वाहन चोरी के बाद अवैध नीलामी की भरपाई मुआवज़े से की गई — पटना उच्च न्यायालय, 2025

याचिकाकर्ता ने अपनी चोरी हुई बोलेरो पिकअप की अवैध ज़ब्ती और नीलामी को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने उत्पाद एवं ज़िला प्राधिकारियों द्वारा गंभीर चूकें पाईं। न्यायालय ने वाहन के पूर्ण बीमित मूल्य के भुगतान का आदेश दिया, साथ ही संभावित ब्याज का भी। न्यायालय ने मुख्य सचिव को भी निर्देश दिया कि वे ज़िम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करें और रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला बोलेरो पिकअप (महिंद्रा), पंजीकरण संख्या BR06GB-1358, जिसकी मालिकाना हक़दारी याचिकाकर्ता के पास थी, की ज़ब्ती और नीलामी से उत्पन्न हुआ।

याचिकाकर्ता का वाहन अज्ञात अपराधियों द्वारा चोरी कर लिया गया था। इस चोरी के कारण 24.10.2019 को अहियापुर थाना, मुज़फ्फरपुर में एक प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसे अहियापुर थाना कांड सं. 1287/2019 के रूप में भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।

बाद में, इसी चोरी किए गए वाहन का कथित रूप से बिहार उत्पाद क़ानून के अंतर्गत अपराधों में उपयोग हुआ। इसके लिए 21.12.2019 को सूपी थाना, सीतामढ़ी में एक और प्राथमिकी दर्ज की गई, जो सूपी थाना कांड सं. 268/2019 के रूप में पंजीकृत हुई।

उत्पाद संबंधी मामले के आधार पर, आधिकारिक प्रतिवादियों ने वाहन के विरुद्ध ज़ब्ती की कार्यवाही आरंभ की। 06.07.2020 को ज़ब्ती का आदेश पारित किया गया। इसके उपरांत 10.03.2022 को प्राधिकारियों ने वाहन की नीलामी की।

वाहन को नीलामी में 1,30,000 रुपए (रुपये एक लाख तीस हज़ार) में बेचा गया। किंतु वाहन 3,50,000 रुपए (रुपये तीन लाख पचास हज़ार) की राशि के लिए MAGMA HDI General Insurance Company Ltd. के साथ 18.09.2019 से 17.09.2020 की अवधि हेतु बीमित था।

बिना नोटिस के की गई ज़ब्ती और नीलामी तथा कम नीलामी मूल्य से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की शरण ली और सिविल रिट अधिकारिता मामला सं. 12581/2024 दायर किया।

न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय की डिवीजन पीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी और माननीय न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा सम्मिलित थे, ने रिट याचिका की सुनवाई की।

याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों को निर्देशित करने की प्रार्थना की कि बोलेरो पिकअप को वास्तविक स्वामी के रूप में उसके पक्ष में रिलीज़ किया जाए। वाहन को अहियापुर थाना कांड सं. 1287/2019, धारा 379 आईपीसी के संबंध में ज़ब्त किया गया था, और याचिकाकर्ता ने कहा कि इस वाहन को प्रतिवादी सं. 7 ने प्रतिवादी सं. 6 से, उत्पाद विभाग, सीतामढ़ी द्वारा कराई गई नीलामी में खरीदा था।

न्यायालय ने सबसे पहले यह दर्ज किया कि याचिकाकर्ता उक्त वाहन का कथित स्वामी था। न्यायालय ने यह नोट किया कि वाहन चोरी हो गया था और चोरी के संबंध में 24.10.2019 को तत्काल प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। यह भी दर्ज किया गया कि बाद में यही वाहन उत्पाद अधिनियम के अंतर्गत अपराधों में संलिप्त पाया गया, जिसके कारण 21.12.2019 को सूपी थाना कांड सं. 268/2019 दर्ज हुआ।

इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने यह जाँच की कि प्राधिकारियों ने ज़ब्ती और नीलामी की कार्यवाही किस प्रकार की। अभिलेखों पर भरोसा करते हुए पीठ ने पाया कि आधिकारिक प्रतिवादियों ने 06.07.2020 को ज़ब्ती का आदेश पारित किया और 10.03.2022 को वाहन की नीलामी कर दी।

न्यायालय ने माना कि वाहन को ज़ब्त और नीलाम करने से पूर्व, ज़ब्ती एवं नीलामी करने वाले प्राधिकारी से यह अपेक्षित था कि वे क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय से वाहन स्वामी के विवरण और ठिकाने का पता लगाएँ। यह कार्य नहीं किया गया।

रिकॉर्ड की आगे की जाँच में पीठ ने पाया कि वाहन की ज़ब्ती या प्रस्तावित नीलामी के संबंध में याचिकाकर्ता को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था। न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि स्वामी को सूचित न करना और स्वामित्व की जाँच न करना, ज़ब्ती एवं नीलामी प्रक्रिया के हर चरण में एक “भारी त्रुटि” (ब्लंडर) के समान है।

इसके बाद पीठ ने नीलामी मूल्य और बीमित मूल्य की तुलना की। वाहन को 1,30,000 रुपए में नीलाम किया गया, जबकि बीमा पॉलिसी (MAGMA HDI General Insurance Company Ltd. द्वारा जारी परिशिष्ट-P/1) में 18.09.2019 से 17.09.2020 की अवधि के लिए 3,50,000 रुपए का बीमित मूल्य दर्शाया गया था। ज़ब्ती की तिथि तक बीमा पॉलिसी वैध थी।

इस आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता बीमित वाहन के मूल्य, अर्थात 3,50,000 रुपए का हकदार है, क्योंकि चोरी और बाद की उत्पाद-संबंधी ज़ब्ती दोनों बीमा पॉलिसी की अवधि के दौरान हुई थीं; चोरी की प्राथमिकी 24.10.2019 को और उत्पाद संबंधी प्राथमिकी 21.12.2019 को दर्ज हुई।

तदनुसार न्यायालय ने संबंधित प्राधिकारी को याचिकाकर्ता के पक्ष में 3,50,000 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया। प्राधिकारी को आदेश दिया गया कि वह निर्णय की तिथि से आठ सप्ताह के भीतर डिमांड ड्राफ्ट जारी करे।

न्यायालय ने देरी की स्थिति में परिणामों का भी प्रावधान किया। आदेश दिया गया कि यदि आठ सप्ताह के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो याचिकाकर्ता वाहन की ज़ब्ती की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 6% वार्षिक की साधारण ब्याज का हकदार होगा।

व्यक्तिगत मामले से आगे बढ़ते हुए न्यायालय ने समान मामलों से उभरते व्यापक पैटर्न की समीक्षा की। पीठ ने कहा कि उसे कई समान मामलों में उत्पाद विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा ज़ब्ती और नीलामी की कार्यवाही में “गंभीर चूकें” मिली हैं। न्यायालय ने नोट किया कि विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है और इसका परिणाम “राजकोष को भारी नुकसान” के रूप में सामने आया है।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि नीलामी से पहले वाहनों का मूल्य आँकने के लिए कोई मानक प्रक्रिया दिखाई नहीं देती। आदर्श रूप से, प्राधिकारियों को मोटर वाहन विभाग या बीमा कंपनी के माध्यम से मूल्य का पता लगाना चाहिए। यदि किसी वाहन के लिए बीमा पॉलिसी उपलब्ध न हो, तो उस वाहन का मॉडल और निर्माता (मेक एंड मॉडल), तथा किसी बीमा कंपनी की राय के आधार पर उचित मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए।

पीठ ने उसी दिन उसके समक्ष आए एक अन्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें एक ट्रक को 2,00,000 रुपए में नीलाम किया गया था, जबकि उसका बीमा मूल्य लगभग 21,00,000 रुपए था। इस उदाहरण का उपयोग यह रेखांकित करने के लिए किया गया कि मूल्यांकन प्रक्रिया किस हद तक ख़राब ढंग से संचालित की जा रही है।

न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि ऐसी चूकें जारी रहीं तो राज्य की राजकोषीय निधि को भारी नुकसान होगा और करदाताओं के धन की बर्बादी होगी।

इन टिप्पणियों को मज़बूत विधिक आधार देने के लिए न्यायालय ने “कर्तव्य से युग्मित शक्ति” के सिद्धांत का हवाला दिया। इस संदर्भ में उसने Julius v. Lord Bishop of Oxford [(1880) 5 AC 214] में अर्ल केर्न्स, एल.सी. द्वारा प्रतिपादित शास्त्रीय व्याख्या का उद्धरण दिया, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Commissioner of Police v. Gordhandas Bhanji [1952 SCR 135] में स्वीकृत किया है। उद्धृत अंश इस बात पर बल देता है कि कुछ प्रसंगों में किसी प्राधिकरण को दी गई शक्ति केवल विवेकाधीन अनुमति नहीं होती, बल्कि संबंधित व्यक्तियों के हित में उसे प्रयोग करने का कर्तव्य भी साथ लेकर चलती है।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि सक्षम प्राधिकारी “शक्ति से युग्मित संवैधानिक कर्तव्य” के अधीन है। न्यायालय ने बल दिया कि प्रत्येक लोक सेवक समाज का न्यासी होता है और उसे संवैधानिक एवं लोक नीतियों, जिनमें अनुच्छेद 14 तथा संबंधित प्रावधान और निदेशक सिद्धांत शामिल हैं, के क्रियान्वयन में ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, निष्ठा और वफ़ादारी प्रदर्शित करनी चाहिए।

पीठ ने रेखांकित किया कि लोक सेवकों को संवैधानिक लक्ष्यों के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। न्यायालय के अनुसार, इस मामले में सक्षम प्राधिकारियों ने “उस विश्वास के साथ विश्वासघात किया” और “लोक नीति को विफल करने की प्रवृत्ति दिखाई।” न्यायालय की दृष्टि में तथ्य दर्शाते हैं कि उन्होंने अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाने में विफलता दिखाई है।

इन चूकों की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने केवल व्यक्तिगत राहत तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उसने बिहार राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे मामले की जाँच कर संबंधित दोषी अधिकारियों के विरुद्ध उपयुक्त कार्यवाही करें। मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया कि वे दो माह के भीतर न्यायालय की रजिस्ट्री को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

इस तर्क के आधार पर न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने अपना मामला सिद्ध कर दिया है। रिट याचिका को स्वीकार किया गया, मौद्रिक राहत प्रदान की गई, और दिनांक 17.06.2025 को उस मामले को सूचीबद्ध करने की तिथि नियत की गई, ताकि अनुच्छेद 6 में निहित निर्देशों (अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही और मुख्य सचिव द्वारा रिपोर्टिंग से संबंधित) के अनुपालन की समीक्षा की जा सके।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन वाहन स्वामियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके वाहन चोरी हो जाते हैं और बाद में उत्पाद संबंधी मामलों में ज़ब्त किए जाते हैं। यह दर्शाता है कि भले ही वाहन ज़ब्त और नीलाम हो चुका हो, प्राधिकारी वास्तविक स्वामी की अनदेखी नहीं कर सकते, विशेषकर जब उसके विवरण सरकारी अभिलेखों से आसानी से प्राप्त किए जा सकते हों।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि ज़ब्ती और नीलामी वाहन स्वामी की पीठ पीछे नहीं की जा सकती। नोटिस देना, स्वामित्व की जाँच करना और उचित मूल्यांकन करना अनिवार्य है।

यह निर्णय लोक धन की भी रक्षा करता है। कम मूल्य पर की गई नीलामी की आलोचना करते हुए और उसे राजकोष के लिए नुकसान बताते हुए, न्यायालय ने अधिकारियों को यह याद दिलाया कि वे लोक निधि के न्यासी हैं और उन्हें सावधानीपूर्वक तथा पारदर्शी ढंग से कार्य करना चाहिए।

साधारण नागरिकों के लिए यह निर्णय यह दिखाता है कि जब अधिकारी लापरवाहीपूर्वक और विधि अनुसार प्रक्रिया का पालन किए बिना कार्य करते हैं, तब न्यायालय वाहन के बीमित मूल्य के आधार पर मुआवज़ा प्रदान करने के लिए तैयार है।

विधिक मुद्दे और उनके उत्तर

  • मुद्दा: क्या याचिकाकर्ता के चोरी हुए वाहन की, बिना उसे नोटिस दिए और बिना स्वामित्व एवं मूल्यांकन की उचित जाँच किए, की गई ज़ब्ती और नीलामी विधिक रूप से टिकाऊ थी?
    उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने प्रभावी रूप से माना कि प्राधिकारियों ने प्रत्येक चरण पर गंभीर चूकें कीं, अपने संवैधानिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया, और इस प्रकार याचिकाकर्ता वाहन के बीमित मूल्य के बराबर मुआवज़े का, तथा भुगतान में देरी होने पर ब्याज का, हकदार है।
  • मुद्दा: वाहन के बीमित मूल्य से बहुत कम मूल्य पर की गई अवैध नीलामी के बाद, याचिकाकर्ता को क्या मौद्रिक राहत प्राप्त होनी चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने 3,50,000 रुपए, जो वाहन का बीमित मूल्य है, का भुगतान आठ सप्ताह के भीतर करने का निर्देश दिया, और यह भी कहा कि यदि इस अवधि में भुगतान नहीं होता है तो याचिकाकर्ता ज़ब्ती की तिथि से भुगतान की तिथि तक 6% वार्षिक साधारण ब्याज का हकदार होगा।
  • मुद्दा: क्या ज़ब्ती और नीलामी से संबंधित मामलों में उत्पाद और राजस्व प्राधिकारियों द्वारा की जा रही तंत्रगत चूकें उच्च-स्तरीय प्रशासनिक हस्तक्षेप की माँग करती हैं?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने बिहार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे दोषी अधिकारियों के विरुद्ध उपयुक्त कार्यवाही करें और दो माह के भीतर उच्च न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Julius v. Lord Bishop of Oxford, (1880) 5 AC 214
  • Commissioner of Police v. Gordhandas Bhanji, 1952 SCR 135

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 12581 of 2024

मामले का शीर्षक: Ashok Rai v. The State of Bihar & Ors.

संदर्भ: 2025 (2) PLJR 508

पीठ (कोरम): Hon’ble Mr. Justice P. B. Bajanthri और Hon’ble Mr. Justice Alok Kumar Sinha

निर्णय की तिथि: 19.03.2025

वकील: याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Ranjit Kumar Thakur, Advocate; राज्य की ओर से: Mr. Prabhakar Jha, Government Pleader-27

मामले का स्वरूप: ज़ब्त एवं नीलाम किए गए वाहन की रिहाई अथवा उसके संबंध में उपयुक्त राहत के लिए दायर सिविल रिट अधिकारिता के अंतर्गत रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTI1ODEjMjAyNCMxI04=-egM4q–am1–H5m–am1–E=

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