम्न अपीलीय न्यायालय को पुनर्विचारार्थ भेज दिया गया। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि निर्णय की प्रति प्राप्त होने की तिथि से अधिमानतः छह माह के भीतर अपील का निपटारा किया जाए।

इस प्रकार द्वितीय अपील सफल हुई और स्वीकृत की गई। पक्षकारों के सभी गुण‑दोष संबंधी तर्क निम्न अपीलीय न्यायालय द्वारा विचारार्थ खुले रखे गए। व्यय के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया और लंबित सभी अंतरिम प्रार्थना‑पत्र, यदि कोई हों, निष्पादित माने गए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय मुख्य रूप से इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि पटना उच्च न्यायालय ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के कर्तव्यों को कड़ाई से लागू किया। इस निर्णय में यह अंतिम रूप से नहीं तय किया गया कि भूमि का मालिक कौन है या उसका विभाजन किस प्रकार होगा। इसके बजाय यह रेखांकित किया गया कि जब कोई पक्ष प्रथम अपील दायर करता है, तो उस अपील की गंभीरता से और पूर्ण रूप से सुनवाई की जानी चाहिए।

विभाजन वादों और अन्य दीवानी विवादों के वादकारों के लिए इसका अर्थ यह है कि अपीलीय न्यायालय केवल वाद‑न्यायालय के आदेश की नकल कर अपील खारिज नहीं कर सकता। उसे यह करना होगा:

अपने स्वतंत्र निर्धारण बिंदु तैयार करना, तथ्यों और विधि दोनों का पुनः परीक्षण करना, मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों पर चर्चा करना, तथा वाद‑न्यायालय से सहमत या असहमत होने के स्पष्ट कारण देने होंगे।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो उच्च न्यायालय द्वितीय अपील में हस्तक्षेप कर सकता है और वाद को वापस भेज सकता है। यही बात इस मामले में हुई है। वादी की विभाजन डिक्री अब अंतिम नहीं रही; अब वह निम्न अपीलीय न्यायालय के नए निर्णय पर निर्भर करेगी।

यह निर्णय ग्रामीण पारिवारिक संपत्ति विवादों के विशेष संदर्भ में यह भी रेखांकित करता है कि कम मूल्य के पुराने अविभाजित विक्रय पत्रों और किराया रसीदों की जांच संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 और पंजीकरण अधिनियम के आलोक में समुचित रूप से की जानी चाहिए। यद्यपि उच्च न्यायालय ने इन प्रश्नों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है, परन्तु उसने संकेत किया है कि ऐसे मुद्दों पर अपीलीय न्यायालय द्वारा विस्तार से विचार किया जाना आवश्यक है।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या निम्न अपीलीय न्यायालय ने निर्धारण बिंदु न बनाकर तथा अपने स्वतंत्र कारण न देकर CPC के आदेश XLI नियम 31 का उल्लंघन किया?
    उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अपीलीय न्यायालय ने केवल वाद‑न्यायालय के निष्कर्षों की नकल की और स्वतंत्र विश्लेषण नहीं किया, जो आदेश XLI नियम 31 की अनिवार्य आवश्यकताओं का उल्लंघन है।
  • प्रश्न: जब अपीलीय न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से परीक्षण नहीं किया, तो क्या उसका निर्णय टिकाऊ था?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने पाया कि अपीलीय न्यायालय ने न तो साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया और न ही कारणयुक्त निर्णय दिया, जिससे अपीलकर्ताओं को पूर्वाग्रह हुआ और उसका निर्णय त्रुटिपूर्ण हो गया।
  • प्रश्न: प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा ऐसी अवहेलना का क्या परिणाम होता है?
    उत्तर: उच्च न्यायालय ने अपीलीय डिक्री को निरस्त कर दिया और अपील को विधि के अनुरूप नए सिरे से निपटारे हेतु, निर्धारित समयावधि के भीतर, निम्न अपीलीय न्यायालय को वापस भेज दिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत वाद

  • P.V. Nagesh & Anr. v. H.V. Sreenivasa Murthy, (2010) 3 SCC 530
  • Malluru Mallappa (Dead) Through Legal Representatives v. Kuruvathappa & Ors., (2020) 4 SCC 313
  • Gopendra Goswami & Ors. v. Haradhan Das & Ors., AIR 2009 Guwahati 41 (दलीलों में उद्धृत)
  • Parmanand Yadav & Anr. v. Jagdeo Yadav & Ors., (2014) 3 PLJR 827 (दलीलों में उद्धृत)
  • Janardhan Narasimha Nayak v. Balwant Venaktesh Kulkarni & Anr., (2007) 9 SCC 658 (दलीलों में उद्धृत)

वाद का विवरण

वाद संख्या: द्वितीय अपील संख्या 424/2019

वाद का शीर्षक: Deonandan Yadav @ Deonarayan Yadav & Ors. v. Baliram Gop

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Khatim Reza

उद्धरण: 2025(3) PLJR 208

अधिवक्ता:

अपीलकर्ताओं (प्रतिवादियों) की ओर से: श्री नरेंद्र कुमार, अधिवक्ता; श्री तेज नारायण सिंह, अधिवक्ता; श्री आकश अंबुज, अधिवक्ता।

उत्तरदाता (वादी) की ओर से: सुश्री सुनीता कुमारी, अधिवक्ता; श्री धर्मेन्द्र कुमार सिन्हा, अधिवक्ता।

पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 15.05.2025

वाद की प्रकृति: विभाजन वाद (पारिवारिक संपत्ति विवाद) में द्वितीय अपील, जिसके माध्यम से प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा विभाजन की डिक्री की पुष्टि करने वाले निर्णय को चुनौती दी गई।

निचली अदालतों का इतिहास:

वाद‑न्यायालय: विभाजन वाद संख्या 172/2004, निर्णय एवं डिक्री दिनांक 30.04.2008, उप न्यायाधीश‑प्रथम, औरंगाबाद द्वारा, वादी को आधे हिस्से की डिक्री।

प्रथम अपील: विभाजन शीर्षक अपील संख्या 18/2008/115/2018, निर्णय एवं डिक्री दिनांक 20.06.2019, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश‑तृतीय, औरंगाबाद द्वारा, वाद‑न्यायालय के निर्णय की पुष्टि करते हुए अपील खारिज।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/OSM0MjQjMjAxOSMxI04=-lYshrG2S6n4=


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